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अनुकर्म

आआआआआआआआआआ – 2
आआआआआआ
आआ-आआ आआआ आआआआआआआ आआआआआआआआआ आआ आआआआआ
आआआआ आआआ आआआआआ आआआ आआ आआआआआ आआ आआआआ आआ आआआ-आआ आआआ आआआआ
आआ आआ आआआआआ आआआआ आआआआआआ आआ आआआआआ आआआआआआ आआआआ आ आआआआआ आआआ
आआआआआ आआआआआआ आआआआ । आआआआ आआआआ आआआआआआआआ आआआआ आआ आआआ आआ आआआ
आआआ। आआआआआआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआआआआआआ आआ आआआआआ आआ आआआआआ
आआआआ आआ आआआ आआ आआआआ आआआआ आआ, आआ आआ आआ आआ आआ आआआआआआ आआ आआआ
आआआ। आआ आआआआ आआआआआआ आआ आआआ आआआआ-आआआआआआ आआआ आआआ आआ 'आआआआआ
आआआआआ आआआ आआआ, आआआआआआ-आआआआआआ आआआआआआ आआआआआआ, आआआ आआ आआआ
आआआआआ आआआआ आआआ। आआआआआआआआआ आआआ आआ आआआ आआआआआआआ आआआ। आआआआआआ !
आआ.....'
पूज यबापू जी व यिथतह दृ य से समाज की दुदर शासुन ी औ र इस पर काबू पाने के िलए आ श मद ाराकई चल
िचिकत्सालय एवं आयुवैर्िदक िचिकत्सालय खोल िदये। आशर्म द्वारा औषिधयों का कहीं
िनःशु ल्कतो कहीं नाममातर् दरों पर िवतरण िकया जाने लगा। परंतु इतने से ही संत हृदय
कहाँ मानता है ? स्वास्थ्य का अनुपम अमृत घर-घर तक पहुँचे, इस उद्देश् यसे लोकसंत
पूजय बापू जी ने आरोगय के अनेको सरल उपाय अपने सतसंग-पवचनो मे समय-समय पर बताये हैं। िजन्हें
आशर्म द्वारा पर्काश ितपितर्काओं 'ऋिष-पसाद' व 'दरवेश-दर् शशश न श' तथा समाचार पतर् 'लोक
कल्याण सेतु' में समय-समय पर पर्काश ितिकया गया है। उनका लाभ लाखों करोड़ों
भारतवासी और िवदेश के लोग उठाते रहे है।
ऋतुचयार् का पालन तथा ऋतु-अनुकूल फल, सिब्जयाँ, सूखे मेवे, खाद्य वस्तुएँ आिद
का उपयोग कर स्वास्थ्य की सुरक्षा करने की ये सुन्दर युिक्तयाँ संगर्ह के रूप में
पकािशत करने की जन जन की माग 'आआआआआआआआआआ-2' के रूप में साकार हो रही है। आप इसका
खूब-खूब लाभ उठायें तथा औरों को िदलाने का दैवी कायर् भी करें। आधुिनकता की
चकाचौंध से पर्भािवत होकर अपने स्वास्थ्य और इस अमूल्य रत्न मानव-देह का सत्यानाश
मत कीिजए।
आइये, अपने स्वास्थ्य के रक्षक और वैद्य स्वयं बिनये। अंगर्ेजी दवाओं और
ऑपरेशनो के चंगुल से अपने को बचाइये और जान लीिजए उन कु ंिजयो को िजनसे हमारे पूवरज 100 वषों से भी अिधक
समय तक स्वस्थ और सबल जीवन जीते थे।
इस पुस्तक का उद्देश् यआपको रोगमुक्त करना ही नहीं, बिल्क आपको बीमारी हो ही
नहीं, ऐ सीखान-पान और रहन-सहन की सरल युिक्तयाँ भी आप तक पहुँचाना है। अंत में आप-हम
यह भी जान लें िक उत्तम स्वास्थ्य पाने के बाद वहीं रुक नहीं जाना है, संतों के बताये
मागर् पर चलकर पर्भु को भी पाना है.... अपनी शाश् वतआत्मा-परमातमा को भी पहचानना है।
आआआआ आआआ आआआआआआआ आआआआ आआआआआ,
आआआआआआआ । आआआआआआ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआआ आआ आआआ
आआआआआआ
मैं शरीर को जानता हूँ, मन को जानता हूँ, इिन्दर्यों को जानता हूँ, मन में आये हुए
काम, कर्ोध, भय आिद के िवचारो को जानता हूँ। इसिलए शरीर की अवसथा और मन के सुख-दुःख मुझे स्पर्शशश
नहीं कर सकते....।' ऐसे िवचार बार-बार करो। हो सके तो कभी-कभी िकसी कमरे में या एकांत
स्थान पर अकेले बैठकर अपने आप से पूछोः 'क्या मैं शरीर हूँ ?' खूब गहराई से पूछो।
जब तक भीतर से उतर न िमले तब तक बार बार पूछते रहो। भीतर से उतर िमलेगाः 'नहीं, मैं वह शरीर नहीं
हूँ।' तो िफर शरीर के सुख दुःख और उसके सम्बिन्धयों के शरीर के सुख-दुःख क्या मेरे
सुख-दुःख हैं ?' उत्तर िमलेगाः 'नहीं.... मैं शरीर नहीं तो शरीर के सुख-दुःख और उसके
सम्बिन्धयों के शरीर के सुख-दुःख मेरे कैसे हो सकते हैं ?' िफर पूछोः ' तो क्या मैं
मन या बुिद्ध का बार-बार िचन्तन करना दुबर्ल िवचारों और दुभार्ग्य को िनकालने का एक
अनुभविसद्ध इलाज है। इसका पर्योग अवश् यकरना। 'ॐ' का पावन जप करते जाना और आगे
बढ़ते जाना। पर्भु के नाम का स्मरण और परमात्मा से पर्ेम करते रहना।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आआआआआआआ
िनवेदन
दुबर्ल िवचारों को हटाने के िलए पर्योग
इस पुस्तक में पर्युक्त कुछ शब्दों के समानाथीर् अंगर्ेजी शब्द
आयुवेर्दः िनदोर्ष एवं उत्कृष्ट िचिकत्सा पद्धित
अंगर्ेजी दवाइयों से सावधान
आयुवेर्द की सलाह के िबना शल्यिकर्या कभी न करवायें
टॉिनसल की शलय िकया कभी नही
सुखमय जीवन की कुंिजयाँ
दीघर् एवं स्वस्थ जीवन के िनयम
अपने हाथ में ही अपना आरोग्य
पसनता और हासय
िदनचयार् में उपयोगी बातें
स्नान-िविध भोजन िविध भोजन-पात
ितिथ अनुसार आहार-िवहार एवं आचार संिहता
िनदर्ा और स्वास्थ्य
क्या आप तेजस्वी एवं बलवान बनना चाहते हैं?
ताड़ासन का चमत्कारी पर्योग
ऋतुचयार्
बसंत ऋतुचयार् ग ी ष म ऋतु च य ा लूः लक्ष्ण तथा बचाव के उपाय शरबत
वषा ऋतुचया शरद ऋतुचयार् शीत ऋतुचयार् शीत ऋतु में उपयोगी पाक
िविवध वयािधयो मे आहार िवहार
सब रोगों का मूलः पर्ज्ञापराध
स्वास्थ्य पर स्वर का पर्भाव
उपवास
फलों एवं अन्य खाद्य वस्तुओं से स्वास्थ्य सुरक्षा
अमृत फल िबल्व सीताफल सेवफल(सेब) अनार आम अमरूद(जामफल)
तरबूज पपीता ईख(गन ा ) बेर नींबू जामुन फालसा आँवला गाजर
करेला जमीकनद अदरक हल्दी एवं आमी हल्दी खेखसा(कंकोड़ा) धिनया
पुदीना पुननरवा (साटी) परवल हरीतकी(हरड़) लौंग दालचीनी मेथी जौ अरंडी
ितल का तेल गु ड
सूखा मेवा
बादाम अखरोट काजू अंजीर चारोली खजूर
पृथवी के अमृतः गोदुगध एवं शहद
स्वास्थ्य रक्षक अनमोल उपहार
तुलसी नीम तकर्(छाछ) गाय का घी
रोगों से बचाव
आँखों की सुरक्षा
दंत-सुरक्षा
गु द े क े रोग एवं िच िक त स ा
यकृत िचिकत्सा
हृदयरोग एवं िचिकत्सा
कर्ोध की अिधकता में....
आशर्म द्वारा िनिमर्त जीवनोपयोगी औषिधयाँ
गोझ रण अकर अश् वगंधाचूणर् हींगािद हरड़ चूणर् रसायन चूणर् संतकृपा
चूणर्
ितर्फला चूणर् आँवला चूणर् शोधनकल्प पीपल चूणर आयुवैर्िदक चाय
मुलतानी िमट्टी सुवणर् मालती रजत मालती सप्तधातुवधर्क बूटी
संत च्यवनपर्ाश मािलशतेलशशश आँवला तेल नीम तेल संतकृपा नेतर्िबन्दु
कणर्िबन्दु अमृत दर्व दंतामृत फेस पैक जयोितशिकत कल्याणकारक
सुवणर्पर्ाश
िमल का आटा स्वास्थ्य के िलए हािनकारक
क्या आप जानते हैं साबूदाने की असिलयत को?
टी.वी. अिधक देखने से बच्चों को िमगीर्...
चॉकलेट का अिधक सेवनः हृदयरोग को आमंतर्ण
'िमठाई की दुकान अथार्त् यमदूत का घर'
रसायन िचिकत्सा
सूयर्-शिक्त का पर्भाव
िपरािमड(बर्ह्माण्डीय ऊजार्)
शंख
घंट की ध्विन का औषिध पर्योग
वाममागर का वासतिवक अथर
स्मरणशिक्त कैसे बढ़ायें ?
िनरामय जीवन की चतुःसूतर्ी
बीमारी की अवस्था में भी परम स्वास्थ्य
आशर्म द्वारा िचिकत्सा व्यवस्था
अनुकर्म
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आआ आआआआआआ आआआ आआआआआआआआ आआआ आआआआआआ
आआ आआआआआआआआआ आआआआआआआआ आआआआ
यकृत लीवर दवाई का दुष्पर्भाव साईड इफेक्ट
गु द ा िकडनी पितजैिवक
एन्टीबायोिटक्स
पलीहा, ितल्ली स्पलीन पाचक रस एंजाइम
अम्लिपत्त एिसिडटी हृदय-पोषक हाटर् टॉिनक
अवसाद िडप े शन संकर्ामक शीतज्वर
इन्फ्लुएंजा
रक्तचाप ब्लडपर्ेशर मूतर्वधर्क
डाययुरेिटक
क्षयरोग टी.बी. रक्ताल्पा
एनीिमया
िदल का दौरा हाटर् अटैक पेिचस िडसेनटी
शल्यिकर्या ऑपरेशन िहचकी िहक्कप
शीतपेय कोल्डिडर्ंक्स सूजाक
गोन ोिर य ा
िवषमजवर टायफाइड कृितर्म
िसन्थेिटक
मधुमेह(मधुपर्मेह) डायिबटीज उपदंश िसफिलस
जीवाणु बैक्टीिरया आमाितसार डायिरया
हैजा कॉलरा सिन्नपात-संगर्हणी स्पर्ू
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआआ आआआआआआआ आआआ आआआआआआआआ
आआआआआआआआ-आआआआआआ
आयुवेर्द एक िनदोर्ष िचिकत्सा पद्धित है। इस िचिकत्सा पद्धित से रोगों का पूणर्
उन्मूलन होता है और इसकी कोई भी औषध दुषप ् र्भाव (साईड इफेक्ट) उत्पन्न नहीं करती।
आयुवेर्द में अंतरात्मा में बैठकर समािधदशा में खोजी हुई स्वास्थ्य की कुंिजयाँ हैं।
एलोपैथी में रोग की खोज के िवकिसत साधन तो उपलब्ध हैं लेिकन दवाइयों की
पितिकया (िरएक्शश न ) तथा दुष्पर्भाव (साईड इफेक्टस) बहुत हैं। अथार्त् दवाइयाँ िनदोर्ष
नहीं हैं क्योंिक वे दवाइयाँ बाह्य पर्योगों एवं बिहरंग साधनों द्वारा खोजी गई हैं।
आयुवेर्द में अथार्भाव, रूिच का अभाव तथा वषोर्ं की गुलामी के कारण भारतीय खोजों और
शास्तर्ों के पर्ित उपेक्षा और हीन दृिष्ट के कारण चरक जैसे ऋिषयों और भगवान
अिग्नवेष जैसे महापुरुषों की खोजों का फायदा उठाने वाले उन्नत मिस्तष्कवाले वैद्य
भी उतने नही रहे और ततपरता से फायदा उठाने वाले लोग भी कम होते गये। इसका पिरणाम अभी िदखायी दे रहा है।
हम अपने िदव्य और सम्पूणर् िनदोर्ष औषधीय उपचारों की उपेक्षा करके अपने
साथ अन्याय कर रहे हैं। सभी भारतवािसयों को चािहए िक आयुवेर्द को िवशेष महत्त्व दें
और उसके अधययन मे सुयोगय रिच ले। आप िवशभर के डॉकटरो का सवे करके देखे तो एलोपैथी का शायद ही कोई ऐसा
डॉकटर िमले जो 80 साल की उमर् में पूणर् स्वस्थ, पसन, िनलोर्भी हो। लेिकन आयुवेर्द के कई
वैद 80 साल की उमर् में भी िनःशु ल्कउपचार करके दिरदर्नारायणों की सेवा करने वाले,
भारतीय संसकृित की सेवा करने वाले सवसथ सपूत है।
(एक जानकारी के अनुसार 2000 से भी अिधक दवाइयाँ, जयादा हािनकारक होने के कारण
अमेिरका और जापान में िजनकी िबकर्ी पर रोक लगायी जाती है, अब भारत में िबक रही
हैं। तटस्थ नेता स्वगीर्य मोरारजी देसाई उन दवाइयों की िबकर्ी पर बंिदश लगाना चाहते
थे और िबकर्ी योग्य दवाइयों पर उनके दुष्पर्भाव िहन्दी में छपवाना चाहते थे। मगर
अंधे स्वाथर् व धन के लोभ के कारण मानव-स्वास्थ्य के साथ िखलवाड़ करने वाले दवाई
बनाने वाली कंपिनयों के संगठन ने उन पर रोक नहीं लगने दी। ऐसा हमने-आपने सुना
है।)
अतः हे भारतवािसयो ! हािनकारक रसायनों से और कई िवकृितयों से भरी हुई
एलोपैथी दवाइयों को अपने शरीर में डालकर अपने भिवष्य को अंधकारमय न बनायें।
शुद्ध आयुवेर्िदक उपचार-पदित और भगवान के नाम का आशय लेकर अपना शरीर सवसथ व मन पसन
रखो और बुिद्ध में बुिद्धदाता का पर्साद पाकर शीघर् ही महान आत्मा, मुक्तात्मा बन जाओ।
अनुकर्म
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आआआआआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआआआ !
सावधान ! आप जो जहरीली अंगर्ेजी दवाइयाँ खा रहे हैं उनके पिरणाम का भी जरा
िवचार कर ले।
वलडर हेलथ आगेनाइजेशन ने भारत सरकार को 72000 के करीब दवाइयों के नाम िलखकर उन पर
पितबनध लगाने का अनुरोध िकया है। कयो ? क्योंिक ये जहरीली दवाइयाँ दीघर् काल तक पेट में
जाने के बाद यकृत, गु द े और आ ँ त ो पर हािन का रक असर करती ह ै , िजससे मनुषय के पाण तक जा
सकते हैं।
कुछ वषर् पहले न्यायाधीश हाथी साहब की अध्यक्षता में यह जाँच करने के िलए
एक कमीशन बनाया गया था िक इस देश में िकतनी दवाइयाँ जरूरी हैं और िकतनी िबन जरूरी
हैं िजन्हें िक िवदेशी कम्पिनयाँ केवल मुनाफा कमाने के िलए ही बेच रही हैं। िफर
उन्होंने सरकार को जो िरपोटर् दी, उसमें केवल 117 दवाइयाँ ही जरूरी थीं और 8400
दवाइयाँ िबल्कुल िबनजरूरी थीं। उन्हें िवदेशी कम्पिनयाँ भारत में मुनाफा कमाने के
िलए ही बेच रही थीं और अपने ही देश के कुछ डॉक्टर लोभवश इस षडयंतर् में सहयोग
कर रहे थे।
पैरािसटामोल नामक दवाई, िजसे लोग बुखार को तुरत ं दूर करने के िलए या कम करने के िलए पयोग कर रहे है,
वही दवाई जापान मे पोिलयो का कारण घोिषत करके पितबिनधत कर दी गयी है। उसके बावजूद भी पजा का पितिनिधतव
करनेवाली सरकार पर्जा का िहत न देखते हुए शायद केवल अपना ही िहत देख रही है।
सरकार कुछ करे या न करे लेिकन आपको अगर पूणर् रूप से स्वस्थ रहना है तो आप
इन जहरीली दवाइयों का पर्योग बंद करें और करवायें। भारतीय संस्कृित ने हमें
आयुवेर्द के द्वारा जो िनदोर्ष औषिधयों की भेंट की हैं उन्हें अपनाएँ।
साथ ही आपको यह भी ज्ञान होना चािहए िक शिक्त की दवाइयों के रूप में आपको,
पािणयो का मास, रक्त, मछली आिद िखलाये जा रहे हैं िजसके कारण आपका मन मिलन,
संकल्पशिक्त कम हो जाती है। िजससे साधना में बरकत नहीं आती। इससे आपका जीवन
खोखला हो जाता है। एक संशोधनकतार् ने बताया िक बर्फ ु ेन नामक दवा जो आप लोग ददर् को
शांत करने के िलए खा रहे हैं उसकी केवल 1 िमलीगर्ाम मातर्ा ददर् िनवारण के िलए
पयापत है, िफर भी आपको 250 िमलीगर्ाम या इससे दुगनी मातर्ा दी जाती है। यह अितिरक्त
मातर्ा आपके यकृत और गुदेर् को बहुत हािन पहुँचाती है। साथ में आप साइड इफेक्टस का
िशकार
ह ोते हैं वह अलग!
घाव भरने के िलए पर्ितजैिवक (एन्टीबायोिटक्स) अंगर्ेजी दवाइयाँ लेने की कोई
जररत नही है।
िकसी भी पर्कार का घाव हुआ हो, टाके लगवाये हो या न लगवाये हो, शल्यिकर्या (ऑपरेशन) का
घव हो, अंदरूनी घाव हो या बाहरी हो, घाव पका हो या न पका हो लेिकन आपको पर्ितजैिवक
लेकर जठरा, आँतों, यकृत एवं गुदोर्ं को साइड इफेक्ट द्वारा िबगाड़ने की कोई जरूरत
नहीं है वरन् िनम्नांिकत पद्धित का अनुसरण करें-
घाव को साफ करने के िलए ताजे गोमूतर् का उपयोग करें। बाद में घाव पर हल्दी का
लेप करें।
एक से तीन िदन तक उपवास रखें। ध्यान रखें िक उपवास के दौरान केवल उबालकर
ठंडा िकया हुआ या गुनगुना गमर पानी ही पीना है, अन्य कोई भी वस्तु खानी-पीनी नही है। दूध भी नही लेना है।
उपवास के बाद िजतने िदन उपवास िकया हो उतने िदन केवल मूँग को उबाल कर जो पानी बचता है वही पानी
पीना है। मूँग का पानी कमशः गाढा कर सकते है।
मूँग के पानी के बाद कर्मशः मूँग, िखचड़ी, दाल-चावल, रोटी-सब्जी इस पर्कार
सामान्य खुराक पर आ जाना है।
कब्ज जैसा हो तो रोज 1 चम्मच हरड़े का चूणर् सुबह अथवा रात को पानी के साथ
लें। िजनके शरीर की पर्कृित ऐसी हो िक घाव होने पर तुरंत पक जाय, उन्हें ितर्फल गूगल
नामक 3-3 गोल ी िद न म े 3 बार पानी के साथ लेनी चािहए।
सुबह 50 ग ा म गोमू त तथा िद न म े 2 बार 3-3 ग ा म ह ल दी क े चू णर का स े व न करन े
से अिधक लाभ होता है। पुराने घाव में चन्दर्पर्भा वटी की 2-2 गोिल य ा िद न म े 2 बार
लें। जात्यािद तेल अथवा मलहम से वर्णरोपण करें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआ आआ आआआआ आआ आआआआ
आआआआआआआआआआ आआआ आ आआआआआआआ
डॉकटरो के बारे मे दो साधको के कटु अनुभव यहा पसतुत है- 'मेरी पत्नी गभर्वती थी। उसे उलटी,
उबकाई एवं पेट में ददर् होने लगा तो डॉक्टर को िदखाया। डॉक्टर ने सोनोगर्ाफी करके
हमें कहाः 'अभी तुरंत ऑपरेशन(शल्यिकर्या) करवाओ। गभर् टयूब में है और टयूब फट
जायेगी तो मा और बचचा, दोनों की जान खतरे में पड़ जायेगी।'
हम सूरत आशर्म में आये। 'साँई शर्ी लीलाशाहजी उपचार केन्दर्' में वैद्यराज जी
के समक्ष सारी पिरिस्थित बतायी। उन्होंने उपचार शुरु िकया। केवल गैस एवं मल मूतर् के
रुके रहने के कारण पेट में ददर् था। टबबाथ, दवा एवं अकर्पतर्-स्वेदन देते ही 10-15
िमनट में ददर् कम हो गया एवं दो-तीन घंटे में सब ठीक हो गया। दूसरे िदन सोनोगर्ाफी की
िरपोटर् देखकर वैद्यराज ने कहाः 'इस िरपोटर् में तो गभर् टयूब में है ऐसा कुछ िलखा ही
नहीं है।'
हमने बताया िक डॉक्टर साहब ने स्वयं ऐसा कहा था। आज भी मेरी पत्नी का स्वास्थ्य
अच्छा है। शायद पैसों के लोभ में डॉक्टर ऑपरेशन करने की सलाह देते हों तो
मानवता के इस व्यवसाय में कसाईपना घुस गया है, ऐसा कहना पडेगा।"
आआआआआआआआआ आआआआआ आआआआआ, आआ आआ 21,
आआआआआआआ आआआआआआ आआआ आआआआआ, आआआआआआ आआआ, आआआआआ-33
'मेरी धमर्पत्नी गभर्वती थी उसके पेट में ददर् तथा मूतर् में रूकावट की तकलीफ
थी। डॉक्टरों ने कहाः 'तुरंत ऑपरेशन करके मूतर्नली खोलकर देखनी पड़ेगी। ऑपरेशन
के दौरान आगे जैसा िदखेगा वैसा िनणर्य करके ऑपरेशन में आगे बढ़ना पड़ेगा।'
हमने बात वैद्यराज से कही तो उन्होंने हमें तुरंत सूरत आशर्म बुला िलया।
उन्होंने मूतर्कृच्छर् रोग की िचिकत्सा की तो ददर् ठीक हो गया। पेशाब भी खुलकर आने लगा।
आज भी मेरी धमर्पत्नी ठीक है।
अगर मैं डॉक्टरों के कहे अनुसार पत्नी का ऑपरेशन करवा देता तो वषोर्ं तक
मनौितयाँ मानने के बाद जो गभर् रहा था, उसको हम खो बैठते, भूणहतया का घोर पाप िसर पर लेते,
स्वास्थ्य और धन की िकतनी सारी हािन होती ! हमारे जैसे असंख्य देशवासी, कुछ नासमझ
तो कुछ कसाई वृित्त के लोगों से शोिषत होने से बचें, यही सभी से पर्ाथर्ना है।'
आआआआआआआआ आआआआआआआआ आआआआआ
आआआआआआआ आआआ, आआआ आआआ, आआ. आआआआ. आआ. आआआआआआआ. आआ.
आआआआ(आआआ.)
आम जनता को सलाह है िक आप िकसी भी पर्कार की शल्यिकर्या कराने से पहले
आयुवेर्द िवशेषज्ञ की सलाह अवश् यलेना। इससे शायद आप शल्यिकर्या की मुसीबत,
एलोपैथी दवाओं के साईड इफेक्ट तथा स्वास्थ्य एवं आिथर्क बरबादी से बच जायेंगे।
कई बार शल्यिकर्या करवाने के बावजूद भी रोग पूणर् रूप से ठीक नहीं होता और िफर
से वही तकलीफ शुरुर हो जाती है। मरीज शारीिरक-मानिसक-आिथर्क यातनाएँ भुगतता रहता
है। वे ही रोग कई बार आयुवेर्िदक िचिकत्सा से कम खचर् में जड़-मूल से िमट जाते
हैं।
कई बड़े रोगों में शल्यिकर्या के बाद भी तकलीफ बढ़ती हुई िदखती है। शल्यिकर्या
की कोई गारन्टी नहीं होती। कभी ऐसा होता है िक जो रोगी िबना शल्यिकर्या के कम पीड़ा से
जी सके, वही रोगी शलयिकया के बाद जयादा पीडा भुगतकर कम समय मे ही मृतयु को पापत हो जाता है।
आयुवेर्द में भी शल्यिचिकत्सा को अंितम उपचार बताया गया है। जब रोगी को
औषिध उपचार आिद िचिकतसा के बाद भी लाभ न हो तभी शलयिकया की सलाह दी जाती है। लेिकन आजकल तो सीधे ही
शल्यिकर्या करने की मानों, पथा ही चल पडी है। हालािक मात दवाएँ लेने से ही कई रोग ठीक हो जाते है,
शल्यिकर्या की कोई आवश्यकता नहीं होती।
लोग जब शीघर् रोगमुक्त होना चाहते हैं तब एलोपैथी की शरण जाते हैं। िफर सब
जगह से हैरान-परेशान होकर एवं आिथरक रप से बरबाद होकर आयुवेद की शरण मे आते है एवं यहा भी अपेका रखते है िक
जलदी अचछे हो जाये। यिद आरंभ से ही वे आयुवेद के कुशल वैद के पास िचिकतसा करवाये तो उपयुरकत तकलीफो से बच
सकते हैं। अतः सभी को स्वास्थ्य के सम्बन्ध में सजग-सतकर् रहना चािहए एवं अपनी
आयुवेर्िदक िचिकत्सा पद्धित का लाभ लेना चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआआ आआ आआआआआआआआआआ आआआ आआआआ
यह रोग बालक, युवा, पौढ – सभी को होता है िकंतु बालको मे िवशेष रप से पाया जाता है। िजन बालको की
कफ-पकृित होती है, उनमें यह रोग देखने में आता है। गला कफ का स्थान होता है। बच्चों
को मीठे पदाथर् और फल ज्यादा िखलाने से, बच्चों के अिधक सोने से(िवशेषकर िदन मे)
उनके गले में कफ एकितर्त होकर गलतुिण्डका शोथ(टॉिनसलस की सूजन) रोग हो जाता है।
इससे गले में खाँसी, खुजली एवं ददर् के साथ-साथ सदीर् एवं ज्वर रहता है, िजससे बालको
को खाने-पीने मे व नीद मे तकलीफ होती है।
बार-बार गलतुिण्डका शोथ होने से शल्यिचिकत्सक(सजर्न) तुरंत शल्यिकर्या करने
की सलाह देते हैं। अगर यह औषिध से शल्यिकर्या से गलतुिण्डका शोथ दूर होता है,
लेिकन उसके कारण दूर नहीं होते। उसके कारण के दूर नहीं होने से छोटी-मोटी
तकलीफें िमटती नहीं, बिल्क बढ़ती रहती हैं।
40 वषर पहले एक िवखयात डॉकटर ने रीडसर डायजेसट मे एक लेख िलखा था िजसमे गलतुिणडका शोथ की
शल्यिकर्या करवाने को मना िकया था।
बालकों ने गलतुिण्डका शोथ की शल्यिकर्या करवाना – यह माँ-बाप के िलए महापाप
है क्योंिक ऐसा करने से बालकों की जीवनशिक्त का हर्ास होता है।
िनसगोर्पचारक शर्ी धमर्चन्दर् सरावगी ने िलखा हैः 'मैंने टॉिन्सल्स के
सैंकड़ों रोिगयों को िबना शल्यिकर्या के ठीक होते देखा है।'
कुछ वषर् पहले इंग्लैण्ड और आस्टर्ेिलया के पुरुषों ने अनुभव िकया िक
टॉिनसलस की शलयिकया से पुरषतव मे कमी आ जाती है और सतीतव के कुछ लकण उभरने लगते है।
इटािलयन कान्सोलेन्ट, मुंबई से पर्काश ितइटािलयन कल्चर नामक पितर्का के अंक
नं. 1,2,3 (सन् 1955) में भी िलखा थाः 'बचपन में टॉिन्सल्स की शल्यिकर्या करानेवालों के
पुरषतव मे कमी आ जाती है। बाद मे डॉ. नोसेन्ट और गाइडो कीलोरोली ने 1973 में एक कमेटी की
स्थापना कर इस पर गहन शोधकायर् िकया। 10 िवदानो ने गेट िबटेन एवं संयुकत राजय अमेिरका के लाखो पुरषो
पर परीकण करके उपयुरकत पिरणाम पाया तथा इस खतरे को लोगो के सामने रखा।
शोध का पिरणाम जब लोगों को जानने को िमला तो उन्हें आश्चयर् हुआ ! टॉिनसलस की
शल्यिकर्या से सदा थकान महसूस होती है तथा पुरुषत्व में कमी आने के कारण जातीय सुख
में भी कमी हो जाती है और बार-बार बीमारी होती रहती है। िजन-िजन जवानो के टॉिनसलस की
शल्यिकर्या हुई थी, वे बंदकू चलाने मे कमजोर थे, ऐसा युद के समय जानने मे आया।
िजन बालको के टॉिनसलस बढे हो ऐसे बालको को बफर का गोला, कुल्फी, आइसकर्ीम, बफर् का पानी,
िफर्ज का पानी, चीनी, गु ड , दही, केला, टमाटर, उडद, ठंडा पानी, खट्टे-मीठे पदाथर्, फल, िमठाई,
िपपरिमंट, िबस्कुट, चॉकलेट ये सब चीजें खाने को न दें। जो आहार ठंडा, िचकना, भारी, मीठा,
खट्टा और बासी हो, वह उनहे न दे।
दूध भी थोड़ा सा और वह भी डालकर दें। पानी उबला हुआ िपलायें।
आआआआआ
टािनसलस के उपचार के िलए हलदी सवरशेष औषिध है। इसका ताजा चूणर टॉिनसलस पर दबाये, गरम पान ी
से कुल्ले करवायें और गले के बाहरी भाग पर इसका लेप करें तथा इसका आधा-आधा
ग ा म चू णर शहद म े िम ल ाकर बार -बार चटाते रहें।
दालचीनी के आधे गर्ाम से 2 ग ा म महीन पाऊडर को 20 से 30 ग ा म शहद म े
िमलाकर चटायें।
टॉिनसलस के रोगी को अगर कबज हो तो उसे हरड दे। मुलहठी चबाने को दे। 8 से 20 गोल ी
खिदरािदवटी या यिष्टमधु धनवटी या लवंगािदवटी चबाने को दें।
कांचनार गूगल का 1 से 2 ग ा म चू णर शहद क े साथ चटाय े ।
कफकेतु रस या ितर्भुवन कीितर्रस या लक्ष्मीिवलास रस(नारदीय) 1 से 2 गोल ी
देवें।
आधे से 2 चम्मच अदरक का रस शहद में िमलाकर देवें।
ितर्फला या रीठा या नमक या िफटकरी के पानी से बार-बार कुल्ले करवायें।
आआआआआआआ
गल े म े मफलर या पट ी लप े ट क र रखनी चािह ए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ आआआआ आआ आआआआआआआआ
आआआआआ आआआआआआआआ आआ आआआआआआआ आआआआ आआआआआआ आआ आआआआआआआ
आआआआआ आआ आआआ आआआआ-आआआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ आआआआआआआ
आआआआआआआआआ आआ आआआआआआ आआआआआ आआ आआआआआआ आआआआ आआआ आआआआआआआ आआ
आआआआआआ आआ आआ । आआ आआआआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआआआआआ आआआ आआ आआआआआ
आआआआआ आआ आआआआआ आआआआआ आआआआआआ आआआ आआ आआआआआ आआआआआआआआआ आआआ
सदाचार से मनुष्य को आयु, लक्ष्मी तथा इस लोक और परलोक में कीितर् की पर्ािप्त
होती है। दुराचारी मनुष्य इस संसार में लम्बी आयु नहीं पाता, अतः मनुष्य यिद अपना
कल्याण करना चाहता हो तो क्यों न हो, सदाचार उसकी बुरी पर्वृित्तयों को दबा देता है।
सदाचार धमर्िनष्ठ तथा सच्चिरतर् पुरुषों का लक्षण है।
सदाचार ही कल्याण का जनक और कीितर् को बढ़ानेवाला है, इसी से आयु की वृिद्ध
होती है और यही बुरे लक्षणों का नाश करता है। सम्पूणर् आगमों में सदाचार ही शर्ेष्ठ
बतलाया गया है। सदाचार से धमर् उत्पन्न होता है और धमर् के पर्भाव से आयु की वृिद्ध
होती है।
जो मनुषय धमर का आचरण करते है और लोक कलयाणकारी कायों मे लगे रहते है, उनके दर्शन न हुए हों
तो भी केवल नाम सुनकर मानव-समुदाय उनमें पर्ेम करने लगता है। जो मनुष्य नािस्तक,
िकर्याहीन, गुर और शास त की आज ा का उल लं घ न करन े वाल े , धमर् को न जाननेवाल,ेदुराचारी,
शीलहीन, धमर् की मयार्दाको भंगकरनेवालेतथादूसरेवणर्कीिस्तर्योंसेसंपकर्
रखनेवालेहै , ंवे इस लोक मे अलपायु
होते हैं और मरने के बाद नरक में पड़ते हैं। जो सदैव अशु द्धव चंचल रहता है, नख
चबाता है, उसे दीघार्यु नहीं पर्ाप्त होती। आआआआआआआ आआआआ आआ, आआआआआआआआ आआ
आआआ आआ आआआ ।
आआआ आआआआ आआ आआआ आआआआआ आआआआ आआआ जो सदाचारी, शर्द्धालु,
ईष्यार्रिहत, कर्ोधहीन, सत्यवादी, िहंसा न करने वाला, दोषदृिष्ट से रिहत और कपटशू न्यहै,
उसे दीघार्यु पर्ाप्त होती है।
पितिदन सूयोदय से एक घंटा पहले जागकर धमर और अथर के िवषय मे िवचार करे। मौन रहकर दंतधावन करे।
दंतधावन िकये िबना देव पूजा व संध्या न करे। देवपूजा व संध्या िकये िबना गुर,ु वृद,
धािमर्क
, िवदान पुरष को छोडकर दूसरे िकसी के पास न जाय। सुबह सोकर उठने के बाद पहले माता-िपता, आचायर्
तथा गुरुजनों को पर्णाम करना चािहए।
सूयोर्दय होने तक कभी न सोये, यिद िकसी िदन ऐसा हो जाय तो पर्ायशि ्चत करे,
गायत ी मं त का जप कर े , उपवास करे या फलािद पर ही रहे।
स्नानािद से िनवृत्त होकर पर्ातःकालीन संध्या करे। जो पर्ातःकाल की संध्या करके
सूयर् के सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीथोर्ं में स्नान का फल िमलता है और वह सब
पापो से छुटकारा पा जाता है।
सूयोर्दय के समय ताँबे के लोटे में सूयर् भगवान को जल(अघ्यर्) देना चािहए।
इस समय आँखें बन्द करके भर्ूमध्य में सूयर् की भावना करनी चािहए। सूयार्स्त के समय
भी मौन होकर संधयोपासना करनी चािहए। संधयोपासना के अंतगरत शुद व सवचछ वातावरण मे पाणायाम व जप िकये जाते
हैं।
िनयिमत ितर्काल संध्या करने वाले को रोजी रोटी के िलए कभी हाथ नहीं फैलाना
पडता ऐसा शासतवचन है। ऋिषलोग पितिदन संधयोपासना से ही दीघरजीवी हुए है।
वृद पुरषो के आने पर तरण पुरष के पाण ऊपर की ओर उठने लगते है। ऐसी दशा मे वह खडा होकर सवागत
और पणाम करता है तो वे पाण पुनः पूवावसथा मे आ जाते है।
िकसी भी वणर् के पुरुष को परायी स्तर्ी से संसगर् नहीं करना चािहए। परस्तर्ी सेवन
से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। इसके समान आयु को नष्ट करने वाला
संसार में दूसरा कोई कायर् नहीं है। िस्तर्यों के शरीर में िजतने रोमकूप होते हैं
उतने ही हजार वषोर्ं तक व्यिभचारी पुरुषों को नरक में रहना पड़ता है। रजस्वला स्तर्ी
के साथ कभी बातचीत न करे।
अमावस्या, पूिणरमा, चतुदर्शी और अष्टमी ितिथ को स्तर्ी-समागम न करे। अपनी पत्नी
के साथ भी िदन में तथा ऋतुकाल के अितिरक्त समय में समागम न करे। इससे आयु की
वृिद होती है। सभी पवों के समय बहचयर का पालन करना आवशयक है। यिद पती रजसवला हो तो उसके पास न जाय
तथा उसे भी अपने िनकट न बुलाये। शास्तर् की अवज्ञा करने से जीवन दुःखमय बनता है।
दूसरों की िनंदा, बदनामी और चुगली न करें, औरो को नीचा न िदखाये। िनंदा करना अधमर बताया

गया ह , इसिलए दूसरों की और अपनी भी िनंदा नहीं करनी चािहए। कर्ूरताभरी बात न बोले।
िजसके कहने से दूसरो को उदेग होता हो, वह रखाई से भरी हुई बात नरक मे ले जाने वाली होती है, उसे कभी मुँह
से न िनकाले। बाणों से िबंधा हुआ फरसे से काटा हुआ वन पुनः अंकुिरत हो जाता है, िकंतु
दुवर्चनरूपी शस्तर् से िकया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता।
हीनांग(अंधे, काने आिद), अिधकांग(छाँगुर आिद), अनपढ़, िनंिदत, कुरुप, धनहीनऔर
असत्यवादी मनुष्यों की िखल्ली नहीं उड़ानी चािहए।
नािस्तकता, वेदो की िनंदा, देवताओं के पर्ित अनुिचत आक्षेप, द्वेष, उद्दण्डता और
कठोरता – इन दुगुर्णों का त्याग कर देना चािहए।
मल-मूतर् त्यागने व रास्ता चलने के बाद तथा स्वाध्याय व भोजन करने से पहले
पैर धो लेने चािहए। भीगे पैर भोजन तो करे, शयन न करे। भीगे पैर भोजन करने वाला मनुष्य लम्बे
समय तक जीवन धारण करता है।
परोसे हुए अन की िनंदा नही करनी चािहए। मौन होकर एकागिचत से भोजन करना चािहए। भोजनकाल मे यह
अन्न पचेगा या नहीं, इस पर्कार की शंका नहीं करनी चािहए। भोजन के बाद मन-ही-मन
अिग्न का ध्यान करना चािहए। भोजन में दही नहीं, मट्ठा पीना चािहए तथा एक हाथ से
दािहने पैर के अँगूठे पर जल छोड़ ले िफर जल से आँख, नाक, कान व नािभ का स्पर्शशश
करे।
पूवर की ओर मुख करके भोजन करने से दीघायु और उतर की ओर मुख करके भोजन करने से सतय की पािपत
होती है। भूिम पर बैठकर ही भोजन करे, चलते-िफरते भोजन कभी न करे। िकसी दूसरे के
साथ एक पातर् में भोजन करना िनिषद्ध है।
िजसको रजसवला सती ने छू िदया हो तथा िजसमे से सार िनकाल िलया गया हो, ऐसा अन कदािप न खाय। जैसे
– ितलों का तेल िनकाल कर बनाया हुआ गजक, कर्ीम िनकाला हुआ दूध, रोगन(तेल) िनकाला
हुआ बादाम(अमेिरकन बादाम) आिद।
िकसी अपिवतर् मनुष्य के िनकट या सत्पुरुषों के सामने बैठकर भोजन न करे।
सावधानी के साथ केवल सवेरे और शाम को ही भोजन करे, बीच में कुछ भी खाना उिचत
नहीं है। भोजन के समय मौन रहना और आसन पर बैठना उिचत है। िनिषद्ध पदाथर् न
खाये।
राितर् के समय खूब डटकर भोजन न करें, िदन में भी उिचत मातर्ा में सेवन करे।
ितल की िचक्की, गजक और ित ल क े बन े पदाथर भारी होत े ह ै । इनको पचान े म े
जीवनशिकत अिधक खचर होती है इसिलए इनका सेवन सवासथय के िलए उिचत नही है।
जूठे मुँह पढना-पढाना, शयन करना, मस्तक का स्पर्शक रना कदािप उिचत नहीं है।
यमराज कहते हैं- '' जो मनुषय जूठे मुँह उठकर दौडता और सवाधयाय करता है, मैं उसकी आयु
नष्ट कर देता हूँ। उसकी संतानों को भी उससे छीन लेता हूँ। जो संध्या आिद अनध्याय के
समय भी अध्ययन करता है उसके वैिदक ज्ञान और आयु का नाश हो जाता है।" भोजन करके
हाथ-मुँह धोये िबना सूयर्-चन्दर्-नक्षतर् इन ितर्िवध तेजों की कभी दृिष्ट नहीं डालनी
चािहए।
मिलन दपर्म में मुँह न देखे। उत्तर व पशि ्चम की ओर िसर करके कभी न सोये, पूवर
या दिक्षण िदशा की ओर ही िसर करके सोये।
नािस्तक मनुष्यों के साथ कोई पर्ितज्ञा न करे। आसन को पैर से खींचकर या फटे
हुए आसन पर न बैठे। राितर् में स्नान न करे। स्नान के पश् चाततेल आिद की मािलश न
करे। भीगे कपड़े न पहने।
गुर क े साथ कभी हठ नही ठानन ा चािह ए। गुर प ित कू ल बत ा व करत े हो तो भी उनक े
पित अचछा बताव करना ही उिचत है। गुर की िनंदा मनुषयो की आयु नष कर देती है। महातमाओं की िनंदा से मनुषय का
अकल्याण होता है।
िसर के बाल पकड़कर खींचना और मस्तक पर पर्हार करना विजर्त है। दोनों हाथ
सटाकर उनसे अपना िसर न खुजलाये।
बारंबार मस्तक पर पानी न डाले। िसर पर तेल लगाने के बाद उसी हाथ से दूसरे
अंगों का स्पर्शन हीं करना चािहए। दूसरे के पहने हुए कपड़े , जूते आिद न पहने।
शयन, भमण तथा पूजा के िलए अलग-अलग वस्तर् रखें। सोने की माला कभी भी पहनने से
अशु द्धनहीं होती।
संध्याकाल में नींद, स्नान, अध्ययन और भोजन करना िनिषद्ध है। पूवर् या उत्तर की
मुँह करके हजामत बनवानी चािहए। इससे आयु की वृिद्ध होती है। हजामत बनवाकर िबना
नहाय रहना आयु की हािन करने वाला है।
िजसके गोत और पवर अपने ही समान हो तथा जो नाना के कुल मे उतपन हुई हो, िजसके कुल का पता न हो,
उसके साथ िववाह नहीं करना चािहए। अपने से शर्ेष्ठ या समान कुल में िववाह करना
चािहए।
तुम सदा उद्योगी बने रहो, क्योंिक उद्योगी मनुष्य ही सुखी और उन्नतशील होता है।
पितिदन पुराण, इितहास, उपाखयान तथा महातमाओं के जीवनचिरत का शवण करना चािहए। इन सब बातो का पालन
करने से मनुष्य दीघर्जीवी होता है।
पूवरकाल मे बहाजी ने सब वणर के लोगो पर दया करके यह उपदेश िदया था। यह यश, आयु और स्वगर् की
पािपत कराने वाला तथा परम कलयाण का आधार है।
(आआआआआआआ, आआआआआआआ आआआआ आआ आआआआआआ)
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ आआआ आआआआआआ आआआआ आआ आआआआ
पतयेक मनुषय दीघर, स्वस्थ और सुखी जीवन चाहता है। यिद स्वस्थ और दीघर्जीवी बनना हो
तो कुछ िनयमों को अवश् यसमझ लेना चािहए।
आसन-पाणायाम, जप-ध्यान, संयम-सदाचार आिद से मनुष्य दीघर्जीवी होता है।
मोटे एवं सूती वस्तर् ही पहनें। िसंथेिटक वस्तर् स्वास्थ्य के िलए िहतकर नहीं
हैं।
िववाह तो करे िकंतु संयम-िनयम से रहें, बर्ह्मचयर् का पालन करें।
आज जो कायर् करते हैं, सप्ताह में कम-से-कम एक िदन उससे मुक्त हो जाइये।
मनोवैज्ञािनक कहते हैं िक जो आदमी सदा एक जैसा काम करता रहता है उसको थकान और
बुढ़ापा जल्दी आ जाता है।
चाय-कॉफी, शराब-कबाब, धूमपान िबलकुल तयाग दे। पानमसाले की मुसीबत से भी सदैव बचे। यह धातु
को क्षीण व रक्त को दूिषत करके कैसंर को जन्म देता है। अतः इसका त्याग करें।
लघुशंका करने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चािहए, न ही पानी पीने के तुरंत बाद
लघुशंका जाना चािहए। लघुशंका करने की इच्छा हुई हो तब पानी पीना, भोजन करना, मैथुन
करना आिद िहतकारी नहीं है। क्योंिक ऐसा करने से िभन्न-िभन पकार के मूतरोग हो जाते है. ऐसा वेदो
में स्पष्ट बताया गया है।
मल-मूतर् का वेग (हाजत) नहीं रोकना चािहए, इससे स्वास्थ्य पर बुरा पर्भाव पड़ता
है व बीमार भी पड़ सकते हैं। अतः कुदरती हाजत यथाशीघर् पूरी कर लेनी चािहए।
पातः बहमुहूतर मे उठ जाना, सुबह-शाम खुली हवा में टहलना उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है।
दीघार्यु व स्वस्थ जीवन के िलए पर्ातः कम से कम 5 िमनट तक लगातार तेज दौड़ना
या चलना तथा कम से कम 15 िमनट िनयिमत योगासन करने चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ आआआ आआआ आआ आआआआ आआआआआआ
नाक को रोगरिहत रखने के िलये हमेशा नाक में सरसों या ितल आिद तेल की
बूँदें डालनी चािहए। कफ की वृिद्ध हो या सुबह के समय िपत्त की वृिद्ध हो अथवा दोपहर को
वायु की वृिद हो तब शाम को तेल की बूँदे डालनी चािहए। नाक मे तेल की बूँदे डालने वाले का मुख सुगिनधत रहता है,
शरीर पर झुिरर्याँ नहीं पड़तीं, आवाज मधुर होती है, इिन्दर्याँ िनमर्ल रहती हैं, बाल
जलदी सफेद नही होते तथा फुँिसया नही होती।
अंगों को दबवाना, यह माँस, खून और चमड़ी को खूब साफ करता है, पीितकारक होने से िनदा
लाता है, वीयर बढाता है तथा कफ, वायु एवं पिरशमजनय थकान का नाश करता है।
कान में िनत्य तेल डालने से कान में रोग या मैल नहीं होती। बहुत ऊँचा सुनना
या बहरापन नहीं होता। कान में कोई भी दर्व्य (औषिध) भोजन से पहले डालना चािहए।
नहाते समय तेल का उपयोग िकया हो तो वह तेल रोंगटों के िछदर्ों, िशराओं क े
समूहों तथा धमिनयों के द्वारा सम्पूणर् शरीर को तृप्त करता है तथा बल पर्दान करता है।
शरीर पर उबटन मसलने से कफ िमटता है, मेद कम होता है, वीयर बढता है, बल पर्ाप्त
होता है, रक्तपर्वाह ठीक होता है, चमड़ी स्वच्छ तथा मुलायम होती है।
दपर्ण में देहदर्शन करना यह मंगलरू , कांितकारक,
प पुिषदाता है, बल तथा आयुष्य को
बढ़ानेवाला है और पाप तथा दािरदर्य का नाश करने वाला है
(आआआआआआआआआ आआआआआआआ)
जो मनुषय सोते समय िबजौरे के पतो का चूणर शहद के साथ चाटता है वह सुखपूवरक स सकता है, खरार्टे
नहीं लेता।
जो मानव सूयोदय से पूवर, रात का रखा हुआ आधा से सवा लीटर पानी पीने का िनयम रखता
है वह स्वस्थ रहता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआआ आआ आआआआआ
आआआआआआआ आआआआआआआआआआआआ आआआआआआआआआआआआआआआ।
आआआआआआआआआआआआ आआआआआआ ।।आआआआआआआ आआआआआआआआआआआआआआ
'अंतःकरण की पर्सन्नता होने पर उसके(साधक के) सम्पूणर् दुःखों का अभाव हो जाता
है और उस पर्सन्न िचत्तवाले कमर्योगी की बुिद्ध शीघर् ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा
में ही भलीभाँित िस्थर हो जाती है।'
(आआआआआ 2.65)
खुशी जैसी खुराक नहीं और िचंता जैसा गम नहीं। हिरनाम, रामनाम, ओंकार के उचचारण
से बहुत सारी बीमािरयाँ िमटती हैं और रोगपर्ितकारक शिक्त बढ़ती है। हास्य का सभी
रोगों पर औषिध की नाई उत्तम पर्भाव पड़ता है। हास्य के साथ भगवन्नाम का उच्चारण एवं
भगवद् भाव होने से िवकार कीण होते है, िचत्त का पर्साद बढ़ता है एवं आवश् यकयोग्यताओं का
िवकास होता है। असली हासय से तो बहुत सारे लाभ होते है।
भोजन के पूवर पैर गीले करने तथा 10 िमनट तक हँसकर िफर भोजन का गर्ास लेने से भोजन
अमृत के समान लाभ करता है। पूज्य शर्ी लीलाशाहजी बापू भोजन के पहले हँसकर बाद में
ही भोजन करने बैठते थे। वे 93 वषर तक नीरोग रहे थे।
नकली(बनावटी) हास्य से फेफड़ों का बड़ा व्यायाम हो जाता है, श्वास लेने की
क्षमता बढ़ जाती है, रक्त का संचार तेज होने लगता और शरीर में लाभकारी पिरवतर्न
होने लगते हैं।
िदल का रोग, हृदय की धमनी का रोग, िदल का दौरा, आधासीसी, मानिसक तनाव, िसरददर्,
खरार्टे, अम्लिपत्त(एिसिडटी), अवसाद(िडपेशन), रक्तचाप(ब्लड पर्ेशर), सदीर्-जुकाम, कैंसर
आिद अनेक रोगों में हास्य से बहुत लाभ होता है।
आआ आआआआआ आआ आआ आआआआ आआआआआ आआआआ आआआआ आआआ।
िदन की शुरुआत में 20 िमनट तक हँसने से आप िदनभर तरोताजा एवं ऊजार् से
भरपूर रहते है। हासय आपका आतमिवशास बढाता है।
आआआ आआआआ आआआ ! आआआ आआआआ, आआआआ आआ आआ आआआ आआआआआ आआआआआआ ?
आआआआ आआ आआ आआआआ आआ, आआआआ आआ आआ आआआआ आआ, आआआआ आआ आआ आआआआ
आआ।।
आआ आआआआआ आआआआआ आआ आआआआआ आआआ, आआआआ आआआआ आआ आआआ आआआआआ
आआ।।
आआआआ आआआआ आआआआ आआआ, आआ आआआआ आआआआ । आआआआआआ
आआआआआआ आआआआआआआआआ आआ आआ, आआ आआआआ आआआआ ।। आआआआआआआआ
अिधक हास्य िकसे नहीं करना चािहए ?
जो िदल के पुराने रोगी हो, िजनको फेफडो से समबिनधत रोग हो, क्षय(टी.बी.) के मरीज हों, गभर व त ी
मिहला या पर्सव में िसिजिरयन ऑपरेशन करवाया हो, पेट का ऑपरेशन करवाया हो एवं िदल के
दौरेवाले(हाटर् अटैक के) रोिगयों को जोर से हास्य नहीं करना चािहए, ठहाके नहीं
मारने चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआ आआआ आआआआआआ आआआआआ
आआआआआ-आआआआ
पातःकाल सूयोदय से पूवर उठकर शौच-स्नानािद से िनवृत्त हो जाना चािहए। िनम्न पर्कार से
िविधवत् सनान करना सवासथय के िलए लाभदायक है।
स्नान करते समय 12-15 लीटर पानी बाल्टी में लेकर पहले उसमें िसर डुबोना
चािहए, िफर पैर िभगोने चािहए। पहले पैर गीले नहीं करने चािहए। इससे शरीर की
ग म ी ऊपर की ओर बढ त ी ह ै जो स वा स थ य क े िल ए हािन का रक ह ै ।
अतः पहले बाल्टी में ठण्डा पानी भर लें। िफर मुँह में पानी भरकर िसर को बाल्टी
में डालें और उसमें आँखें झपकायें। इससे आँखों की शिक्त बढ़ती है। शरीर को
रगड़-रगड़ कर नहायें। बाद में गीले वस्तर् से शरीर को रगड़-रगड़ कर पौंछें िजससे
रोमकूपों का सारा मैल बाहर िनकल जाय और रोमकूप(त्वचा के िछदर्) खुल जायें। त्वचा के
िछदर् बंद रहने से ही त्वचा की कई बीमािरयाँ होती हैं। िफर सूखे अथवा थोड़े से गीले
कपड़े से शरीर को पोंछकर सूखे साफ वस्तर् पहन लें। वस्तर् भले ही सादे हों िकन्तु
साफ हों। स्नान से पूवर् के कपड़े नहीं पहनें। हमेशा धुले हुए कपड़े ही पहनें। इससे
मन भी पर्सन्न रहता है।
आयुवेर्द के तीन उपस्तम्भ हैं- आआआआ, आआआआआआ आआ आआआआआआआआआआ।
जीवन मे सुख-शांित न समृिद्ध पर्ाप्त करने के िलए स्वस्थ शरीर की िनतांत आवश्यकता
है क्योंिक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और िववेकवती कुशागर् बुिद्ध पर्ाप्त हो सकती
है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के िलए उिचत िनदर्ा, शर्म, वयायाम और संतुिलत आहार अित आवशयक
है। पाँचों इिन्दर्यों के िवषयों के सेवन में की गयी गलितयों के कारण ही मनुष्य रोगी
होता है। इसमें भोजन की गलितयों का सबसे अिधक महत्त्व है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ आआआआ
अिधकांश लोग भोजन की सही िविध नहीं जानते। गलत िविध से गलत मातर्ा में
अथार्त् आवश् यकतासे अिधक या बहुत कम भोजन करने से या अिहतकर भोजन करने से
जठरािगन मंद पड जाती है, िजससे कबज रहने लगता है। तब आँतो मे रका हुआ मल सडकर दूिषत रस बनाने लगता है।
यह दूिषत रस ही सारे शरीर में फैलकर िविवध पर्कार के रोग उत्पन्न करता है। उपिनषदों
में भी कहा गया हैः आआआआआआआआआआ आआआआआआआआआआआआआआ । शुद्ध आहार से मन शुद्ध
रहता है। साधारणतः सभी व्यिक्तयों के िलए आहार के कुछ िनयमों को जानना अत्यंत
आवश् यकहै। जैसे-
आलस तथा बेचैनी न रहें, मल, मूतर् तथा वायु का िनकास य़ोग्य ढंग से होता रहे,
शरीर में उत्साह उत्पन्न हो एवं हलकापन महसूस हो, भोजन के पित रिच हो तब समझना चािहए की
भोजन पच गया है। िबना भूख के खाना रोगो को आमंितत करता है। कोई िकतना भी आगह करे या आितथयवश िखलाना
चाहे पर आप सावधान रहें।
सही भूख को पहचानने वाले मानव बहुत कम हैं। इससे भूख न लगी हो िफर भी भोजन
करने से रोगों की संख्या बढ़ती जाती है। एक बार िकया हुआ भोजन जब तक पूरी तरह पच न
जाय एवं खुलकर भूख न लगे तब तक दुबारा भोजन नही करना चािहए। अतः एक बार आहार गहण करने के बाद दूसरी
बार आहार गर्हण करने के बीच कम-से-कम छः घंटों का अंतर अवश् यरखना चािहए
क्योंिक इस छः घंटों की अविध में आहार की पाचन-िकर्या सम्पन्न होती है। यिद दूसरा
आहार इसी बीच गर्हण करें तो पूवर्कृत आहार का कच्चा रस(आम) इसके साथ िमलकर दोष
उत्पन्न कर देगा। दोनों समय के भोजनों के बीच में बार-बार चाय पीने, नाशशशश ् ता ,
तामस पदाथोर्ं का सेवन आिद करने से पाचनशिक्त कमजोर हो जाती है, ऐसा वयवहार मे मालूम
पडता है।
राितर् में आहार के पाचन के समय अिधक लगता है इसीिलए राितर् के समय पर्थम
पहर मे ही भोजन कर लेना चािहए। शीत ऋतु मे राते लमबी होने के कारण सुबह जलदी भोजन कर लेना चािहए और गिमरयो
में िदन लम्बे होने के कारण सायंकाल का भोजन जल्दी कर लेना उिचत है।
अपनी पर्कृित के अनुसार उिचत मातर्ा में भोजन करना चािहए। आहार की मातर्ा
वयिकत की पाचकािगन और शारीिरक बल के अनुसार िनधािरत होती है। सवभाव से हलके पदाथर जैसे िक चचावल, मूँग,
दूध अिधक मातर्ा में गर्हण करने सम्भव हैं परन्तु उड़द, चना तथा िपट्ठी से बने पदाथर्
स्वभावतः भारी होते हैं, िजनहे कम माता मे लेना ही उपयुकत रहता है।
भोजन के पहले अदरक और सेधा नमक का सेवन सदा िहतकारी होता है। यह जठरािगन को पदीपत करता है,
भोजन के पित रिच पैदा करता है तथा जीभ एवं कणठ की शुिद भी करता है।
भोजन गरम और िसनगध होना चािहए। गरम भोजन सवािदष लगता है, पाचकािगन को तेज करता है और शीघ
पच जाता है। ऐसा भोजन अितिरकत वायु और कफ को िनकाल देता है। ठंडा या सूखा भोजन देर से पचता है। अतयंत
गर म अन बल का ह ा स करता ह ै । िसन ग ध भोजन शरीर को मजबू त बनात ा ह ै , उसका बल
बढ़ाता है और वणर् में भी िनखार लाता है।
चलते हुए, बोलते हुए अथवा हँसते हुए भोजन नहीं करना चािहए।
दूध के झाग बहुत लाभदायक होते हैं। इसिलए दूध खूब उलट-पुलटकर, िबलोकर, झाग
पैदा करके ही िपये। झागो का सवाद लेकर चूसे। दूध मे िजतने जयादा झाग होगे, उतना ही वह लाभदायक होगा।
चाय या कॉफी पर्ातः खाली पेट कभी न िपयें, दुश् मनको भी न िपलायें।
एक सप्ताह से अिधक पुराने आटे का उपयोग स्वास्थ्य के िलए लाभदायक नहीं है।
भोजन कम से कम 20-25 िमनट तक खूब चबा-चबाकर एवं उत्तर या पूवर् की ओर मुख करके
करें। अच्छी तरह चबाये िबना जल्दी-जलदी भोजन करने वाले िचडिचडे व कोधी सवभाव के हो जाते है।
भोजन अतयनत धीमी गित से भी नही करना चािहए।
भोजन सािततवक हो और पकने के बाद 3-4 घंटे के अंदर ही कर लेना चािहए।
स्वािदष्ट अन्न मन को पर्सन्न करता है, बल व उत्साह बढ़ाता है तथा आयुष्य की
वृिद करता है, जबिक सवादहीन अन इसके िवपरीत असर करता है।
सुबह-सुबह भरपेट भोजन न करके हलका-फुलका नाश् ताही करें।
भोजन करते समय भोजन पर माता, िपता, िमतर्, वैद, रसोइये, हंस, मोर, सारस या चकोर पक्षी
की दृिष्ट पड़ना उत्तम माना जाता है। िकंतु भूखे, पापी, पाखंडी या रोगी मनुषय, मुगेर् और कुत्ते
की नज़र पड़ना अच्छा नहीं माना जाता।
भोजन करते समय िचत को एकाग रखकर सबसे पहले मधुर, बीच में खट्टे और नमकीन तथा अंत
में तीखे, कड़वे और कसैले पदाथर् खाने चािहए। अनार आिद फल तथा गन्ना भी पहले
लेना चािहए। भोजन के बाद आटे के भारी पदाथर्, नये चावल या िचवड़ा नहीं खाना
चािहए।
पहले घी के साथ किठन पदाथर, िफर कोमल व्यंजन और अंत में पर्वाही पदाथर् खाने
चािहए।
माप से अिधक खाने से पेट फूलता है और पेट में से आवाज आती है। आलस
आता है, शरीर भारी होता है। माप से कम अन्न खाने से शरीर दुबला होता है और शिक्त का
क्षय होता है।
िबना समय के भोजन करने से शिक्त का क्षय होता है, शरीर अशक्त बनता है।
िसरददर् और अजीणर् के िभन्न-िभन रोग होते है। समय बीत जाने पर भोजन करने से वायु से अिगन कमजोर हो
जाती है। िजससे खाया हुआ अन शायद ही पचता है और दुबारा भोजन करने की इचछा नही होती।
िजतनी भूख हो उससे आधा भाग अन से, पाव भाग जल से भरना चािहए और पाव भाग वायु के आने जाने के िलए
खाली रखना चािहए। भोजन से पूवर् पानी पीने से पाचनशिक्त कमजोर होती है, शरीर दुबर्ल
होता है। भोजन के बाद तुरंत पानी पीने से आलस्य बढ़ता है और भोजन नहीं पचता। बीच
में थोड़ा-थोड़ा पानी पीना िहतकर है। भोजन के बाद छाछ पीना आरोग्यदायी है। इससे
मनुष्य कभी बलहीन और रोगी नहीं होता।
पयासे वयिकत को भोजन नही करना चािहए। पयासा वयिकत अगर भोजन करता है तो उसे आँतो के िभन-िभन रोग
होते हैं। भूखे व्यिक्त को पानी नहीं पीना चािहए। अन्नसेवन से ही भूख को शांत करना
चािहए।
भोजन के बाद गीले हाथो से आँखो का सपशर करना चािहए। हथेली मे पानी भरकर बारी-बारी से दोनों
आँखों को उसमें डुबोने से आँखों की शिक्त बढ़ती है।
भोजन के बाद पेशाब करने से आयुषय की वृिद होती है। खाया हुआ पचाने के िलए भोजन के बाद पदितपूवरक
वजासन करना तथा 10-15 िमनट बायीं करवट लेटना चािहए(सोयें नहीं), क्योंिक जीवों की
नािभ के ऊपर बायीं ओर अिग्नतत्त्व रहता है।
भोजन के बाद बैठे रहने वाले के शरीर मे आलसय भर जाता है। बायी करवट लेकर लेटने से शरीर पुष होता
है। सौ कदम चलने वाले की उमर् बढ़ती है तथा दौड़ने वाले की मृत्यु उसके पीछे ही
दौड़ती है।
राितर् को भोजन के तुरंत बाद शयन न करें, 2 घंटे के बाद ही शयन करें।
िकसी भी पर्कार के रोग में मौन रहना लाभदायक है। इससे स्वास्थ्य के सुधार में
मदद िमलती है। औषिध सेवन के साथ मौन का अवलम्बन िहतकारी है।
आआआ आआआआआआ आआआआआ-
घी, दूध, मूँग, ग े हू ँ , लाल साठी चावल, आँवले, हरड़े, शुद्ध शहद, अनार, अंगूर, परवल
– ये सभी के िलए िहतकर हैं।
अजीणर् एवं बुखार में उपवास िहतकर है।
दही, पनीर, खटाई, अचार, कटहल, कुन्द, मावे की िमठाइयाँ – से सभी के िलए
हािनकारक हैं।
अजीणर् में भोजन एवं नये बुखार में दूध िवषतुल्य है। उत्तर भारत में अदरक के
साथ गुड़ खाना अच्छा है।
मालवा पर्देश में सूरन(जिमकंद) को उबालकर काली िमचर् के साथ खाना लाभदायक
है।
अत्यंत सूखे पर्देश जैसे की कच्छ, सौराष्टर् आिद में भोजन के बाद पतली छाछ
पीना िहतकर है।
मुंबई, गु ज रात म े अदरक , नींबू एवं सेंधा नमक का सेवन िहतकर है।
दिक्षण गुजरात वाले पुननर्वा(िवषखपरा) की सब्जी का सेवन करें अथवा उसका रस
िपये तो अचछा है।
दही की लस्सी पूणर्तया हािनकारक है। दहीं एवं मावे की िमठाई खाने की आदतवाले
पुननरवा का सेवन करे एवं नमक की जगह सेधा नमक का उपयोग करे तो लाभपद है।
शराब पीने की आदवाले अंगूर एवं अनार खायें तो िहतकर है।
आँव होने पर सोंठ का सेवन, लंघन (उपवास) अथवा पतली िखचड़ी और पतली छाछ
का सेवन लाभपर्द है।
अत्यंत पतले दस्त में सोंठ एवं अनार का रस लाभदायक है।
आँख के रोगी के िलए घी, दूध, मूँग एवं अंगूर का आहार लाभकारी है।
वयायाम तथा अित पिरशम करने वाले के िलए घी और इलायची के साथ केला खाना अचछा है।
सूजन के रोगी के िलए नमक, खटाई, दही, फल, गिर ष आहा र , िमठाई अिहतकर है।
यकृत (लीवर) के रोगी के िलए दूध अमृत के समान है एवं नमक, खटाई, दही एवं
गिर ष आहा र िव ष क े समान ह ै ।
वात के रोगी के िलए गरम जल, अदरक का रस, लहसुन का सेवन िहतकर है। लेिकन आलू,
मूँग के िसवाय की दालें एवं विरष्ठ आहार िवषवत् हैं।
कफ के रोगी के िलए सोंठ एवं गुड़ िहतकर हैं परंतु दही, फल, िमठाई िवषवत् हैं।
िपत के रोगी के िलए दूध, घी, िमशर्ी िहतकर हैं परंतु िमचर्-मसालेवाले तथा तले हुए
पदाथर एवं खटाई िवषवत् है।
अन्न, जल और हवा से हमारा शरीर जीवनशिकत बनाता है। सवािदष अन व सवािदष वयंजनो की अपेका
साधारण भोजन स्वास्थ्यपर्द होता है। खूब चबा-चबाकर खाने से यह अिधक पुिष्ट देता है,
वयिकत िनरोगी व दीघरजीवी होता है। वैजािनक बताते है िक पाकृितक पानी मे हाइडोजन और ऑकसीजन के िसवाय
जीवनशिकत भी है। एक पयोग के अनुसार हाइडोजन व ऑकसीजन से कृितम पानी बनाया गया िजसमे खास सवाद न था
तथा मछली व जलीय पर्ाणी उसमें जीिवत न रह सके।
बोतलों में रखे हुए पानी की जीवनशिक्त क्षीण हो जाती है। अगर उसे उपयोग में
लाना हो तो 8-10 बार एक बतर्न से दूसरे बतर्न में उड़ेलना (फेटना) चािहए। इससे
उसमें स्वाद और जीवनशिक्त दोनों आ जाते हैं। बोतलों में या िफर्ज में रखा हुआ पानी
स्वास्थ्य का शतर्ु है। पानी जल्दी-जलदी नही पीना चािहए। चुसकी लेते हुए एक-एक घूँट करके पीना
चािहए िजससे पोषक तत्त्व िमलें।
वायु मे भी जीवनशिकत है। रोज सुबह-शाम खाली पेट, शुद्ध हवा में खड़े होकर या बैठकर
लम्बे श्वास लेने चािहए। श्वास को करीब आधा िमनट रोकें, िफर धीरे-धीरे छोडे। कुछ देर
बाहर रोकें, िफर लें। इस पर्कार तीन पर्ाणायाम से शुरुआत करके धीरे-धीरे पंदह तक पहुँचे।
इससे जीवनशिक्त बढ़ेगी, स्वास्थ्य-लाभ होगा, पसनता बढेगी।
पूजय बापू जी सार बात बताते है, िवसतार नही करते। 93 वषर तक सवसथ जीवन जीने वाले सवयं उनके गुरदेव
तथा ऋिष-मुिनयों के अनुभविसद्ध ये पर्योग अवश् यकरने चािहए।
आआआआआआआआआ आआ आआआआआआआ
उदय, अस्त, ग ह ण और म ध य ाह क े समय सू यर की ओर कभी न द े ख े , जल मे भी उसकी
परछाई न देखे।
दृिष्ट की शुिद्ध के िलए सूयर् का दर्शन करें।
उदय और अस्त होते चन्दर् की ओर न देखें।
संध्या के समय जप, ध्यान, पाणायाम के िसवाय कुछ भी न करे।
साधारण शुिद्ध के िलए जल से तीन आचमन करें।
अपिवतर् अवस्था में और जूठे मुँह स्वाध्याय, जप न करे।
सूयर्, चन्दर् की ओर मुख करके कुल्ला, पेशाब आिद न करे।
मनुष्य जब तक मल-मूतर् के वेगों को रोक कर रखता है तब तक अशु द्धरहता है।
िसर पर तेल लगाने के बाद हाथ धो लें।
रजस्वला स्तर्ी के सामने न देखें।
ध्यानयोगीठंडेजलसेस्नानन करे।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ-आआआआआ
भोजन को शुद, पौिषक, िहतकर व साित्त्वक बनाने के िलए हम िजतना ध्यान देते हैं
उतना ही ध्यान हमें भोजन बनाने के बतर्नों पर देना भी आवश् यकहै। भोजन िजन बतर्नों
में पकाया जाता है उन बतर्नों के गुण अथवा दोष भी उसमें समािवष्ट हो जाते हैं। अतः
भोजन िकस पकार के बतरनो मे बनाना चािहए अथवा िकस पकार के बतरनो मे भोजन करना चािहए, इसके िलए भी
शास्तर्ों ने िनदेर्श िदये हैं।
भोजन करने का पात सुवणर का हो तो आयुषय को िटकाये रखता है, आँखों का तेज बढ़ता है। चाँदी
के बतर्न में भोजन करने से आँखों की शिक्त बढ़ती है, िपत, वायु तथा कफ िनयंितत रहते है।
काँसे के बतर्न में भोजन करने से बुिद्ध बढ़ती है, रक्त शुद्ध होता है। पत्थर या िमट्टी
के बतर्नों में भोजन करने से लक्ष्मी का क्षय होता है। लकड़ी के बतर्न में भोजन
करने से भोजन के पर्ित रूिच बढ़ती है तथा कफ का नाश होता है। पत्तों से बनी पत्तल
में िकया हुआ भोजन, भोजन मे रिच उतपन करता है, जठरािगन को पजजविलत करता है, जहर तथा पाप का नाश
करता है। पानी पीने के िलए तामर् पातर् उत्तम है। यह उपलब्ध न हों तो िमट्टी का पातर् भी
िहतकारी है। पेय पदाथर् चाँदी के बतर्न में लेना िहतकारी है लेिकन लस्सी आिद
खट्टे पदाथर् न लें।
लोहे के बतर्न में भोजन पकाने से शरीर में सूजन तथा पीलापन नहीं रहता,
शिक्त बढ़ती है और पीिलया के रोग में फायदा होता है। लोहे की कढ़ाई में सब्जी बनाना
तथा लोहे के तवे पर रोटी सेंकना िहतकारी है परंतु लोहे के बतर्न में भोजन नहीं
करना चािहए इससे बुिद्ध का नाश होता है। स्टेनलेस स्टील के बतर्न में बुिद्धनाश का
दोष नहीं माना जाता है। सुवणर्, काँसा, कलई िकया हुआ पीतल का बतर्न िहतकारी है।
एल्यूमीिनयम के बतर्नों का उपयोग कदािप न करें।
केला, पलाश, तथा बड़ के पतर् रूिच उद्दीपक, िवषदोषनाशक तथा अिगनपदीपक होते है। अतः
इनका उपयोग भी िहतावह है।
पानी पीने के पात के िवषय मे 'आआआआआआआआआ आआआआआ' में िलखा है।
आआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ । आआआआआआ आआआआ आआआआआआ
आआआआआआआ आआआआआ आआआआआआ । आआआआआ आआआआआआआआ आआआआ
आआआआआ आआआआआ आआआआआआ । आआआआआआआआआआआआआआआ
(आआआआआआआआआ, आआआआआआआआआ4)
अथार्त् पानी पीने के िलए ताँबा, स्फिटक अथवा काँच-पात का उपयोग करना चािहए। समभव
हो तो वैङूयर्रत्नजिड़त पातर् का उपयोग करें। इनके अभाव में िमट्टी के जलपातर्
पिवत व शीतल होते है। टू टे-फूटे बतरन से अथवा अंजिल से पानी नही पीना चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ आआआआआआ आआआआ-आआआआआ आआआ आआआआ
आआआआआआ
पितपदा को कूषमाड (कुम्हड़ा, पेठा) न खायें, क्योंिक यह धन का नाश करने वाला है।
िद्वताया को बृहती (छोटा बैंगन या कटेहरी) खाना िनिषद्ध है।
तृितया को परवल खाने से शतर्ुओं की वृिद्ध होती है।
चतुथीर् को मूली खाने से धन का नाश होता है।
पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।
षष्ठीको नीमकी पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योिनयों की पर्ािप्त होती
है।
सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग होते हैं तथा शरीर का नाश होता है।
अष्टमी को नािरयल का फल खाने से बुिद्ध का नाश होता है।
नवमी को लौकी गोमांस के समान त्याज्य है।
एकादशी को िम् श बी (सेम) खाने से, द्वादशी को पूितका(पोई) खाने से अथवा
शशशश
तर्योदशी को बैंगन खाने से पुतर् का नाश होता है।
अमावस्या, पूिणरमा, संकर्ािन्त, चतुदर्शी और अष्टमी ितिथ, रिववार, शर्ाद्ध और वर्त के
िदन स्तर्ी-सहवास तथा ितल का तेल, लाल रंग का साग व काँसे के पातर् में भोजन करना
िनिषद्ध है।
रिववार के िदन अदरक भी नहीं खाना चािहए।
काितर्क मास में बैंगन और माघ मास में मूली का त्याग कर देना चािहए।
सूयार्स्त के बाद कोई भी ितलयुक्त पदाथर् नहीं खाना चािहए।
लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चािहए। यह नरक
की पर्ािप्त कराने वाला है।
बायें हाथ से लाया गया अथवा परोसा गया अन्न, बासी भात, शराब िमला हुआ, जूठा और
घरवालों को न देकर अपने िलए बचाया हुआ अन्न खाने योग्य नहीं है।
जो लडाई-झगड ा करत े ह ु ए त ै य ा र िकया गया हो , िजसको िकसी ने लाघ िदया हो, िजस पर
रजस्वला स्तर्ी की दृिष्ट पड़ गयी हो, िजसमे बाल या कीडे पड गये हो, िजस पर कुते की दृिष पड गयी हो
तथा जो रोकर ितरस्कारपूवर्क िदया गया हो, वह अन राकसो का भाग है।
गाय , भैस और बकरी के दूध के िसवाय अनय पशुओं के दूध का तयाग करना चािहए। इनके भी बयाने के बाद
दस िदन तक का दूध काम में नहीं लेना चािहए।
बर्ाह्मणों को भैंस का दूध, घी और मक्खन नहीं खाना चािहए।
लक्ष्मी चाहने वाला मनुष्य भोजन और दूध को िबना ढके नहीं छोड़े।
जूठे हाथ से मसतक का सपशर न करे कयोिक समसत पाण मसतक के अधीन है।
बैठना, भोजन करना, सोना, गुर जनो का अिभ व ा द न करना और (अन्य शर्ेष्ठ पुरुषों को)
पणाम करना – ये सब कायर जूते पहन कर न करे।
जो मैले वसत धारण करता है, दाँतों को स्वच्छ नहीं रखता, अिधक भोजन करता है, कठोर
वचन बोलता है और सूयोदय तथा सूयासत के समय सोता है, वह यिद साकात् भगवान िवषणु भी हो उसे भी लकमी छोड देती
है।
उगत े हु ए सू यर की िकरण े , िचता का धुआँ, वृदा सती, झाडू की धूल और पूरी तरह न जमा
हुआ दही – इनका सेवन व कटे हुए आसन का उपयोग दीघार्यु चाहने वाले पुरुष को नहीं करना
चािहए।
अिग्नशाला , गौशा ल ा , देवता और बर्ाह्मण के समीप तथा जप, स्वाध्याय और
भोजन व जल गहण करते समय जूते उतार देने चािहए।
सोना, जागना, लेटना, बैठना, खड़े रहना, घूमना, दौड़ना, कूदना, लाँघना, तैरना, िववाद
करना, हँसना, बोलना, मैथुन और व्यायाम – इन्हें अिधक मातर्ा में नहीं करना चािहए।
दोनों संध्या, जप, भोजन, दंतधावन, िपतृकायर, देवकायर्, मल-मूतर् का त्याग, गुर क े
समीप, दान तथा यज्ञ – इन अवसरों पर जो मौन रहता है, वह सवगर मे जाता है।
गभर ह त य ा करन े वाल े क े द े ख े हु ए , रजस्वला स्तर्ी से छुए हुए, पकी से खाये हुए और
कुत्ते से छुए हुए अन्न को नहीं खाना चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआ आआ आआआआआआआआआ
जब आँख, कान, आिद ज्ञानेिन्दर्याँ और हाथ, पैर आिद कमेिनदया तथा मन अपने -अपने कायर्
में रत रहने के कारण थक जाते हैं, तब स्वाभािवक ही नींद आ जाती है। जो लोग िनयत
समय पर सोते और उठते हैं, उनकी शारीिरक शिक्त में ठीक से वृिद्ध होती है। पाचकािग्न
पदीपत होती है िजससे शरीर की धातुओं का िनमाण उिचत ढंग से होता रहता है। उनका मन िदन भर उतसाह से भरा रहता
है िजससे वे अपने सभी कायर् तत्परता से कर सकते हैं।
आआआआ आआ आआआआआआआ
अच्छी नींद के िलए राितर् का भोजन अल्प तथा सुपाच्य होना चािहए। सोने से दो
घंटे पहले भोजन कर लेना चािहए। भोजन के बाद स्वच्छ, पिवत तथा िवसतृत सथान मे अचछे,
अिवषम एवं घुटनों तक की ऊँचाई वाले शयनासन पर पूवर् या दिक्षण की ओर िसर करके हाथ
नािभ के पास रखकर व पर्सन्न मन से ईश् वरिचंतनकरते-करते सो जाना चािहए। पशि ्चम
या उत्तर की ओर िसर करके सोने से जीवनशिक्त का हर्ास होता है। शयन से पूवर् पर्ाथर्ना
करने पर मानिसक शांित िमलती है एवं नसों में ििथलता शउ त्पन्न होती है। इससे
स्नायिवक तथा मानिसक रोगों से बचाव व छुटकारा िमलता है। यह िनयम अिनदर्ा रोग एवं
दुःस्वप्नों का नाश करता है। यथाकाल िनदर्ा के सेवन से शरीर की पुिष्ट होती है तथा बल
और उतसाह की पािपत होती है।
आआआआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआ
राितर् 10 बजे से पर्ातः 4 बजे तक गहरी िनदर्ा लेने मातर् से आधे रोग ठीक हो
जाते है। कहा भी हैः 'आआआआआआआआआआ आआआआआआ....'
स्वस्थ रहने के िलए कम से कम छः घंटे और अिधक से अिधक साढ़े सात घंटे
की नींद करनी चािहए, इससे कम ज्यादा नहीं। वृद्ध को चार व शर्िमक को छः से साढ़े सात
घंटे की नींद करनी चािहए।
जब आप शयन करे तब कमरे की िखडिकया खुली हो और रोशनी न हो।
राितर् के पर्थम पर्हर में सो जाना और बर्ह्ममुहूतर् में पर्ातः 4 बजे नींद से उठ
जाना चािहए। इससे सवासथय पर अचछा पभाव पडता है कयोिक इस समय मे ऋिष-मुिनयों के जप-तप एवं शुभ
संकल्पों का पर्भाव शांत वातावरण में व्याप्त रहता है। इस समय ध्यान-भजन करने से उनके
शुभ संकल्पों का पर्भाव हमारे मनः शरीर में गहरा उतरता है। कम से कम सूयोर्दय से
पूवर उठना ही चािहए। सूयोदय के बाद तक िबसतर पर पडे रहना अपने सवासथय की कब खोदना है।
नींद से उठते ही तुरंत िबस्तर का त्याग नहीं करना चािहए। पहले दो-चार िमनट
िबस्तर में ही बैठकर परमात्मा का ध्यान करना चािहए िक 'हे पर्भु ! आप ही सवर्िनयंता
हैं, आप की ही सत्ता से सब संचािलत है। हे भगवान, इष्टदेव, गुर द े व जो भी कह दो। म ै
आज जो भी कायर् करूँगा परमात्मा सवर्व्याप्त हैं, इस भावना से सबका िहत ध्यान में
रखते हुए करूँगा।' ऐसी पाथरना करनी चािहए।
आआआआआआआआआ आआ आआआआआ
कुछ कारणों से हमें राितर् में नींद नहीं आती अथवा कभी-कभी थोड़ी बहुत नींद आ
भी गयी तो आँख तुरतं खुल जाती है। वात-िपत की वृिद होने पर अथवा फेफडे, िसर, जठर आिद शरीरागो से कफ का
अंश क्षीण होने के कारण वायु की वृिद्ध होने पर अथवा अिधक पिरशर्म के कारण थक जाने
से अथवा कर्ोध, शोक, भय से मन वयिथत होने पर नीद नही आती या कम आती है।
आआआआआआआआआ आआ आआआआआआआ
िनदर्ानाश शश सेबदनददर् , िसर में भारीपन, जडता, ग ल ािन , भम, अन्न का न पचना एवं
वात जनय रोग पैदा होते है।
आआआआआआआआआ आआ आआआआ आआ आआआआआ
तरबूज के बीज की िगरी और सफेद खसखस अलग-अलग पीसकर समभाग िमलाकर रख
लें। यह औषिध 3 ग ा म प ा त ः सायं ल े न े स े रात म े नी द अ च छ ी आती ह ै और िस रददर
ठीक होता है। आवशयकतानुसार 1 से 3 सप्ताह तक लें।
आआआआआआआ
6 ग ा म खसखस 250 ग ा म पानी म े पीसकर कपड े स े छान ल े और उसम े 25
ग ा म िम श ी िम ल ाकर िन त य प ा त ः सू य ो द य क े बाद या सायं 4 बजे एक बार लें।
3 ग ा म पू द ीन े की पित य ा (अथवा ढाई गर्ाम सूखी पित्तयों का चूणर्) 200 ग ा म पान ी
में दो िमनट उबालकर छान लें। गुनगुना रहने पर इस पुदीने की चाय में 2 चम्मच शहद
डालकर िनतय रात सोते समय पीने से गहरी और मीठी नीद आती है। आवशयकतानुसार 3-4 सप्ताह तक लें।
शंखपुष्पी और जटामासी का 1 चम्मच सिम्मशि र्त चूणर् सोने से पहले दूध के साथ
लें।
आआआआआ आआआआआआ
अपने शारीिरक बल से अिधक पिरशर्म न करें। बर्ाह्मी, आँवला, भागरा आिद शीत दवयो
से िसद्ध तेल िसर पर लगायें तथा ललाट पर बादाम रोगन की मािलश करें।
'आआआआआआ-आआआआआआ आआआआआआआआआ । आआआआआआआआआ आआआआआआआ' इस मंतर् का
जप सोने से पूवर 10 िमनट या अिधक समय तक करें। इससे अिनदर्ा िनवृत्त होगी व नींद अच्छी
आयेगी।
नींद कम आती हो या देर से आती हो तो सोने से पहले पैरों को हलके गमर् पानी
से धोकर अच्छी तरह पोंछ लेना चािहए।
पैरो के तलवो मे सरसो के तेल की मािलश करने से नीद गहरी आती है।
राितर् को सोने से पहले सरसों का तेल गुनगुना करके उसकी 4-4 बूंदे दोनों कानों
में डालकर ऊपर से साफ रूई लगाकर सोने से गहरी नींद आती है।
रात को िनदर्ा से पूवर् रूई का एक फाहा सरसों के तेल से तर करके नािभ पर रखने
से और ऊपर से हलकी पट्टी बाँध लेने से लाभ होता है।
सोते समय पाँव गमर् रखने से नींद अच्छी आती है (िवशेषकर सिदरयो मे)।
आआआआआआआआआआआआ
इस मुदर्ा की िवस्तृत जानकारी आशर्म से पर्काश ित'जीवन िवकास' पुसतक मे दी गयी है।
अिधकांशतः दोनों हाथों से और अिधक से अिधक समय अथार्त् चलते िफरते, िबस्तर पर
लेटे हुए या कहीं बैठे हुए िनरंतर इस मुदर्ा का अभ्यास करना चािहए। अिनदर्ा के पुराने
रोगी को भी ज्ञान मुदर्ा के दो तीन िदन के अभ्यास से ही ठीक िकया जा सकता है।
अिनदर्ा के अितिरक्त स्मरणशिक्त कमजोर होना, कर्ोध, पागलपन, अत्यिधक आलस्य,
िचड़िचड़ापन आिद मिस्तष्क के सम्पूणर् िवकार दूर करने, एकागर्ता बढ़ाने और
स्नायुमंडल को शिक्तशाली बनाने के िलए भी ज्ञानमुदर्ा परम उपयोगी है।
आआआ आआआ आआआआ आआआआआआआआआ
राितर् का जागरण रूक्षताकारक एवं वायुवधर्क होता है। िदन में सोने से कफ बढ़ता
है और पाचकािग्न मंद हो जाती है, िजससे अन का पाचन ठीक से नही होता। इससे पेट की अनेक पकार
की बीमािरयाँ होती हैं तथा त्वचा-िवकार, मधुमेह, दमा, संिधवात आिद अनेक िवकार होने की
संभावना होती है। बहुत से व्यिक्त िदन और रात, दोनों काल में खूब सोते हैं। इससे
शरीर में िशिथलता आ ज ाती है। शरीर में सूज, नमलावरोध, आलस्य तथा कायर् में
िनरुत्साह आिद लक्षण उत्पन्न होते हैं। गर्ीष्म ऋतु के अलावा बाकी के िदनों में िदन
में सोना विजर्त है। िदन में एक संध्या के समय शयन आयु को क्षीण करता है।
अतः िदन में सोनेवालो ! सावधान। मंदािग्न और कफवृिद्ध करके कफजिनत रोगों को
न बुलाओ। रात की नींद ठीक से लो। िदन में सोकर स्वास्थ्य िबगाड़ने की आदत बंद करो-
कराओ। नन्हें-मासूमों को, राितर् में जागने वालों को, कमजोर व बीमारों को और िजनको
वैद बताते है उनको िदन मे सोने की आवशयकता हो तो शिकत है।
आआआ आआआआआआ आआ आआआआआआआआआ
उपवास अथवा हलके, सुपाच्य एवं अल्प आहार से नींद अिधक नहीं आती। सुबह शाम 10-
10 पाणायाम करना भी िहतकारी है। नेतो मे अंजन लगाने से तथा आधी चुटकी वचा चूणर(घोड़ावज) का नस्य
लेने से नींद का आवेग कम होता है। इस पर्योग से मिस्तष्क में कफ और वृिद्ध पर जो
तमोगुण का आवरण होता है, वह दूर हो जाता है। 'आ आआआ आआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआ
आआआआ आआआआ आआआआआआ।' इस मंतर् का एक माला जप करें।
आआआ आआआआ आआ आआआआआआ आआआ आआ आआआ
पढते समय नीद आती हो और िसर दुखता हो तो पान मे एक लौग डालकर चबा लेना चािहए। इससे सुसती और
िसरददर् में कमी होगी तथा नींद अिधक नहीं सतायेगी।
आआआआआ आआआआआआ
अित िनदर्ावालों के िलए वजासन का अभ्यास परमोपयोगी है। यह आसन मन की
चंचलता दूर करने में भी सहायक है। िजन िवद्यािथर्यों का मन पढ़ाई में नहीं लगता
उन्हें इस आसन में बैठकर पढ़ना चािहए।
आआआआआआआआआ आआ आआआआआआआ आआ आआआआआआआ
िवचारो की उतपित मे हमारी िदनचया, वातावरण, सामािजक िस्थित आिद िविभन्न तथ्यों का असर
पडता है। अतः दैिनक जीवन मे िवचारो का बडा ही महततव होता है। कई बार हम केवल अपने दुबरल िवचारो के कारण
रोगगर्स्त हो जाते हैं और कई बार साधारण से रोग की िस्थित, भयंकर रोग की कलपना से अिधक
िबगड़ जाती है और कई बार डॉक्टर भी डरा देते हैं। यिद हमारे िवचार अच्छे हैं, दृढ़
हैं तो हम स्वास्थ्य सम्बन्धी िनयमों का पालन करेंगे और साधारण रोग होने पर योग्य
िवचारो से ही हम उससे मुिकत पाने मे समथर हो जायेगे।
साित्त्वक िवचारों की उत्पित्त में साित्त्वक आहार, सत्शास्तर्ों का पठन,
महात्माओं के जीवन-चिरतर्ों का अध्ययन, ईश् वरिचंतन, भगवनाम-स्मरण, योगासन और
बर्ह्मचयर् पालन बड़ी सहायता करते हैं।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ आआ आआआआआआआ आआआ आआआआआ आआआआ
आआआआआ आआआ?
संसार में पर्त्येक व्यिक्त आरोग्य और दीघर् जीवन की इच्छा रखता है। चाहे
िकसी के पास िकतने ही सांसािरक सुख-वैभव और भोग-सामिगर्याँ क्यों न हों, पर यिद वह सवसथ
नहीं है तो उसके िलए वे सब साधन सामिगर्याँ व्यथर् हैं। आरोग्य-शास्तर् के आचायोर्ं
ने उत्तम स्वास्थ्य के िलए मूल चार बाते बतलायी हैं- आहार, शर्म, िवशाम और बहचयर।
बर्ह्मचयर् के िवषय में भगवान धन्वंतरी ने कहा हैः 'जो शाित-कांित, स्मृित, जान, आरोग्य
और उतम संतित चाहता हो उसे संसार के सवोतम धमर 'बर्ह्मचयर्' का पालन करना चािहए। आयुवेर्द के
आचायर् वाग्भट्ट का कथन हैः 'संसार में िजतना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु
बर्ह्मचयर् के अधीन है। आयुवेर्द के आिद गर्न्थ 'चरक संिहता' में बर्ह्मचयर् को
सांसािरक सुख का साधन ही नहीं, मोक्ष का दाता भी बताया गया हैः
आआआआआआआआआआआआ आआआआआआआआआ आआआआआआआआआआ।
आआआआआआआआआआआआआआआआआआ आआआआआआआआ आआआआआआआआआआ।।
'सज्जनों की सेवा, दुजर्नों का त्याग, बर्ह्मचयर्, उपवास, धमर्शास्तर्
केिनयमोंका ज्ञानऔर
अभ्यास आत्मकल्याण का मागर् है।'
(आआ.आआ. 143)
आयुवेर्द के महान आचायोर्ं ने सभी शर्ेिणयों के मनुष्यों को चेतावनी दी है िक
यिद वे अपने स्वास्थ्य और आरोग्य को िस्थर रखते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने के
इच्छुक हैं तो पर्यत्नपूवर्क वीयर्रक्षा करें। वीयर् एक ऐसी पूँजी है, िजसे बाजार से खरीदा नही
जा सकता, िजसके अपवयय से वयिकत इतना दिरद बन जाता है िक पकृित भी उसके ऊपर दया नही करती। उसका
आरोग्य लुट जाता है और आयु क्षीण हो जाती है। यह पूँजी कोई उधार नहीं दे सकता। इसकी
िभका नही मागी जा सकती। अतः सावधान !
जो नवयुवक िसनेमा देखकर, कामिवकार बढ़ानेवाली पुस्तकें पढ़कर या अनुभवहीन लोगों
की दलीलें सुनकर स्वयं भी बर्ह्मचयर् को िनरथर्क कहने लगते हैं, वे अपने चारो तरफ िनगाह
दौड़ाकर अपने सािथयों की दशा देखें। उनमें से हजारों जवानी में ही शिक्तहीनता का
अनुभव करके ताकत की दवाएँ या टॉिनक आिद ढूँढने लगते हैं। हजारों ऐसे भी हैं जो
भयंकर रोगो के िशकार होकर अपने जीवन को बरबाद कर लेते है।
नेतर् व कपोल अंदर धंस जाना, कोई रोग न होने पर भी शरीर का जजर्र, ढीला सा रहना,
गाल ो म े झा ई -मुँहासे, काले चकते पड़ना, जोडो मे ददर, तलवे तथा हथेली पसीजना, अपच
और किबजयत, रीढ़ की हड्डी का झुक जाना, एकाएक आँखों के सामने अँधेरा छा जाना, मूछार्
आ जाना, छाती के मध्य भाग का अंदर धंस जाना, हिड्डयाँ िदखना, आवाज का रूखा और
अिपर्य बन जाना, िसर, कमर तथा छाती में ददर् उत्पन्न होना – ये वे शारीिरक िवकार हैं
जो वीयर रका न करने वाले युवको मे पाये जाते है।
िधक्कारहैउस पापमयिजंदगीपर, जो मिकखयो की तरह पाप िक िवषा के ऊपर िभनिभनाने मे और िवषय-भोगो मे
वयतीत होती है ! िजस तततव को शरीर का राजा कहा जाता है और बल, ओज, तेज, साहस, उत्साह आिद सब
िजससे िसथर रहते है, उसको नष्ट करके बर्ह्मचयर् को िनरथर्क तथा अवैज्ञािनक कहने वाले
अभागे लोग जीवन में सुख-शांित और सफलता िकस पर्कार पा सकेंगे ? ऐसे लोग िनशय ही
दुराचारी, दुगुर्णी, शठ, लम्पट बनकर अपना जीवन नष्ट करते हैं और िजस समाज में रहते
हैं उसे भी तरह-तरह के षड्यंतर्ों द्वारा नीचे िगराते हैं।
चािरितर्क पतन के कारणों में अश् लीलसािहत्य का भी हाथ है। िनम्न पर्वृित्तयों
के अनेक लेखक चािरतर् की गिरमा को िबल्कुल भुला बैठे हैं। आज लेखकों को एक ऐसी
शर्ेणी पैदा हो गयी है जो यौन दुराचार तथा कामुकता की बातों का यथातथ्य वणर्न करने
में ही अपनी िवशेषता मानती है। इस पर्कार की पुस्तकों तथा पितर्काओं का पठन युवकों
के िलए बहुत घातक होता है। बड़े नगरों में कुछ पुस्तक िवकर्ेता सड़कों पर अश् लील
िचतर् एवं पुस्तकें बेचते हैं। अखबारों के रंगीन पृष्ठों पर ऐसे िचतर् छापे जाते हैं
िजनहे देखकर बेशमी भी शरमा जाय।
जीवन के िजस केत मे देिखये, िसनेमा का कुपर्भाव दृिष्टगोचर होता है। िसनेमा तो शैतान
का जादू, कुमागर् का कुआँ, कुित्सत कल्पनाओं का भण्डार है। मनोरंजन के नाम पर िस्तर्यों
के अधर्नग्न अंगों का पर्दर्शन करके , अश् लीलतापूणर्गाने और नाच िदखाकर
िवदािथरयो तथा युवक-युवितयों में िजन वासनाओं और कुपर्वृित्तयों को भड़काया जाता है
िजससे उनका नैितक सतर चरमरा जाता है। िकशोरो, युवकों तथा िवद्यािथर्यों का िजतना पतन िसनेमा
ने िकया है, उतना अन्य िकसी ने नहीं िकया।
छोटे-छोटे बच्चे बीड़ी-िसगरेट फूँकते हैं, पानमसाला खाते है। िसनेमा मे भदे गाने गाते है,
कुचेष्टाएँ करते िफरते हैं। पापाचरण में डालते हैं। वीयर्नाश का फल उस समय तो
िविदत नही होता परंतु कुछ आयु बढने पर उनके मोह का पदा हटता है। िफर वे अपने अजान के िलए पशाताप करते है।
ऐसे बूढे नवयुवक आज गली-गली म े वीयर व धर क चू र न , चटनी, माजून, गोिल य ा ढू ँ ढत े िफ रत े ह ै
लेिकन उन्हें घोर िनराशा ही हाथ लगती है। वे ठगे जाते हैं। अतः पर्त्येक माता, िपता,
अध्यापक, सामािजक संस्था तथा धािमर्क संगठन कृपा करके पतन की गहरी खाई में िगर रही
युवा पीढ़ी को बचाने का पर्यास करे।
यिद समाज सदाचार को महत्त्व देनेवाला हो और चिरतर्हीनता को हेय दृिष्ट से
देखता रो तो बहुत कम व्यिक्त कुमागर् पर जाने का साहस करेंगे। यिद समाज का सदाचारी
भाग पभावशाली हो तो वयिभचार के इचछुक भी गलत मागर पर चलने से रक जायेगे। सदाचारी वयिकत अपना तथा अपने
देश और समाज का उत्थान कर सकता है और िकसी उच्च लक्ष्य को पूरा लोक और परलोक में
सदगित का अिधकारी बन सकता है।
संसार वीयर्वान के िलये है। वीयर्वान जाितयों ने संसार में राज्य िकया और
वीयरवान होने पर उनका नामोिनशान िमट गया। वीयरहीन डरपोक, कायर, दीन-हीन और दुबर्ल होता है। ज्यों-
जयो वीयरशिकत कीण होती है मानो, मृत्यु का संदेश सुनाती है। वीयर् को नष्ट करने वाला जीवनभर
रोगी, दुभार्ग्यशाली और दुःखी रहता है। उसका स्वभाव िचड़िचड़ा, कर्ोधी और रूक्ष बन जाता
है। उसके मन में कामी िवचार हुड़दंग मचाते रहते हैं, मानिसक दुबर्लता बढ़ जाती है,
स्मृित कमजोर हो जाती है।
जैसे सूयर संसार को पकाश देता है, वैसे ही वीयर मनुषय और पशु-पिकयो मे अपना पभाव िदखाता है। िजस पकार
सूयर् की रशि ्मयों से रंग-िबरंगे फूल िवकिसत होकर पर्कृित का सौन्दयर् बढ़ाते हैं, इसी
पकार यह वीयर भी अपने िभन-िभन सवरपो मे अपनी पभा की छटा िदखाता है। बहचयर से बुिद पखर होती है,
इिन्दर्याँ अंतमुर्खी हो जाती हैं, िचत्त में एकागर्ता आती है, आित्मक बल बढ़ता है,
आत्मिनभर्रता, िनभीर्कता आिद दैवी गुण स्वतः पर्कट होने लगते हैं। वीयर्वान पुरुषाथीर्
होता है, किठनाई का मुकाबला कर सकता है। वह सजीव, शिक्तशाली और दृढ़िनश्चयी होता है।
उसे रोग नहीं सताते, वासनाएँ चंचल नही बनाती, दुबर्लताएँ िववश नहीं करतीं। वह पर्ितभाशाली
वयिकततव पापत करता है और दया, क्षमा, शांित, परोपकार, भिकत, पेम, स्वतंतर्ता तथा सत्य द्वारा
पुणयातमा बनता है। धनय है ऐसे वीयररकक युवान।
परशुराम, हनुमान और भीष्म इसी वर्त के बल पर न केवल अतुिलत बलधाम बने, बिल्क
उन्होंने जरा और मृत्यु तक को जीत िलया। हनुमान ने समुदर् पार कर िदखाया और अकेले
परशुराम ने 21 बार पृथव ् ी से आततायी और अनाचारी राजाओं को नष्ट कर डाला। परशु रामऔर
हनुमान के पास तो मृत्यु आयी ही नहीं, पर भीषम ने तो उसे आने पर डाटकर भगा िदया और तब रोम-रोम
में िबँधे बाणों की सेज पर तब तक सुखपूवर्क लेटे रहे, जब तक सूयर का उतरायण मे पवेश नही
हुआ। सूयर् का उत्तरायण में पर्वेश हो जाने पर ही उन्होंने स्वयं मृत्यु का वरण िकया।
शरशय्या पर लेटे हुए भी वे केवल जीिवत ही नहीं बने रहे, अिपतु स्वस्थ और चैतन्य भी
बने रहे। महाभारत के युद्ध के पश् चातउन्होंने इसी अवस्था में पाण्डवों को धमर् तथा
जान का आदशर उपदेश भी िदया। यह सारा चमतकार उस बहचयर-वरत का ही था, िजसका उनहोने आजीवन पालन िकया
था।
दीपक का तेल बाती से होता हुआ उसके िसरे पर पहुँचकर पर्काश उत्पन्न करता है
लेिकन यिद दीपक की पेंदी में छेद हो तो न तेल बचेगा और न दीपक जलेगा। यौनशिक्त
को ऊध्वर्गामी बनाना पर्यत्न और अभ्यास के द्वारा संभव है। कािलदास ने पर्यत्न और
अभ्यास से इसे िसद्ध करके जड़बुिद्ध से महाकिव बनने में सफलता पर्ाप्त की। जो
पती को एक कण के िलए छोडने के िलए तैयार नही थे, ऐसे तुलसीदास जी ने जब संयम, बर्ह्मचयर् की िदशा
पकडी तो वे शीरामचिरतमानस जैसे गंथ के रचियता और संत-महापुरुष बन गये। वीयर् को ऊध्वर्मुखी
बनाकर संसार में आश् चयर्जनकसफलता पर्ाप्त करने वाली ज्ञात-अज्ञात िवभूितयों का
िववरण इकटा िकया जाय तो उनकी संखया हजारो मे नही, लाखों में हो सकती है।
रामकृष्ण परमहंस िववािहत होकर भी योिगयों की तरह रहे, वे सदैव आनंदमगन रहते थे।
स्वामी रामतीथर् और महात्मा बुद्ध ने तो परमात्म-सुख के िलए तरुणी पत्नी तक का पिरत्याग
कर िदया था। बर्ह्मचारी महिषर् दयानन्द बर्ह्मचयर् के ओज-तेज से सम्पन्न होकर अमर हो
गय े । न यू टन क े मिसत ष क म े यौनाकषर ण उठा होता तो उसन े अपन ा बुिद -कौशल सृिष्ट के
रहस्य जानने की अपेक्षा कामसुख पर्ाप्त करने में झोंक िदया होता। बोलते समय
काँपने वाले मोहनदास गृहस्थ होते हुए भी वीयर् को ऊध्वर्गामी िदशा देकर अपनी आवाज
से करोड़ों लोगों में पर्ाण फूँकने वाले महात्मा गाँधी हो गये। इस बर्ह्मचयर् वर्त को
उन्होंने िकस पर्कार गर्हण िकया और कैसे पर्यत्न पूवर्क इसका पालन िकया इस सम्बन्ध
में वे स्वयं िलखते हैं-
'खूब चचार् और दृढ़ िवचार करने के बाद 1906 में मैंने बर्ह्मचयर्-वरत धारण िकया।
वरत लेते समय मुझे बडा किठन महसूस हुआ। मेरी शिकत कम थी। िवकारो को कैसे दबा सकूँगा ? पती के साथ रहते हुए
िवकारो से अिलपत रहना भी अजीब बात मालूम होती थी। िफर भी मै देख रहा था िक यह मेरा सपष कतरवय है। मेरी
नीयत साफ थी। यह सोचकर िक ईश् वरशिक्त और सहायता देंगे, मैं कूद पड़ा। अब 20 वषर बाद
उस वर्त को स्मरण करते हुए मुझे सानंद आश् चयर्होता है। संयम करने का भाव तो सन
1901 से ही पर्बल था और उसका पालन भी कर रहा था, परंतु जो सवतंतता और आनंद मे अब पाने लगा वह
मुझे याद नहीं िक पहले कभी िमला हो। बर्ह्मचयर् के सोलह आने पालन का अथर् है
बर्ह्मदर् श न। इसके िलए तन
, मन और वचन से समस्त इिन्दर्यों का संयम रखना अिनवायर्
है। बर्ह्मचयर् में त्याग की बड़ी आवश् यकताहै। पर्यत्नशील बर्ह्मचारी िनत्य अपनी
तर्ुिटयों का दर्शन करेगा तो अपने हृदय के कोने -कोने में िछपे िवकारों को पहचान
लेगा और उन्हें बाहर िनकालने का पर्यत्न करेगा।'
महात्मा गाँधी ने 36 वषर की अवसथा के बाद काम-वासना को िबलकुल िनयंितत कर िदया था तो भी
उनके जीवन से पर्सन्नता का फव्वारा छूटता रहता था। तब िफर काम को जीवन का पर्धान सुख
तथा बर्ह्मचयर् को िनरथर्क एवं अवैज्ञािनक कहना महा मूखर्ता नहीं है ? दुलर्भ व अमूल्य
मनुष्य-शरीर पाकर भी यिद मनुष्य उसे िवकारों में ही नष्ट कर दे तो उसे चंदन के वन को
सूखी लकिड़यों के भाव बेचने वाले मूखर् लकड़हारे की तरह ही समझा जायेगा।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआ आआ आआआआआआआआआ आआआआआआ
ताड़ासन करने से पर्ाण ऊपर के केन्दर्ों में आ जाते हैं िजससे पुरुषों के
वीयरसाव एवं िसतयो के पदररोग की तकलीफ मे तुरत ं ही लाभ होता है।
वीयरसाव कयो होता है ? जब पेट मे दबाव (Intro-abdominal pressure) बढ़ता है तब वीयर्सर्ाव
होता है। इस दबाव(पेशर) के बढ़ने के कारण इस पर्कार है-
ठूँस-ठूँसकर खाना, बार-बार खाना, किब्जयत, ग ै स होन े पर भी वायु कर े ऐसी आलू ,
गवारफल ी , िभंडी, तली हुई चीजों का अिधक सेवन एवं अिधक भोजन, लैंिगक (सैक्स
सम्बन्धी) िवचार, चलिचतर् देखने एवं पितर्काएँ पढ़ने से।
इस दबाव के बढ़ने से पर्ाण नीचे के केन्दर्ों मे, नािभ से नीचे मूलाधार
केन्दर् में आ जाते हैं िजसकी वजह से वीयर्सर्ाव हो जाता है। इस पर्कार के दबार के
कारण हिनर्या की बीमारी भी हो जाती है।
आआआआआआआ आआ आआआआआ
सवर्पर्थम एकदम सीधे खड़े होकर हाथ ऊँचे रखें। िफर पैरों के
पंजो के बल पर खड़े होकर रहें एवं दृिष्ट ऊपर की ओर रखें। ऐसा िदन में
तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) 5-10 िमनट तक करें।
यिद पैरों के पंजों पर खड़े न हो सकें तो जैसे अनुकूल हो वैसे
खड़े रहकर भी यह आसन िकया जा सकता है।
यह आसन बैठे-बैठे भी िकया जा सकता है। जब भी काम(सेक्स)
सम्बन्धी िवचार आयें तब हाथ ऊँचे करके दृिष्ट ऊपर की ओर करनी
चािहए।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआ
आआआआ आआआआआआआआ
वसंत ऋतु की मिहमा के िवषय मे किवयो ने खूब िलखा है।
गु ज रात ी किव दलपतरा म न े कहा ह ै ः
आआआआ आआआ आ आआआआआआ आआआआआ। आआआआआ आआआआ आआआआआ आआआआआआआ।।
अथार्त्
आआआआ, आआआआआ आआ ।आआआआआआ आआआआआआआआ आआआआ आआ आआ
आआआआआ।।
वसंत का असली आनंद जब वन मे से गुजरते है तब उठाया जा सकता है। रंग-िबरंगे पुष्पों से
आच्छािदत वृक्ष..... शीतल एवं मंद-मंद बहती वायु..... पकृित मानो, पूरी बहार मे होती है। ऐसे मे सहज ही
पभु का समरण हो आता है, सहज ही में ध्यानावस्था में पहुँचा जा सकता है।
ऐसी सुंदर वसंत ऋतु मे आयुवेद ने खान-पान मे संयम की बात कहकर वयिकत एवं समाज की नीरोगता का धयान
रखा है।
िजस पकार पानी अिगन को बुझा देता है वैसे ही वसंत ऋतु मे िपघला हुआ कफ जठरािगन को मंद कर देता है।
इसीिलए इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने , ताजी हल्दी, ताजी मूली, अदरक, पुरानी जौ, पुराने गेहूँ की चीजे
खाने के िलए कहा गया है। इसके अलावा मूँग बनाकर खाना भी उत्तम है। नागरमोथ अथवा
सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। देखो, आयुवेर्द िवज्ञान की
दृिष्ट िकतनी सूक्ष्म है !
मन को पर्सन्न करें एवं हृदय के िलए िहतकारी हों ऐसे आसव, अिरष्ट जैसे िक
मध्वािरष्ट, दर्ाक्षािरष्ट, गन े का रस , िसरका आिद पीना इस ऋतु में लाभदायक है।
वसंत ऋतु मे आने वाला होली का तयौहार इस ओर संकेत करता है िक शरीर को थोडा सूखा सेक देना चािहए
िजससे कफ िपघलकर बाहर िनकल जाय। सुबह जलदी उठकर थोडा वयायाम करना, दौड़ना अथवा गुलािटयाँ
खाने का अभ्यास लाभदायक होता है।
मािलश करके सूखे दर्व्य आँवले, ितर्फला अथवा चने के आटे आिद का उबटन
लगाकर गमर् पानी से स्नान करना िहतकर है। आसन, पाणायाम एवं टंक िवदा की मुदा िवशेष रप से
करनी चािहए।
िदन में सोना नहीं चािहए। िदन में सोने से कफ कुिपत होता है। िजन्हें राितर्
में जागना आवश् यकहो वे थोड़ा सोयें तो ठीक है। इस ऋतु में राितर्-जागरण भी नही करना
चािहए।
वसंत ऋतु मे सुबह खाली पेट हरडे का चूणर शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता है। इस ऋतु मे कडवे नीम
में नयी कोंपलें फूटती हैं। नीम की 15-20 कोंपलें 2-3 काली िमचर् के साथ चबा-चबाकर
खानी चािहए। 15-20 िदन यह पर्योग करने से वषर्भर चमर्रोग, रक्तिवकार और ज्वर आिद
रोगों से रक्षा करने की पर्ितरोधक शिक्त पैदा होती है एवं आरोग्यता की रक्षा होती है।
इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 िदन तक पीने से त्वचा के रोग एवं
मलेिरया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।
मधुर रसवाले पौिष्टक पदाथर् एवं खट्टे-मीठे रसवाले फल आिद पदाथर् जो िक शीत
ऋतु में खाये जाते हैं, उन्हें खाना बंद कर देना चािहए क्योंिक वे कफ को बढ़ाते
हैं। वसंत ऋतु के कारण स्वाभािवक ही पाचनशिक्त कम हो जाती है, अतः पचने में भारी
पदाथों का सेवन नही करना चािहए। ठंडे पेय, आइसकर्ीम, बफर् के गोले चॉकलेट, मैदे की चीजें,
खमीरवाली चीजें, दही आिद पदाथर् िबल्कुल त्याग देने चािहए।
धािमर्कगर्ंथोक
ं ेवणर्नानुसारचैतर्
मासकेदौरान'अलौने वर्त' (िबना नमक के वर्त) करने से
रोगपर्ितकारक शिक्त बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.),
गु द ा (िकडनी) आिद के रोग नहीं होते।
यिद कफ ज्यादा हो तो रोग होने से पूवर् ही 'वमन कमर' द्वारा कफ को िनकाल देना
चािहए िकंतु वमन कमर् िकसी योग्य वैद्य की िनगरानी में करना ही िहतावह है। सामान्य
उलटी करनी हो आशर्म से पर्काश ितयोगासन पुस्तक में बतायी गयी िविध के अनुसार
गजकरणी की जा सकती ह ै । इसस े अन े क रोग ो स े बचाव होता ह ै ।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआआआआआ
वसंत ऋतु की समािपत के बाद गीषम ऋतु का आगमन होता है। अपैल, मई तथा जून के पर्ारंिभक
िदनों का समावेश गर्ीष्म ऋतु में होता है। इन िदनों में सूयर् की िकरणें अत्यंत उष्ण
होती हैं। इनके सम्पकर् से हवा रूक्ष बन जाती है और यह रूक्ष-उष्णहवाअन्नदर् व्योक
ं ो सुखाकर
शुष्क बना देती है तथा िस्थर चर सृिष्ट में से आदर्र्ता, िचकनाई का शोषण करती है। इस
अत्यंत रूक्ष बनी हुई वायु के कारण, पैदा होने वाले अन-पदाथों मे कटु, ितक्त, कषाय रसों का
पाबलय बढता है और इनके सेवन से मनुषयो मे दुबरलता आने लगती है। शरीर मे वातदोष का संचय होने लगता है। अगर
इन िदनों में वातपर्कोपक आहार-िवहार करते रहे तो यही संिचत वात गीषम के बाद आने वाली वषा ऋतु मे
अत्यंत पर्कुिपत होकर िविवध व्यािधयों को आमंतर्ण देता है। आयुवेर्द िचिकत्सा-शास्तर्
के अनुसार 'आआ आआ आआआआआ । आआआआआ' अथार्त् दोष जब शरीर में संिचत होने लगते हैं
तभी उनका शमन करना चािहए। अतः इस ऋतु में मधुर, तरल, सुपाच्य, हलके, जलीय, ताजे,
िस्नग्ध, शीत गुणयुक्त पदाथोर्ं का सेवन करना चािहए। जैसे कम मातर्ा में शर्ीखंड, घी
से बनी िमठाइयाँ, आम, मक्खन, िमशर्ी आिद खानी चािहए। इस ऋतु में पर्ािणयों के शरीर
का जलीयांश कम होता है िजससे प्यास ज्यादा लगती है। शरीर में जलीयांश कम होने से
पेट की बीमािरया, दस्त, उलटी, कमजोरी, बेचैनी आिद परेशािनयाँ उत्पन्न होती हैं। इसिलए
ग ी ष म ऋतु म े कम आहा र ल े क र शीतल जल बार -बार पीना िहतकर है।
आआआआआ ग ी ष म ऋतु म े साठी क े पु र ान े चावल , ग े हू ँ , दूध, मक्खन, गौघृ त क े स े व न
से शरीर में शीतलता, स्फूितर् तथा शिक्त आती है। सिब्जयों में लौकी, िग ल की , परवल,
नींबू, करेला, केले के फूल, चौलाई, हरी ककड़ी, हरा धिनया, पुदीना और फलो मे दाक, तरबूज,
खरबूजा, एक-दो-केले, नािरयल, मौसमी, आम, सेब, अनार, अंगूर का सेवन लाभदायी है।
इस ऋतु में तीखे, खट्टे, कसैले एवं कड़वे रसवाले पदाथर् नहीं खाने चािहए।
नमकीन, रूखा, तेज िमचर्-मसालेदार तथा तले हुए पदाथर्, बासी एवं दुगर्न्धयुक्त पदाथर्,
दही, अमचूर, आचार, इमली आिद न खायें। गरमी से बचने के िलए बाजारू शीत पेय (कोल्ड
िडंकस), आइस कर्ीम, आइसफर्ूट, िडबबाबंद फलो के रस का सेवन कदािप न करे। इनके सेवन से शरीर मे कुछ
समय के िलए शीतलता का आभास होता है परंतु ये पदाथर् िपत्तवधर्क होने के कारण
आंतिरक गमीर् बढ़ाते हैं। इनकी जगह कच्चे आम को भूनकर बनाया गया मीठा पना, पानी मे
नींबू का रस तथा िमशर्ी िमलाकर बनाया गया शरबत, जीरे की िशकंजी, ठंडाई, हरे नािरयल का पानी,
फलों का ताजा रस, दूध और चावल की खीर, गु ल कं द आिद शीत तथा जलीय पदा थ ों का स े व न
करें। इससे सूयर् की अत्यंत उष्ण िकरणों के दुष्पर्भाव से शरीर का रक्षण िकया जा सकता
है।
ग ी ष म ऋतु म े ग म ी अिध क होन े क े कारण चाय , कॉफी, िसगरेट, बीड़ी, तम्बाकू
आिद सवर्था वज्यर् हैं। इस ऋतु में िपत्तदोष की पर्धानता से िपत्त के रोग होते हैं
जैसे िक दाह, उष्णता, मूच्छार्, अपच, दस्त, नेतर्िवकार आिद। अतः उनसे बचें। िफर्ज का ठंडा
पानी पीने से गला, दाँत एवं आँतों पर बुरा पर्भाव पड़ता है इसिलए इन िदनों में मटके या
सुराही का पानी िपएँ।
आआआआआआ इस ऋतु में पर्ातः पानी-पयोग, वायु-सेवन, योगासन, हलका व्यायाम एवं
तेल-मािलश लाभदायक है। पर्ातः सूयोर्दय से पहले उठ जाएँ। शीतल जलाशय के िकनारे
अथवा बगीचे में घूमें। शीतल जलाशय के िकनारे अथवा बगीचे में घूमें। शीतल पवन
जहा आता हो वहा सोये। शरीर पर चंदन, कपूर का लेप करें। रात को भोजन के बाद थोड़ा सा टहलकर
बाद में खुली छत पर शुभर् (सफेद) शय्या पर शयन करें। गमीर् के िदनों में सोने से दो
घंटे पहले, ठंडे िकये हुए दूध का अथवा ठंडाई का सेवन भी िहतकारी होता है।
ग ी ष म ऋतु म े आदान काल क े कारण शरीर की शिकत का ह ा स होता रहता ह ै । वात
पैदा करने वाले आहार-िवहार के कारण शरीर मे वायु की वृिद होने लगती है। इस ऋतु मे िदन बडे और राितया छोटी होती
हैं। अतः दोपहर के समय थोड़ा सा िवशर्ाम करना चािहए। इससे इस ऋतु में धूप के कारण
होने वाले रोग उत्पन्न नहीं हो पाते।
रात को देर तक जागना और सुबह देर तक सोये रहना त्याग दें। अिधक व्यायाम,
अिधक पिरशर्म, धूप मे टहलना, अिधक उपवास, भूख-पयास सहना तथा सती-सहवास – ये सभी विजर्त
हैं।
आआआआआआ इस ऋतु में मुलतानी िमट्टी से स्नान करना वरदान स्वरूप है। इससे जो
लाभ होता है, साबुन से नहाने से उसका 1 पितशत लाभ भी नही होता। जापानी लोग इसका खूब लाभ
उठाते हैं। गमीर् को खींचने वाली, िपतदोष का शमन करने वाली, रोमकूपों को खोलने वाली
मुलतानी िमट्टी से स्नान करें और इसके लाभों का अनुभव करें।
अनुकर्म
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आआआ आआआआआ आआआ आआआआ आआ आआआआ
ग म ी क े िद नो म े जो हवा चलती ह ै उस े लू कहत े ह ै ।
आआआआआआ लू लगने से चेहरा लाल हो जाता है, नब्ज तेज चलने लगती है। साँस
लेने में कष्ट होता है, त्वचा शुष्क हो जाती है। प्यास अिधक लगती है। कई बार िसर और
गदर न म े पीड ा होन े लगती ह ै । कभी -कभी पर्ाणी मूिच्छर्त भी हो जाता है तथा उसकी मृत्यु
भी हो सकती है।
आआआआआ लू चलने के िदनों में पानी अिधक पीना चािहए। सुबह 700 िम.ली. से सवा
लीटर पानी पीने वालों को लू लगने की संभावना नहीं होती। घर से बाहर जाते समय कानों
को रूमाल से ढँक लेना चािहए। जब गमीर् अिधक पड़ रही हो तब मोटे, सफेद और ढीले
कपड़े पहनने चािहए। िदन में दो बार नहाना चािहए। एक सफेद प्याज (ऊपर का िछलका
हटाकर) हमेशा साथ रखने से लू लगने की संभावना नहीं रहती। प्याज और पुदीना लू लगने
के खतरे से रक्षा करते हैं। घर से बाहर जाने से पहले पानी या छाछ पीकर िनकलने
से लू नहीं लगती। नींबू का शरबत पीना िहतकर होता है।
लू व गमीर् से बचने के िलए रोजाना शहतूत खायें। पेट, गु द े और प े श ा ब की जलन
शहतूत खाने से दूर होती है। यकृत और आँतों के घाव ठीक होते हैं। िनत्य शहतूत खाते
रहने से मिस्तष्क को ताकत िमलती है।
यिद लू लग जाय तो लू का असर दूर करने के िलए कच्चे आम उबालकर उसके रस में
पानी िमलाकर घोल बनाये तथा उसमे थोडा सेधा नमक, जीरा, पुदीना डालकर िपये।
अनुकर्म
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आआआआ
बाजारू ठंडे पेय पदाथोर्ं से स्वास्थ्य को िकतनी हािन पहुँचती है यह तो लोग
जानते ही नही है। दूिषत तततवो, गं द े पान ी एवं अभ क य पदा थ ों क े रासायिन क िम श ण स े त ै य ा र
िकये गये अपिवतर् बाजारू ठंडे पेय हमारी तंदरुस्ती एवं पिवतर्ता का घात करते हैं।
इसिलए उनका त्याग करके हमें आयुवेर्द एवं भारतीय संस्कृित में विणर्त पेय पदाथोर्ं
से ही ठंडक पर्ाप्त करनी चािहए। यहाँ कुछ शरबतों की िनमार्ण-िविध एवं उपयोग की जानकारी दी जा
रही हैः-
आआआआआ आआ आआआआआ गु ल ाब जल अथवा निल कायं त (वाषपसवेदन यंत) द्वारा गुलाब की
किलयों के िनकाले गये अकर् में िमशर्ी डालकर उसका पाक तैयार करें। जब जरूरत
पडे तब उसमे ठंडा जल िमलाकर शरबत बना ले।
आआआआआआ यह शरबत सुवािसत होने के साथ शरीर की गमीर् को नष्ट करता है। अतः
ग ी ष म ऋतु म े स े व न करन े यो ग य ह ै ।
आआआआ आआ आआआआ- अच्छी तरह से पके हुए 20 अनार के दाने िनकालकर उनका रस
िनकाल लें। उस रस में अदरक डालकर रस गाढ़ा हो जाय तब तक उबालें। उसके बाद
उसमें केसर एवं इलायची का चूणर् िमलाकर शीशी में भर लें।
आआआआआआआ 30 ग ा म।
आआआआआआ यह शरबत रूिचकर एवं िपत्तशामक होने की वजह से दवा के रूप में भी
िलया जा सकता है एवं गमीर् में शरबत के रूप में पीने से गमीर् से राहत िमलती है।
आआआआआआआ आआ आआआआआ बीज िनकाली हुई 60 ग ा म द ा क को िब जौर े अथवा नी बू
के रस में पीसें। उसमें अनार का 240 ग ा म रस डाल े । उसक े बाद उस े छानकर उसम े
स्वादानुसार काला नमक, इलायची, काली िमचर्, जीरा, दालचीनी एवं अजवायन डालकर 60 ग ा म
शहद िमलायें।
आआआआआआआ 25 ग ा म।
आआआआआआ मंदािग्न एवं अरूिच में लाभपर्द।
आआआआ आआ आआआआआ साफ एवं अच्छे गुणवाली 1 िकलो इमली लेकर एक पत्थर के
बतर्न में दो िकलो पानी में 12 घंटे िभगो दें। उसके बाद इमली को हाथ से खूब मसलकर
पानी के साथ एकरस कर दे। िफर पानी को िमटी के बतरन मे छान ले। उस पानी को कलई िकये हुए अथवा सटील के
बतर्न में डालकर उभार आने तक उबालें। िफर उसमें िमशर्ी डालकर तीन तार की चासनी
बनाकर काँच की बरनी में भर लें।
आआआआआआआ 25 से 60 ग ा म।
आआआआआआ िपत पकृितवाले वयिकत को राित मे सोते समय देने से शौच साफ होगा।
ग म ी म े सु ब ह पीन े स े लू लगन े का भय नही रहता।
किब्जयत के रोगी के िलए इसका सेवन लाभदायक है।
आआआ आआआ आआआआ(आआआआ) आआ आआआआआ यह भी इमली के शरबत की तरह ही बनाया
जाता है।
आआआआआआ यह शरबत शरीर की गमीर् की दूर करने में अत्यंत उपयोगी है। इसके
अलावा िपत्तशामक एवं रूिचकर भी है।
आआआआआ आआ आआआआआ 20 अच्छे एवं बड़े नींबू का रस िनकालें। उस रस में 500
ग ा म िम श ी डालकर गाढ ा होन े तक उबाल े एवं शीशी म े भरकर रख ल े ।
आआआआआआआ 10 से 25 ग ा म।
आआआआआआ अरुिच, मंदािग्न, उलटी, िपत के कारण होने वाले िसरददर आिद मे लाभदायक है।
इसके अलावा यह शरबत आहार के पर्ित रूिच एवं भूख उत्पन्न करता है।
आआआआआ आआ आआ आआआआ (आआआ)- कच्चे आम को छीलकर पानी में उबालें। उसके
बाद ठण्डे पानी में मसल-मसलकर रस बनायें। इस रस में स्वाद के अनुसार नमक, जीरा,
गु ड आिद डालकर िप य े ।
आआआआआआ इस शरबत को पीने से गमीर् से राहत िमलती है। यह अपने देश के
शीतल पेयों की पर्ाचीन परंपरा का एक नुस्खा है जो स्वास्थ्य के िलए अत्यंत लाभदायक
है।
स्वास्थ्यनाशक, रोगोत्पादक, अपिवतर् पदाथोर्ं के िमशर्ण से तैयार बाजारू शीतल
पेय शरीर तथा मन को हािन पहँुचाते है। ऐसे पेयो से सावधान !
अनुकर्म
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आआआआआ आआआआआआआआ
वषा ऋतु मे वायु का िवशेष पकोप तथा िपत का संचय होता है। वषा ऋतु मे वातावरण के पभाव के कारण
स्वाभािवक ही जठरािग्न मंद रहती है, िजसके कारण पाचनशिकत कम हो जाने से अजीणर, बुखार, वायुदोष
का पर्कोप, सदीर्, खाँसी, पेट के रोग, किब्जयत, अितसार, पवािहका, आमवात, संिधवात आिद रोग
होने की संभावना रहती है।
इन रोगों से बचने के िलए तथा पेट की पाचक अिग्न को सँभालने के िलए
आयुवेर्द के अनुसार उपवास तथा लघु भोजन िहतकर है। इसिलए हमारे आषर्दृष्टा ऋिष-
मुिनयों ने इस ऋतु में अिधक-से-अिधक उपवास का संकेत कर धमर् के द्वारा शरीर के
स्वास्थ्य का ध्यान रखा है।
इस ऋतु में जल की स्वच्छता पर िवशेष ध्यान दें। जल द्वारा उत्पन्न होने वाले
उदर-िवकार, अितसार, पवािहका एवं हैजा जैसी बीमािरयो से बचने के िलए पानी को उबाले, आधा जल जाने पर
उतार कर ठंडा होने दें, तत्पश् चात्िहलाये िबना ही ऊपर का पानी दूसरे बतर्न में भर दें
एवं उसी पानी का सेवन करें। जल को उबालकर ठंडा करके पीना सवर्शर्ेष्ठ उपाय है।
आजकल पानी को शुद्ध करने हेतु िविवध िफल्टर भी पर्युक्त िकये जाते हैं। उनका भी
उपयोग कर सकते है। पीने के िलए और सनान के िलए गंदे पानी का पयोग िबलकुल न करे कयोिक गंदे पानी के सेवन से
उदर व त्वचा सम्बन्धी व्यािधयाँ पैदा हो जाती हैं।
500 ग ा म हरड और 50 ग ा म स े ध ा नमक का िम श ण बनाकर प ित िद न 5-6 ग ा म
लेना चािहए।
आआआआ आआआआआ इस ऋतु में वात की वृिद्ध होने के कारण उसे शांत करने के िलए
मधुर, अम्ल व लवण रसयुक्त, हलके व शीघर् पचने वाले तथा वात का शमन करने वाले
पदाथों एवं वयंजनो से युकत आहार लेना चािहए। सिबजयो मे मेथी, सिहजन, परवल, लौकी, सरगवा, बथुआ, पालक
एवं सूरन िहतकर हैं। सेवफल, मूँग, गरम दू ध , लहसुन, अदरक, सोंठ, अजवायन, साठी के
चावल, पुराना अनाज, ग े हू ँ , चावल, जौ, खट्टे एवं खारे पदाथर्, दिलया, शहद, पयाज, गाय का घी ,
ितल एवं सरसों का तेल, महुए का अिरष्ट, अनार, दर्ाक्ष का सेवन लाभदायी है।
पूरी, पकोडे तथा अनय तले हुए एवं गरम तासीरवाले खाद पदाथों का सेवन अतयंत कम कर दे।
आआआआआ आआआआआ गिर ष भोजन , उडद, अरहर, चौला आिद दालें, नदी, तालाब एवं
कुएँ का िबना उबाला हुआ पानी, मैदे की चीजें, ठंडे पेय, आइसकर्ीम, िमठाई, केला, मट्ठा,
अंकुिरत अनाज, पितयो वाली सिबजया नही खाना चािहए तथा आआआआआआआ आआआआआआ आआ आआआ आआ
आआआआ आआआआ आआआआआ।
आआआआ आआआआआआ अंगमदर्न, उबटन, स्वच्छ हलके वस्तर् पहनना योग्य है।
आआआआआ आआआआआआ अित व्यायाम, स्तर्ीसंग, िदन में सोना, राितर् जागरण, बािरश
में भीगना, नदी में तैरना, धूप मे बैठना, खुले बदन घूमना त्याज्य है।
इस ऋतु में वातावरण में नमी रहने के कारण शरीर की त्वचा ठीक से नहीं सूखती।
अतः त्वचा स्वच्छ, सूखी व िस्नग्ध बनी रहे। इसका उपाय करें तािक त्वचा के रोग पैदा न
हों। इस ऋतु में घरों के आस-पास गंदा पानी इकटा न होने दे, िजससे मचछरो से बचाव हो सके।
इस ऋतु में त्वचा के रोग, मलेिरया, टायफायड व पेट के रोग अिधक होते है। अतः खाने पीने की
सभी वस्तुओं को मिक्खयों एवं कीटाणुओं से बचायें व उन्हें साफ करके ही पर्योग में
लें। बाजारू दही व लस्सी का सेवन न करें।
चातुमार्स में आँवले और ितल के िमशर्ण को पानी में डालकर स्नान करने से
दोष िनवृत्त होते हैं।
अनुकर्म
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आआआ आआआआआआआआ
भादपद एवं आिशन ये शरद ऋतु के दो महीने है। शरद ऋतु सवचछता के बारे मे सावधान रहने की ऋतु है
अथार्त् इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है। आआआआआआआआ आआआआआ
आआआआआ। अथार्त् शरद ऋतु रोगों की माता है।
शरद ऋतु में स्वाभािवक रूप से ही िपत्तपर्कोप होता है। इससे इन दो महीनों में
ऐसा ही आहार एवं औषधी लेनी चािहए जो िपत का शमन करे। मधयाह के समय िपत बढता है। तीखे नमकीन, खट्टे,
गर म एवं दाह उत पन करन े वाल े द व य ो का स े व न , मद्यपान, कर्ोध अथवा भय, धूप मे घूमना,
राितर्-जागरण एवं अिधक उपवास – इनसे िपत बढता है। दही, खट्टी छाछ, इमली, टमाटर, नींबू, कच्चे
आम, िमचीर्, लहसुन, राई, खमीर लाकर बनाये गये व्यंजन एवं उड़द जैसी चीजें भी िपत्त
की वृिद्ध करती हैं।
इस ऋतु में िपत्तदोष की शांित के िलए ही शास्तर्कारों द्वारा खीर खाने, घी का
हलवा खाने तथा शर्ाद्धकमर् करने का आयोजन िकया गया है। इसी उद्देश् यसे
चन्दर्िवहार, गरब ा नृ त य तथा शरद पू िणर म ा क े उत सव क े आयोज न का िव धान ह ै । गु ड एवं
घूघरी (उबाली हुई ज्वार-बाजरा आिद) के सेवन से तथा िनमर्ल, स्वच्छ वस्तर् पहन कर फूल,
कपूर, चंदन द्वारा पूजन करने से मन पर्फुिल्लत एवं शांत होकर िपत्तदोष के शमन में
सहायता िमलती है।
इस ऋतु में िपत्त का पर्कोप होकर जो बुखार आता है, उसमें एकाध उपवास रखकर
नागरमोथ, िपतपापडा, चंदन, वाला (खस) एवं सोंठ डालकर उबालकर ठंडा िकया हुआ पानी पीना
चािहए। पैरों में घी िघसना चािहए। बुखार उतरने के बाद सावधानीपूवर्क ऊपर की ही
औषिधयो मे िगलोय, काली दर्ाक्ष एवं ितर्फला िमलाकर उसका काढ़ा बनाकर पीना चािहए।
वयथर जलदबाजी के कारण बुखार उतारने की अंगजी दवाओं का सेवन न करे अनयथा पीिलया, यकृतदोष
(लीवर की सूजन), आँव, लकवा, टायफाइड, जहरी मलेिरया, पेशाब एवं दसत मे रकत िगरना, शीतिपत्त जैसे
नये-नये रोग होते ही रहेंगे। आजकल कई लोगों का ऐसा अनुभव है। अतः अंगर्ेजी
दवाओं से सदैव सावधान रहें।
आआआआआआआआआआ-
शर्ाद्ध के िदनों में 16 िदन तक दूध, चावल, खीर का सेवन िपत्तशामक है। परवल,
मूँग, पका पीला पेठा (कद्द)ू आिद का भी सेवन कर सकते हैं।
दूध के िवरुद्ध पड़ने वाले आहार जैसे की सभी पर्कार की खटाई, अदरक, नमक,
मांसाहार आिद का त्याग करें। दही, छाछ, िभंडी, ककड़ी आिद अम्लिवपाकी (पचने पर खटास उतपन
करने वाली) चीजों का सेवन न करें।
कड़वा रस िपत्तशामक एवं ज्वर पर्ितरोधी है। अतः कटुकी, िचरायता, नीम की
अंतरछाल, गु ड ु च , करेले, सुदर्शन चूण , इन्
र् दर्जौ (कुटज) आिद के सेवन िहतावह है।
धूप मे न घूमे। शाद के िदनो मे एवं नवराित मे िपतृपूजन हेतु संयमी रहना चािहए। कडक बहचयर का पालन
करना चािहए। यौवन सुरक्षा पुस्तक का पाठ करने से बर्ह्मचयर् में मदद िमलेगी।
इन िदनों में राितर्जागरण, राितर्भर्मण अच्छा होता है इसीिलए नवराितर् आिद का
आयोजन िकया जाता है। राितर्जागरण 12 बजे तक का ही माना जाता है। अिधक जागरण से
और सुबह एवं दोपहर को सोने से ितदोष पकुिपत होते है िजससे सवासथय िबगडता है।
हमारे दूरदशीर् ऋिष-मुिनयों ने शरद पूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में िवशेषकर
स्वास्थ्य की दृिष्ट से ही आयोिजत िकया है। शरद पूनम के िदन राितर्जागरण, राितर्भर्मण,
मनोरंजन आिद का उत्तम िपत्तनाशक िवहार के रूप में आयुवेर्द ने स्वीकार िकया है।
शरदपूनम की शीतल राितर् छत पर चन्दर्मा की िकरणों में रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-
चावल की खीर सवर्िपर्य, िपतशामक, शीतल एवं साित्त्वक आहार है। इस राितर् में ध्यान,
भजन, सत्संग, कीतर्न, चन्दर्दर्शन आिद शारीिरक व मानिसक आरोग्यता के िलए अत्यंत
लाभदायक है।
इस ऋतु में भरपेट भोजन िदन की िनदर्ा, बफर्, ओस, तेल व तले हुए पदाथोर्ं का
सेवन न करें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआ आआआआआआआआ
शीत ऋतु के अंतगर्त हेमंत और िशि रऋ श तु आते हैं। यह ऋतु िवसगर्काल अथार्त्
दिक्षणायन का अंतकाल कहलाती है। इस काल में चन्दर्मा की शिक्त सूयर् की अपेक्षा
अिधक पर्भावशाली होती है। इसिलए इस ऋतु में औषिधयाँ, वृक, पृथवी की पौिषकता मे भरपूर वृिद
होती है व जीव जंतु भी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है तथा
िपतदोष का नाश होता है।
शीत ऋतु में स्वाभािवक रूप से जठरािग्न तीवर् रहती है, अतः पाचन शिक्त पर्बल
रहती है। ऐसा इसिलए होता है िक हमारे शरीर की त्वचा पर ठंडी हवा और हवा और ठंडे
वातावरण का पभाव बारंबार पडते रहने से शरीर के अंदर की उषणता बाहर नही िनकल पाती और अंदर ही अंदर इकटी
होकर जठरािग्न को पर्बल करती है। अतः इस समय िलया गया पौिष्टक और बलवधर्क आहार
वषरभर शरीर को तेज, बल और पुिष्ट पर्दान करता है। इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यिक्त को अपनी
सेहत की तंदरूस्ती के िलए िकस पर्कार का आहार लेना चािहए ? शरीर की रक्षा कैसे
करनी चािहए ? आइये, उसे हम जानें-
शीत ऋतु में खारा तथा मधु रसपर्धान आहार लेना चािहए।
पचने मे भारी, पौिषकता से भरपूर, गरम व िसन ग ध प कृ ित क े घी स े बन े पदा थ ों का
यथायोग्य सेवन करना चािहए।
वषरभर शरीर की सवासथय-रक्षा हेतु शिक्त का भंडार एकितर्त करने के िलए उड़दपाक,
सालमपाक, सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदाथोर्ं अथवा च्यवनपर्ाश आिद का उपयोग करना
चािहए।
मौसमी फल व शाक, दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, मट्ठा, शहद, उडद, खजूर, ितल, खोपरा, मेथी,
पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौिष्टक पदाथर् इस ऋतु में सेवन योग्य
माने जाते हैं। पर्ातः सेवन हेतु रात को िभगोये हुए कच्चे चने (खूब चबा-चबाकर
खाये), मूँगफली, गु ड , गाजर , केला, शकरकंद, िसंघाड़ा, आँवला आिद कम खचर् में सेवन
िकये जाने वाले पौिष्टक पदाथर् हैं।
इस ऋतु में बफर् अथवा बफर् का िफर्ज का पानी, रूखे-सूखे, कसैले, तीखे तथा
कड़वे रसपर्धान दर्व्यों, वातकारक और बासी पदाथर, एवं जो पदाथर् आपकी पर्कृित के अनुकूल
नहीं हों, उनका सेवन न करें। शीत पर्कृित के पदाथोर्ं का अित सेवन न करें। हलका
भोजन भी िनिषद है।
इन िदनों में खटाई का अिधक पर्योग न करें, िजससे कफ का पयोग न हो और खासी, श्वास
(दमा), नजला, जुकाम आिद वयािधया न हो। ताजा दही, छाछ, नींबू आिद का सेवन कर सकते हैं। भूख
को मारना या समय पर भोजन न करना स्वास्थ्य के िलए हािनकारक होता है। क्योंिक चरक
संिहता का कहना है िक शीतकाल में अिग्न के पर्बल होने पर उसके बल के अनुसार
पौिषक और भारी आहारपी ईधन नही िमलने पर यह बढी हुई अिगन शरीर मे उतपन धातु (रस) को जलाने लगती
है और वात कुिपत होने लगता है। अतः उपवास भी अिधक नहीं करने चािहए।
शरीर को ठंडी हवा के सम्पकर् में अिधक देर तक न आने दें।
पितिदन पातःकाल दौड लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भर्मण, शरीर की तेलमािलश, वयायाम,
कसरत व योगासन करने चािहए।
िजनकी तासीर ठंडी हो, वे इस ऋतु मे गुनगुने गमर जल से सनान करे। अिधक गमर जल का पयोग न करे। हाथ-
पैर धोने मे भी यिद गुनगुने पानी का पयोग िकया जाय तो िहतकर होगा।
शरीर की चंपी करवाना एवं यिद कुश्ती अथवा अन्य कसरतें आती हों तो उन्हें करना
िहतावह है।
तेल मािलश के बाद शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करना िहतकारी होता है।
कमरे एवं शरीर को थोड़ा गमर् रखें। सूती, मोटे तथा ऊनी वस्तर् इस मौसम में
लाभकारी होते हैं।
पातःकाल सूयर की िकरणो का सेवन करे। पैर ठंडे न हो इस हेतु जूते पहने। िबसतर, कुसीर् अथवा बैठने
के स्थान पर कम्बल, चटाई, पलािसटक अथवा टाट की बोरी िबछाकर ही बैठे। सूती कपडे पर न बैठे।
स्कूटर जैसे दुपिहया खुले वाहनों द्वारा इन िदनों लम्बा सफर न करते हुए बस,
रेल, कार-जैसे वाहनो से ही सफर करने का पयास करे।
दशमूलािरष्ट, लोहासन, अश् वगंधािरष्ट, च्यवनपर्ाश अथवा अश् वगंधावलेहजैसी
देशी व आयुवेर्िदक औषिधयों का इस काल में सेवन करने से वषर् भर के िलए पयार्प्त
शिक्त का संचय िकया जा सकता है।
हेमंत ऋतु में बड़ी हरड़ का चूणर् और सोंठ का चूणर् समभाग िमलाकर और िशश शिर
शश
ऋतु में बड़ी हरड़ का चूणर् समभाग पीपर (िपपपली या पीपल) चूणर् के साथ पर्ातः सूयोर्दय के
समय अवश् यपानी में घोलकर पी जायें। दोनों िमलाकर 5 ग ा म ल े न ा प य ा प त ह ै । इस े
पानी मे घोलकर पी जाये। यह उतम रसायन है। लहसुन की 3-4 किलयाँ या तो ऐसे ही िनगल जाया करें
या चबाकर खा लें या दूध में उबालकर खा िलया करें।
जो समपन और समथर हो, वे इस मौसम मे केसर, चंदन और अगर िघसकर शरीर पर लेप करें।
गिर ष खाद पदा थ ों क े स े व न स े पहल े अदरक क े टुकड ो पर नमक व नी बू का
रस डालकर खाने से जठरािग्न अिधक पर्बल होती है।
भोजन पचाने के िलए भोजन के बाद िनम मंत के उचचारण के साथ बाया हाथ पेट पर दिकणावतर (दिक्षण
िदशा की ओर घुमाव देते हुए) घुमा लेना चािहए, िजससे भोजन शीघता से पच सके।
आआआआआआआआ आआआआआआआआआ आआआआ आ आआआआआआआआ।
आआआआआआआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआ आ आआआआआआ।।
इस ऋतु में सदीर्, खाँसी, जुकाम या कभी बुखार की संभावना भी बनी रहती है। ऐसा होने पर
िनिम्निलिखत उपाय करने चािहए।
आआआआआ-आआआआआ आआआ आआआआआ आआआआआआ आआ आआआआआ सुबह तथा राितर् को
सोते वक्त हल्दी-नमकवाले ताजे भुने हुए एक मुट्ठी चने खायें, िकंतु खाने के बाद कोई
भी पेय पदाथर, यहाँ तक िक पानी न िपयें। भोजन में घी, दूध, शक्कर, गु ड एवं खटाई तथा फलो
का सेवन बन्द कर दें। सदीर्-खाँसी वाले स्थायी मरीजों के िलए यह सस्ता पर्योग है।
भोजन के पशात हलदी-नमकवाली भुनी हुई अजवायन को मुखवास के रुप में िनत्य सेवन
करने से सदीर्-खाँसी िमट जाती है। अजवाइन का धुआँ लेना चािहए। अजवाइन की पोटली
से छाती की सेंक करनी चािहए। िमठाई, खटाई एवं िचकनाईयुक्त चीजों का सेवन नहीं करना
चािहए।
पितिदन मुखवास के रप मे दालचीनी का पयोग करे। दो गाम सोठ, आधा गर्ाम दालचीनी तथा 5 ग ा म
पुराना गुड – इन तीनो को कटोरी मे गरम करके रोज ताजा खाने से सदी िमटती है।
सदीर्-जुकाम अिधक होने पर नाक बंद हो जाती है, िसर भी भारी हो जाता है और बहुत बेचैनी
होती है। ऐसे समय में एक तपेली में पानी को खूब गरम करके उसमें थोड़ा ददर्शामक
मलहम, नीलिगिर का तेल अथवा कपूर डालकर िसर व तपेली ढँक जाय ऐसा कोई मोटा कपड़ा
या तौिलया ओढ़कर गरम पानी की भाप लें। ऐसा करने से कुछ ही िमनटों में लाभ होगा
एवं सदीर् से राहत िमलेगी।
िमशर्ी के बारीक चूणर् को नसवार की तरह नाक से सूँघें।
स्थायी सदीर्-जुकाम एवं खासी के रोगी को 2 ग ा म सो ठ , 10 से 12 ग ा म गु ड एवं थोड ा घी
एक कटोरी में लेकर उतनी देर तक गमर् करना चािहए जब तक िक गुड़ िपघल न जाय। िफर
सबको िमलाकर सुबह खाली पेट रोज गरम-गरम खा ल े । भोजन म े मीठी , खट्टी, िचकनी एवं
गिर ष वस तु ए ँ न ल े । रोज साद े पानी की जगह पर सो ठ की डली डालकर उबाला गया पान ी ही
गु न गु न ा -गमर हो जाय तब िप य े । इस प य ो ग स े रोग िम ट जाय े ग ा।
सदीर् के कारण होता िसरददर्, छाती का ददर् एवं बेचैनी में सोंठ का चूणर् पानी
में डालकर गमर् करके पीड़ावाले स्थान पर थोड़ा लेप करें। सोंठ की डली डालकर
उबाला गया पानी िपयें। सोंठ का चूणर् शहद में िमलाकर थोड़ा-थोड़ा रोज चाटें। मूँग,
बाजरी, मेथी एवं लहसुन का पर्योग भोजन में करें। इससे भी सदीर् िमटती है।
हल्दी को अंगारों पर डालकर उससी धूनी लें तथा हल्दी के चूणर् को दूध में डालकर
िपये। इससे लाभ होता है।
वायु की सूखी खासी मे अथवा िपतजनय खासी मे, खून िगरने में, छाती की कमजोरी के ददर्
में, मानिसक दुबर्लता में तथा नपुंसकता के रोग में गेहूँ के आटे में गुड़ अथवा
शक्कर एवं घी डालकर बनाया गया हलुआ िवशेष िहतकर है। वायु की खाँसी में गुड़ के हलुए
में सोंठ डालें। खून िगरने के रोग में िमशर्ी-घी में हलुआ बनाकर िकशिमश डालें।
मानिसक दौबर्ल्य में उपयोग करने के िलए हलुए में बादाम डालें। कफजन्य खाँसी तथा
श्वास के ददर् में गुनगुने पानी के साथ अजवाइन िखलाने से लाभ होता है, कफोत्पित्त
बंद होती है। पीपरामूल, सोंठ एवं बहेड़ादल का चूणर् बनाकर शहद में िमलाकर पर्ितिदन
खाने से सदीर् कफ की खाँसी िमटती है।
आआआआआ आआआआआआ आआ आआआआआ
बुखार आने पर एक िदन उपवास रखकर केवल उबला हुआ पानी पीने से बुखार िगरता
है।
मोंठ या मोंठ की दाल का सूप बनाकर पीने से बुखार में राहत िमलती है। उस सूप
में हरा धिनया तथा िमशर्ी डालने से मुँह अथवा मल द्वारा िनकलता खून बंद हो जाता है।
पानी मे तुलसी एवं पुदीना के पते डालकर उबाले। नीचे उतार कर 10 िमनट ढँककर रखें। िफर
उसमें शहद डालकर पीने से बुखार में राहत िमलती है और शरीर की ििथलता शद ूर होती
है।
पीपरामूल का 1 से 2 ग ा म चू णर शहद क े साथ ल े क र िफ र कु छ द े र बाद गमर दू ध पीन े
से मलेिरया कम होता है।
5 से 10 ग ा म लहसु न किल यो को काटकर , ितल के तेल अथवा घी में तलकर, सेंधा
नमक डालकर रोज खायें। इससे मलेिरया का बुखार दूर होता है।
सौंफ तथा धिनया के काढ़े में िमशर्ी िमलाकर पीने से िपत्तज्वर का शमन होता
है।
हींग तथा कपूर से बनायी गयी गोली (िहंगकपूर वटी) दवाई की दुकान पर िमलती है।
एक-दो गोली लेकर, अदरक के रस में घोंटकर, रोगी की जीभ पर लगायें-रगड़ें। रोगी
अगर दवा पी सके तो यही दवा िपये। इससे नाड़ी सुधरेगी और बुखार िमटेगा।
कई बार बुखार 103-104 िडगी फानरहाइट से उपर हो जाता है। इससे ऊपर बुखार होने पर मरीज के िलए
खतरा पैदा हो जाता है। ऐसे समय में ठंडे पानी में खाने का नमक, नौसादर या कोलन
वॉटर डालकर, उस पानी में पतले कपड़े के टुकड़े डुबाकर, मरीज की हथेली एवं पाँव के
तलवों पर तथा ललाट पर रखें। रखा हुआ कपड़ा सूख जाय तो तुरंत ही दूसरा कपड़ा दूसरे
साफ पानी में डुबाकर, िनचोड़कर ददीर् के उपरोक्त अंगों पर रखें। इस पर्कार थोड़ी-
थोड़ी देर में ठंडे पानी की, पिटया बदलते रहने से अथवा बफर िघसने से बुखार कम हो जाता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआ आआआ आआआ आआआआआआ आआआ
शीतकाल में पाक का सेवन अत्यंत लाभदायक होता है। पाक के सेवन से रोगों को
दूर करने में एवं शरीर में शिक्त लाने में मदद िमलती है। स्वािदष्ट एवं मधुर होने के
कारण रोगी को भी पाक का सेवन करने में उबान नहीं आती।
आआआ आआआआआ आआ आआआआआआआआआआआ आआआआआ पाक मे डाली जाने वाली काष-औषिधयो एवं
सुगंिधत औषिधयों का चूणर् अलग-अलग करके उन्हें कपड़छान कर लेना चािहए। िकशिमश,
बादाम, चारोली, खसखस, िपसता, अखरोट, नािरयल जैसी वस्तुओं के चूणर् को कपड़छन करने
की जरूरत नहीं है। उन्हें तो थोड़ा-थोड़ा कूटकर ही पाक में िमला सकते हैं।
पाक मे सवरपथम काष औषिधया डाले, िफर सुगंिधत पदाथर् डालें। अंत में केसर को घी
में पीसकर डालें।
पाक तैयार होने पर उसे घी लगायी हुई थाली मे फैलाकर बफी की तरह छोटे या बडे टुकडो मे काट दे। ठंडा
होने पर स्वच्छ बतर्न या काँच की बरनी में भरकर रख लें।
पाक खाने के पशात दूध अवशय िपये। इस दौरान मधुर रसवाला भोजन करे। पाक एक िदन मे जयादा से जयादा
40 ग ा म िज तनी मात ा तक खाया जा सकता ह ै ।
आआआआ आआआआ अदरक के बारीक-बारीक टुकड़े, गाय का घी एवं गु ड – इन तीनो को
समान मातर्ा में लेकर लोहे की कड़ाही में अथवा िमट्टी के बतर्न में धीमी आँच पर
पकाये। पाक जब इतना गाढा हो जाय िक िचपकने लगे तब आँच पर से उतारकर उसमे सोठ, जीरा, काली िमचर्,
नागकेसर, जायफल, इलायची, दालचीनी, तेजपतर्, लेंडीपीपर, धिनया, स्याहजीरा, पीपरामूल एवं
वायिवंडम का चूणर ऊपर की औषिधया (अदरक आिद) से चौथाई भाग में डालें। इस पाक को घी लगे
हुए बतर्न में भरकर रख लें।
शीतकाल में पर्ितिदन 20 ग ा म की मात ा म े इस पाक को खान े स े दमा , खाँसी, भम,
स्वरभंग, अरुिच, कणर्रोग, नािसकारोग, मुखरोग, क्षय, उरःक्षतरोग, हृदय रोग, संगर्हणी, शूल,
गु ल म एवं तृ ष ारो ग म े लाभ होता ह ै ।
आआआआ आआआआ खािरक (खजूर) 480 ग ा म , गो द 320 ग ा म , िमशर्ी 380 ग ा म , सोंठ 40
ग ा म , लेंडीपीपर 20 ग ा म , काली िमचर् 30 ग ा म तथा दालची न ी , तेजपतर्, िचतर्क एवं
इलायची 10 -10 ग ा म डाल ल े । िफ र उपय ुर क त िव िध क े अनु स ार इन सब औषिध य ो स े पाक
तैयार करें।
यह पाक बल की वृिद्ध करता है, बालकों को पुष्ट बनाता है तथा इसके सेवन से शरीर
की कांित सुंदर होकर, धातु की वृिद्ध होतीहै।साथ हीक्षय , खाँसी, कंपवात, िहचकी, दमे का नाशहोता
शशशश
है।
आआआआआ आआआआ बादाम 320 ग ा म , मावा 160 ग ा म , बेदाना 45 ग ा म , घी 160 ग ा म ,
िमशर्ी 1600 ग ा म तथा लौ ग , जायफल, वंशलोचन एवं कमलगटा 5-5 ग ा म और ए ल च ा (बड़ी इलायची)
एवं दालचीनी 10-10 ग ा म ल े । इसक े बाद उपरो क त िव िध क े अनु स ार पाक त ै य ा र कर े ।
आआआआ बड़ी इलायची के गुणधमर् वही हैं जो छोटी इलायची के होते हैं ऐसा
दर्व्य-गु ण क े िव द ा न ो का मान न ा ह ै । अतः बड ी इलायच ी भी छोटी क े बराब र ही फायदा
करेगी। बड़ी इलायची छोटी इलायची से बहुत कम दामों में िमलती है।
इस पाक के सेवन से वीयर्वृिद्ध होकर शरीर पुष्ट होता है, वातरोग मे लाभ होता है।
आआआआ आआआआ मेथी एवं सोंठ 320-320 ग ा म की मात ा म े ल े क र दोनो का चू णर
कपड़छन कर लें। 5 लीटर 120 िम.ली. दूध में 320 ग ा म घी डालकर उसम े य े चू णर िम ल ा
दें। यह सब एकरस होकर गाढ़ा हो जाय, तक उसे पकायें। उसके पश् चातउसमें 2 िकलो
560 ग ा म शक र डालकर िफ र स े धीमी आ ँ च पर पकाय े । अ च छ ी तरह पाक त ै य ा र हो जान े
पर नीचे उतार ले। िफर उसमे लेडीपीपर, सोंठ, पीपरामूल, िचतर्क, अजवाइन, जीरा, धिनया, कलौंजी, सौंफ,
जायफल, दालचीनी, तेजपतर् एवं नागरमोथ, ये सभी 40-40 ग ा म एवं काली िम चर का 60 ग ा म
चूणर् डालकर िहलाकर ऱख लें।
यह पाक 40 ग ा म की मात ा म े अथवा पाचनशिकत अनु स ार सु ब ह खाय े । इसक े ऊपर
दूध न िपयें।
यह पाक आमवात, अन्य वातरोग, िवषमजवर, पाडुरोग, पीिलया, उन्माद, अपस्मार, पमेह, वातरकत,
अम्लिपत्त, िशश रोरोग
शशशश , नािसकारोग, नेतर्रोग, सूितकारोग आिद सभी में लाभदायक है।
यह पाक शरीर के िलए पुिष्टकारक, बलकारक एवं वीयर् वधर्क है।
आआआआआ आआआआ 320 ग ा म सो ठ और 1 िकलो 280 ग ा म िम श ी या चीनी को 320 ग ा म
घी एवं इससे चार गुने दूध में धीमी आँच पर पकाकर पाक तैयार करें।
इस पाक के सेवन से मस्तकशू ल, वातरोग, सूितकारोग एवं कफरोगों में लाभ होता है।
पसूित के बाद इसका सेवन लाभदायी है।
आआआआआ आआआआ 500 ग ा म सू ख े अं ज ी र ल े क र उसक े 6-8 छोटे-छोटे टुकड़े कर
लें। 500 ग ा म द े श ी घी गमर करक े उसम े अं ज ी र क े व े टुकड े डालकर 200 ग ा म िम श ी
का चूणर् िमला दें। इसके पश् चातउसमें बड़ी इलायची 5 ग ा म , चारोली, बलदाणा एवं
िपसता 10-10 ग ा म तथा 20 ग ा म बादा म क े छोट े -छोटे टुकड़ों को ठीक ढंग से िमशि र्त कर
काँच की बनीर् में भर लें। अंजीर के टुकड़े घी में डुबे रहने चािहए। घी कम लगे तो
उसमें और ज्यादा घी डाल सकते हैं।
यह िमश र्ण 8 िदन तक बनीर् में पड़े रहने से अंजीरपाक तैयार हो जाता है।
इस अंजीरपाक को पर्ितिदन सुबह 10 से 20 ग ा म की मात ा म े खाली प े ट खाय े । शीत ऋतु
में शिक्त संचय के िलय यह अत्यंत पौिष्टक पाक है। यह अशक्त एवं कमजोर व्यिक्त का
रक्त बढ़ाकर धातु को पुष्ट करता है।
आआआआआआआआ आआआआ अश् वगंधाएक बलवधर्क व पुिष्टदायक शर्ेष्ठ रसायन है। यह
मधुर व िस्नग्ध होने के कारण वात का शमन एवं रक्तािद सप्त धातुओं का पोषण करने वाला
है। सिदर्यों में जठरािग्न पर्दीप्त रहती है। तब अश् वगंधासे बने हुए पाक का सेवन
करने से पूरे वषर् शरीर में शिक्त, स्फूितर् व ताजगी बनी रहती है।
आआआआआ 480 ग ा म अश गं ध ा चू णर को 6 लीटर गाय के दूध में, दूध गाढ़ा होने तक
पकाये। दालचीनी (तज), तेजपत्ता, नागकेशर और इलायची का चूणर् पर्त्येक 15-15 ग ा म
मातर्ा में लें। जायफल, केशश र , वंशलोचन, मोचरस, जटामासी, चंदन, खैरसार (कत्था), जािवती
(जावंती), पीपरामूल, लौंग, कंकोल, िभलावा की मीगी, अखरोट की िगरी, िसंघाड़ा, गोखर का महीन
चूणर् पर्त्येक 7.5 – 7.5 ग ा म मात ा म े ल े । रस िसं दू र , अभर्कभस्म, नागभस्म, बंगभस्म,
लौहभस्म पर्त्येक 7.5 – 7.5 ग ा म मात ा म े ल े । उपय ुर क त सभी चू णर व भस म िम ल ाकर
अश् वगंधासे िसद्ध िकये दूध में िमला दें। 3 िकलो िमशर्ी अथवा चीनी की चाशनी बना
लें। जब चाशनी बनकर तैयार हो जाय तब उसमें से 1-2 बूँद िनकालकर उँगली से देखें,
लच्छेदार तार छूटने लगें तब इस चाशनी में उपयुर्क्त िमशर्ण िमला दें। कलछी से खूब
घोंटे, िजससे सब अचछी तरह से िमल जाय। इस समय पाक के नीचे तेज अिगन न हो। सब औषिधया अचछी तरह से
िमल जाने के बाद पाक को अिग्न से उतार दें।
आआआआआआआआ पूवोकत पकार से औषिधया डालकर जब पाक तैयार हो जाता है, तब वह कलछी से
उठाने पर तार सा बँधकर उठता है। थोड़ा ठंडा करके 1-2 बूँद पानी में डालने से उसमें
डू बकर एक जगह बैठ जाता है, फलता नहीं। ठंडा होने पर उँगली से दबाने पर उसमें उँगिलयों
की रेखाओं के िनशान बन जाते हैं।
पाक को थाली मे रखकर ठंडा करे। ठंडा होने पर चीनी िमटी या काच के बतरन मे भरकर रखे। 10 से 15
ग ा म पाक सु ब ह शहद अथवा गाय क े दूध क े साथ ल े ।
यह पाक शिक्तवधर्क, वीयरवधरक, स्नायु व मांसपेश ियोंको ताकत देने वाला एवं कद
बढ़ाने वाला एक पौिष्टक रसायन है। यह धातु की कमजोरी, शारीिरक-मानिसक कमजोरी आिद
के िलए उत्तम औषिध है। इसमें कैश िल् ,यम लौह तथा जीवनसत्व (िवटािमनस) भी पचुर माता मे
होते हैं।
अश् वगंधाअत्यंत वाजीकर अथार्त् शुकर्धातु की त्विरत वृिद्ध करने वाला रसायन है।
इसके सेवन से शुकर्ाणुओं की वृिद्ध होती है एवं वीयर्दोष दूर होते हैं। धातु की कमजोरी,
स्वप्नदोष, पेशाब के साथ धातु जाना आिद िवकारो मे इसका पयोग बहुत ही लाभदायी है।
यह पाक अपने मधुर व िस्नग्ध गुणों से रस-रक्तािद सप्तधातुओं की वृिद्ध करता है।
अतः मांसपेश ियोंकी कमजोरी, रोगों के बाद आने वाला दौबर्ल्य तथा कुपोषण के कारण
आनेवाली कृशता आिद में िवशेष उपयुक्त है। इससे िवशेषतः मांस व शुकर्धातु की वृिद्ध
होती है। अतः यह राजयक्षमा (क्षयरोग) में भी लाभदायी है। क्षयरोग में अश् वगंधापाक
के साथ सुवणर् मालती गोली का पर्योग करें। िकफायती दामों में शुद्ध सुवणर् मालती व
अश् वगंधाचूणर् आशर्म के सभी उपचार केन्दर्ों व स्टालों पर उपलब्ध है।
जब धातुओं का कय होने से वात का पकोप होकर शरीर मे ददर होता है, तब यह दवा बहुत लाभ करती है।
इसका असर वातवािहनी नाड़ी पर िवशेष होता है। अगर वायु की िवशेष तकलीफ है तो इसके
साथ 'महायोगराज गुगल' गोल ी का प य ो ग कर े ।
इसके सेवन से नींद भी अच्छी आती है। यह वातशामक तथा रसायन होने के कारण
िवसमृित, यादशिक्त की कमी, उन्माद, मानिसक अवसाद (िडपेशन) आिद मनोिवकारों में भी
लाभदायी है। दूध के साथ सेवन करने से शरीर में लाल रक्तकणों की वृिद्ध होती है,
जठरािगन पदीपत होती है, शरीर की कांित बढ़ती है और शरीर में शिक्त आती है। सिदर्यों में
इसका लाभ अवश् यउठायें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ आआआआआआआआआ आआआ आआआआ-आआआआआ
तैत्तीरीय उपिनषद के अनुसारः
'आआआआआ आआ आआआआआआआ आआआआआआआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआआआआआआ।' अथार्त् भोजन ही पर्ािणयों की सवर्शर्ेष्ठ औषिध है, क्योंिक
आहार से ही शरीरस्थ सप्तधातु, ितर्दोष तथा मलों की उत्पित्त होती है।
युिक्तयुक्त आहार वायु, िपत और कफ – इन तीनो दोषो को समान रखते हुए आरोगय पदान करता है और
िकसी कारण से रोग उत्पन्न हो भी जायें तो आहार-िवहार के िनयमो को पालने से रोगो को समूल नष
िकया जा सकता है। आहार में अनाज, दलहन, घी, तेल, शाक, दूध, जल, ईख तथा फल का
समावेश होता है।
अित िमचर्-मसालेवाले, अित नमक तथा तेलयुक्त, पचने मे भारी पदाथर, दूध पर िविवध
पिकया करके बनाये गये अित शीत अथवा अित उषण पदाथर सदा अपथयकर है।
िदन में सोना, कड़क धूप में अथवा ठंडी हवा में घूमना, अित जागरण, अित शर्म
करना अथवा िनत्य बैठे रहना, वायु-मल-मूतर्ािद वेगों को रोकना, ऊँची आवाज में बात
करना, अित मैथुन, कर्ोध, शोक आरोग्य नाशक माने गये हैं।
कोई भी रोग हो, पथम उपवास या लघु अन लेना चािहए कयोिक आआआआआ
आआआआआआआआआआआआआआआआआआ। (आआआआआआआ आआआआ आआआआआआआआआआआ 12.1) पायः सभी
रोगों का मूल मंदािग्न है। आआआआआआआआआआआ आआआआ आआआआआआआआ।
आआआआआआ आआआआआआ आआआआ आआआआआआ
आआआआआआ बुखार में सवर्पर्थम उपवास रखें। बुखार उतरने पर 24 घंटे बाद दर्व
आहार लें। इसके िलए मूँग में 14 गु न ा पानी िम ल ा य े । मु ल ाय म होन े तक पकाय े , िफर
छानकर इसका पानी िपलायें। यह पचने में हलका, अिग्नवधर्क, मल-मूतर् और दोषों का
अनुलोमन करने वाला और बल बढ़ाने वाला है।
पयास लगने पर उबले हुए पानी मे सोठ िमलाकर ले अथवा षडंगोदक का पयोग करे। (नागरमोथ, चंदन,
सोंठ, खस, काली खस (सुगन्धवाली) तथा िपत्तपापड़ा पानी में उबालकर षडंगोदक बनाया
जाता है।) षडंगोदककेपानसेिपत्तका शमनहोताहै , पयास तथा बुखार कम होते है। बुखार के समय पचने मे भारी,
िवदाह उतपन करने वाले पदाथों का सेवन, स्नान, वयायाम, घूमना-िफरना अिहतकर है। नये बुखार में दूध
और फल सपर िवष के समान है।
आआआआआआआआआ ग े हू ँ , पुराने साठी के चावल, जौ, मूँग, घी, दूध, अनार, काले अंगूर िवशेष
पथयकर है। शाको मे पालक, तोरई, मूली, परवल, लौकी और फलों में अंगूर, आम, मौसमी, सेब आिद
पथयकर है। गुड, भूने हुए चने , काली दर्ाक्ष, चुकन्दर, गाजर , हरे पत्तेवाली सिब्जयाँ लाभदायी
हैं। िपत्त बढ़ाने वाला आहार, िदन में सोना, अित शर्म, शोक-कर्ोध अिहतकर हैं।
आआआआआआआआआआ उपवास रखे या हलका, मधुर व रसयुक्त आहार लें। पुराने जौ, ग े हू ँ ,
चावल, मूँग, परवल, पेठा, लौकी, नािरयल, अनार, िमशर्ी, शहद, गाय का दू ध और घी िव श े ष
पथयकर है। ितल, उडद, कुलथी, नमक, लहसुन, दही, नया अनाज, मूँगफली, गु ड , िमचर् तथा गरम
मसाले का सेवन न करें।
आआआआआआआ पथम उपवास रखे। बारंबार थोडी-थोड़ी मातर्ा में गुनगुना पानी पीना िहतकर
है। जठरािग्न पर्दीप्त होने पर अथार्त् अच्छी भूख लगने पर मूँग का पानी, नींबू का शरबत,
छाछ आिद दर्वाहार लेने चािहए। बाद में मूँग अथवा िखचड़ी लें। पचने में भारी,
िस्नग्ध तथा अित मातर्ा में आहार और भोजन के बाद िदन में सोना हािनकारक है।
आआआआआआआआ पुराने चावल तथा गेहूँ, मूँग, परवल, लौकी तुरई िवशेष पथ्यकर हैं। अत्यंत
तीखे, खट्टे, खारे पदाथर्, दही, गु ड , िमष्ठान्न, खमीरीकृत पदाथर्, इमली, टमाटर, मूँगफली,
फल, मछली आिद वज्यर् हैं। साबुन, सुगंिधत तेल, इतर् आिद का उपयोग न करें। चंदन चूणर्
अथवा चने के आटे या मुलतानी िमट्टी का पर्योग करें। ढीले, सादे, सूती वस्तर् पहनें।
आआआआ आआआआ चमर्रोग के अनुसार पथ्यपालन करें और दूध, खट्टी चीजें, नींबू,
संतरा, अमरूद, मौसमी आिद फलों का सेवन न करें।
आआआआआआआ, आआआआआआआ जौ की रोटी, कुलथी, साठी के लाल चावल, परवल, पुननरवा,
सिहजन की फली, पपीता, अदरक, लहसुन, अरंडी का तेल, गोझ र न अकर (आशर्म में िमल सकता
है।) गमर जल सवर श े ष ह ै । भोजन म े गौघृ त , ितल का तेल िहतकर हैं। आलू, चना,
मटर, टमाटर, दही, खट्टे तथा पचने में भारी पदाथर् हािनकारक हैं।
आआआआआ (आआआ)- अल्प मातर्ा में दर्व, हलका, उष्णआहारलें।राितर् को भोजनन करें।स्नान
करने एवं पीने के िलए उष्ण जल का उपयोग करें। गेहूँ, बाजरा, मूँग का सूप, लहसुन,
अदरक का उपयोग करें। अित शीत, खट्टे, तले हुए पदाथोर्ं का सेवन, धूल और धुआँ हािनकारक
हैं।
आआआआआआआ 10 ग ा म ही ग ताबीज की तरह कपड े म े िस लाई करक े गल े म े
पहनने से िमगी के दौरे रक जाते है।
भुनी हुई हीग, सोंठ, काली िमचर्, पीपल, काला नमक, समान मातर्ा में पीसकर, 1 कप पेठे
के रस में इसका 1 चम्मच चूणर् िमलाकर, िनत्य पीते रहने से िमगीर् के दौरे आने बंद
हो जाते हैं।
रेशम के धागे में 21 जायफल िपरोकर गले मे पहनने से भी िमगी मे लाभ होता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआ आआआआआ आआ आआआआ आआआआआआआआआआआ
चरक स्थान के शरीर स्थान में आता हैः
आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ । आआआआ आआआआआआआआआ आआआआआआआ
आआआआआआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ ।। आआआआआआआआआआआआआआआआआआ
'धी, धृितएवंस्मृितयानीबुिद्,धधैयर्
औरयादशिक्त– इनतीनोंको भर्ष्टकरकेअथार्त्इनकीअवहेलनाकरके
जो वयिकत शारीिरक अथवा मानिसक अशुभ कायों को करता है, भूले करता है उसे पजापराध या बुिद का अपराध
(अंतःकरण की अवहेलना) कहा जाता है, जो िक सवरदोष अथात् वायु, िपत, कफ को कुिपत करने
वाला है।
आयुवेर्द की दृिष्ट से ये कुिपत ितर्दोष ही तन-मन के रोगों के कारण हैं।
उदाहरणाथर्ः राितर्जागरण करने अथवा रूखा-सूखा एवं ठंडा खाना खाने से वायु
पकुिपत होती है। अब िजस वयिकत को यह बात समझ मे आ गयी हो िक उसके वायु रोग – गैस, किब्जयत, िसरददर्
अथवा पेटददर् आिद का कारण राितर्जागरण है। चने, सेम, चावल, जामुन एवं आलू जैसा आहार है,
िफर भी वह व्यिक्त मन पर अथवा स्वाद पर िनयंतर्ण न रख पाने के कारण उनका सेवन
करने की गलती करता है तब उसका अंतःकरण उसे वैसा करने से मना भी करता है। उसकी
बुिद्ध भी उसे उदाहरणों दलीलों से समझाने का पर्यास करती है। धैयर् उसे वैसा करने
से रोकता है और स्मरणशिक्त उसे पिरणाम की याद िदलाती है, िफर भी वह गलती करता है
तो यह पर्ज्ञापराध कहलाता है।
तीखा खाने से जलन होती हो, सुजाक हुआ हो, धूप मे घूमने से अमलिपत (एिसिडटी) के कारण
िसर दुखता हो, कर्ोध करने से रक्तचाप (ब्लडपर्ेशर) बढ़ जाता हो – यह जानने के बाद भी
वयिकत अपनी बुिद, धृितऔरस्मृितकी अवहेलनाकरेतोउसेिपत्तकेशारीिरकअथवारजोगुणजन्यमानिसकरोगहोंगे।
इसी पर्कार घी, दूध, शक्कर, गु ड , गन ा अथवा क े ल ा आिद खान े स े या िद न म े सोन े
से सदीर् अथवा कफ, होता हो, मीठा खाने से मधुमेह (डायिबटीज) बढ़ गया हो, नमक, दूध, दही
या गुड़ खाने से त्वचा के रोग बढ़ गये हों िफर भी स्वाद लोलुपतावश लोभी व्यिक्त मन पर
िनयंतर्ण न रख सके तो उसे कफ के रोग एवं तमोगुणजन्य रोग आलस्य, अिनदर्ा, पमाद आिद
होंगे ही।
अंतःकरण अथवा अंतरात्मा की आवाज पर्त्येक व्यिक्त को थोड़ी बहुत सुनाई देती
ही है। छोटे बच्चे भी पेट भर जाने पर एक घूँट दूध पीने में भी आनाकानी करते हैं।
पशु भी पेट भर जाने के बाद अथवा बीमारी पानी तक नही पीते। जबिक मनुषय जैस-े जैसे समझ बढती है, उमर् बढ़ती
है वैसे-वैसे जयादा पजापराध करता नजर आता है। आहार-िवहार के पतयेक मामले मे सजग रहकर, पजापराध न
होने देने की आदत डाली जाय तो मनुष्यमातर् आिध, वयािध एवं उपािध को िनमंतण देना बंद करके समपूणर
स्वास्थ्य, सुख एवं शांित को पर्ाप्त कर सकता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआआ आआ आआआआ आआ आआआआआआ
िजस समय जो सवर चलता है उस समय तुमहारे शरीर मे उसी सवर का पभाव होता है। हमारे ऋिषयो ने इस
िवषय बहुत सुंदर खोज की है।
दायें नथुने से चलने वाला श्वास दायाँ स्वर एवं बायें नथुने से चलने वाला
श्वास बायाँ स्वर कहलाता है, िजसका जान नथुने पर हाथ रखकर सहजता से पापत िकया जा सकता है। िजस
समय िजस नथुने से शव ् ासोच्छ्वास अिधक गित से चल रहा हो, उस समय वह या नथुना चालू
है ऐसा कहा जाता है।
जब सूयर नाडी अथात् दाया सवर (नथुना) चलता हो तब भोजन करने से जल्दी पच जाता है
लेिकन पेय पदाथर् पीना हो तब चन्दर् नाड़ी अथार्त् बायाँ स्वर चलना चािहए। यिद पेय
पदाथर पीते समय बाया सवर न चलता हो तो दाये नथुने को उँगली से दबा दे तािक बाया सवर चलने लगे। भोजन या कोई
भी खाद पदाथर सेवन करते समय िपंगला नाडी अथात् सूयर सवर चालू न हो तो थोडी देर बायी करवट लेटकर या कपडे
की छोटी पोटली बायीं काँख में दबाकर यह स्वर चालू िकया जा सकता है। इससे स्वास्थ्य
की रक्षा होती है तथा बीमारी जल्दी नहीं आती।
सुबह उठते समय ध्यान रखें िक जो स्वर चलता हो उसी ओर का हाथ मुँह पर घुमाना
चािहए तथा उसी ओर का पैर पहले पृथ्वी पर रखना चािहए। ऐसा करने से अपने कायोर्ं
में सफलता िमलती है ऐसा कहा गया है।
दायाँ स्वर चलते समय मलत्याग करने से एवं बायाँ स्वर चलते समय मूतर्त्याग
करने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। वैज्ञािनकों ने पर्योग करके देखा िक इससे
िवपरीत करने पर िवकृितया उतपन होती है।
पकृित ने एक साल तक के िशशु के सवर पर अपना िनयंतण रखा है। िशशु जब पेशाब करता है तब उसका बाया
स्वर चलता है और मलत्याग करता है तब उसका दायाँ स्वर चलता है।
लघुशंका बैठकर ही करनी चािहए क्योंिक खड़े-खड़े पेशाब करने से धातु क्षीण
होती है और बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं।
कुछ लोग मुँह से श्वास लेते हैं। इससे श्वासनली और फेफड़ों में बीमारी के
कीटाणु घुस जाते हैं एवं तकलीफ सहनी पड़ती है। अतः शव ् ास सदैव नाक से ही लेना
चािहए।
कोई खास काम करने जायें उस वक्त जो भी स्वर चलता हो वही पैर आगे रखकर
जाने से िवघ दूर होने मे मदद िमलती है। इस पकार सवर का भी एक अपना िवजान है िजसे जानकर एवं छोटी-छोटी
सावधािनयाँ अपना कर मनुष्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा एवं व्यावहािरक जीवन में भी
सफलता पर्ाप्त कर सकता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ
आआआआ आआआआआ आआआआआआआआ आआ आआआआ आआआआ
अन्न में भी एक पर्कार का नशा होता है। भोजन करने के तत्काल बाद आलस्य के
रूप में इस नशे का पर्ायः सभी लोग अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक
पकार की पािथरव शिकत िनिहत होती है, जो पािथरव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती है। इस शिकत को शासतकारो
ने आिधभौितक शिक्त कहा है।
इस शिक्त की पर्बलता में वह आध्याित्मक शिक्त, जो हम पूजा उपासना के माधयम से एकितत
करना चाहते हैं, नष्ट हो जाती है। अतः भारतीय महिषर्यों ने सम्पूणर् आध्याित्मक
अनुष्ठानों में उपवास का पर्थम स्थान रखा है।
आआआआ आआआआआआआआआआआआ । आआआआआआआआआआ आआआआआआआ
गीता क े अनु स ार उपवास , िवषय-वासना की िनवृित का अचूक साधन है। िजसका पेट खाली हो उसे
फालतू की मटरगस्ती नहीं सझती। अतः शरीर, इिन्दर्यों और मन पर िवजय पाने के िलए
िजतासन और िजताहार होने की परम आवशयकता है।
आयुवेर्द तथा आधुिनक िवज्ञान दोनों का एक ही िनष्कषर् है िक वर्त और उपवासों
जहा अनेक शारीिरक वयािधया समूल नष हो जाती है, वहा मानिसक वयािधयो के शमन का भी यह एक अमोघ उपाय है।
इससे जठरािग्न पर्दीप्त होती है व शरीरशु िद्धहोती है।
फलाहार का तात्पयर् उस िदन आहार में िसफर् कुछ फलों का सेवन करने से है
लेिकन आज इसका अथर् बदलकर फलाहार में से अपभर्ंश होकर फिरयाल बन गया है और
इस फिरयाल में लोग ठूँस-ठूँसकर साबुदाने की िखचडी या भोजन से भी अिधक भारी, गिर ष , िचकना,
तला-गु ल ा व िम चर मसाल े यु क त आहा र का स े व न करन े लग े ह ै । उनस े अनु र ोध ह ै िक व े
उपवास न ही करे तो अचछा है कयोिक इससे उपवास जैसे पिवत शबद की तो बदनामी होती है, साथ ही साथ शरीर को
और अिधक नुकसान पहुँचता है। उनके इस अिववेकपूणर कृतय से लाभ के बदले उनहे हािन ही हो रही है।
सप्ताह में एक िदन तो वर्त रखना ही चािहए। इससे आमाशय, यकृत एवं पाचनतंतर्
को िवशर्ाम िमलता है तथा उनकी स्वतः ही सफाई हो जाती है। इस पर्िकर्या से पाचनतंतर्
मजबूत हो जाता है तथा व्यिक्त की आंतिरक शिक्त के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है।
भारतीय जीवनचया मे वरत एवं उपवास का िवशेष महततव है। उनका अनुपालन धािमरक दृिष से िकया जाता है
परंतु वरतोपवास करने से शरीर भी सवसथ रहता है।
उप यानी समीप और वास यानी रहना। उपवास का आधयाितमक अथर है – बह-परमातमा के िनकट रहना।
उपवास का वयावहािरक अथर है – िनराहार रहना। िनराहार रहने से भगवदभजन और आतमिचंतन मे मदद िमलती है। वृित
अंतमुर्ख होने लगती है। उपवास पुण्यदायी, आमदोषहर, अिग्नपर्दीपक, स्फूितर्दायक तथा
मन को पर्सन्नता देने वाला माना गया है। अतः यथाकाल, यथािविध उपवास करके धमर् तथा
स्वास्थ्य लाभ करना चािहए।
आआआआआ आआआआ आआआआ आआआआआआ आआआआआआआआआआआ।
अथार्त् पेट की अिग्न आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता है। उपवास
से पाचनशिक्त बढ़ती है। उपवासकाल में शरीर में क्या मल उत्पन्न नहीं होता और
जीवनशिकत को पुराना जमा मल िनकालने का अवसर िमलता है। मल-मूतर् िवसजर्न सम्यक होने लगता है,
शरीर में हलकापन आता है तथा अित िनदर्ा-तन्दर्ा का नाश होता है।
इसी कारण भारतवषर् के सनातन धमार्वलम्बी पर्ायः एकादशी, अमावस्या, पूिणरमा या पवों
पर उपवास िकया करते है, क्योंिक उन िदनों जठरािग्न मंद होती है और सहज ही पर्ाणों का
ऊध्वर्गमन होता है। शरीर-शोधन के िलए चैतर्, शर्ावण एवं भादर्पद महीने अिधक
महत्त्वपूणर् होते हैं। नवराितर्यों के िदनों में भी वर्त करने का बहुत पर्चलन है। यह
अनुभव से जाना गया है िक एकादशी से पूिणर्मा तथा एकादशी से अमावस्या तक का काल रोग
की उगर्ता में भी अिधक सहायक होता है, क्योंिक जैसे सूयर् एवं चन्दर्मा के पिरभर्मण
के पिरणामस्वरूप समुदर् में उक्त ितिथयों के िदनों में िवशेष उतार-चढ़ाव होता है, उसी
पकार उकत िकया के पिरणामसवरप हमारे शरीर मे रोगो की वृिद होती है। इसीिलए इन चार ितिथयो मे उपवास का िवशेष
महत्त्व है।
आआआआआआआ आआआआआआ अजीणर्, उलटी, मंदािग्न, शरीर में भारीपन, िसरददर्,
बुखार, यकृत-िवकार, श्वास रोग, मोटापा, संिधवात, सम्पूणर् शरीर में सूजन, खाँसी, दस्त लगना,
किब्जयत, पेटददर, मुँह में छाले, चमड़ी के रोग, गु द े क े िव कार , पकाघात आिद वयािधयो मे रोग के
अनुसार छोटे या बड़े रूप में उपवास रखना लाभकारी होता है।
आआआआआआ आआआआआआ मन पर भी उपवास का बहुमुखी पर्भाव पड़ता है। उपवास से
िचत्त की वृित्तयाँ रुकती हैं और मनुष्य जब अपनी िचत्त की वृित्तयों को रोकने लग जाता
है, तब देह रहते हुए भी सुख-दुःख, हषर्-िवषाद पैदा नही होते। उपवास से सािततवक भाव बढता है, राजस
और तामस भाव का नाश होने लगता है। मनोबल तथा आतमबल मे वृिद होने लगती है। अतः अित िनदा, तन्दर्ा,
उन्माद(पागलपन), बेचैनी, घबराहट, भयभीत या शोकातुर रहना, मन की दीनता, अपर्सन्नता, दुःख,
कर्ोध, शोक, ईष्यार् आिद मानिसक रोगों में औषधोपचार सफल न होने पर उपवास िवशेष
लाभ देता है। इतना ही नहीं अिपतु िनयिमत उपवास के द्वारा मानिसक िवकारों की उत्पित्त
भी रोकी जा सकती है।
आआआआआ आआआआआआआ इन िदनों पूणर् िवशर्ाम लेना चािहए। मौन रह सके तो उत्तम।
उपवास मे हमेशा पहले एक दो िदन ही किठन लगते है। कडक उपवास एक दो बार ही किठन ही लगता है िफर तो मन
और शरीर, दोनों का औपवािसक िस्थित का अभ्यास हो जाता है उसमें आनंद आने लगता है।
सामान्यतः चार पर्कार के उपवास पर्चिलत हैं- िनराहार, फलाहार, दुग्धाहार और
रूिढ़गत।
आआआआआआआआ िनराहार वर्त शर्ेष्ठ है। यह दो पर्कार का होता है – िनजर्ल एवं
सजल। िनजर्ल वर्त में पानी का भी सेवन नहीं िकया जाता। सजल वर्त में गुनगुना पानी
अथवा गुनगुने पानी में नींबू का रस िमलाकर ले सकते हैं। इससे पेट में गैस नहीं
बन पाती। ऐसा उपवास दो या तीन िदन रख सकते हैं। अिधक समय तक ऐसा उपवास करना हो तो
िचिकत्सक की देख-रेख में ही करना चािहए। शरीर में कहीं भी ददर् हो तो नींबू का सेवन
न करें।
आआआआआआआ इसमें केवल फल अथवा फलों के रस पर ही िनवार्ह िकया जाता है।
उपवास के िलए अनार, अंगूर, सेब और पपीता ठीक हैं। इसके साथ गुनगुने पानी में नींबू का
रस िमलाकर ले सकते हैं। नींबू से पाचन-तंतर् की सफाई में सहायता िमलती है। ऐसा
उपवास 6-7 िदन से ज्यादा नहीं करना चािहए।
आआआआआआआआआआ ऐसे उपवास मे िदन मे 3 से 8 बार मलाई-िवहीन दूध 250 से 500 िम.ली.
मातर्ा में िलया जाता है। गाय का दूध उत्तम आहार है। आआआआआआ आआ आआआआआआ आ
आआआआआआआआआ आआआआआआआआआ आआआ आआ आआआ आआआआ आआआआआ आआआ आआआआआआआ
आआआआ आआआआ आआ।
गाय का दूध जीणर ज व र , ग ह ण ी , पाडुरोग, यकृत के रोग, पलीहा के रोग, दाह, हृदयरोग,
रक्तिपत्त आिद में शर्ेष्ठ है। श्वास(दमा), क्षयरोग तथा पुरानी सदीर् के िलए बकरी का दूध
उत्तम है।
आआआआआआआआ 24 घंटों में एक बार सादा, हलका, नमक, चीनी व िचकनाईरिहत भोजन
करें। इस एक बार के भोजन के अितिरक्त िकसी भी पदाथर् का सेवन न करें। केवल सादा
पानी अथवा गुनगुने पानी मे नीबू ले सकते है।
आआआआआआ िजन लोगो को हमेशा कफ, जुकाम, दमा, सूजन, जोडो मे ददर, िनम्न रक्तचाप रहता हो
वे नीबू का उपयोग न करे।
उपरोकत उपवासो मे केवल एक बात का ही धयान रखना आवशयक है िक मल-मूतर् व पसीने का
िनष्कासन ठीक तरह से होता रहे, अन्यथा शरीर के अंगों से िनकली हुई गंदगी िफर से
रक्तपर्वाह में िमल सकती है। आवश् यकहो तो बाद में एिनमा का पर्योग करें।
लोग उपवास तो कर लेते हैं, लेिकन उपवास छोड़ने के बाद क्या खाना चािहए इस
बात पर ध्यान नहीं देते, इसीिलए अिधक लाभ नहीं होता। िजतने िदन उपवास करें, उपवास
छोड़ने के बाद उतने ही िदन मूँग का पानी लेना चािहए तथा उसके दुगने िदन तक मूँग
उबालकर लेनी चािहए। तत्पश् चातिखचड़ी, चावल आिद तथा बाद में सामान्य भोजन करना
चािहए।
उपवास के नाम पर वरत के िदन आलू, अरबी, साग, केला, िसंघाड़े आिद का हलवा, खीर, पेड,े
बफीर् आिद गिरष्ठ भोजन भरपेट करने से रोगों की वृिद्ध होती है। अतः इनका सेवन न
करें।
आआआआआआआआ गभर व त ी स त ी , क्षयरोगी, अल्सर व िमगीर् के रोगी को व अित कमजोर
वयिकत को उपवास नही करना चािहए। मधुमेह के मरीजो को वैदकीय सलाह से ही उपवास करने चािहए।
शास्तर्ों में अिग्नहोतर्ी तथा बर्ह्मचारी को अनुपवास्य माना गया है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ आआआ आआआआ आआआआआ आआआआआआआ आआ
आआआआआआआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ आआआआआ
बेल या िबल्व का अथर् हैः आआआआआआ आआआआआ आआआआआआआ आआआ आआआआआआ जो ।
रोगों का नाश करे वह िबल्व। बेल के िविधवत् सेवन से शरीर स्वस्थ और सुडोल बनता है।
बेल की जड़, उसकी शाखाएँ, पते, छाल और फल, सब के सब औषिधयाँ हैं। बेल में हृदय
को ताकत और िदमाग को ताजगी देने के साथ साित्त्वकता पर्दान करने का भी शर्ेष्ठ गुण
है। यह िस्नग्ध, मुलायम और उष्ण होता है। इसके गूदे, पतो तथा बीजो मे उडनशील तेल पाया जाता
है, जो औषधीय गुणो से भरपूर होता है। कचचे और पके बेलफल के गुण तथा उससे होने वाले लाभ अलग-अलग
पकार के होते है।
कच्चा बेलफल भूख तथा पाचनशिक्त बढ़ानेवाला, कृिमयों का नाश करने वाला है।
यह मल के साथ बहने वाले जलयुक्त भाग का शोषण करने वाला होने के कारण अितसार
रोग में अत्यंत िहतकर है। इसके िनयिमत सेवन से कॉलरा (हैजा) से रक्षण होता है।
पका हुआ फल मधुर, कसैला, पचने मे भारी तथा मृदु िवरेचक है। इसके सेवन से दसत साफ होते है।
आआआआ आआआआआआआ
आआआआआ बेलफल के िछलके का 30 से 50 िम.ली. काढ़ा शहद िमलाकर पीने से
ितर्दोषजन्य उलटी में आराम िमलता है।
गभर व त ी िसत य ो को उलटी व अित सार होन े पर कच च े ब े ल फ ल क े 20 से 50 िम.ली.
काढ़े में सत्तू का आटा िमलाकर देने से भी राहत िमलती है।
बार-बार उलिटयाँ होने पर और अन्य िकसी भी िचिकत्सा से राहत न िमलने पर
बेलफल के गूदे का 5 ग ा म चू णर चावल की धोवन क े साथ ल े न े स े आरा म िम लत ा ह ै ।
आआआआआआआआआ इस व्यािध में पाचनशिक्त अत्यंत कमजोर हो जाती है। बार-बार
दुगर्न्धयुक्त िचकने दस्त होते हैं। इसके िलए 2 बेलफल का गूदा 400 िम.ली. पानी मे उबालकर
छान लें। िफर ठंडी कर उसमें 20 ग ा म शहद िम ल ाकर स े व न कर े ।
आआआआआआ आआआआआ आआआआआआआआआ बेल का 100 ग ा म गू द ा प ित िद न 250 ग ा म
छाछ में मसलकर िपयें।
आआआआआ(Dysentery)- बेलफल आँतों को ताकत देता है। एक बेल के गूदे से बीज
िनकालकर सुबह शाम सेवन करने से पेट में मरोड़ नहीं आती।
आआआआ 200 िम.ली. पानी मे 25 ग ा म ब े ल का गू द ा , 25 ग ा म िम श ी िम ल ाकर शरबत पीन े
से छाती, पेट, आँख या पाँव की जलन में राहत िमलती है।
आआआआ आआ आआआआआ एक बेल का गूदा 100 ग ा म पानी म े उबाल े , ठंडा हो जाने पर उस
पानी से कुलले करे। छाले िमट जायेगे।
आआआआआआआ बेल एवं बकुल की छाल का 2 ग ा म चू णर दू ध क े साथ ल े अथवा 15
िबल्वपतर् और 5 काली िमचर् पीसकर चटनी बना लें। उसे एक कप पानी में घोलकर पीने
से मधुमेह ठीक हो जाता है। इसे लम्बे समय, एक दो साल तक लेने से मधुमेह स्थायी
रूप से ठीक होता है।
आआआआआआ आआआआआआ एक पके बेल का गूदा राितर् के समय पानी में िमलाकर
िमट्टी के बतर्न में रखें। सुबह छानकर इसमें िमशर्ी िमला लें और पर्ितिदन िपयें।
इससे िदमाग तरोताजा हो जाता है।
आआआ आआ आआआआ, आआआआआआआ बेलफल को गोमूतर् में पीसकर उसे 100 िम.ली. दूध,
300 िम.ली. पानी तथा 100 िम.ली. ितल के तेल में िमलाकर धीमी आँच पर उबालें। यह
िबल्विसद्ध तेल पर्ितिदन 4-4 बूँद कान में डालने से कान के ददर् तथा बहरेपन में लाभ
होता है।
आआआआआ पके हुए बेलफल का गूदा िनकालकर उसे खूब सुखा ले। िफर पीसकर चूणर बनाये। इसमे पाचक
तत्त्व पूणर् रूप से समािवष्ट होता है। आवश् यकतापड़ने पर 2 से 5 ग ा म चू णर पान ी म े
िमलाकर सेवन करने से पाचन ठीक होता है। इस चूणर् को 6 महीने तक ही पर्योग में लाया
जा सकता है।
अनुकर्म
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आआआआआआ
अगस्त से नवम्बर के आस-पास अथात् आिशन से माघ मास के बीच आने वाला सीताफल, एक
स्वािदष्ट फल है।
आयुवेर्द के मतानुसार सीताफल शीतल, िपतशामक, कफ एवं वीयर्वधर्क, तृषाशश ामक,
शश
पौिषक, तृिप्तकतार्, मांस एवं रक्तवधर्क, उलटी बंद करने वाला, बलवधर्क, वातदोषशामक एवं
हृदय के िलए िहतकर है।
आधुिनक िवज्ञान के मतानुसार सीताफल में कैश िल् ,यम लौह तत्त्व, फासफोरस,
िवटािमन – थायमीन, राईबोफ्लेिवन एवं िवटािमन सी आिद अच्छे पर्माण में होते हैं।
िजन लोगो की पकृित गमर अथात् िपतपधान है उनके िलए सीताफल अमृत के समान गुणकारी है।
आआआआ आआआआआआआ
आआआआ आआआआआआआ िजन लोगो का हृदय कमजोर हो, हृदय का स्पंदन खूब ज्यादा हो, घबराहट
होती हो, उच्च रक्तचाप हो ऐसे रोिगयों के िलए भी सीताफल का सेवन लाभपर्द है। ऐसे
रोगी सीताफल की ऋतु में उसका िनयिमत सेवन करें तो उनका हृदय मजबूत एवं िकर्याशील
बनता है।
आआआआआ (आआआ आआआआ आ आआआआ)- िजनहे खूब भूख लगती हो, आहार लेने के उपरांत भी
भूख शात न होती हो – ऐसे भसमक रोग मे भी सीताफल का सेवन लाभदायक है।
आआआआआआआआ सीताफल गुण में अत्यिधक ठंडा होने के कारण ज्यादा खाने से
सदीर् होती है। कइयों को ठंड लगकर बुखार आने लगता है, अतः िजनकी कफ-सदीर् की
तासीर हो वे सीताफल का सेवन न करें। िजनकी पाचनशिक्त मंद हो, बैठे रहने का कायर्
करते हों, उन्हें सीताफल का सेवन बहुत सोच-समझकर सावधानी से करना चािहए, अन्यथा
लाभ के बदले नुक्सान होता है।
अनुकर्म
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आआआआआ (आआआ)
पातःकाल खाली पेट सेवफल का सेवन सवासथय के िलए लाभदायक है। सेब को छीलकर नही खाना चािहए
क्योंिक इसके िछलके में कई महत्त्वपूणर् क्षार होते हैं। इसके सेवन से मसूड़े
मजबूत व िदमाग शांत होता है तथा नींद अच्छी आती है। यह रक्तचाप कम करता है।
सेब वायु तथा िपत्त का नाश करने वाला, पुिषदायक, कफकारक, भारी, रस तथा पाक में
मधुर, ठंडा, रुिचकारक, वीयरवधरक हृदय के िलए िहतकारी व पाचनशिकत को बढाने वाला है।
सेब के छोटे-छोटे टुकड़े करके काँच या चीनी िमट्टी के बतर्न में डालकर
चाँदनी रात में ऐसी खुली जगह रखें जहाँ उसमें ओस पड़े। इन टुकड़ों को सुबह एक
महीने तक पर्ितिदन सेवन करने से शरीर तंदरुस्त बनता है।
कुछ िदन केवल सेब के सेवन से सभी पर्कार के िवकार दूर होते हैं। पाचनिकर्या
बलवान बनती है और स्फूितर् आती है।
यूनानी मतानुसार सेब हृदय, मिस्तष्क, यकृत तथा जठरा को बल देता है, खून बढ़ाता
है तथा शरीर की कांित में वृिद्ध करता है।
इसमें टाटर्िरक एिसड होने से यह एकाध घंटे में पच जाता है और खाये हुए
अन्य आहार को भी पचा देता है।
सेब के गूदे की अपेक्षा उसके िछलके में िवटािमन सी अिधक मातर्ा में होता
है। अन्य फलों की तुलना में सेब में फास्फोरस की मातर्ा सबसे अिधक होती है। सेब
में लौहतत्त्व भी अिधक होता है अतः यह रक्त व मिस्तष्क सम्बन्धी दुबर्लताओं के िलए
िहतकारी है।
आआआआ आआआआआआआ
आआआआआआआआआ आआआ आआआआआ आआआआ रक्तिवकार के कारण बार-बार फोड़े-
फुंिसयाँ होती हों, पुराने तवचारोग के कारण चमडी शुषक हो गयी हो, खुजली अिधक होती हो तो अन्न
त्यागकर केवल सेब का सेवन करने से लाभ होता है।
आआआआ आआ आआआआ सेब को अंगारे पर सेंककर खाने से अत्यंत िबगड़ी
पाचनिकया सुधरती है।
आआआआआआआ सेब का रस सोडे के साथ िमलाकर दाँतों पर मलने से दाँतों से
िनकलने वाला खून बंद व दाँत स्वच्छ होते हैं।
आआआआआआ बार-बार बुखार आने पर अन्न का त्याग करके िसफर् सेब का सेवन करें
तो बुखार से मुिक्त िमलती है व शरीर बलवान बनता है।
आआआआआआआआ सेब का गुणधमर् शीतल है। इसके सेवन से कुछ लोगों को सदीर्-
जुकाम भी हो जाता है। िकसी को इससे किबजयत भी होती है। अतः किबजयत वाले पपीता खाये।
अनुकर्म
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आआआआ
मीठा अनार तीनों दोषों का शमन करने वाला, तृिप्तकारक, वीयरवधरक, हलका, कसैले
रसवाला, बुिद्ध तथा बलदायक एवं प्यास, जलन, जवर, हृदयरोग, कण्ठरोग, मुख की दुगर्न्ध तथा
कमजोरी को दूर करने वाला है। खटिमट्ठा अनार अिग्नवधर्क, रुिचकारक, थोड़ा-सा
िपतकारक व हलका होता है। पेट के कीडो का नाश करने व हृदय को बल देने के िलए अनार बहुत उपयोगी है। इसका
रस िपत्तशामक है। इससे उलटी बंद होती है।
अनार िपत्तपर्कोप, अरुिच, अितसार, पेिचश, खाँसी, नेतर्दाह, छाती का दाह व मन की
वयाकुलता दूर करता है। अनार खाने से शरीर मे एक िवशेष पकार की चेतना सी आती है।
इसका रस स्वरयंतर्, फेफड़ों, हृदय, यकृत, आमाशय तथा आँतों के रोगों से
लाभपर्द है तथा शरीर में शिक्त, स्फूितर् तथा िस्नग्धता लाता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ आआ आआआआ गिमर य ो म े िस रददर हो , लू लग जाय, आँखें लाल हो जायें
तब अनार का शरबत गुणकारी िसद्ध होता है।
आआआआआआआआआआआआ ताजे अनार के दानों का रस िनकालकर उसमें िमशर्ी डालकर
पीने से हर पकार का िपतपकोप शात होता है।
आआआआआआ अनार के रस में सेंधा नमक व शहद िमलाकर लेने से अरुिच िमटती
है।
आआआआआआ अनार की सूखी छाल आधा तोला बारीक कूटकर, छानकर उसमें थोड़ा सा
कपूर िमलायें। यह चूणर् िदन में दो बार पानी के साथ िमलाकर पीने से भयंकर कष्टदायक
खाँसी िमटती है एवं िछलका मुँह में डालकर चूसने से साधारण खाँसी में लाभ होता है।
आआआआ आआआआआआआ अनार के िछलके का चूणर् नागकेशर के साथ िमलाकर देने
से बवासीर का रक्तसर्ाव बंद होता है।
आआआआआ बच्चों के पेट में कीड़े हों तो उन्हें िनयिमत रूप से सुबह शाम 2-3
चम्मच अनार का रस िपलाने से कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
अनुकर्म
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आआ
पका आम खाने से सातो धातुओं की वृिद होती है। पका आम दुबले पतले बचचो, वृदो व कृश लोगो को पुष बनाने
हेतु सवोर्त्तम औषध और खाद्य फल है।
पका आम चूसकर खाना आँखो के िलए िहतकर है। यह उतम पकार का हृदयपोषक है तथा शरीर मे छुपे हुए िवष
को बाहर िनकालता है। यह वीयर् की शुिद्ध एवं वृिद्ध करता है। शुकर्पर्मेह आिद िवकारों
और वातािद दोषो के कारण िजनको संतानोतपित न होती हो उनके िलए पका आम लाभकारक है। इसके सेवन से
शुकर्ाल्पताजन्य नपुंसकता, िदमागी कमजोरी आिद रोग दूर होते हैं।
िजस आम का िछलका पतला एवं गुठली छोटी हो, जो रेशारिहत हो तथा िजसमे गभरदल अिधक हो, ऐसा आम
मांस धातु के िलए उत्तम पोषक है।
शहद के साथ पके आम के सेवन से क्षयरोग एवं प्लीहा के रोगों में लाभ होता
है तथा वायु और कफदोष दूर होते हैं।
यूनानी िचिकत्सकों के मतानुसार, पका आम आलसय को दूर करता है, मूतर् साफ लाता है,
क्षयरोग िमटाता है, गुद े एवं बिसत (मूतर्ाशय) के िलए शिक्तदायक है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआ आआ आआआ, आआआआआआआ आम के रस में घी और सोंठ डालकर सेवन करने से
यह जठरािग्नदीपक, बलवधर्क तथा वायु व िपत्तदोष नाशक बनता है। वायु रोग हो अथवा
पाचनतंत दुबरल हो तो आम के रस मे अदरक का रस िमलाकर लेना िहतकारी है।
आआआआआआ, आआआआ-आआआआआआ यिद एक वक्त के आहार में सुबह या शाम आम चूसकर
जरा सा अदरक ले तथा डेढ दो घंटे बाद दूध िपये तो 40 िदन में शारीिरक बल बढ़ता है तथा वणर् में
िनखार आता है, साथ ही शरीर पुष्ट व सुडौल हो जाता है।
आआआआआआआ आआ आआआ आआआआआ आआआआआआआआआआ आआआआआआआ सुबह खाली पेट
250 ग ा म आम का रस , 50 ग ा म शहद और 10 ग ा म अदरक का रस िम ल ाकर ल े । उसक े 2
घंटे बाद एक िगलास दूध िपयें। 4 घंटे तक कुछ न खायें। यह पर्योग बुढ़ापे को दूर
धकेलने वालातथावृद्धोकं ेिलएखूब बलपर्दऔरजीवनशिक्तबढ़ानेवालाहै।
आआआआआआआआ आम और दूध का एक साथ सेवन आयुवेर्द की दृिष्ट से िवरुद्ध आहार
है, जो आगे चलकर चमडी के रोग उतपन करता है।
लम्बे समय तक रखा हुआ बासी रस वायुकारक, पाचन मे भारी एवं हृदय के िलए अिहतकर है। अतः
बाजार में िबकने वाला िडब्बाबंद आम का रस स्वास्थ्य के िलए हािनकारक होता है।
कच्चा, स्वाद में खट्टा तथा ितक्त आम खाने से लाभ के बजाय हािन हो सकती है।
कच्चा आम खाना हो तो उसमें गुड़, धिनया, जीरा और नमक िमलाकर खा सकते है।
अनुकर्म
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आआआआआ (आआआआआ)
अमरूद (जामफल) शीतकाल में पैदा होने वाला, सस्ता और गुणकारी फल है जो सारे
भारत मे पाया जाता है। संसकृत मे इसे अमृतफल भी कहा गया है।
आयुवेर्द के मतानुसार पका हुआ अमरूद स्वाद में खटिमट्ठा, कसैला, गु ण म े ठं ड ा ,
पचने मे भारी, कफ तथा वीयर्वधर्क, रुिचकारक, िपतदोषनाशक एवं हृदय के िलए िहतकर है। अमरद भम,
मूच्छार्, कृिम, तृषा, शोष, शर्म तथा जलन (दाह) नाशक है। गमीर् के तमाम रोगों में जामफल
खाना िहतकारी है। यह शिक्तदायक, सत्त्वगुणी एवं बुिद्धवधर्क है, अतः बुिद्धजीिवयों के
िलए िहतकर हैं। भोजन के 1-2 घंटे के बाद इसे खाने से कब्ज, अफरा आिद की
िशकायतें
द ूर होती हैं। सुबह खाली पेट नास्ते में अमरूद खाना भी लाभदायक है।
आआआआआआआआ अिधक अमरूद खाने से वायु, दस्त एवं ज्वर की उत्पित्त होती है,
मंदािग्न एवं सदीर् भी हो जाती है। िजनकी पाचनशिक्त कमजोर हो, उन्हें अमरूद कम खाने
चािहए।
अमरूद खाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखना चािहए िक इसके बीज ठीक से चबाये
िबना पेट में न जायें। इसको या तो खूब अच्छी तरह चबाकर िनगलें या िफर इसके बीज
अलग करके केवल गूदा ही खायें। इसका साबुत बीज यिद आंतर्पुच्छ (अपेिण्डक्स) में
चला जाय तो िफर बाहर नहीं िनकल पाता, िजससे पायः आंतपुचछ शोथ (अपेिण्डसाइिटस) होने की
संभावना रहती है।
खाने के िलए पके हुए अमरूद का ही पर्योग करें। कच्चे अमरूद का उपयोग सब्जी
के रूप में िकया जा सकता है। दूध एवं फल खाने के बीच में 2-3 घंटों का अंतर अवश् य
रखें।
अनुकर्म
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आआआआआ
ग ी ष म ऋतु का फल – तरबू ज प ा य ः पू र े भारत म े पाया जाता ह ै । पका ह ु आ लाल
गूद े व ा ल ा तरबू ज स वाद म े मधु र , गु ण म े शीतल , िपत एवं गमी का शमन करने वाला, पौिषकता एवं तृिपत
देने वाला, पेट साफ करने वाला, मूतर्ल, वात एवं कफकारक है।
कच्चा तरबूज गुण में ठंडा, दस्त को रोकने वाला, वात व कफकारक, पचने मे भारी एवं
िपतनाशक है।
तरबूज के बीज शीतवीयर्, शरीर में िस्नग्धता बढ़ानेवाले, पौिषक, मूतर्ल, ग म ी का
शमन करने वाले, कृिमनाशश क , िदमागी शिक्त बढ़ाने वाले, दुबर्लता िमटाने वाले,
गु द ों की कमजोर ी दू र करन े वाल े , ग म ी की खा स ी एवं ज व र को िम टान े वाल े क य एवं
मूतर्रोगों को दूर करने वाले हैं। बीज के सेवन की मातर्ा हररोज 10 से 20 ग ा म ह ै ।
जयादा बीज खाने से ितलली की हािन होती है।
आआआआआआआआ गमर तासीरव ा ल ो क े िल ए तरबू ज एक उत म फल ह ै ल े िक न वात व
कफ पर्कृितवालों के िलए हािनकारक है। अतः सदीर्-खाँसी, श्वास, मधुपर्मेह, कोढ़,
रक्तिवकार के रोिगयों को इसका सेवन नहीं करना चािहए।
ग ी ष म ऋतु म े दोपहर क े भोजन क े 2-3 घंटे बाद तरबूज खाना लाभदायक है। यिद
तरबूज खाने के बाद कोई तकलीफ हो तो शहद अथवा गुलकंद का सेवन करें।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआ तरबूज के लाल गूदे पर काली िमचर्, जीरा एवं नमक का चूणर डालकर खाने से
भूख खुलती है एवं पाचनशिकत बढती है।
आआआआआआआआआआआ तरबूज के बीज के गभर् का चूणर् बना लें। गमर् दूध में िमशर्ी
तथा 1 चम्मच यह चूणर् डालकर उबाल लें। इसके पर्ितिदन सेवन से देह पुष्ट होती है।
"आआआआआ आआ आआआआआआआआ आआआआ आआ आआआ आआ आआआआआ आआआआ आआ आआ आआ
आआ आआआआआ आआआआ आआ आआआ आआआआआ आआ..... आआआआआ आआआ आआ। आआआ आआ आआआआआ
आआआआआआ, आआ आआआआआआआआआआ आआआआआआआआआ।"
(आआआआआआआआआ)
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ
पपीता फरवरी-माचर् एवं मई से अक्तूबर तक के महीनों में बहुतायत से पाया
जानेवाला फल है।
कच्चे पपीते के दूध में पेपेइन नामक पाचक रस (Enzymes) होता है। ऐसा आज के
वैजािनक कहते है। िकंतु कचचे पपीते का दूध इतना अिधक गमर होता है िक अगर उसे गभरवती सती खाये तो उसको
गभर स ा व की सं भ ा व न ा रहती ह ै और ब ह च ा र ी खाय े तो वीयर न ा श की सं भ ा व न ा रहती ह ै ।
पके हुए पपीते सवाद मे मधुर, रुिचकारक, िपतदोषनाशक, पचने मे भारी, गु ण म े गरम ,
िस्नग्धतावधर्क, दस्त साफ लाने वाले, वीयरवधरक, हृदय के िलए िहतकारी, वायुदोषनाशक, मूतर्
साफ लानेवाले तथा पागलपन, यकृतवृिद्ध, ितल्लीवृिद्ध, अिग्नमांद्य, आँतों के कृिम एवं
उच्च रक्तचाप आिद रोगों को िमटाने में मददरूप होते हैं।
आधुिनक िवज्ञान के मतानुसार पपीते में िवटािमन ए पयार्प्त मातर्ा में होता है।
इसका सेवन शारीिरक वृिद्ध एवं आरोग्यता की रक्षा करता है।
पके हुए पपीते मे िवटािमन सी की भी अचछी माता होती है। इसके सेवन से सूख रोग (स्कवीर्) िमटता है।
बवासीर, किब्जयत, क्षयरोग, कैंसर, अल्सर, अम्लिपत्त, मािसकसर्ाव की अिनयिमतता,
मधुमेह, अिस्थ-क्षय (Bone T.B.) आिद रोगों में इसके सेवन से लाभ होता है।
िलटन बनार्डर् नामक एक डॉक्टर का मतव्य है िक पर्ितजैिवक (एन्टीबायोिटक) दवाएँ
लेने से आँतों में रहने वाले शरीर के िमतर् जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जबिक पपीते का
रस लेने से उन लाभकतार् जीवाणुओं की पुनः वृिद्ध होती है।
पपीते को शहद के साथ खाने से पोटैिशयम तथा िवटािमन ए, बी, सी की कमी दूर होती है।
पपीता खाने के बाद अजवाइन चबाने अथवा उसका चूणर लेने से फोडे-फुंसी, पसीने की दुगरनध, अजीणर् के
दस्त एवं पेट के कृिम आिद का नाश होता है। इससे शरीर िनरोगी, पुष एवं फुतीला बनता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ आआ आआआआआआआआआआ नाटे, अिवकिसत एवं दुबले-पतले बालको को रोज
उिचत मातर्ा में पका हुआ पपीता िखलाने से उनकी लम्बाई बढ़ती है, शरीर मजबूत एवं
तंदरुस्त बनता है।
आआआआआआआआ, आआआआआआआ रोज सुबह खाली पेट पपीते की फाँक पर नींबू, नमक
एवं काली िमचर् अथवा संतकृपा चूणर् डालकर खाने से मंदािग्न, अरुिच तथा अजीणर् िमटता
है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआ (आआआआआ)
आजकल अिधकांश लोग मशीन या ज्यूसर आिद से िनकाला हुआ रस पीते हैं। सुशर्ुत
संिहता के अनुसार यंतर् (मशीन, जयूसर आिद) से िनकाला हुआ रस भारी, दाहकारी, कब्जकारक
होने के साथ ही (यिद शुद्धतापूवर्क नहीं िनकाला गया है तो) संकर्ामक कीटाणुओं से युक्त
भी हो सकता है।
आआआआआआआ आआआआआ आआआआआआआआ । आआआआआआआआ
आआआआआआ आआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआआआआआआआ आआआ।।
सुशर्ुत संिहता के अनुसार गन्ने को दाँतों से चबाकर उसका रस चूसने पर वह
दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं। अतः गन्ना चूस कर खाना चािहए।
भावपकाश िनघणटु के अनुसार गना रकतिपत नामक वयािध को नष करने वाला, बलवधर्क, वीयरवधरक,
कफकारक, पाक तथा रस मे मधुर, िस्नग्ध, भारी, मूतर्वधर्क व शीतल होता है। ये सब पके हुए
गन े क े गु ण ह ै ।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ गन ा िन त य चू स त े रहन े स े पथरी टुकड े टुकड े होकर बाहर िन कल जाती
है।
आआआआआ आआ आआआआ आआआआ आआआ 1 िग ल ास गन े क े रस म े 2 चम्मच शहद
िमलाकर िपलाने से लाभ होता है।
आआआआआआआआआआआ एक कप गन्ने के रस में आधा कप अनार का रस िमलाकर सुबह-
शाम िपलाने से रक्ताितसार िमटता है।
आआआआआआ यकृत की कमजोरी वाले, िहचकी, रक्तिवकार, नेतर्रोग, पीिलया, िपतपकोप व
जलीय अंश की कमी के रोगी को गना चूसकर ही सेवन करना चािहए। इसके िनयिमत सेवन से शरीर का दुबलापन दूर
होता है और पेट की गमीर् व हृदय की जलन दूर होती है। शरीर में थकावट दूर होकर तरावट
आती है। पेशाब की रुकावट व जलन भी दूर होती है।
आआआआआआआआ मधुमेह, पाचनशिकत की मंदता, कफ व कृिम के रोगवालों को गन्ने के रस
का सेवन नहीं करना चािहए। कमजोर मसूढ़ेवाले, पायिरया व दातो के रोिगयो को गना चूसकर सेवन
नहीं करना चािहए। एक मुख्य बात यह है िक बाजारू मशीनों द्वारा िनकाले गये रस से
संकर्ामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस िनकलवाते समय शुद्धता का
िवशेष धयान रखे।
अनुकर्म
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आआआ
सवर्पिरिचत तथा मध्यम वगर् के द्वारा भी पर्योग में लाया जा सकने वाला फल है
बेर।
यह पुिष्टदायक फल है, िकंतु उिचत मातर्ा में ही इसका सेवन करना चािहए। अिधक
बेर खाने से खाँसी होती है। कभी भी कच्चे बेर नहीं खाने चािहए। चमर्रोगवाले
वयिकत बेर न खाये।
स्वाद एवं आकार की दृिष्ट से इसके 4 पकार होते है।
आआआआ आआआ (आआआआआआ आआआ)- खजूर के आकार, बड़े-बड़े, लम्बे-गोल ब े र
जयादातर गुजरात, कश् मीरएवं पशि ्चमोत्तर पर्देशों में पाये जाते हैं। ये स्वाद में मीठे,
पचने मे भारी, ठंडे, मांसवधर्क, मलभेदक, शर्महर, हृदय के िलए िहतकर, तृषाशश ामक,
शश
दाहशश ामक
शश , शुकर्वधर्क तथा क्षयिनवारक होते हैं। ये बवासीर, दस्त एवं गमीर् की
खाँसी में भी उपयोगी होते हैं।
आआआआ आआआआआ आआआआ ये मध्यम आकार के एवं स्वाद में मीठे होते हैं तथा
माचर् महीने में अिधक पाये जाते हैं। ये गुण में ठंडे, मल को रोकने वाले, भारी,
वीयरवधरक एवं पुिषकारक होते है। ये िपत, दाह, रक्तिवकार, क्षय एवं तृषा में लाभदायक होते हैं,
िकन्तु गुणों में बड़े बेर से कुछ कम। ये कफकारक भी होते हैं।
आआआआआ आआआआ आआआआआ आआआआ ये आकार में मीठे-मध्यम बेर से कुछ छोटे,
कच्चे होने पर स्वाद में खट्टे कसैले एवं पक जाने पर खट्टे-मीठे होते हैं। इसकी
झाड़ी कँटीली होती है। ये बेर मलावरोधक, रुिचवधर्क, वायुनाशक, िपत एवं कफकारक, गरम ,
भारी, िस्नग्ध एवं अिधक खाने पर दाह उत्पन्न करने वाले होते हैं।
आआआआ आआआ (आआआआआआ)- चने के आकार के लाल बेर स्वाद में खट्टे मीठे,
कसैले, ठंडे, भूख तथा पाचन वधरक, रुिचकतार्, वायु एवं िपतशामक होते है। ये अकटू बर-नवम्बर महीनों
में ज्यादा होते हैं।
आआआआ आआआआ सभी पर्कार के सूखे बेर पचने में हलके, भूख बढाने वाले, कफ-वायु-
तृषा-िपत व थकान का नाश करने वाले तथा वायु की गित को ठीक करने वाले होते है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआ आआआआआ आआआ आआआआआ बेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर उससे बाल धोने
से बालों को शिक्त िमलती है, बाल झड़ने बंद होते हैं तथा रूसी िमटती है। अथवा पत्तों
को पीसकर पानी में डालें और मथानी से मथें। उससे जो झाग उत्पन्न हो, उसे िसर में
लगाने से भी बालों का झड़ना रुकता है।
अनुकर्म
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आआआआआ
गु ण ो की दृिष स े बह ु त अिध क लाभकारी ह ै । ग म ी क े मौस म म े नी बू का शरबत
बनाकर िपया जाता है। नींबू का रस स्वािदष्ट और पाचक होने के कारण स्वास्थ्य के िलए
अत्यंत उपयोगी िसद्ध हुआ है। यह खड़ा होने पर भी बहुत गुणकारी है।
रक्त की अम्लता को दूर करने का िवश िष्टगुण रखता है। ितर्दोष, वायु-सम्बन्धी रोगों,
मंदािग्न, कब्ज और हैजे में नींबू िवशेष उपयोगी है। नींबू में कृिम-कीटाणुनाशक और
सड़न दूर करने का िवशेष गुण है। यह रक्त व त्वचा के िवकारों में भी लाभदायक है। नींबू
की खटाई में ठंडक उत्पन्न करने का िवश िष्टगुण है जो हमें गमीर् से बचाता है।
नींबू के फूल में अम्ल (साइिटर्क एिसड) की मातर्ा लगभग 7.5 पितशत होती है। परंतु
उसका पाचन होने पर, उसका क्षार में रूपांतर होने से वह रक्त में अन्नािद आहार से
उत्पन्न होने वाली खटाई को दूर कर रक्त को शुद्ध करता है। इसमें िवटािमन सी अिधक
मातर्ा में उपलब्ध होता है अतः यह रक्तिपत्त, सूखा(स्कवीर्) रोग आिद में अत्यंत
लाभदायक है।
आआआआआआआआ सूजन, जोडो का ददर, सफेद दाग इन रोगों में नींबू का सेवन नहीं करना
चािहए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआ आआआआआआ जवर-अवस्था में गमीर् के कारण मुँह के भीतर लार उत्पन्न
करने वाली गर्ंिथयाँ जब लार उत्पन्न करना बंद कर देती है और मुँह सूखने लगता है,
तब नींबू का रस पीने से ये गर्ंिथयाँ सिकर्य बनती हैं।
आआआआआआआआआआआ, आआआआआआआ िपत पकोप से होने वाले रोगो मे नीबू सवरशेष लाभकता है।
अम्लिपत्त में सामिपत्त का पाचन करने के िलए नींबू के रस में सेंधा नमक िमलाकर
दें। यह अफरा, उलटी, उदरकृिम, मलावरोध, कंठरोग को दूर करता है।
आआआ, आआआआआआ नींबू के रस में िमशर्ी और काली िमचर् का 1 चुटकी चूणर् डालकर
शरबत बना कर पीने से जठरािग्न पर्दीप्त होती है, भोजन के पित रिच उतपन होती है व आहार का
पाचन होता है।
आआआआआआआ, आआआआआआआआआ 1 िग ल ास गु न गु न े पानी म े 1 नींबू का रस एवं 2-3
चम्मच अदरक का रस व िमशर्ी डालकर पीने से हर पर्कार का पेटददर् दूर होता है, जठरािगन
पदीपत होती है व भूख खुलकर लगती है।
आआआआआआ, आआआआआ 1 िग ल ास गु न गु न े पानी म े 1 चम्मच नींबू का रस एवं 2-3
चम्मच शहद डालकर पीने से शरीर की अनावश् यकचरबी कम होती है, शौचशुिद्ध होती है एवं
पुरानी कबज िमट जाती है।
आआआआआआ आआ आआआ आआआआआआआ नींबू के रस में इमली के बीज पीसकर लगाने
से दाद, खाज िमटती है। कृिम, कण्डू, कुष्ठरोग में जब स्तर्ाव न होता हो तब नींबू का रस
लगाने से लाभ होता है।
नींबू के रस में नािरयल का तेल िमलाकर शरीर पर उसकी मािलश करने से त्वचा
की शुष्कता, खुजली आिद त्वचा के रोगों में लाभ होता है।
आआआआआ आआ आआआआ, आआआ आआ आआआआआ-आआआआआआ नींबू का रस और सरसों का
तेल समभाग में िमलाकर िसर पर लगाने से रूसी में राहत िमलती है और बाद में दही
रगड़कर धोने से कुछ ही िदनों में िसर का दारूणक रोग िमटता है। इस रोग में िसर में
फुंिसयाँ व खुजली होती है।
अनुकर्म
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आआआआआ
जामुन अिगनपदीपक, पाचक, स्तंभक (रोकनेवाला) तथा वषार् ऋतु में अनेक रोगों में
उपयोगी है। जामुन मे लौह तततव पयापत माता मे होता है, अतः पीिलया के रोिगयों के िलए जामुन का
सेवन िहतकारी है। जामुन यकृत, ितल्ली और रक्त की अशु िद्धको दूर करते हैं। जामुन खाने
से रक्त शुद्ध तथा लािलमायुक्त बनता है। जामुन मधुमेह, पथरी, अितसार, पेिचश, संगर्हणी,
यकृत के रोगों और रक्तजन्य िवकारों को दूर करता है। मधुमेह के रोिगयों के िलए जामुन
के बीज का चूणर् सवोर्त्तम है।
आआआआआआआआ जामुन सदा भोजन के बाद ही खाना चािहए। भूखे पेट जामुन िबलकुल न खाये। जामुन खाने
के तत्काल बाद दूध न िपयें।
जामुन वातदोष नाश करने वाले है अतः वायुपकृितवालो तथा वातरोग से पीिडत वयिकतयो को इनका सेवन नही
करना चािहए। शरीर पर सूजन व उलटी दीघर्कालीन उपवास करने वाले तथा नवपर्सूताओं को
इनका सेवन नहीं करना चािहए।
जामुन पर नमक लगाकर ही खाये। अिधक जामुन का सेवन करने पर छाछ मे नमक डाल कर िपये।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआ मधुमेह के रोगी को िनत्य जामुन खाने चािहए। अच्छे पके जामुन
सुखाकर, बारीक कूटकर बनाया गया चूणर् पर्ितिदन 1-1 चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ सेवन
करने से मधुमेह में लाभ होता है।
आआआआआआआआआ कुछ िदनों तक जामुन के वृक्ष की छाल के काढ़े में शहद (मधु)
िमलाकर िदन में 2 बार सेवन करने से िस्तर्यों का पर्दर रोग िमटता है।
आआआआआआआआ जामुन के बीज को पानी मे िघसकर मुँह पर लगाने से मुँहासे िमटते है।
आआआआ आआआआआआ जामुन की गुठिलयो को पीसकर शहद मे िमलाकर गोिलया बना ले। 2-2 गोल ी
िनत्य 4 बार चूसें। इससे बैठा गला खुल जाता है। आवाज का भारीपन ठीक हो जाता है।
अिधक बोलने वालों के िलए यह िवशेष चमत्कारी योग है।
आआआआआआआआआआ जामुन की गुठली का 4-5 ग ा म चू णर सु ब ह -शाम पानी के साथ लेने से
स्वप्नदोष ठीक होता है।
आआआआआ जामुन के पेड की पितया (न ज्यादा पकी हुईं न ज्यादा मुलायम) लेकर पीस लें।
उसमें जरा-सा सेंधा नमक िमलाकर उसकी गोिलयाँ बना लें। 1-1 गोल ी सु ब ह -शाम पानी के
साथ लेने से कैसे भी तेज दस्त हों, बंद हो जाते हैं।
अनुकर्म
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आआआआआ
फालसा िस्नग्ध, मधुर, अम्ल और ितक्त है। कच्चे फल का पाक खट्टा एवं पके फल
का िवपाक मधुर, शीतवीयर्, वात-िपतशामक एवं रिचकता होता है।
फालसे पके फल स्वाद में मधुर, स्वािदष्ट, पाचन मे हलके, तृषाशश ामक,
शश उलटी िमटाने
वाले, दस्त में सहायक, हृदय के िलए िहतकारी है। फालसा रक्तिपत्तनाशक, वातशामक,
कफहतार्, पेट एवं यकृत के िलए शिकतदायक, वीयरवधरक, दाहनाशश क , सूजन िमटाने वाला, पौिषक,
कामोद्दीपक, िपत का जवर िमटाने वाला, िहचकी एवं श्वास की तकलीफ, वीयर की कमजोरी एवं कय जैसे रोगो
में लाभकतार् है। वह रक्तिवकार को दूर करके रक्त की वृिद्ध भी करता है।
आधुिनक िवज्ञान की दृष्टा से फालसे में िवटािमन सी एवं केरोटीन तत्त्व भरपूर
मातर्ा में है। गमीर् के िदनों में फालसा एक उत्तम फल है। फालसा शरीर को िनरोगी एवं
हृष्ट-पुष बनाता है।
फालसे के फल के अन्दर बीज होता है। फालसे को बीज के साथ भी खा सकते हैं।
शरीर से िकसी भी मागर् के द्वारा होने वाले रक्तसर्ाव की तकलीफ में पके
फालसे के रस का शरबत बना कर पीना लाभकारी है। फालसे का शरबत हृदय पोषक (हाटर्
टॉिनक) है। यह शरबत स्वािदष्ट एवं रुिचकर होता है। गिमर्यों के िदनों में शरीर में
होने वाले दाह, जलन तथा पेट एवं िदमाग जैसे महततवपूणर अंगो की कमजोरी आिद फालसे के सेवन से दूर होती
है। फालसे का मुरब्बा भी बनाया जाता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआ आआ आआआआ िसकी हुई 3 ग ा म अजवा य न म े फालस े का 25 से 30 ग ा म रस
डालकर थोडा सा गमर करके पीने से पेट का शूल िमटता है।
आआआआआआआआआआआ ग म ी क े दोष , नेतर्दाह, मूतर्दाह, छाती या पेट में दाह, खट्टी
डकार आिद की तकलीफ मे फालसे के रस का शरबत बनाकर पीना तथा उषण-तीक्ष्ण खुराक बंद कर केवल
साित्त्वक खुराक लेने से िपत्तिवकार िमटते हैं और अिधक तृषा से भी राहत िमलती है।
आआआआ आआ आआआआआआआ फालसे का रस, नींबू का रस, 1 चुटकी सेंधा नमक, 1-2 काली
िमचर् लेकर उसमें स्वादानुसार िमशर्ी िमलाकर पीने से हृदय की कमजोरी में लाभ होता
है।
आआआ आआ आआआआआआआ पके फालसे के रस मे गुलाब जल एवं िमशी िमलाकर रोज पीने से पेट की
कमजोरी दूर होती है एवं उलटी उदरशू ल, उबकाई आना आिद तकलीफें दूर होती हैं एवं
रक्तदोष भी िमटता है।
आआआआआ आआ आआआआआआआ कुछ िदनों तक नाश् तेके स्थान पर फालसे का रस
उपयुकत माता मे पीने से िदमाग की कमजोरी एवं सुसती दूर होती है, फुतीर् और शिक्त पैदा होती है।
आआआआ आआ आआआ आआआआआ कई बार गभर्वती मिहलाओं के गभार्शय में िस्थत गभर्
मूढ़ या मृत हो जाता है। ऐसी अवस्था में िपण्ड को जल्दी बाहर िनकालना एवं माता के
पाणो की रका करना आवशयक होता है। ऐसी पिरिसथित मे अनय कोई उपाय न हो तो फालसा के मूल को पानी मे िघसकर
उसका लेप गभर्वती मिहला की नािभ के नीचे पेड़ू, योिन एवं कमर पर करने से िपण्ड
जलदी बाहर आ जायेगा। िपणड बाहर आते ही तुरनत लेप िनकाल दे, नहीं तो गभार्शय बाहर आने की
सम्भावना रहती है।
आआआआआ, आआआआआ, आआआ कफदोष से होने वाले श्वास, सदीर् तथा िहचकी में
फालसे का रस थोड़ा गमर् करके उसमें थोड़ा अदरक का रस एवं सेंधा नमक डालकर पीने
से कफ बाहर िनकल जाता है तथा सदीर्, श्वास की तकलीफ एवं िहचकी िमट जाती है।
आआआआआआआआआ 25 ग ा म फालस े , 5 ग ा म आ ँ व ल े का चू णर , 10 ग ा म काली द ा क ,
10 ग ा म खजू र , 50 ग ा म चं द न चू णर , 10 ग ा म सौ फ का चू णर ल े । सवर प थ म आ ँ व ल ा चू णर ,
चंदन चूणर् एवं सौंफ का चूणर् लेकर िमला लें। िफर खजूर, दर्ाक्ष एवं फालसे को आधा कूट
लें। राितर् में इस सबको पानी में िभगोकर रख दें। सुबह 20 ग ा म िम श ी डालकर अ च छ ी
तरह से िमशि र्त कर के छान लें। उसके2 भाग करके सुबह-शाम 2 बार िपयें। खाने में दूध,
घी, रोटी, मक्खन, फल एवं िमशर्ी की चीजें लें। सभी गरम खुराक खाना बंद कर दें। इस
पयोग से मूत, गु द ा , आँख या योिन की अथवा अन्य िकसी भी पर्कार की जलन िमटती है। मिहलाओं
का श्वेत पर्दर, अित मािसकसर्ाव होना तथा पुरुषों का शुकर्मेह आिद िमटता है। िदमाग की
अनावश् यकगमीर् दूर होती है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ
आयुवेर्द के मतानुसार आँवले थोड़े खट्टे, कसैले, मीठे, ठंडे, हलके, ितर्दोष
(वात-िपत-कफ) का नाश करने वाले, रक्तशु िद्धकरनेवाले, रुिचकर, मूतर्ल, पौिषक, वीयरवधरक,
केशवधर्क, टू टी अिसथ जोडने मे सहायक, कांितवधर्क, नेतर्ज्योितवधर्क, ग म ी न ा शक एवं दा त ो
को मजबूती पर्दान करने वाले होते हैं।
आँवले रक्तपर्दर, बवासीर, दाह, अजीणर्, श्वास, खाँसी, दस्त, पीिलया एवं कय जैसे रोगो मे
लाभपर्द होते हैं। आँवला एक शर्ेष्ठ रसायन है। यह रस-रक्तािद सप्तधातुओं को पुष्ट
करता है। आँवले के सेवन से आयु, स्मृित, कांित एवं बल बढ़ता है, हृदय एवं मिस्तष्क
को शिक्त िमलती है, आँखों का तेज बढ़ता है और बालों की जड़ें मजबूत होकर बाल
काले होते हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ आआआआआआ 3 से 5 ग ा म चू णर को िम श ी क े साथ प ित िद न 2 बार लेने से
अथवा इस चूणर् को शहद के साथ चाटने से श्वेत पर्दर ठीक होता है।
आआआआ आआआआआआ आँवला तथा िमशर्ी का समभाग चूणर् 4 भाग लेकर उसमे 2 भाग हलदी का
चूणर् िमलाकर 3-3 ग ा म चू णर सु ब ह -शाम पानी के साथ लेने से रक्त पर्दर (योिनगत
रक्तसर्ाव) में अितशीघर् आराम िमलता है।
आआआआआआआआ आँवले के 3 से 5 ग ा म चू णर को घी एवं िम श ी क े साथ ल े न े स े
िपत तथा वायुदोष से उतपन िसरददर मे राहत िमलती है।
आआआआआआआआ, आआआआआआआआआ आँवले के रस में ताजी हल्दी का रस अथवा हल्दी
का पाउडर व शहद िमलाकर सुबह-शाम िपयें अथवा आँवले एवं हल्दी का समभाग चूणर् रोज
सुबह-शाम शहद अथवा पानी के साथ लें। इससे पर्मेह िमटता है। पेशाब के साथ धातु
जाना बंद होता है।
आआआआआआआआआआआआ आँवले के रस में घी तथा िमशर्ी िमलाकर रोज पीने से
वीयरवृिद होती है।
आआआआआआआआ ग म ी क े कारण हु ई किबज य त म े आ ँ व ल े का चू णर घी एवं िम श ी क े
साथ चाटें अथवा ितर्फला (हरड़, बहेड़ा, आँवला समभाग) चूणर् आधा से एक चम्मच रोज
राितर् को पानी के साथ लें। इससे किब्जयत दूर होती है।
आआआआआआआ आआआआआ आआआआ हाथ-पैरो मे अतयिधक पसीना आता हो तो पितिदन आँवले के 20 से
30 िम.ली. रस में िमशर्ी डालकर िपयें अथवा ितर्फला चूणर् लें। आहार में गरम वस्तुओं
का सेवन न करें।
आआआआआआ आआ आआआआआआआ आँवले के चूणर् को पानी में उबालकर उस पानी से
कुल्ले करने से दाँत मजबूत एवं स्वच्छ होते हैं।
आँवला एक उत्तम औषिध है। जब ताजे आँवले िमलते हों, तब इनका सेवन सबके
िलए लाभपर्द है। ताजे आँवले का सेवन हमें कई रोगों से बचाता है। आँवले का चूणर्,
मुरब्बा तथा च्यवनपर्ाश वषर्भर उपयोग िकया जा सकता है। जो मनुष्य पर्ितिदन आँवले से
स्नान करता है उसके बाल जल्दी सफेद नहीं होते।
अनुकर्म
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आआआआ
गाजर को उसक े प ा कृ ित क रप म े ही अथ ा त ् कच चा खान े स े ज य ाद ा लाभ होता ह ै ।
उसके भीतर का पीला भाग िनकाल कर खाना चािहए क्योंिक वह अत्यिधक गरम होता है, अतः
िपतदोष, वीयरदोष एवं छाती मे दाह उतपन करता है।
गाजर स वाद म े मधु र कस ै ल ी कड व ी , तीक्ष्ण, िस्नग्ध, उष्णवीयर् , गरम , दस्त ठीक करने
वाली, मूतर्ल, हृदय के िलए िहतकर, रक्त शुद्ध करने वाली, कफ िनकालनेवाली, वातदोषनाशक,
पुिषवधरक तथा िदमाग एवं नस नािडयो के िलए बलपद है। यह अफरा, संगर्हणी, बवासीर, पेट के रोगो, सूजन,
खाँसी, पथरी, मूतर्दाह, मूतर्ाल्पता तथा दुबर्लता का नाश करने वाली है।
गाजर क े बीज गरम होत े ह ै अतः गभर व त ी मिह ल ा ओं को उपयोग कभी नही करना
चािहए। इसके बीज पचने में भी भारी होते हैं। गाजर में आलू से छः गुना ज्यादा
कैश िल् होता यम है। कैश िल् एवं यम केरोटीन की पर्चुर मातर्ा होने के कारण छोटे बच्चों
के िलए यह एक उत्तम आहार है। रूसी डॉ. मेकिनकोफ के अनुसार गाजर में आँतों के
हािनकारक जंतुओं को नष्ट करने का अदभुत गुण पाया जाता है। इसमें िवटािमन ए भी काफी
मातर्ा में पाया जाता है, अतः यह नेतर्रोगों में भी लाभदायक है।
गाजर रक त शुद करती ह ै । 10-15 िदन तक केवल गाजर के रस पर रहने से
रक्तिवकार, गा ठ , सूजन एवं पांडुरोग जैसे त्वचा के रोगों में लाभ होता है। इसमें
लौह-तत्त्व भी पर्चुर मातर्ा में पाया जाता है। खूब चबाकर गाजर खाने से दाँत मजबूत,
स्वच्छ एवं चमकदार होते हैं तथा मसूढ़ें मजबूत बनते हैं।
आआआआआआआआ गाजर क े भीतर का पील ा भाग खान े स े अथवा गाजर क े खान े क े
बाद 30 िमनट के अंदर पानी पीने से खाँसी होती है। अत्यिधक मातर्ा में गाजर खाने से
पेट मे ददर होता है। ऐसे समय मे थोडा गुड खाये। अिधक गाजर वीयर का कय करती है। िपतपकृित के लोगो को गाजर
का कर्म एवं सावधानीपूवर्क उपयोग करना चािहए।
आआआआ आआआआआआआ
आआआआआआ आआआआआआआ गाजर क े रस का िन त त य स े व न करन े स े िद मा ग ी कमजोर ी
दूर होती है।
आआआआआ सब आहार त्यागकर केवल गाजर के रस अथवा उबली हुई गाजर पर रहने
से मरीज को लाभ होता है।
आआआआआ आ आआआआआ आआ आआ आआआआआआआआआआ मािसक कम आने पर या समय होने
पर भी न आने पर गाजर के 5 ग ा म बीजो को 20 ग ा म गु ड क े साथ काढ ा बनाकर ल े न े स े लाभ
होता है। एलोपैिथक गोिलयाँ जो मािसक को िनयिमत करने के िलए ली जाती हैं, वे अतयिधक
हािनकारक होती हैं। भूल से भी इसक सेवन न करें।
आआआआआआआआ गाजर क े पत ो पर दोनो ओर घी लगाकर उन ह े गमर कर े । िफ र
उनका रस िनकालकर 2-3 बूँदें गाम एवं नाक में डालें। इससे आधासीसी (आधा िसर) का
ददर् िमटता है।
आआआआआ-आआआआआआ गाजर क े रस की 4-5 बूंदें दोनों नथुनों में डालने से लाभ
होता है।
आआआआआआआआआ दृिष्टमंदता, रतौंधी, पढते समय आँखो मे तकलीफ होना आिद रोगो मे कचची गाजर
या उसके रस का सेवन लाभपर्द है। यह पर्योग चश् मेका नंबर घटा सकता है।
आआआआ आआआआआआआआ आआआआआआआआ अरुिच, मंदािग्न, अपच, आिद रोगों में गाजर
के रस में नमक, धिनया, जीरा, काली िमचर्, नींबू का रस डालकर िपयें अथवा गाजर का सूप
बनाकर िपयें।
आआआआआ आआ आआआआआआ गाजर का रस पीन े स े प े श ा ब खु लकर आता ह ै , रक्तशशशश कर्र
शाश
भी कम होती है। गाजर का हलवा खाने से पेशाब मे कैिलशयम, फास्फोरस का आना बंद हो जाता है।
आआआआ आआआ जलने से होने वाले दाह मे पभािवत अंग पर बार-बार गाजर का रस लगाने से लाभ
होता है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ
वषा ऋतु मे करेले बहुतायत मे पाये जाते है। मधुमेह, बुखार, आमवात एवं यकृत के मरीजों के
िलए अत्यंत उपयोगी करेला, एक लोकिपर्य सब्जी है।
आयुवेर्द के मतानुसार करेले पचने में हलके, रुक्ष, स्वाद में कच्चे, पकने पर
तीखे एवं उष्णवीयर् होते हैं। करेला रुिचककर, भूखवधरक, पाचक, िपतसारक, मूतर्ल, कृिमहर,
उत्तेजक, जवरनाशक, पाचक, रक्तशश ोधक,
शश सूजन िमटाने वाला, वरण िमटाने वाला, दाहनाशश क ,
आँखों के िलए िहतकर, वेदना िमटाने वाला, मािसकधमर् का उत्पित्तकतार्, दूध शुद्ध करने वाला,
मेद, गु ल म (गा ठ ), पलीहा (ितल्ली), शूल, पमेह, पाडु, िपतदोष एवं रकतिवकार को िमटाने वाला है। करेले कफ
पकृितवालो के िलए अिधक गुणकारी है तथा खासी, श्वास एवं पीिलया में भी लाभदायक है। करेले
के पत्तों का ज्यादा मातर्ा में िलया गया रस वमन-िवरेचन करवाता है, िजससे िपत का नाश होता है।
बुखार, सूजन, आमवात, वातरकत, यकृत या प्लीहावृिद्ध एवं त्वचा के रोगों में करेले
की सब्जी लाभदायक होती है। चेचक-खसरे के पर्भाव से बचने के िलए भी पर्ितिदन
करेले की सब्जी का सेवन करना लाभपर्द है। इसके अलावा अजीणर्, मधुपर्मेह, शूल,
कणर्रोग, िशरोरोग
ए वं कफ के रोगों आिद में मरीज की पर्कृित क अनुसार एवं दोष का
िवचार करके करेले की सबजी देना लाभपद है।
आमतौर पर करेले की सब्जी बनाते समय उसके ऊपरी हरे िछलके उतार िलये
जाते है तािक कडवाहट कम हो जाय। िफर उसे काटकर, उसमें नमक िमलाकर, उसे िनचोड़कर उसका
कड़वा रस िनकाल िलया जाता है और तब उसकी सब्जी बनायी जाती है। ऐसा करने से
करेले के गुण बहुत कम हो जाते हैं। इसकी अपेक्षा कड़वाहट िनकाले िबना, पानी डाले िबना,
मातर् तेल में छाँककर (तड़का देकर अथवा बघार कर) बनायी गयी करेले की सब्जी परम
पथय है। करेले के मौसम मे इनका अिधक से अिधक उपयोग करके आरोगय की रका करनी चािहए।
आआआआआआ करेले अिधक खाने से यिद उलटी या दस्त हुए हों तो उसके इलाज के
तौर पर घी-भात-िमशर्ी खानी चािहए। करेले का रस पीने की मातर्ा 10 से 20 ग ा म ह ै । उलटी
करने के िलए रस पीने की मातर्ा 100 ग ा म तक की ह ै । कर े ल े की स ब जी 50 से 150 ग ा म
तक की मातर्ा में खायी जा सकती है। करेले के फल, पते, जड आिद सभी भाग औषिध के रप मे
उपयोगी है।
आआआआआआआआ िजनहे आँव की तकलीफ हो, पाचनशिकत कमजोर दुबरल पकृित के हो, उन्हें करेले
का सेवन नहीं करना चािहए। गर्ीष्म ऋतु में, िपतपकोप की ऋतु काितरक मास मे करेले का सेवन नही
करना चािहए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआ करेले के 3-4 पतो को काली िमचर के 3 दानों के साथ पीसकर दें तथा
पतो का रस शरीर पर लगाये। इससे लाभ होता है।
आआआआ आआ आआआआआ करेले के 1 से 3 बीजों को एक दो काली िमचर् के साथ
पीसकर बालक को िपलाने से उलटी बंद होती है।
आआआआआआआआआआ कोमल करेले के टुकड़े काटकर, उन्हें छाया में सुखाकर
बारीक पीसकर उनमें दसवाँ भाग काली िमचर् िमलाकर सुबह शाम पानी के साथ 5 से 10 ग ा म
की मातर्ा में पर्ितिदन लेने से मूतर्मागर् से जाने वाली शक्कर में लाभ होता है।
कोमल करेले का रस भी लाभकारक है।
आआआआआआआआआआआ 20 ग ा म कर े ल े का रस , 5 ग ा म राई का चू णर , 3 ग ा म स े ध ा
नमक इन सबको िमलाकर सुबह खाली पेट पीने से यकृतवृिद्ध, अपचन एवं बारंबार शौच की
पवृित मे लाभ होता है।
आआआआआ आआआ आआआआ पैर के तलवो मे होने वाली जलन मे करेले का रस िघसने से लाभ होता है।
आआआआआआ आआ आआआआआ बच्चों के अफरे में करेले के पत्तों के आधा चम्मच
रस में चुटकी भेर हल्दी का चूणर् िमलाकर िपलाने से बालक को उलटी हो जायेगी एवं पेट
की वायु तथा अफरे में लाभ होगा।
आआआआआआआ करेले के 10 से 20 ग ा म रस म े 5 से 10 ग ा म िम श ी िम ल ाकर रोज
िपलाने से लाभ होता है।
आआआआआआआआआआआआ िजनको पेशाब खुलकर न आता हो, उन्हें करेले अथवा उनके
पतो के 30 से 50 ग ा म रस म े दही का 15 ग ा म पानी िम ल ाकर िप ला न ा चािह ए। उसक े बाद 50
से 60 ग ा म छा छ िप ला य े । ऐसा 3 िदन करें। िफर तीन िदन यह पर्योग बंद कर दें एवं िफर
से दूसरे 6 िदन तक लगातार करें तो लाभ होता है।
इस पर्योग के दौरान छाछ एवं िखचड़ी ही खायें।
आआआआआआआआआआ करेले एवं उसके पत्ते के 5 से 10 ग ा म चू णर म े िम श ी
िमलाकर घी अथवा पानी के साथ लेने से लाभ होता है।
आआआआआआआआआ 50 ग ा म कर े ल े का रस , 25 ग ा म नाग र ब े ल क े पत ो का रस , 10
ग ा म चं द न का चू णर , 10 ग ा म िग ल ो य का चू णर , 10 ग ा म असगं ध (अश् वगंधा) का चूणर्, 10
ग ा म शतावरी का चू णर , 10 ग ा म गोखर का चू णर एवं 100 ग ा म िम श ी ल े । पहल े कर े ल े
एवं नागरबेल के पत्तों के रस को गमर् करें। िफर बाकी की सभी दवाओं के चूणर् में
उन्हें डालकर िघस लें एवं आधे-आधे गर्ाम की गोिलयाँ बनायें। सुबह दूध पीते समय
खाली पेट पाँच गोिलयाँ लें। 21 िदन के इस पर्योग से पुरुष की वीयर्धातु में वृिद्ध होती
है एवं शरीर में ताकत बढ़ती है।
आआआआआ करेले को पीसकर सूजव वाले अंग पर उसका लेप करने से सूजन उतर
जाती है। गले की सूजन मे करेले की लुगदी को गरम करके लेप करे।
आआआआआ पेट मे कृिम हो जाने पर करेले के रस मे चुटकीभर हीग डालकर पीने से लाभ होता है।
आआआआ आआआ आग से जले हुए घाव पर करेले का रस लगाने से लाभ होता है।
आआआआआआआ करेले के पत्तों के रस में लेंडीपीपर िघसकर आँखों में
आँजने से लाभ होता है।
आआआआआआआआ (आआआआआआआआआआ)- करेले के पत्तों का 2-2 चम्मच रस सुबह-शाम
देने से पांडुरोग में लाभ होता है।
अनुकर्म
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आआआआआआआ (आआआआ)
आयुवेर्द के मतानुसार सभी पर्कार की कन्द, सिब्जयों में सूरन सवर्शर्ेष्ठ है।
बवासीर के रोिगयों को वैद्य सूरन एवं छाछ पर रहने के िलए कहते हैं। आयुवेर्द में
इसीिलए इसे अशोर् घ्नभी कहा गया है।
आआआआआआआआ सूरन पचने में हलका, रुक्ष, तीक्ष्ण, कड़वा, कसैला और तीखा,
उष्णवीयर्
, कफ एवं वातशामक, रुिचवधर्क, शूलहर, मािसक बढ़ानेवाला, बलवधर्क, यकृत के िलए
उत्तेजक तथा बवासीर (अर् शशश), गु ल म व प ल ी ह ा क े ददर म े पथ यकारक ह ै ।
सूरन की दो पर्जाितयाँ पायी जाती हैं – लाल और सफेद। लाल सूरन को काटने से
हाथ में खुजली होती है। यह औषिध में ज्यादा पर्युक्त होता है जबिक सफेद सूरन का
उपयोग सबजी बनाने मे िकया जाता है।
सफेद सूरन अरुिच, अिग्नमाद्य, किब्जयत, उदरशू ल, गु ल म (वायुगोला), आमवात, यकृत-
पलीहा के मरीजो के िलए तथा कृिम, खाँसी एवं श्वास की तकलीफों वालों के िलए उपयोगी है। सूरन
पोषक रसो को बढाकर शरीर मे शिकत उतपन करता है।
लाल सूरन स्वाद में कसैला, तीखा, पचने मे हलका, रुिचकर, दीपक, पाचक, िपत करने वाला एवं
दाहक है तथा कृिम, कफ, वायु, दमा, खाँसी, उलटी, शूल, वायुगोला आिद रोगो का नाशक है। यह उषणवीयर,
जलन उतपन करने वाला, वाजीकारक, कामोद्दीपक, मेदवृिद्ध, बवासीर एवं वायु तथा कफ िवकारों से
उत्पन्न रोगों के िलए िवशेष लाभदायक है।
आआआआआआआआ हृदयरोग, रक्तसर्ाव एवं कोढ़ के रोिगयों को सूरन का सेवन नहीं
करना चािहए।
सूरन की सब्जी ज्यादा कड़क या कच्ची न रहे इस ढंग से बनानी चािहए। ज्यादा कमजोर
लोगों के िलए सूरन का अिधक सेवन हािनकारक है। सूरन से मुँह आना, कंठदाह या खुजली
जैसा हो तो नीबू अथवा इमली का सेवन करे।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ (आआआआआ-आआआआ)- सूरन के टुकड़ों को पहले उबाल लें और िफर
सुखाकर उनका चूणर् बना लें। 320 ग ा म यह चू णर 160 ग ा म िच त क , 40 ग ा म सो ठ , 20 ग ा म
काली िमचर् एवं 1 िकलो गुड़। इन सबको िमलाकर बेर जैसी छोटी-छोटी गोिलयाँ बना लें।
इसे सूरन वटक कहते हैं। पर्ितिदन सुबह शाम 3-3 गोिल य ा खान े स े बवासीर म े बह ु त
लाभ होता है।
सूरन के टुकड़ों को भाप में पकाकर तथा ितल के तेल में बनायी गयी सब्जी का
सेवन करने से एवं ऊपर से छाछ पीने से सभी पर्कार की बवासीर में लाभ होता है। यह
पयोग 30 िदन तक करें।
अनुकर्म
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आआआआ
अदरक रूखा, तीखा, उष्ण-तीक्ष्ण होने के कारण कफ तथा वात का नाश करता है, िपत को
बढ़ाता है। इसका अिधक सेवन रक्त की पुिष्ट करता है। यह उत्तम आमपाचक है।
भारतवािसयो को यह सातमय होने के कारण भोजन मे रिच बढाने के िलए इसका सावरजिनक उपयोग िकया जाता है। आम
से उत्पन्न होने वाले अजीणर्, अफरा, शूल, उलटी आिद में तथा कफजन्य सदीर्-खाँसी में
अदरक बहुत उपयोगी है।
आआआआआआआआ रक्तिपत्त, उच्च रक्तचाप, अल्सर, रक्तसर्ाव व कोढ़ में अदरक का
सेवन नहीं करना चािहए। अदरक साक्षात अिग्नरूप है। इसिलए इसे कभी िफर्ज में नहीं
रखना चािहए ऐसा करने से इसका अिग्नतत्त्व नष्ट हो जाता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआ आआआ, आआआआआ आआ आआआआ 100 ग ा म अदरक की चटनी बनाय े व 100 ग ा म घी
में इस चटनी को सेंके। जब वह लाल हो जाये तब उसमें 200 ग ा म गु ड डालकर हलव े
जैसा गाढा अवलेह बनाये। इसमे केसर, इलायची, जायफल, जायपती, लौंग िमलायें। यह अवलेह रोज
सुबह-शाम 10-10 ग ा म खान े स े जठरा का मं द होना , आमवृिद्ध, अरुिच व श्वास, खाँसी व
जुकाम मे राहत िमलती है।
आआआआआ अदरक व प्याज का रस समान मातर्ा में िमलाकर 3-3 घंटे के अंतर से 1-
1 चम्मच लेने से अथवा अदरक के रस में िमशर्ी में िमलाकर पीने से उलटी होना व जौ
िमचलाना बन्द होता है।
आआआआआआआआ अदरक के रस व पानी समभाग िमलाकर पीने से हृदयरोग में लाभ
होता है।
आआआआआआआआआ अदरक के रस में नींबू व सेंधा नमक िमलाकर सेवन करने से
जठरािगन तीवर होती है।
आआआआआआआ 5 ग ा म अदरक , 5 ग ा म पु द ीन े क े रस म े थोड ा -सा सेंधा नमक डालक
पीने से उदरशूल िमटता है।
आआआआआआआआ अदरक व पुदीने का काढ़ा देने से पसीना आकर ज्वर उतर जाता है।
शीतज्वर में लाभपर्द है।
आआआ आआ आआआआ आधा-चम्मच अदरक के रस में हींग और काला नमक िमलाकर
खाने से गैस की तकलीफ दूर होती है।
आआआआआ-आआआआआआ 20 ग ा म अदरक का रस 2 चम्मच शहद के साथ सुबह शाम लें।
वात-कफ पर्कृितवाले के िलए अदरक व पुदीना िवशेष लाभदायक है।
आआआआआ आआआ आआआआआ आआ आआआआ अदरक और तुलसी के रस में शहद िमलाकर
लें।
आआआआआआआआआआआ 20 ग ा म अदरक क े रस म े 5-10 ग ा म िम श ी लाकर भोजन स े
पहले लेने से बहुमूतता मे लाभ होता है।
आआआआआआआआआआआ अदरक के रस के साथ पुराना गुड़ लेने से शरीरस्थ सूजन
िमटती है।
आआआआ आआआआ आआआआआ आआआ दोष-पकोप से आये हुए बुखार या ठंड लगने से शरीर ठंडा पड गया हो
तो अदरक के रस में उसका चौथाई लहसुन का रस िमलाकर पूरे शरीर पर िघसने से पूरे
शरीर में गमीर् आ जाती है िजससे पर्ाण बच जाते हैं।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआ आआआ आआआआआ
पाचीन काल से ही भोजन मे एवं घरेलु उपचार के रप मे हलदी का पयोग होता रहा है। ताजी हलदी तथा आमी
हल्दी का पर्योग सलाद के रूप में भी िकया जाता है। आमी हल्दी का रंग सफेद एवं सुगंध
आम के समान होता है। अनेक मांगिलक कायोर्ं में भी हल्दी का पर्योग िकया जाता है।
आयुवेर्द के मतानुसार हल्दी कषाय (कसैली), कड़वी, गरम उष णव ीयर , पचने मे हलकी,
शरीर के रंग को साफ करने वाली, वात-िपत-कफशश ामक
शश , त्वचारोग-नाशश क , रक्तवधर्क,
रक्तशशोधक,
शश सूजन नष्ट करने वाली, रुिचवधर्क, कृिमनाशश क , पौिषक, ग भ ा श य की शुिद
करने वाली एवं िवषनाशक है। यह कोढ़ वर्ण (घाव), आमदोष, पमेह, शोष, कणर्रोग, पुरानी सदी
आिद को िमटाने वाली है। यह यकृत को बलवान बनाती है एवं रस, रक्त आिद सब धातुओं पर
पभावशाली काम करती है।
आयुवेर्द के मतानुसार आमी हल्दी कड़वी, तीखी, शीतवीयर्, िपतनाशक, रूिचकारक, पाचन
में हलकी, जठरािगनवधरक कफदोषनाशक एवं सदी खासी, ग म ी की खा स ी , दमा, बुखार, सिन्नपात ज्वर,
मार-चोट के कारण होनेवाली पीड़ा तथा सूजन एवं मुखरोग में लाभदायक है। यूनानी मत
के अनुसार आमी हल्दी मूतर् की रुकावट एवं पथरी का नाश करती है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ-आआआआआआ हल्दी के टुकड़े को घी में सेंककर राितर् को सोते समय मुँह
में रखने से कफ, सदीर् और खाँसी में फायदा होता है। हल्दी के धुएँ का नस्य लेने से
सदीर् और जुकाम में तुरन्त आराम िमलता है। अदरक एवं ताजी हल्दी के एक-एक चम्मच
रस में शहद िमलाकर सुबह-शाम लेने से कफदोष से उत्पन्न सदीर्-खाँसी में लाभ होता
है। भोजन में मीठे, भारी एवं तले हुए पदाथर लेना बनद कर दे।
आआआआआआआआआ (आआआआआआआआआआ आआआ)- हल्दी के चूणर् को शहद में िमलाकर
टॉिनसलस के ऊपर लगाने से लाभ होता है।
आआआआआ 50 ग ा म गोमू त म े 3 से 5 ग ा म ह ल दी िम ल ाकर पीन े स े कोढ म े लाभ
होता है।
आआआआआ 70 पितशत बचचो को कृिमरोग होता है परंतु माता-िपता को इस बात का पता नही होता। ताजी
हल्दी का आधा से एक चम्मच रस पर्ितिदन बालकों को िपलाने से कृिमरोग दूर होता है।
अनुकर्म
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आआआआआ (आआआआआआआ)
बड़ी बेर जैसे गोल एवं बेलनाकार एक से डेढ़ इंच के, बारीक कांटेदार, हरे
रंग के खेखसे केवल वषार् ऋतु में ही उपलब्ध होते हैं। ये पर्ायः पथरीली जमीन पर
उगत े ह ै एवं एक दो महीन े क े िल ए ही आत े ह ै । अं द र स े सफ े द एवं नरम बीजव ा ल े
खेखसों का ही सब्जी के रूप में पर्योग करना चािहए।
खेखसे स्वाद में कड़वे कसैले, कफ एवं िपत्तनाशक, रूिचकतार्, शीतल,
वायुदोषवधरक, रूक्ष, मूतर्वधर्क, पचने मे हलके जठरािगनवधरक एवं शूल, खाँसी, श्वास, बुखार, कोढ़, पमेह,
अरुिच पथरी तथा हृदयरोगनाशक है।
खेखसे की सब्जी बुखार, खाँसी, श्वास, उदररोग, कोढ़, त्वचा रोग, सूजन एवं मधुमेह
के रोिगयों के िलए ज्यादा िहतकारी है। श्लीपद (हाथीपैर) रोग में भी खेखसा का सेवन
एवं उसके पत्तों का लेप लाभपर्द है। जो बच्चे दूध पीकर तुरन्त उलटी कर देते हैं,
उनकी माताओं के िलए भी खेखसे की सब्जी का सेवन लाभपर्द है।
आआआआआआआआ खेखसे की सब्जी वायु पर्कृित की होती है। अतः वायु के रोगी इसका
सेवन न करें। इस सब्जी को थोड़ी मातर्ा में ही खाना िहतावह है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ आआआ आआआआआ खेखसे (कंकोड़े) के पत्तों के काढ़े में शहद डालकर
पीने से लाभ होता है।
आआआआआआआ खेखसे के कंद का 5 ग ा म चू णर एवं 5 ग ा म िम श ी क े चू णर को
िमलाकर सुबह-शाम लेने से खूनी बवासीर (मस्से) में लाभ होता है।
आआआआआआआ आआआआआ आआआआ खेखसे के कंद का पाउडर बनाकर, रोज स्नान के
वकत वह पाउडर शरीर पर मसलकर नहाने से शरीर से दुगरनधयुकत पसीना आना बंद होता है एवं तवचा मुलायम बनती है।
आआआआआआ खेखसे के कंद का 3 ग ा म चू णर सु ब ह -शाम पानी के साथ लेने से लाभ
होता है।
खेखसे की जड़ की दो से तीन रत्ती (250 से 500 िम.ग ा .) भसम को शहद एवं अदरक के रस
के साथ देने से भयंकर खाँसी एवं श्वास में राहत िमलती है।
आआआआआ खेखसे की जड़ का 10 ग ा म चू णर दूध अथवा पान ी क े साथ रोज ल े न े स े
िकडनी एवं मूतर्ाशय में िस्थत पथरी में लाभ होता है।
आआआआआआआआआआ खेखसे की जड़ को काली िमचर्, रक्तचंदन एवं नािरयल के साथ
पीसकर ललाट पर उसका लेप करने से िपत के कारण उतपन िशरोवेदना मे लाभ होता है।
अनुकर्म
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आआआआआ
धिनयासवर्तर्
पर्िसद्धहै।भोजनबनानेमेइंसकािनत्यपर्योगहोताहै।हरेधिनयेकेिवकिसतहोजानेपरउस
पर हरे रंग के बीज की फिलया लगती है। वे सूख जाती है तो उनहे सूखा धिनया कहते है। सबजी, दाल जैसे खाद्य
पदाथों मे काटकर डाला हुआ हरा धिनया उसे सुगंिधत एवं गुणवान बनाता है। हरा धिनया गुण मे ठंडा, रूिचकारक व
पाचक है। इससे भोजय पदाथर अिधक सवािदष व रोचक बनते है। हरा धिनया केवल सबजी मे ही उपयोग मे आने वाली
वसतु नही है वरन् उतम पकार की एक औषिध भी है। इसी कारण अनेक वैद इसका उपयोग करने की सलाह देते है।
आआआआआआआआ हरा धिनया स्वाद में कटु, कषाय, िस्नग्ध, पचने मे हलका, मूतर्ल, दस्त
बंद करने वाला, जठरािगनवदरक, िपतपकोप का नाश करने वाला एवं गमी से उतपन तमाम रोगो मे भी अतयंत लाभपद
है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ अिधक गमीर् से उत्पन्न बुखार या टायफाइड के कारण यिद दस्त में खून
आता हो तो हरे धिनये के 25 िम.ली. रस में िमशर्ी डालकर रोगी को िपलाने से लाभ होता
है।
जवर से शरीर मे होती जलन पर इसका रस लगाने से लाभ होता है।
आआआआआआआआ चावल में पानी के बदले हरे धिनये का रस डालकर एक बतर्न (पेशर
कूकर) में पकायें। िफर उसमें घी तथा िमशर्ी डालकर खाने से िकसी भी रोग के कारण
शरीर में होने वाली जलन शांत होती है।
आआआआआआ सूखा, धिनया, इलायची व काली िमचर् का चूणर् घी और िमशर्ी के साथ लें।
हरा धिनया, पुदीना, काली िमचर्, सेंधा नमक, अदरक व िमशर्ी पीसकर उसमें जरा सा
गु ड व नी बू का रस िम ल ाकर चटनी त ै य ा र कर े । भोजन क े समय उस े खान े स े अरिच व
मंदािग्न िमटती है।
आआआआ आआआआ हरे धिनये के 50 िम.ली. रस में िमशर्ी या हरे अंगूर का रस
िमलाकर िपलायें।
आआआआआआ आआ आआआआआ हरे धिनये के रस में हलका-सा नींबू िनचोड़ लें। यह
रस एक-एक चम्मच थोड़े-थोड़े समय पर िपलाने से लाभ होता है।
आआआआआआआआआआ सूखा धिनया, अंगूर व बेदाना का काढ़ा बनाकर िपलायें।
हरे धिनये के रस में िमशर्ी या अंगूर का रस िमलाकर िपलायें। साथ में नमकीन,
तीखे व खट्टे पदाथर् खाना बंद करें और सादा, साित्त्वक आहार लें।
आआआआआआ आआ आआआआआआआ आ आआआआआआआ सूखा धिनया और सोंठ का काढ़ा बनाकर
िपलाये।
आआआआआआ आआ आआआआआ आआआ आआआ सूखे िपसे हुए धिनये की पोटली बाँधकर उसे
पानी मे िभगोकर बार-बार आँखों पर घुमायें।
हरा धिनया धोकर, पीसकर उसकी एक-दो बूँदें आँखों में डालें। आँखें आना,
आँखों की लािलमा, आँखों की कील, गु ह े र ी एवं चश म े क े नं ब र दू र करन े म े यह
लाभदायक है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआ
पुदीने का उपयोग अिधकाशतः चटनी या मसाले के रप मे िकया जाता है। पुदीना एक सुगंिधत एवं उपयोगी
औषिध है। यह अपच को िमटाता है।
आयुवेर्द के मतानुसार पुदीना, स्वािदष्ट, रुिचकर, पचने मे हलका, तीक्ष्ण, तीखा, कड़वा,
पाचनकता, उलटी िमटाने वाला, हृदय को उत्तेिजत करने वाला, शिक्त बढ़ानेवाला, वायुनाशक,
िवकृत कफ को बाहर लाने वाला, ग भ ा श य -संकोचक, िचत्त को पर्सन्न करने वाला, जखमो को भरने वाला,
कृिम, जवर, िवष, अरुिच, मंदािग्न, अफरा, दस्त, खाँसी, श्वास, िनम्न रक्तचाप, मूतर्ाल्पता, त्वचा
के दोष, हैजा, अजीणर्, सदीर्-जुकाम आिद को िमटाने वाला है।
पुदीने का रस पीने से खासी, उलटी, अितसार, हैजे में लाभ होता है, वायु व कृिम का नाश होता
है।
पुदीने मे रोगपितकारक शिकत उतपन करने की अदभुत शिकत है एवं पाचक रसो को उतपन करने की भी कमता
है। अजवायन के सभी गुण पुदीने में पाये जाते हैं।
पुदीने के बीज से िनकलने वाला तेल सथािनक एनेसथिटक, पीडानाशक एवं जंतुनाशक होता है। यह दंतपीडा एवं
दंतकृिमनाशक होता है। इसके तेल की सुगंध से मच्छर भाग जाते हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआ पुदीने मे िवटािमन ए अिधक माता मे पाया जाता है। इसमे जठरािगन को पदीपत करने वाले
तत्त्व भी अिधक मातर्ा में हैं। इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है। पुदीना, तुलसी,
काली िमचर्, अदरक आिद का काढ़ा पीने से वायु दूर होता है व भूख खुलकर लगती है।
आआआआआआआआआआआ दाद-खाज पर पुदीने का रस लगाने से लाभ होता है। हरे
पुदीने की चटनी बनाकर सोते समय चेहरे पर उसका लेप करने से चेहरे के मुँहासे, फुंिसयाँ समाप्त हो जाती
हैं।
आआआआआआ िहचकी बंद न हो रही हो तो पुदीने के पत्ते या नींबू चूसें।
आआआ-आआआआआ सूखा पुदीना व िमशर्ी समान मातर्ा में िमलायें एवं दो चम्मच फंकी
लेकर पानी िपयें। इससे पैर-ददर् ठीक होता है।
आआआआआआआआ पुदीने एवं तुलसी के पतो का काढा बनाकर सुबह-शाम लेने से अथवा पुदीना
एवं अदरक का 1-1 चम्मच रस सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।
आआआआ आआआ आआआआआ पुदीने के 2 चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने
से गैस, वायु एवं पेट के कृिम नष होते है।
पातः काल एक िगलास पानी मे 20-25 ग ा म पु द ीन े का रस व 20-25 ग ा म शहद िम ल ाकर पीन े
से गैस की बीमारी में िवशेष लाभ होता है।
आआआआआआ आआआआआ-आआआआआ आ आआआआआआआआआआआ पुदीने के रस की 2-3 बूँदें नाक
में डालने एवं पुदीने तथा अदरक के 1-1 चम्मच रस में शहद िमलाकर िदन में 2 बार
पीने से लाभ होता है।
आआआआआआआ-आआआआआआआआआआ मािसक न आने पर या कम आने पर अथवा वायु एवं
कफदोष के कारण बंद हो जाने पर पुदीने के काढ़े में गुड़ एवं चुटकी भर हींग डालकर
पीने से लाभ होता है। इससे कमर की पीडा मे भी आराम होता है।
आआआ आआ आआआआआ अपच, अजीणर्, अरुिच, मंदािग्न, वायु आिद रोगो मे पुदीने के रस मे शहद
डालकर ले अथवा पुदीने का अकर ले।
आआआआ पुदीने के रस मे नीबू िमलाकर लगाने से दाद िमट जाती है।
आआआआआ-आआआआ, आआआआआ पुदीने के रस मे नीबू का रस, पयाज अथवा अदरक का रस एवं शहद
िमलाकर िपलाने अथवा अकर् देने से ठीक होता है।
आआआआआआ आआ आआआआ िबच्छू के काटने पर इसका रस पीने से व पत्तों का लेप
करने से िबच्छू के काटने से होने वाला कष्ट दूर होता है। पुदीने का रस दंशवाले स्थान
पर लगाये एवं उसके रस मे िमशी िमलाकर िपलाये। यह पयोग तमाम जहरीले जंतुओं के दंश के उपचार मे काम आ सकता
है।
आआआआआआआआआआआ रोज पुदीने का रस िनकालकर उसे थोड़ा गमर् करके सुबह शाम
िनयिमत रूप से देने पर लाभ होता है।
आआआ आआ आआआआआआआआआ पुदीने की रस मे पानी िमलाकर अथवा पुदीने के काढे का घूँट मुँह मे भरकर
रखें, िफर उगल दें। इससे मुख की दुगर्न्ध का नाश होता है।
आआआआआआ पुदीने का ताजा रस लेने की माता 5 से 10 िम.ग ा . पतो का चूणर लेने की माता 3 से 6
ग ा म , काढ़ा लेने की मातर्ा 20 से 50 ग ा म , अकर् लेने की मातर्ा 10 से 20 िम.ग ा . एवं
बीज का तेल लेने की मातर्ा आधी बूँद से 3 बूँद तक है।
अनुकर्म
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आआआआआआआआ (आआआआ)
पुननरवा का संसकृत पयाय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरनेवाली) है। पुननर्वा (साटी) या िवषखपरा
के नाम से िवख्यात यह वनस्पित वषार् ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की
आँतिरक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के िलए यह अत्यंत उपयोगी है।
यह तीन पर्कार की होती हैः सफेद, लाल, एवं काली। काली पुननर्वा पर्ायः देखने
में भी नहीं आती, सफेद ही देखने में आती है। काली पर्जाित बहुत कम स्थलों पर पायी
जाती है। जैसे तादूल तथा पालक की भाजी बनाते है, वैसे ही पुननरवा की सबजी बनाकर खायी जाती है। इसकी सबजी
शोथ (सूजन) की नाशक, मूतर्ल तथा स्वास्थ्यवधर्क है।
पुननरवा कडवी, उष्ण, तीखी, कसैली, रूच्य, अिग्नदीपक, रुक्ष, मधुर, खारी, सारक, मूतर्ल
एवं हृदय के िलए लाभदायक है। यह वायु, कफ, सूजन, खाँसी, बवासीर, वरण, पाडुरोग, िवषदोष एवं शूल
का नाश करती है।
पुननरवा मे से पुननरवािद कवाथ, पुननरवा मंडूर, पुननरवामूल धनवटी, पुननरवाचूणर आिद औषिधया बनती है।
बड़ी पुननर्वा को साटोड़ी (वषाभू) कहा जाता है। उसके गुण भी पुननर्वा के जैसे ही
हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआ आआ आआआआआ पुननरवा की जड को घी मे िघसकर आँखो मे आँजे।
आआआआआआआ आआ आआआआआआ पुननरवा की जड को शहद अथवा दूध मे िघसकर आँजने से लाभ होता है।
आआआआआआआ आआ आआआआ आआआआआआ पुननरवा की जड को शहद मे िघसकर आँखो मे आँजने से लाभ
होता है।
आआआआआआआ पुननरवा की जड को काजी मे िघसकर आँखो मे आँजे।
आआआआ आआआआआआआ पुननरवा की जड को हलदी के काढे मे देने से लाभ होता है।
आआआआआआआ पुननरवा के पंचाग (जड, छाल, पती, फूल और बीज) को शहद एवं िमशर्ी के साथ
लें अथवा उसका रस या काढ़ा िपयें।
आआआआआ आआआ आ आआआआ आआआआ पुननरवा के पंचाग का 2 ग ा म चू णर 10 ग ा म घी एवं 20
ग ा म शहद म े सु ब ह -शाम देने से लाभ होता है।
आआआआआआ पुननरवा की जड के चूणर को शहद के साथ खाये।
आआआआआ पुननरवा की जड का काढा िपलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
आआआआआ पुननरवामूल को दूध मे उबालकर सुबह-शाम िपयें।
आआआआ
आआआआ आआ आआआआ सफेद पुननर्वा के मूल का 2-2 ग ा म चू णर 10 ग ा म शहद क े साथ
िदन में 2 बार दें।
आआआआ आआआआआआ आआ आआआआ सफेद पुननर्वा के मूल का 25 से 50 ग ा म रस , 20
ग ा म घी म े िम ल ाकर रोज िप य े ।
आआआआआआआआ (आआआआआ)- पुननरवा के मूल का काढा पीने से कचचा अथवा पका हुआ फोडा भी िमट
जाता है।
आआआआआआआआ पुननरवा के मूल का कवाथ 100-100 िम.ली. िदन में 2 बार पीने से िनदर्ा
अच्छी आती है।
आआआआआआआआ पुननरवा के पतो की भाजी सोठ डालकर खाये।
आआआआआआआआ वायुपकोप से पैर की एडी मे वेदना होती हो तो पुननरवा मे िसद िकया हुआ तेल पैर की एडी पर
िपसे एवं सेक करे।
आआआआआआआआ पुननरवा के हरे पतो को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योिन मे
धारणकरनेसेभयंकरयोिनशल ू भीिमटताहै।
आआआआआआआ आआआआआ-आआआआआआआआआ पुननरवा के मूल के रस मे थोडा ितल का तेल िमलाकर
योिन में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
आआआआ 2 ग ा म पु न नर व ा क े मू ल का चू णर , आधा गर्ाम हींग तथा 1 ग ा म काला नमक
गमर पानी स े ल े ।
आआआआआआआ-आआआआआआआआआआ पुननरवा के 5 ग ा म चू णर म े 10 ग ा म शहद िम ल ाकर
सुबह-शाम लें। पुननर्वा की सब्जी बना कर खायें।
आआआआआआआआआआआ पुननरवा का 40 िम.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा िपयें। पुननर्वा के
पान बाफकर पेडू पर बाधे। 1 ग ा म पु न नर व ा क ा र (आयुवेर्िदक औषिधयों की दुकान से िमलेगा)
गर म पानी क े साथ पीन े स े तु र ं त फायदा होता ह ै ।
आआआआ आआआआआआआ पुननरवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 िम.ली.) या बकरी के दूध (200
िम.ली.) के साथ िपयें।
आआआ आआ आआआआ गोमू त एवं पु न नर व ा का रस समान मात ा म े िम ल ाकर िप य े ।
आआआआआआ(आआआआआआआ)- 50 िम.ली. पुननरवा का रस और उतना ही गोमूत िमलाकर सुबह शाम िपये।
आआआआ आआआआ पुननरवा का मूल दूध मे िघसकर लेप करने से वृषण की सूजन िमटती है। यह हाडोसील मे
भी फायदेमंद है।
आआआआआआआआ हृदयरोग के कारण सवार्ंगसूजन हो गयी हो तो पुननर्वा के मूल का 10
ग ा म चू णर और अज ुर न की छाल का 10 ग ा म चू णर 200 िम.ली. पानी मे काढा बनाकर सुबह-शाम
िपये।
आआआआआ (आआआ)- 10 ग ा म भारं ग मू ल चू णर और 10 ग ा म पु न नर व ा चू णर को 200 िम.ली.
पानी मे उबालकर काढा बनाये। जब 50 िम.ली. बचे तब उसमें आधा गर्ाम शर्ृंगभस्म डालकर सुबह-
शाम िपयें।
आआआआआ आआआआआआआ हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के िलए रोज सुबह
पुननरवा के मूल का या पते का 2 चम्मच (10 िम.ली.) रस िपयें अथवा पुननर्वा के मूल का चूणर् 2 से
4 ग ा म की मात ा म े दू ध या पान ी स े ल े या स प ताह म े 2 िदन पुननर्वा की सब्जी बनाकर
खायें।
पुननरवा मे मूँग व चने की िछलकेवाली दाल िमलाकर इसकी बिढया सबजी बनती है। ऊपर विणरत तमाम पकार के
रोग हों ही नहीं, स्वास्थ्य बना रहे इसिलए इसकी सब्जी या ताजे पत्तों का रस काली िमचर्
व शहद िमलाकर पीना िहतावह है। बीमार तो कया सवसथ वयिकत भी अपना सवासथय अचछा रखने के िलए इसकी सबजी
खा सकते हैं। भारत में यह सवर्तर् पायी जाती है। संत शर्ी आसारामजी आशर्म (िदल्ली,
अमदावाद, सूरत आिद) में पुननर्वा का नमूना देखा जा सकता है। आपके इलाकों में भी यह
पयापत माता मे होती होगी।
अनुकर्म
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आआआआ
वषर के कुछ ही महीनो मे िदखने वाली सबजी परवल को सभी सिबजयो मे सबसे अचछा माना गया है। आयुवेद मे
एकमातर् परवल को ही बारह महीने में सदा पथ्य के रूप में स्वीकार िकया गया है क्योंिक
परवल गुण मे हलके, पाचक, गरम , स्वािदष्ट, हृदय के िलये िहतकर, वीयरवधरक, जठरािगनवधरक,
िस्नग्धतावधर्क, पौिषक, िवकृत कफ को बाहर िनकालने वाला और ितदोषनाशक है। यह सदी, खाँसी, बुखार,
कृिम, रक्तदोष, जीणर जवर, िपत के जवर और रकतालपता को दूर करता है।
परवल दो पकार के होते है- मीठे और कड़वे। सब्जी के िलए सदैव मीठे, कोमल बीजवाले
और सफेद गूदेवाले परवल का उपयोग िकया जाता है। जो परवल ऊपर से पीले तथा कडक हो जाते है उनकी अचछी नही
मानी जाती।
कड़वे परवल का पर्योग केवल औषिध के रूप में होता है। कड़वे परवल हलके,
रूक्ष, गर म वीयर , रूिचकतार्, भूखवधरक, पाचनकता, तृषाशश ामक,
शश ितर्दोषनाशश क, िपतसारक, अनुलोमक,
रक्तशश ोधक,
शश पीडाशामक, घाव को िमटाने वाले, अरुिच, मंदािग्न, यकृतिवकार, उदररोग, बवासीर,
कृिम, रक्तिपत्त, सूजन, खाँसी, कोढ़, िपतजवर, जीणरजवर और कमजोरीनाशक है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआ डंठल के साथ मीठे परवल के 6 ग ा म पत े व 3 ग ा म सो ठ क े काढ े म े
शहद डालकर सुबह-शाम पीने से कफ सरलता से िनकल जाता है।
आआआआआआआ, आआआआ आआआआआआआ घी अथवा तेल में बनायी गयी परवल की सब्जी
का पर्ितिदन सेवन करने से हृदयरोग में लाभ होता है, वीयरशुिद होती है तथा वजन बढता है।
आआआआआआ परवल के टुकडो को 16 गु न े पान ी म े उबाल े । उबालत े समय उनम े सो ठ ,
पीपरामूल, लेंडीपीपर, काली िमचर्, जीरा व नमक डाले। चौथाई भाग शेष रह जाने पर सुबह शाम 2 बार
िपये। इससे आमदोष मे लाभ होता है। तथा शिकत बढती है।
आआआआ आआआआआआ इसके मरीज को पर्ितिदन धिनया, जीरा, काली िमचर् और हल्दी
डालकर घी मे बनायी गयी परवल की सबजी का सेवन करना चािहए।
आआआ-आआआआआआआआआ कड़वे परवल के पत्तों अथवा परवल के टुकड़ों का काढ़ा
बारंबार रोगी को िपलाने से उसके शरीर में व्याप्त जहर वमन द्वारा बाहर िनकल जाता
है।
आआआ आआ आआआ, आआआ, आआआआआ परवल के पते, नीम की छाल, गु डु च व कुटकी को समभा ग
में लेकर काढ़ा बनायें। यह काढ़ा िपत्त-कफ पर्धान अम्लिपत्त, शूल, भम, अरुिच,
अिग्नमांद्य, दाह, जवर तथा वमन मे लाभदायक है।
आआआआआआआआ गमर तासीरव ा ल ो क े िल ए परव ल का अिध क स े व न हािन का रक ह ै । यिद
इसके सेवन से कोई तकलीफ हुई हो तो सूखी धिनया अथवा धिनया जीरे का चूणर् घी-िमशर्ी
में िमलाकर चाटें अथवा हरी धिनया का रस िपयें।
आआआआआआ जवर, चेचक(शीतला), मलेिरया, दुष्ट वर्ण, रक्तिपत्त, उपदंश जैसे रोगो मे मीठे
परवल की अपेका कडवे परवल के पतो का काढा अथवा उसकी जड का चूणर अिधक लाभदायक होता है।
अनुकर्म
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आआआआआआ (आआआआ)
भारत मे िवशेषतः िहमालय मे कशमीर से आसाम तक हरीतकी के वृक पाये जाते है। आयुवेद ने इसे अमृता,
पाणदा, कायस्था, िवजया, मेध्या आिद नामों में गौरावािन्वत िकया है। हरीतकी एक शर्ेष्ठ
रसायन दर्व्य है।
इसमें लवण छोड़कर मधुर, अम्ल, कटु, ितक्त, कषाय ये पाँचों रस पाये जाते हैं।
यह लघु, रुक्ष, िवपाक मे मधुर तथा वीयर मे उषण होती है। इन गुणो से यह वात-िपत-कफ इन तीनों दोषों का
नाश करती है।
हरड़(हरीतकी) शोथहर, वरणशोधक, अिग्नदीपक, पाचक, यकृत-उत्तेजक, मल-अनुलोमक,
मेध्य, चक्षुष्य और वयःस्थापक है। िवश िष्ठदर्व्यों के साथ िमलाकर िवश िष्ठसंस्कार
करने से यह िविवध रोगों में लाभदायी होती है। पाचन-संस्थान पर इसका कायर् िवशेष-
रूप से िदखाई देता है।
आआआआ-आआआआआ हरड़ चबाकर खाने से भूख बढ़ती है। पीसकर फाँकने से मल
साफ होता है। सेंककर खाने से ितर्दोषों को नष्ट करती है। खाना खाते समय खाने से
यह शिक्तवधर्क और पुिष्टकारक है। सदीर्, जुकाम तथा पाचनशिकत ठीक करने के िलए भोजन करने के बाद
इसका सेवन करें।
आआआआआआआ 3 से 4 ग ा म।
यिद आप लम्बी िजंदगी जीना चाहते हैं तो छोटी हरड़ (हरर्) रात को पानी में िभगो
दें। पानी इतना ही डालें िक ये सोख लें। पर्ातः उनको देशी घी में तलकर काँच के
बतर्न में रख लें। 2 माह तक रोज 1-1 हरड़ सुबह शाम 2 माह तक खाते रहें। इससे शरीर
हृष्ट-पुष होगा।
आआआआआ, आआआआआआआआआआआआ, आआआआआआआआआ हरड़ मेध्य है अथार्त्
बुिद्धवधर्क है। नेतर् तथा अन्य इिन्दर्यों का बल बढ़ाती है। घी, सुवणर्, शतावरी, बर्ाह्मी
आिद अन्य दर्व्य अपने शीत-मधुर गुणों से धातु तथा इिन्दर्यों का बल बढ़ाते हैं, जबिक
हरड़ िवकृत कफ तथा मल का नाश करके, बुिद्ध तथा इिन्दर्यों का जड़त्व नष्ट करके उन्हें
कुशागर् बनाती है। शरीर में मल-संचय होने पर बुिद्ध तथा इिन्दर्याँ बलहीन हो जाती हैं।
हरड़ इस संिचत मल का शोधन करके धातुशु िद्धकरती है। इससे बुिद्ध व इिन्दर्याँ िनमर्ल व
समथर् बन जाती है। इसिलए हरड़ को मेध्या कहा गया है।
हरड़ नेतर्ों का बल बढ़ाती है। नेतर्ज्योित बढ़ाने के िलए ितर्फला शर्ेष्ठ
दर्व्य है। 2 ग ा म ित फ ल ा चू णर घी तथा शहद क े िव िम श ण (अथार्त् घी अिधक और शहद कम
या शहद अिधक और घी कम) के साथ अथवा ितर्फला घी के साथ लेने से नेतर्ों का बल
तथा नेतर्ज्योित बढ़ती है।
आआआआआ आआआआआआ हरड़ साक्षात् धातुओं का पोषण नहीं करती। वह धात्विग्न
बढ़ाती है। धात्वािग्न बढ़ने से नये उत्पन्न होने वाले रस रक्तािद धातु शुद्ध-पाकृत बनने
लगते हैं। धातुओं में िस्थत िवकृत कफ तथा मल का पाचन व शोधन करके धातुओं को
िनमर्ल बनाती है। सभी धातुओं व इिन्दर्यों का पर्सादन करके यह यौवन की रक्षा करती है,
इसिलए इसे कायस्था कहा गया है।
स्थूल व्यिक्तयों में केवल मेद धातु का ही अितिरक्त संचय होने के कारण अन्य
धातु कषीणहोन
् ेलगतेहै , ंिजससे बुढापा जलदी आने लगता है। हरड इस िवकृत मेद का लेखन व करण (नाश ) करके
अन्य धातुओं की पुिष्ट का मागर् पर्शस्त कर देती है, िजससे पुनः तारणय और ओज की पािपत होती है।
लवण रस मांस व शुकर् धातु का नाश करता है िजससे वाधर्क्य जल्दी आने लगता है, अतः
नमक का उपयोग सावधानीपूवर्क करें। हरड़ में लवण रस न होने से तथा िवपाक में मधुर
होने से वह तारुण्य की रक्षा करती है। रसायन कमर् के िलए दोष तथा ऋतु के अनुसार
िविभन अनुपानो के साथ हरड का पयोग करना चािहए।
आआआ आआआआआआ आआआआ आआआआ आआ आआआ आआआआआआ
वसंत – शहद ग ी ष म – गु ड
वषा – सैधव शरद – शकर्रा
हेमंत – सोंठ िशश
शिर - पीपर
आआआआआआआआआ आआआआआआआ कफ में हरड़ और सैंधव। िपत्त में हरड़ और
िमशर्ी। वात में हरड़ घी में भूनकर अथवा िमलाकर दें।
आयुवेर्द के शर्ेष्ठ आचायर् वाग्भट्ट के अनुसार हरड़ चूणर् घी में भूनकर
िनयिमत रूप से सेवन करने से तथा भोजन में घी का भरपूर उपयोग करने से शरीर बलवान
होकर दीघार्यु की पर्ािप्त होती है।
आआआआआआआआ अित शर्म करने वाले, दुबर्ल, उष्ण, पकृितवाले एवं गिभरणी को तथा गीषम ऋतु,
रक्त व िपत्तदोष में हरड़ का पर्योग नहीं करना चािहए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआ ितक्त रस व उष्णवीयर् होने से यह यकृत को उत्तेिजत करती है।
पाचक सताव बढाती है। आमाशयसथ िवकृत कफ का नाश करती है। अिगनमाद, ग ह ण ी (अितसार), उदरशू ल,
अफरा आिद रोगों में िवशेषतः छोटी हरड़ चबाकर खाने से लाभ होता है।
यह जठरािग्न के साथ-साथ रस रक्तािद सप्तधातुओं की धात्वािग्नओं की भी वृिद्ध
करती है, िजससे शरीरसथ आम का पाचन होकर रसरकतािद सपतधातु पाकृतरप से बनने लगते है।
आआआआआआआआ 3 से 5 ग ा म हरड चू णर पानी क े साथ ल े न े स े मल का पाचन होकर
वह िशिथल व दवरप मे बाहर िनकलता है, िजससे कबज का नाश होता है।
आआआआआआ (आआआआआआ)- हरड़ पानी में उबालकर लेने से मल में से दर्वभाग
का शोषण करके बँधे हुए मल को बाहर िनकालती है, िजससे दसत मे राहत िमलती है। हरड को पानी मे
उबालकर पीस लें। इसकी 2 ग ा म मात ा शहद क े साथ िद न म े 3 बार लेने से अथवा काढ़ा
पीने से भी लाभ होता है। इससे आँतो को बल िमलता है, दोषों का पाचन होता है, जठरािगन बढती है। (आशशशर्म

में उपलब्ध िहंगािद हरड़ चूणर् का उपयोग भी कर सकते हैं।)
आआआआआआआ 2 ग ा म हरड चू णर गु ड म े िम ल ाकर छा छ क े साथ द े न े स े बवासी र
के शूल, शोथ आिद लक्षणों में आराम िमलता है।
आआआआआआआआआआ हरड़ चूणर्, पीपर व गुड समान माता मे लेकर िमला ले। इसकी 2-2 ग ा म की
गोिल य ा बनाकर 1-1 गोल ी सु ब ह -शाम लेने से अथवा 2 ग ा म हरड चू णर मु न क ा व िम श ी
के साथ लेने से कण्ठदाह, तृष्णा, मंदािग्न आिद अम्लिपत्तजन्य लक्षणों से छुटकारा
िमलता है।
आआआआ-आआआआआआ आआआआआआआ हरड़ व रोिहतक के 50 ग ा म काढ े म े एक चु टकी
यवक्षार व 1 ग ा म पीपर चू णर िम ल ाकर ल े न े स े यकृ त व प ल ी ह ा सामा न य लगती ह ै ।
आआआआआ, आआआआआ, आआआआआ आ आआआआआआआआ हरड़ कफनाशक है और पीपर
िस्नग्ध, उष्ण-तीक्ष्ण है। अतः 2 भाग हरड चूणर मे 1 भाग पीपर का चूणर िमलाकर 2 ग ा म की मात ा म े
शहद के साथ 2-3 बार चाटने से कफजन्य खाँसी, जुकाम, स्वरभेद आिद में राहत िमलती
है।
आआआआआआ हरड़ अथवा ितर्फला के काढ़े में शहद िमलाकर देने से िपत्त का
नाश शशशशहोताहै , यकृत की सूजन दूर होती है। जठरािग्न पर्ज्विलत होती है।
आआआआआआआ अिधक मातर्ा में बार-बार पेशाब आता हो तो हरड़ के काढ़े में
हल्दी तथा शहद िमलाकर देने से लाभ होता है।
आआआआआआआआआआ, आआआआआआआआआआ हरड़, गोक ु र व पाषाण भ े द क े काढ े म े मधु
िमलाकर देने से दाह व शूलयुक्त मूतर्-पवृित मे आराम िमलता है।
आआआआआआआआ हरड़ के काढ़े में गोमूतर् िमलाकर लेने से वृषणशोथ नष्ट होता
है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ
मलक्का एवं अंबोय के देश में लौंग के झाड़ अिधक उत्पन्न होते हैं। लौंग का
उपयोग मसालो एवं सुगिनधत पदाथों मे अिधक होता है। इसका तेल भी िनकाला जाता है।
आआआआआआआआ लौंग लघु, कड़वा, चक्षुष्य, रुिचकर, तीक्ष्ण, िवपाक मे मधुर, पाचक,
िस्नग्ध, अिग्नदीपक, हृद्य (हृदय को रुचने वाली), वृषय और िवशद (स्वच्छ) है। यह िपत्त, कफ,
आँव, शूल, अफरा, खाँसी, िहचकी, पेट की गैस, िवष, तृषा, पीनस (सूँघने की शिक्त का नष्ट होना)
तथा रक्तदोष का नाश करती है। लौंग में मुख, आमाशय एव आँतों में रहने वाले सूक्ष्म
कीटाणुओं का नाश करने एवं सड़न को रोकने का गुण है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ आआआआ आआआ लौंग का काढ़ा बनाकर मरीज को िपलाने से लाभ होता है।
आआ आआ आआआआआआ िमट्टी का तवा या तवे जैसा टुकड़ा गरम करें। लाल हो जाने
पर बाहर िनकालकर एक बतरन मे रखे और उसके ऊपर सात लौग डालकर उनहे सेके। िफर लौग को पीसकर शहद के
साथ लेने से लाभ होता है।
आआआआ आआ आआआआआ लौंग के अकर् या पाउडर को रूई पर डालकर उस फाहे को दाँत
पर रखे। इससे दात के ददर मे लाभ होता है।
आआआआआआआआ आआआ आआआआआआ आआ आआआआआआआ लौंग को िघसकर उसका अंजन
करने से लाभ होता है।
आआआआआआआ बकरी के मूतर् में लौंग को िघसकर उसको आँजने से लाभ होता है।
आआआआआआआआ िसरददर् में लौंग का तेल िसर पर लगाने से या लौंग को पीसकर
ललाट पर लेप करने से राहत िमलती है।
आआआआआ आआ आआआआआआआआआ लौंग का चूणर् खाने से अथवा दाँतों पर लगाने से
दाँत मजबूत होते हैं। मुँह की दुगर्न्ध, कफ, लार, थूक के द्वारा बाहर िनकल जाती है।
इससे श्वास सुगिन्धत िनकलती है, कफ िमट जाता है और पाचनशिक्त बढ़ती है।
आआआआआआआ आआ आआआआआ 2 लौंग को गरम पानी में िभगोकर वह पानी पीने से
गिभर ण ी की उलटी म े लाभ होता ह ै । इसकी सलाह एल ौ प ै थ ी क े डॉ क टरो द ा र ा भी दी जाती
है।
आआआआआआआआआआआ, आआआआआआ आआआ आआआआआ लौंग का अष्टमांश काढ़ा अथार्त्
आठवाँ भाग िजतना पानी बचे, ऐसा काढा बनाकर िपलाने से रोगी को राहत िमलती है।
आआआआआ आआ आआ आआआआआआआआ हैजे में प्यास लगने पर या जी िमचलाने पर 7
लौंग अथवा 2 जायफल अथवा 2 ग ा म नाग र म ोथ पानी म े उबालकर ठं ड ा करक े रोग ी को
िपलाने से लाभ होता है।
आआआआआ, आआआआआ, आआआआआ, आआआआआआआआ आआआ आआआआआआ लौंग, जायफल एवं
लेंडीपीपर 1 भाग, बहेड़ा 3 भाग, काली िमचर् 3 भाग और लौग 16 भाग लेकर उसका चूणर करे। उसके बाद
2 ग ा म चू णर म े उतनी ही िम श ी डालकर खाय े । इसस े लाभ होता ह ै ।
आआआआआआआ िनत्य 125 िम.ग ा . से 250 िम.ग ा . लौंग का चूणर् लेने से मूतर्िपंड
से मूतर्द्वार तक के मागर् की शुिद्ध होती है और मूतर् खुलकर आता है।
आआआआआ आआ आआआ आआआआआआआ आआआआ लौंग, काली िमचर्, बहेड़ा – इन तीनों को
समान मातर्ा में िमला लें। िफर इन तीनों की सिम्मिलत मातर्ा िजतनी खैर की अंतरछाल
अथवा सफेद कत्था इसमें डाल दें। इसके पश् चात्बबूल की अंतरछाल के काढ़े में
घोंटकर तीन तीन गर्ाम वजन की गोिलयाँ बनायें। रोज दो तीन बार एक-एक गोली मुँह में
रखने से खाँसी में शीघर् राहत िमलती है।
आआआआआ आआआ आआ आआआ आआआआआआआ आआआआआआ लौंग, जायफल और लेडीपीपर 5 ग ा म ,
काली िमचर् 20 ग ा म और सो ठ 160 ग ा म ल े क र उसका चू णर त ै य ा र कर े । अब चू णर क े
बराबर मातर्ा में िमशर्ी िमलायें। यह चूणर् तीवर् खाँसी, जवर, अरुिच, गु ल म , श्वास,
अिग्नमांद्य एवं संगर्हणी में उपयोगी है।
आआआआआआ लवंगािद सुगंधी पदाथोर्ं का चूणर् तभी बनायें जब जरुरत हो, अन्यथा
पहले से बनाकर रखने से इनमे िवदमान तेल उड जाता है।
अनुकर्म
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आआआआआआआ
भारत मे दालचीनी के वृक िहमालय तथा पिशमी तट पर पाये जाते है। इस वृक की छाल, दालचीनी के नाम
से पर्िसद्ध है।
यह रस में तीखी, कड़वी तथा मधुर होती है। उष्ण-तीक्ष्ण होने के कारण दीपन, पाचन
और िवशेष रप से कफ का नाश करने वाली है। यह अपने मधुर रस से िपत का शमन और उषणवीयर होने से वात का
शमन करती है। अतः ितर्दोषशामक है।
आआआआआआआआ दालचीनी उष्ण-तीक्ष्ण तथा रक्त का उत्क्लेश करने वाली है अथार्त्
रक्त में िपत्त की मातर्ा बढ़ानेवाली है। इसके अिधक सेवन से शरीर में गरमी उत्पन्न
होती है। अतः गरमी के िदनों में इसका लगातार सेवन न करें। इसके अत्यिधक उपयोग
से नपुंसकता आती है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआ आआ आआआआ यह मुख की शुिद्ध तथा दुगर्न्ध का नाश करने वाली है। अजीणर्
अथवा ज्वर के कारण गला सूख गया हो तो इसका एक टुकड़ा मुँह में रखने से प्यास बुझती
है तथा उत्तम स्वाद उत्पन्न होता है। इससे मसूढ़े भी मजबूत होते हैं।
आआआआआआ आ आआआआआआआआ इसके तेल में िभगोया हुआ रूई का फाहा दाँत के मूल
में रखने से दंतशू लतथा दंतकृिमयों का नाश होता है। 5 भाग शहद मे इसका एक भाग चूणर िमलाकर
दाँतों पर लगाने से भी दंतशू लमें राहत िमलती है।
आआआ आआ आआआआ 1 चम्मच शहद के साथ इसका 1.5 ग ा म (एक चने िजतनी मातर्ा)
चूणर् लेने से पेट का अलसर िमट जाता है।
दालचीनी, इलायची और तेजपतर् को समभाग में लेकर िमशर्ण करें। इसका 1 ग ा म
चूणर् 1 चम्मच शहद के साथ लेने से पेट के अनेक िवकार जैसे मंदािग्न, अजीणर्,
उदरशू लआिद में राहत िमलती है।
आआआआआ, आआआआआ, आआआआआआ दालचीनी का 1 ग ा म चू णर एवं 1 ग ा म िस तोपल ािद
चूणर् 1 चम्मच शहद के साथ लेने से सदीर् और खाँसी में तुरंत राहत िमलती है।
आआआआआआआ(आआ.आआ.)- इसका 1 ग ा म चू णर 1 चम्मच शहद में िमलाकर सेवन करने
से कफ आसानी से छूटने लगता है एवं खाँसी से राहत िमलती है। दालचीनी का यह सबसे
महत्त्वपूणर् उपयोग है।
आआआआआआआआआ आआआ आआआआआआआआ दालचीनी रक्त की शुिद्ध करने वाली है। इसका
1 ग ा म चू णर 1 ग ा म शहद म े िम ल ाकर स े व न करन े स े अथवा दूध म े िम ल ाकर पीन े स े
रक्त में उपिस्थत कोलेस्टर्ोल की अितिरक्त मातर्ा घटने लगती है। अथवा इसका आधा से
एक गर्ाम चूणर् 200 िम.ली. पानी मे धीमी आँच पर उबाले। 100 िम.ली. पानी शेष रहने पर उसे छानकर पी ले।
इससे भी कोलेस्टर्ोल की अितिरक्त मातर्ा घटती है।
गमर प कृ ित वाल े लोग पान ी व दू ध िम िश त कर इसका उपयोग कर सकत े ह ै । इस
पयोग से रकत की शुिद होती है एवं हृदय को बल िमलता है।
आआआआआआआ आआआआआआ इसका एक चम्मच (छोटा) चूणर् 20 ग ा म शहद एवं 40 ग ा म
पानी मे िमलाकर सथािनक मािलश करने से वात के कारण होने वाले ददर से कुछ ही िमनटो मे छुटकारा िमलता है।
इसका एक गर्ाम चूणर् और 2 चम्मच शहद व 1 कप गुनगुने पानी में िमलाकर िनत्य
सुबह-शाम पीने से संिधशूल में राहत िमलती है।
वेदनायुकत सूज तथा िसरददर मे इसका चूणर गरण पानी मे िमलाकर लेप करे।
िबच्छू के दंशवाली जगह पर इसका तेल लगाने से ददर् कम होता है।
आआआआआआआआआआआआ बुढ़ापे में रक्तवािहिनयाँ कड़क और रुक्ष होने लगती हैं
तथा उनका लचीलापन कम होने लगता है। एक चने िजतना दालचीनी का चूणर् शहद में
िमलाकर िनयिमत सेवन करने से इन लक्षणों से राहत िमलती है। इस पर्योग से त्वचा
पर झुिररया नही पडती, शरीर में स्फूितर् बढ़ती है और शर्म से जल्दी थकान नहीं आती।
आआआआआआआ 1.5 ग ा म चू णर का काढ ा बना ल े । उसम े 1 चम्मच शहद िमलाकर सुबह
खाली पेट तथा सोने से पहले िपयें। इससे मेद कम होता है।
आआआआआ आआआआआआ दालचीनी का चूणर् और शहद समभाग में लेकर िमला लें। दाद,
खाज तथा खुजलीवाले स्थान पर उसका लेप करने से कुछ ही िदनों में त्वचा के ये िवकार
िमट जाते हैं।
सोने से पूवर् इसका 1 चम्मच चूणर् 3 चम्मच शहद में िमलाकर मुँह की कीलों पर
अच्छी तरह से मसलें। सुबह चने का आटा अथवा उबटन लगाकर गरम पानी से चेहरा साफ
कर लें। इससे कील-मुँहासे िमटते हैं।
आआआआआ आआ आआआआआआ दालचीनी का चूणर्, शहद और गरम ऑिलव्ह तेल 1-1 चम्मच
लेकर िमशि र्त करें और उसे बालों की जड़ों में धीरे-धीरे मािलश करे। 5 िमनट के बाद
िसर को पानी से धो लें। इस पर्योग से बालों का झड़ना कम होता है।
अनुकर्म
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आआआआ
आहार में हरी सिब्जयों का िवशेष महत्त्व है। आधुिनक िवज्ञान के मतानुसार हरे
पतो वाली सिबजयो मे कलोरोिफल नामक तततव रहता है जो िक जंतुओं का पबल नाशक है। दात एवं मसूढो मे सडन
उत्पन्न करने वाले जंतुओं को यह नष्ट करता है। इसके अलावा इसमें पर्ोटीन तत्त्व भी
पाया जाता है।
हरी सिब्जयों में लौह तत्त्व भी काफी मातर्ा में पाया जाता है, जो पाडुरोग
(रक्ताल्पता) व शारीिरक कमजोरी को नष करता है। हरी सिबजयो मे िसथत कार, रक्त की अम्लता को
घटाकर उसका िनयमन करता है।
हरी सिब्जयों में मेथी की भाजी का पर्योग भारत के पर्ायः शबी भागों में बहुलता
से होता है। इसको सुखाकर भी उपयोग िकया जाता है। इसके अलावा मेथीदानों का पर्योग
छौंक में तथा कई औषिधयों के रूप में भी िकया जाता है। ठंडी के िदनों में इसका पाक
बनाकर भी सेवन िकया जाता है।
वैसे तो मेथी पायः हर समय उगायी जा सकती है िफर भी मागरशीषर से फालगुन महीने तक जयादा उगायी जाती है।
कोमल पत्तेवाली मेथी कम कड़वी होती है।
मेथी की भाजी तीखी, कड़वी, रुक्ष, गरम , िपतवधरक, अिग्नदीपक (भूखवधरक), पचने मे हलकी,
मलावरोध को दूर करने वाली, हृदय के िलए िहतकर एवं बलपर्द होती है। सूखे मेथी दानों
की अपेक्षा मेथी की भाजी कुछ ठण्डी, पाचनकता, वायु की गित ठीक करने वाली औल सूजन िमटाने वाली
है। मेथी की भाजी पर्सूता िस्तर्यों, वायुदोष के रोिगयो एवं कफ के रोिगयो के िलए अतयंत िहतकर है। यह
बुखार, अरुिच, उलटी, खाँसी, वातरकत (गाउट ), वायु, कफ, बवासीर, कृिम तथा क्षय का नाशकरने शशशश
वाली है। मेथी पौिषक एवं रकत को शुद करने वाली है। यह शूल, वायुगोला, संिधवात, कमर के ददर्, पूरे शरीर
के ददर्, मधुपर्मेह एवं िनम्न रक्तचाप को िमटाने वाली है। मेथी माता दूध बढ़ाती है,
आमदोष को िमटाती है एवं शरीर को स्वस्थ बनाती है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआ कफदोष से उत्पन्न किब्जयत में पर्ितिदन मेथी की रेशेवाली
सब्जी खाने से लाभ होता है।
आआआआआआआ पितिदन मेथी की सबजी का सेवन करने से वायु कफ के बवासीर मे लाभ होता है।
आआआआआआआआआआआ िजनहे एकाध घंटे मे बार-बार मूतर्त्याग के िलए जाना पड़ता हो
अथार्त् बहुमूतर्ता का रोग हो उन्हें मेथी की भाजी के 100 िम.ली. रस में डेढ़ गर्ाम कत्था
तथा 3 ग ा म िम श ी िम ल ाकर प ित िद न स े व न करना चािह ए। इसस े लाभ होता ह ै ।
आआआआआआआ पितिदन सुबह मेथी की भाजी का 100 िम.ली. रस पी जायें या उसके बीज रात
को िभगोकर सुबह खा लें और पानी पी लें। रक्त-शकर्रा की मातर्ा ज्यादा हो तो सुबह शाम दो
बार रस िपयें। साथ ही भोजन में गेहूँ, चावल एवं िचकनी (घी-तेल युक्त) तथा मीठी चीजों
का सेवन न करने से शीघर् लाभ होता है।
आआआआआ आआआआआआआआ िजनहे िनम रकतचाप की तकलीफ हो उनके िलए मेथी की भाजी मे अदरक,
लहसुन, गर म मसाल ा आिद डालकर बनाय ी गयी स ब जी का स े व न लाभप द ह ै ।
आआआआआ बच्चों के पेट में कृिम हो जाने पर उन्हें मेथी की भाजी का 1-2 चम्मच
रस रोज िपलाने से लाभ होता है।
आआआआआ-आआआआआआ कफदोष के कारण िजन्हें हमेशा सदीर्-जुकाम-खाँसी की
तकलीफ बनी रहती हो उन्हें ितल अथवा सरसों के तेल में गरम मसाला, अदरक एवं
लहसुन डालकर बनायी गयी मेथी की सब्जी का पर्ितिदन सेवन करना चािहए।
आआआआ आआ आआआआआ रोज हरी अथवा सूखी मेथी का सेवन करने से शरीर के 80
पकार के वायु के रोगो मे लाभ होता है।
आआआ आआआआ आआआ मेथी की भाजी के 50 िम.ली. रस में 6 ग ा म िम श ी डालकर पीन े
से लाभ होता है। 5 ग ा म म े थ ी का पाउडर 100 ग ा म दही क े साथ स े व न करन े स े भी लाभ
होता है। दही खट्टा नहीं होना चािहए।
आआआ-आआआ आआ आआआआआ वायु के कारण होने वाले हाथ-पैर के ददर मे मेथीदानो को घी मे सेककर उनका
चूणर् बनायें एवं उसके लड्डू बनाकर पर्ितिदन एक लड्डू का सेवन करें तो लाभ होता है।
आआ आआआआ आआआ मेथी की सूखी भाजी को ठंडे पानी में िभगोयें। अच्छी तरह भीग
जाने पर मसलकर छान ले एवं उस पानी मे शहद िमलाकर एक बार रोगी को िपलाये तो लू मे लाभ होता है।
अनुकर्म
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आआ
पाचीन काल से जौ का उपयोग होता चला आ रहा है। कहा जाता है िक पाचीन काल मे ऋिष-मुिनयों का
आहार मुख्यतः जौ थे। वेदों ने भी यज्ञ की आहुित के रूप में जौ को स्वीकार िकया है।
गु ण वत ा की दृिष स े ग े हू ँ की अप े क ा जौ हलका धा न य ह ै । उत र प द े श म े ग म ी की
ऋतु में भूख-पयास शात करने के िलए सतू का उपयोग अिधक होता है। जौ को भूनकर, पीसकर, उसके आटे
में थोड़ा सेंधा नमक और पानी िमलाकर सत्तू बनाया जाता है। कई लोग नमक की जगह गुड़
भी डालते है। सतू मे घी और चीनी िमलाकर भी खाया जाता है।
जौ का सतू ठंडा, अिग्नपर्दीपक, हलका, कब्ज दूर करने वाला, कफ एवं िपत्त को हरने
वाला, रूक्षता और मल को दूर करने वाला है। गमीर् से तपे हुए एवं कसरत से थके हुए
लोगों के िलए सत्तू पीना िहतकर है। मधुमेह के रोगी को जौ का आटा अिधक अनुकूल रहता
है। इसके सेवन से शरीर में शक्कर की मातर्ा बढ़ती नहीं है। िजसकी चरबी बढ़ गयी हो
वह अगर गेहूँ और चावल छोडकर जौ की रोटी एवं बथुए की या मेथी की भाजी तथा साथ मे छाछ का सेवन करे तो धीरे-
धीरे चरबी की माता कम हो जाती है। जौ मूतल (मूतर् लाने वाला पदाथर्) हैं अतः इन्हें खाने से
मूतर् खुलकर आता है।
जौ को कूटकर, ऊपर के मोटे िछलके िनकालकर उसको चार गुने पानी में उबालकर
तीन चार उफान आने के बाद उतार लो। एक घंटे तक ढककर रख दो। िफर पानी छानकर अलग
करो। इसको बालीर् वाटर कहते हैं। बालीर् वाटर पीने से प्यास, उलटी, अितसार,
मूतर्कृच्छ, पेशाब का न आना या रक-रुककर आना, मूतर्दाह, वृकशूल, मूतर्ाशयशू लआिद में लाभ
होता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआआआ एक सेर जौ का आटा, एक सेर ताजा घी और एक सेर िमशर्ी को
कूटकर कलईयुक्त बतर्न में गमर् करके, उसमें 10-12 ग ा म काली िम चर एवं 25 ग ा म
इलायची के दानों का चूणर् िमलाकर पूिणर्मा की राितर् में छत पर ओस में रख दो। उसमें
से हररोज सुबह 60-60 ग ा म ल े क र खान े स े धातु प ु िष होती ह ै ।
आआआआआआआआ जौ के आटे को एवं िमशी को समान माता मे िमलाकर खाने से बार-बार होने वाला
गभर प ा त रकता ह ै ।
अनुकर्म
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आआआआआ
िकसी भी स्थान पर और िकसी भी ऋतु में उगने वाला और कम पानी से पलने वाला
अरंडी का वृक्ष गाँव में तो खेतों का रक्षक और घर का पड़ोसी बनकर रहने वाला होता
है।
वातनाशक, जकडन दूर करने वाला और शरीर को गितशील बनाने वाला होने के कारण इसे अरंडी नाम िदया
गया ह ै । खासतौर पर अरं ड ी की जड और पत े दवाई म े प य ु क त होत े ह ै । इसक े बीजो
में से जो तेल िनकलता है उसे अरंडी का तेल कहते हैं।
आआआ-आआआआ गु ण म े अरं ड ी वायु तथा कफ का नाश करन े वाली , रस में तीखी,
कसैली, मधुर, उष्णवीयर् औरपचनेकेबादकटु होतीहै।यहगरम, हलकी, िचकनी एवं जठरािग्न, स्मृित,
मेधा, िस्थरता, कांित, बल-वीयर और आयुषय को बढाने वाली होती है।
यह उत्तम रसायन है और हृदय के िलए िहतकर है। अरंडी के तेल का िवपाक पचने
के बाद मधुर होता है। यह तेल पचने में भारी और कफ करने वाला होता है।
यह तेल आमवात, वायु के तमाम 80 पकार के रोग, शूल, सूजन, वायुगोला, नेतर्रोग, कृिमरोग,
मूतर्ावरोध, अंडवृिद्ध, अफरा, पीिलया, पैरो का वात (सायिटका), पाडुरोग, किटशू ल, िशरः शशशशशश
ूल ,
बिस्तशू ल(मूतर्ाशयशू ल), हृदयरोग आिद रोगों को िमटाता है।
अरंडी के बीजों का पर्योग करते समय बीज के बीच का जीभ जैसा भाग िनकाल
देना चािहए क्योंिक यह जहरीला होता है।
शरीर के अन्य अवयवों की अपेक्षा आँतों और जोड़ों पर अरंडी का सबसे अिधक
असर होता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ (आआआ आआ आआआआ)- कमर पर अरंडी का तेल लगाकर, अरंडी के पत्ते
फैलाकरखाट-सेंक (चारपाई पर सेंक) करना चािहए। अरंडी के बीजों का जीभ िनकाला हुआ
भाग (गभर ), 10 ग ा म दूध म े खीर बनाकर सु ब ह -शाम लेना चािहए।
आआआआआआआआ वायु से हुए िसर के ददर मे अरंडी के कोमल पतो पर उबालकर बाधना चािहए तथा िसर पर
अरंडी के तेल की मािलश करनी चािहए और सोंठ के काढ़े में 5 से 10 ग ा म अरं ड ी का
तेल डालकर पीना चािहए।
आआआआ आआ आआआआआ अरंडी के तेल में कपूर में िमलाकर कुल्ला करना चािहए
और दातो पर मलना चािहए।
आआआआआआआआ पसूित के बाद होने वाले योिनशूल को िमटाने के िलये योिन मे अरंडी के तेल का फाहा रखे।
आआआआआआआ अरंडी के पके हुए पत्तों को गरम करके पेट पर बाँधने से और
हींग तथा काला नमक िमला हुआ अरंडी का तेल पीने से तुरंत ही राहत िमलेगी।
आआआआआआआ (आआआआआ आआ आआआ)- एक कप गोमूतर् के साथ एक चम्मच अरंडी का
तेल रोज सुबह शाम लेने और अरंड़ी के बीजों की खीर बनाकर पीने से कब्ज दूर होती
है।
आआआ-आआआ आआआआ आआआ सिदर्यों में हाथ, पैर, होंठ इत्यािद फट जाते हों तो
अरंडी का तेल गरम करके उन पर लगायें और इसका जुलाब लेते रहें।
आआआआआआआआ अरंडी के तेल में सोंठ िमलाकर गरम करके जोड़ों पर (सूजन न हो
तो) मािलश करनी चािहए। सोंठ तथा सौंफ के काढ़े में अरंडी का तेल डालकर पीना चािहए
और अरंडी के पतो का सेक करना चािहए।
आमवात में यही पर्योग करना चािहए।
आआआआआआआआ आआ आआआआ आआ आआआआआ सोंठ डाले हुए गरम पानी में 1 चम्मच
अरंडी का तेल डालकर पीना चािहए एवं तेल से मािलश और सेंक करनी चािहए।
आआआआआआआआ वायिवडंग के काढे मे रोज सुबह अरंडी का तेल डालकर ले।
आआआआआआआआ अरंडी के कोमल पत्ते दूध में पीसकर ललाट और कनपटी पर गरम-
गर म बा ध न े चािह ए। पा व क े तलवो और िस र पर अरं ड ी क े त े ल की मािल श करनी चािह ए।
आआआआआ अरंडी के बीज और हरड़े समान मातर्ा में लेकर पीस लें। इसे नयी
गा ठ पर बा ध न े स े वह ब ै ठ जाय े ग ी और अगर ल म ब े समय की पु र ान ी गा ठ होग ी तो पक
जायेगी।
आआआआआआ आआआआ अरंडी के पत्तों के काढ़े में हल्दी डालकर ददर्वाले स्थान
पर गरम-गर म डाल े और उसक े पत े उबालकर ह ल दी डालकर चोटवाल े स थान पर बा ध े ।
आआआआआ आआआआ अरंडी के कोमल पत्ते दूध में पीसकर, हल्दी िमलाकर, गरम
करके पट्टी बाँधें।
आआआआआआआआ स्तनपाक,स्तनशोथ और स्तनशू लमें अरंडी के पत्ते पीसकर लेप
करें।
आआआआआआआआआआ नयी हुई अंडवृिद्ध में 1-2 चम्मच अरंडी का तेल, पाच गुने गोमूत मे
डालकर िपये और अंडवृिद पर अरंडी के तेल की मािलश करके हलका सेक करना चािहए अथवा अरंडी के कोमल पते
पीसकर गरम-गरम लगान े चािह ए और एक माह तक एक च म म च अरं ड ी का त े ल द े न ा चािह ए।
आआआआआआआआआ सोंठ के काढ़े में अथवा गरम पानी में अरंडी का तेल देना
चािहए अथवा अरंडी के तेल की िपचकारी देनी चािहए। यह इस रोग का उत्तम इलाज है।
आआआआआआआआआ बालक की गुदा बाहर िनकलती हो तो अरंडी के तेल में डुबोई हुई
बत्ती से उसे दबा दें एवं ऊपर से रूई रखकर लंगोट पहना दें।
आआआआआआआआआआ आआआ (आआआआआआआआआआआआआ)- पारंिभक अवसथा मे रोज सुबह सोठ के
काढ़े में अरंडी का तेल दें।
आआआआआआआआ (आआआआआआ आआआ)- 1 चम्मच अरंडी के तेल में 5 गु न ा गोमू त
िमलाकर 1 माह तक लें।
आआआआआआआ अरंडी का 1-1 पता खाये और उसका 1-1 चम्मच रस िपयें।
आआआआआआआआ पैर की एडी मे शूल होता है तो उसे दूर करने के िलए सोठ के काढे मे या गरम पानी मे अरंडी
का तेल डालकर िपयें तथा अरंडी के पत्तों को गरम करके पट्टी बाँधें।
आआआआ शरीर पर जन्म से ही ितल हों तो उन्हें से दूर करने के िलए अरंडी के
पतो की डंडी पर थोडा कली चूना लगाकर उसे ितल पर िघसने से खून िनकलकर ितल िगर जाते है।
आआआआआआआआ जवर मे दाह होता तो अरंडी के शीतल कोमल पते िबसतर पर िबछाये और शरीर पर रखे।
अनुकर्म
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आआआ आआ आआआ
तेल वायु के रोगों को िमटाता है, परंतु ितल का तेल िवशेष रप से िवतघ है।
यह तेल अपनी िस्नग्धता, कोमलता और पतलेपन के कारण शरीर के समस्त
स्तर्ोतों में पर्वेश धीरे-धीरे मेद का कय कर दोषो को उखाड फेकता है। ितल का तेल अनय तेलो की अपेका
शर्ेष्ठ है। महिषर् चरक ितल के तेल को बलवधर्क, त्वचा के िलए िहतकर, गमर एवं
िस्थरता देने वाला मानते हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआ आआआआआ आ आआआआआआआआ ितल का तेल 10 िमनट तक मुँह में रखने से
िहलते हुए दाँत भी मजबूत हो जाते हैं और पायिरया िमटता है।
आआआआआआ, आआआ-आआआआआआ ितल के गुनगुने तेल से एक माह तक शरीर पर मािलश
करने से त्वचा में िनखार आ जाता है, मेद (चबीर्) कम हो जाता है और खाज-खुजली िमट
जाती है।
आआआआआआआ आआआआ आआआ मोम और सेंधा नमक िमला हुआ ितल का तेल पैरों की
एड़ी पर लगाने से वे मुलायम हो जाती हैं।
आआआआआआ आआआआआ आआआ पागल कुते ने काटा हो तो मरीज को ितल का तेल, कूटा हुआ ितल,
गु ड और आ ँ कड े का दूध समभा ग करक े िप ल ान े स े फायद े होता ह ै ।
आआआआ आआआ जले हुए भाग पर गमर िकया हुआ ितल का तेल लगाने से भी चमतकािरक लाभ होता है।
आआआ आआआ ितल के तेल में िभगोया हुआ पट्टा बाँधने से वर्ण (घाव) का शोधन व
रोपण होता है।
अनुकर्म
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आआआआ
अमेिरका में हाल ही में हुए एक शोध से पता चला है िक जो व्यिक्त अिधक मातर्ा
में चीनी का सेवन करते हैं, उन्हें बड़ी आँत का कैंसर होने की संभावना अिधक रहती
है। कैंसर ही नहीं अिपतु चीनी अन्य कई रोगों का कारण भी है। (अिधक जानकारी के िलए
पढे- आरोग्यिनिध भाग-1, शक्कर-नमकः िकतने खतरनाक!) अतः इसके सेवन पर िनयंतर्ण
बहुत आवश् यकहै। चीनी के स्थान पर रसायनों के िमशर्ण से रिहत शुद्ध गुड़ का उपयोग
स्वास्थ्य के िलए अच्छा है।
गन े क े रस स े चीनी बनान े म े क ै िलश य म , लौह तत्त्व, गं धक , पोटेिशयम आिद
फासफोरस आिद महत्वपूणर् तत्त्व नष्ट हो जाते हैं जबिक गुड़ में ये तत्त्व मौजूद रहते
हैं। गुड़ में पर्ोटीन 8 % , वसा 0.9 % , कैिल् यम शशश 0.08 % , फास्फोरस 0.04 % ,
काबोर्हाईडर्ेट 65 % होता है और िवटािमन ए 280 यूिनट पर्ित 900 ग ा म होता ह ै ।
पाडुरोग और अिधक रकतसाव के कारण रकत मे हीमोगलोिबन कम हो जाता है, तब लौह तत्त्व की पूितर्
के िलए पालक का पर्योग िकया जाता है। पालक में 1.3% , केले में 0.4% एम.जी. लौह
तत्त्व होता है जबिक गुड़ में 11.4% एम.जी लौह तततव पाया जाता है।
मिहलाओं में आमतौर पर लौह तत्त्व की कमी पायी जाती है। यह मािसक धमर् की
गड ब ड ी क े कारण होता ह ै । भू न े ह ु ए चन े और गु ड खान े स े इस कमी की पू ितर की जा सकती
है।
गु न गु न े पानी म े गु ड को घोलकर खाली प े ट ल े न े स े िव श े ष लाभ होता ह ै । यह
दोपहर को भी भोजन के दो घंटे बाद िलया जा सकता है।
गु ड िच क ी क े रप म े भी काफी प च िल त ह ै । िछ लक े वाली मू ँ ग की पतली दाल म े
गु ड िम ल ाकर खाया जा सकता ह ै ।
गु ड म े क ै िलश य म होन े क े कारण ब च च ो की हडडी की कमजोर ी एवं दं त क य म े
यह बहुत लाभकारी है। बढ़ते बच्चों के िलए यह अमृततुल्य है।
गु ड म े िव टािम न बी भी प य ा प त मात ा म े होता ह ै । इसम े प ै न ट ो िथ िन क एिस ड ,
इनािसटोल सवोर्पिर है जो िक मानिसक स्वास्थ्य के िलए िहतकारी है। आयुवेर्द में तो
एक जगह िलखा है िक मट्ठा, मक्खन और गुड़ खाने वाले को बुढ़ापा कष्ट नहीं देता।
हृदयरोगों में पोटेश ियमलाभकारी है जो गुड़ में मौजूद होता है। यह पोटेश ियम
केले और आलू में भी पाया जाता है।
अत्यिधक चीनी नुकसानकारक है। इसिलए गुड़, िपणड खजूर, िकशिमश आिद में िस्थत
पाकृितक शकरराएँ फायदेमंद है।
अनुकर्म
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आआआआ आआआआ
सूखे मेवे में बादाम, अखरोट, काजू, िकशशश िमश , अंजीर, िपसता, खािरक (छुहारे),
चारोली, नािरयल आिद का समावेश होता है।
सूखे मेवे अथार्त् ताजे फलों के उत्तम भागों को सुखाकर बनाया गया पदाथर्।
ताजे फलों का बारह महीनों िमलना मुशि ्कल है। सूखे मेवों से दूसरी ऋतु में भी फलों
के उत्तम गुणों का लाभ िलया जा सकता है और उनके िबगड़ने की संभावना भी ताजे फलों
की अपेक्षा कम होती है। कम मातर्ा में लेने पर भी ये फलों की अपेक्षा ज्यादा
लाभकारी िसद्ध होते हैं।
सूखा मेवा पचने में भारी होता है। इसीिलए इसका उपयोग शीत ऋतु में िकया जा
सकता है क्योंिक शीत ऋतु में अन्य ऋतुओं की अपेक्षा व्यिक्त की जठरािग्न पर्बल होती
है। सूखा मेवा उष्ण, िस्नग्ध, मधुर, बलपर्द, वातनाशक, पौिषक एवं वीयरवधरक होता है।
सूखे मेवे कोलेस्टर्ोल बढ़ाते हैं, अतः िबमारी के समय नहीं खाने चािहए।
इन सूखे मेवों में कैलोरी बहुत अिधक होती है जो शरीर को पुष्ट करने के िलए
बहुत उपयोगी है। शरीर को हृष्ट पुष्ट रखने के िलए रासायिनक दवाओं की जगह सूखे मेवों
का उपयोग करना ज्यादा उिचत है। इनसे क्षारतत्त्व की पूितर् भी की जा सकती है।
सूखे मेवे में िवटािमन ताजे फलों की अपेक्षा कम होते हैं।
अनुकर्म
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आआआआआ
बादाम गरम, िस्नग्ध, वायु को दूर करने वाला, वीयर को बढाने वाला है। बादाम बलपद एवं पौिषक है िकंतु
िपत एवं कफ को बढाने वाला, पचने मे भारी तथा रकतिपत के िवकारवालो के िलए अचछा नही है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआ आआआआआआआ राितर् को 4-5 बादाम पानी में िभगोकर, सुबह िछलके िनकालकर
पीस ले िफर दूध मे उबालकर, उसमें िमशर्ी एवं घी डालकर ठंडा होने पर िपयें। इस पर्योग से
शरीर हृष्ट पुष्ट होता है एवं िदमाग का िवकास होता है। पढ़ने वाले िवद्यािथर्यों के िलए
तथा नेतर्ज्योित बढ़ाने के िलए भी यह एक उत्तम पर्योग है। बच्चों को 2-3 बादाम दी जा
सकती हैं। इस दूध में अश् वगंधाचूणर् भी डाला जा सकता है।
आआआआआ आआ आआआआ इस तेल से मािलश करने से त्वचा का सौंदयर् िखल उठता है
व शरीर की पुिष भी होती है। िजन युवितयो के सतनो के िवकास नही हुआ है उनहे रोज इस तेल से मािलश करनी
चािहए। नाक में इस तेल की 3-4 बूँदें डालने से मानिसक दुबर्लता दूर होकर िसरददर्
िमटता है और गमर् करके कान में 3-4 बूँदें डालने से कान का बहरापन दूर होता है।
आआआआ िपसते के गुणधमर बादाम जैसे ही है।
अनुकर्म
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आआआआआ
अखरोट बादाम के समान कफ व िपत्त बढ़ाने वाली है। स्वाद में मधुर, िस्नग्ध,
शीतल, रुिचकर, भारी तथा धातु को पुष करने वाली है।
आआआआ आआआआआआआ
आआआ आआआआआआ आआ आआआआ ग े हू ँ क े आट े म े अखरोट का चू णर िम ल ाकर हलवा
बनाकर खाने से स्तनपान कराने वाली माताओं का दूध बढ़ता है। इस दूध में शतावरी चूणर्
भी डाला जा सकता है।
आआआआआआआआआआ अखरोट की छाल के काढ़े में पुराना गुड़ िमलाकर पीने से
मािसक साफ आता है और बंद हुआ मािसक भी शुरु हो जाता है।
आआआआ आआआ आआआआ आआआआआ अखरोट की छाल के चूणर् को ितल के तेल में
िमलाकर सावधानीपूवर्क दाँतों पर िघसने से दाँत सफेद होते हैं।
आआआआआआआआ अखरोट की छाल को जलाकर उसका 100 ग ा म चू णर , कंटीला 10 ग ा म ,
मुलहठी का चूणर् 50 ग ा म , कच्ची िफटकरी का चूणर् 5 ग ा म एवं वायविडं ग का चू णर 10 ग ा म
लें। इस चूणर् में सुगिन्धत कपूर िमला लें। इस मंजन से दाँतों का सड़ना रुकता है एवं
दाँतों से खून िनकलता हो तो बंद हो जाता है।
आआआआआ आआ आआआआ चेहरे पर अखरोट के तेल की मािलश करने से चेहरे का
लकवा िमटता है।
इस तेल के पर्योग से कृिम नष्ट होते हैं। िदमाग की कमजोरी, चक्कर आना आिद
दूर होते हैं। चश् माहटाने के िलए आँखों के बाहर इस तेल की मािलश करें।
अनुकर्म
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आआआआ
काजू पचने में हलका होने के कारण अन्य सूखे मेवों से अलग है। यह स्वाद
में मधुर एवं गुण में गरम है अतः इसे िकशिमश के साथ िमलाकर खायें। कफ तथा
वातशामक, शरीर को पुष्ट करने वाला, पेशाब साफ लाने वाला, हृदय के िलए िहतकारी तथा मानिसक
दुबर्लता को दूर करने वाला है।
आआआआआआआ काजू गरम होने से 7 से ज्यादा न खायें। गमीर् में एवं िपत्त
पकृितवालो को इसका उपयोग सावधानीपूवरक करना चािहए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआ आआआआआआआआआ 5-7 काजू सुबह शहद के साथ खायें। बच्चों को 2-3 काजू
िखलाने से उनकी मानिसक दुबर्लता दूर होती है।
आआआआआ घी में भुने हुए काजू पर काली िमचर्, नमक डालकर खाने से पेट की वायु
नष्ट होती है।
आआआआ आआ आआआआ यह तेल खूब पौिष्टक होता है। यह कृिम, कोढ़, शरीर के काले
मस्से, पैर की िबवाइयो एवं जखम मे उपयोगी है।
आआआआआआआ 4 से 5 ग ा म त े ल िल या जा सकता ह ै ।
अनुकर्म
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आआआआआ
अंजीर की लाल, काली, सफेद और पीली – ये चार पर्कार की जाितयाँ पायी जाती
हैं। इसके कच्चे फलों की सब्जी बनती है। पके अंजीर का मुरब्बा बनता है। अिधक
मातर्ा में अंजीर खाने से यकृत एवं जठर को नुकसान होता है। बादाम खाने से अंजीर
के दोषों का शमन होता है।
आआआआआआआआ पके, ताजे अंजीर गुण में शीतल, स्वाद में मधुर, स्वािदष्ट एवं
पचने मे भारी होते है। ये वायु एवं िपतदोष का शमन एवं रकत की वृिद करते है। ये रस एवं िवपाक मे मधुर एवं शीतवीयर
होते हैं। भारी होने के कारण कफ, मंदािग्न एवं आमवात के रोगों की वृिद्ध करते हैं।
ये कृिम, हृदयपीड़ा, रक्तिपत्त, दाह एवं रक्तिवकारनाशक हैं। ठंडे होने के कारण नकसीर
फूटने मे, िपत के रोगो मे एवं मसतक के रोगो मे िवशेष लाभपद होते है।
अंजीर में िवटािमन ए होता है िजससे वह आँख के कुदरती गीलेपन को बनाये
रखता है।
सूखे अंजीर में उपयुर्क्त गुणों के अलावा शरीर को िस्नग्ध करने, वायु की गित को
ठीक करने एवं शास रोग का नाश करने के गुण भी िवदमान होते है।
अंजीर के बादाम एवं िपस्ता के साथ खाने से बुिद्ध बढ़ती है और अखरोट के साथ
खाने से िवष-िवकार नष होता है।
िकसी बालक ने काँच, पतथर अथवा ऐसी अनय कोई अखाद ठोस वसतु िनगल ली हो तो उसे रोज एक से
दो अंजीर िखलायें। इससे वह वस्तु मल के साथ बाहर िनकल जायेगी। अंजीर चबाकर खाना
चािहए।
सभी सूखे मेवों में देह को सबसे ज्यादा पोषण देने वाला मेवा अंजीर है।
इसके अलावा यह देह की कांित तथा सौंदयर् बढ़ाने वाला है। पसीना उत्पन्न करता है
एवं गमीर् का शमन करता है।
आआआआआआआ 2 से 4 अंजीर खाये जा सकते हैं। भारी होने से इन्हें ज्यादा
खाने पर सदीर्, कफ एवं मंदािग्न हो सकती है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआ आआ आआआआआआ आ आआआआआआआ 3-4 नग अंजीर को 200 ग ा म दूध म े
उबालकर रोज पीने से रक्त की वृिद्ध एवं शुिद्ध, दोनों होती है। इससे किब्जयत भी िमटती
है।
आआआआआआआआआआ कान, नाक, मुँह आिद से रक्तसर्ाव होता हो तो 5-6 घंटे तक 2
अंजीर िभगोकर रखें और पीसकर उसमें दुवार् का 20-25 ग ा म रस और 10 ग ा म िम श ी
डालकर सुबह-शाम िपयें।
जयादा रकतसाव हो तो खस एवं धिनया के चूणर को पानी मे पीसकर ललाट पर एवं हाथ-पैर के तलवो पर लेप
करें। इससे लाभ होता है।
आआआआआआआआ आआआ आआआआआआआ िजनकी पाचनशिकत मंद हो, दूध न पचता हो उन्हें 2 से
4 अंजीर राितर् में पानी में िभगोकर सुबह चबाकर खाने चािहए एवं वही पानी पी लेना
चािहए
आआआआआआआआ पितिदन 5 से 6 अंजीर के टुकड़े करके 250 िम.ली. पानी मे िभगो दे। सुबह
उस पानी को उबालकर आधा कर दें और पी जायें। पीने के बाद अंजीर चबाकर खायें तो
थोड़े ही िदनों में किब्जयत दूर होकर पाचनशिक्त बलवान होगी। बच्चों के िलए 1 से 3
अंजीर पयार्प्त हैं।
आधुिनक िवज्ञान के मतानुसार अंजीर बालकों की किब्जयत िमटाने के िलए िवशेष
उपयोगी है। किबजयत के कारण जब मल आँतो मे सडने लगता है, तब उसके जहरीले तत्त्व रक्त में िमल
जाते है और रकतवाही धमिनयो मे रकावट डालते है, िजससे शरीर के सभी अंगो मे रकत नही पहुँचता। इसके फलसवरप
शरीर कमजोर हो जाता है तथा िदमाग, नेतर्, हृदय, जठर, बड़ी आँत आिद अंगों में रोग
उत्पन्न हो जाते हैं। शरीर दुबला-पतला होकर जवानी मे ही वृदतव नजर आने लगता है। ऐसी िसथित मे
अंजीर का उपयोग अत्यंत लाभदायी होता है। यह आँतों की शुिद्ध करके रक्त बढ़ाता है
एवं रक्त पिरभर्मण को सामान्य बनाता है।
आआआआआआआ 2 से 4 अंजीर रात को पानी में िभगोकर सुबह खायें और सुबह िभगोकर
शाम को खायें। इस पर्कार पर्ितिदन खाने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। अथवा
अंजीर, काली दर्ाक्ष (सूखी), हरड़ एवं िमशर्ी को समान मातर्ा में लें। िफर उन्हें कूटकर
सुपारी िजतनी बड़ी गोली बना लें। पर्ितिदन सुबह-शाम 1-1 गोल ी का स े व न करन े स े भी
लाभ होता है।
आआआआआआआआआआआ िजनहे बार-बार ज्यादा मातर्ा में ठंडी व सफेद रंग का पेशाब
आता हो, कंठ सूखता हो, शरीर दुबर्ल होता जा रहा हो तो रोज पर्ातः काल 2 से 4 अंजीर खाने
के बाद ऊपर से 10 से 15 ग ा म काल े ित ल चबाकर खाय े । इसस े आरा म िम लत ा ह ै ।
आआआआआआआआआआआआ 1 या 2 अंजीर में 1 या 2 ग ा म कलमी सोडा िम ल ाकर प ित िद न
सुबह खाने से मूतर्ाल्पता में लाभ होता है।
आआआआआ (आआआआआ आआ आआआ)- 6 ग ा म अं ज ी र एवं 3 ग ा म गोरख इमली का चू णर
सुबह-शाम खाने से लाभ होता है। श्वास के साथ खाँसी भी हो तो इसमें 2 ग ा म जीर े का
चूणर् िमलाकर लेने से ज्यादा लाभ होगा।
आआआआआ अंजीर रात को िभगो दें, सुबह िखलायें। इससे 2-3 िदन में ही लाभ होता
है।
अनुकर्म
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आआआआआआ
चारोली बादाम की पर्ितिनिध मानी जाती है। जहाँ बादाम न िमल सकें वहाँ चारोली
का पर्योग िकया जा सकता है।
चारोली स्वाद में मधुर, िस्नग्ध, भारी, शीतल एवं हृद्य (हृदय को रुचने वाली) है। देह
का रंग सुधारने वाली, बलवधर्क, वायु-ददर्नाशक एवं िरः श कू लशो ि म टाने वाली है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआ आआआआआआआ चारोली को दूध में पीसकर मुँह पर लगाने से काले दाग
दूर होकर त्वचा कांितमान बनती है।
आआआआ आआआआआ 5-10 ग ा म चारो ल ी को पीसकर दू ध क े साथ ल े न े स े रक ताित स ा र
(खूनी दस्त) में लाभ होता है।
आआआआआआआआआ चारोली को दूध में पीसकर शीतिपत्त (त्वचा पर लाल चकते) पर
लगायें।
आआआआआआआआआ ग े हू ँ क े आट े क े हलु ए म े 5-10 चारोली डालकर खाने से
नपुंसकता में लाभ होता है।
आआआआआआ आआ आआआआ बालों को काला करने के िलए उपयोगी है।
अनुकर्म
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आआआआ
पकी हुई खजूर मधुर, पौिषक, वीयरवधरक, पचने मे भारी होती है। यह वातयुकत िपत के िवकारो मे लाभदायक
है। खािरक के गुणधमर् खजूर जैसे ही हैं।
आधुिनक मतानुसार 100 ग ा म खजू र म े 10.6 िम.ग ा . लौह तत्त्व, 600 यूिनट कैरोटीन,
800 यूिनट कैलोरी के अलावा िवटािमन बी-1, फास्फोरस एवं कैश िल् भी यमपाया जाता है।
आआआआआआआ एक िदन में 5 से 10 खजूर ही खानी चािहए।
आआआआआआआआ खजूर पचने में भारी और अिधक खाने पर गमर् पड़ती है। अतः
उसका उपयोग दूध-घी अथवा मक्खन के साथ करना चािहए।
िपत के रोिगयो को खजूर घी मे सेककर खानी चािहए। शरीर मे अिधक गमी होने पर वैद की सलाह के अनुसार
ही खजूर खावें।
आआआआ आआआआआआआ
आआआआआआ अदरक, िमचर् एवं सेंधा नमक आिद डालकर बनायी गयी खजूर की चटनी
खाने से भूख खुलकर लगती है। पाचन ठीक से होता है और भोजन के बाद होने वाली गैस
की तकलीफ भी दूर होती है।
आआआआआआ गु ठ ली िन काल ी ह ु ई 4-5 खजूर को मक्खन, घी या दूध के साथ रोज लेने से
कृशता दूर होती है, शरीर में शिक्त आती है और शरीर की गमीर् दूर होती है। बच्चों को खजूर
न िखलाकर खजूर को पानी में पीसकर तरल करके िदन में 2-3 बार देने से वे हृष्ट-पुष
होते हैं।
आआआआआआआआआआ (आआआआआ)- घी युक्त दूध के साथ रोज योग्य मातर्ा में खजूर का
उपयोग करने से खून की कमी दूर होती है।
आआआआ आआ आआआआ जयादा शराब िपये हुए वयिकत को पानी मे िभगोयी हुई खजूर मसलकर िपलानी चािहए।
अनुकर्म
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आआआआआआ आआ आआआआआ आआआआआआआ आआआ आआआ
आआआआआआआ
आजकल पाउडर का अथवा सार तत्त्व िनकाला हुआ या गाढ़ा माना जानेवाला भैंस का
दूध पीने का फैशन चल पड़ा है इसिलए लोगों की बुिद्ध भी भैंसबुिद्ध बनती जा रही है।
शास्तर्ों ने व वैज्ञािनकों ने भी स्वीकार िकया है िक गाय का दूध अमृत के समान है व
अनेक रोगों का स्वतः िसद्ध उपचार है। गाय का दूध सेवन करने से िकशोर-िकशोिरयों की
शरीर की लम्बाई व पुष्टता उिचत मातर्ा में िवकिसत होती है, हिड्डयाँ भी मजबूत बनती हैं
एवं बुिद्ध का िवलक्षण िवकास होता है। आयुवेर्द में दूध में शहद डालकर पीना िवपरीत
आहार माना गया है, अतः दूध और शहद एक साथ नहीं पीना चािहए।
भारतीय नसल की गाय की रीढ मे सूयरकेतु नामक एक िवशेष नाडी होती है। जब इस पर सूयर की िकरणे पडती है
तब यह नाड़ी सूयर् िकरणों से सुवणर् के सूक्ष्म कणों का िनमार्ण करती है। इसीिलए गाय
के दूध-मक्खन तथा घी में पीलापन रहता है। यह पीलापन शरीर में उपिस्थत िवष को
समाप्त अथवा बेअसर करने में लाभदायी िसद्ध होता है। गोदुग्ध का िनत्य सेवन
अंगर्ेजी दवाओं के सेवन से शरीर में उत्पन्न होने वाले दुष्पर्भावों (साईड
इफेक्टस) का भी शमन करता है।
गोदु ग ध म े प ो ट ी न की 'अमीनो एिसड' की पर्चुर मातर्ा होने से यह सुपाच्य तथा
चरबी की मातर्ा कम होने से कोलेस्टर्ोल रिहत होता है।
गाय क े दूध म े उपिसथ त 'सेरीबर्ोसाइडस' मिस्तष्क को ताजा रखने एवं बौिद्धक
क्षमता बढ़ाने से िलए उत्तम टॉिनक का िनमार्ण करते हैं।
रूस के वैज्ञािनक गाय के दूध को आिण्वक िवस्फोट से उत्पन्न िविकरण के शरीर पर
पडे दुषपभाव को शमन करने वाला मानते है।
कारनेल िवश् विवद्यालयमें पशु िवज्ञानिवशेषज्ञ पर्ोफेसर रोनाल्ड गोरायटे के
अनुसार गाय के दूध में उपिस्थत MDGI पोटीन शरीर की कोिशकाओं को कैसरयुकत होने से बचती है।
गोदु ग ध पर अन े क द े श ो म े और भी नय े -नये परीक्षण हो रहे हैं तथा सभी
परीकणो से इसकी नवीन िवशेषताएँ पकट हो रही है। धीरे-धीरे वैजािनको की समझ मे आ रहा है िक भारतीय ऋिषयो ने
गाय को माता , अवध्य तथा पूजनीय क्यों कहा है।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआ
आआआ आआआआ आआ आआआआआआ, आआआआ आआआ आआआआ।
आआआआआ, आआआआआ, आआआआआ, आआआआआआआ आआआ आआआ।
शहद पर्कृित की देन है। भारत में पर्ाचीन काल से शहद एक उत्तम खाद्य माना जाता
है। उसके सेवन से मनुष्य िनरोगी, बलवान और दीघार्यु बनता है।
िविवध पकार के फूलो मे से मीठा रस चूसकर मधुमिकखया अपने मे संिचत करती है। शहद की तुलना मे यह रस
पहले तो पतला और फीका होता है परंतु मधुमिकखयो के शरीर मे संिचत होने पर गाढा और मीठा हो जाता है। िफर शहद
के छत्ते में ज्यादा गढ़ा बनकर शहद के रूप में तैयार होता है। इस पर्कार शहद अलग-
अलग फूलों के पराग, वनसपितयो और मधुमिकखयो के जीवन के सार तततव का सिममशण है। शहद केवल औषिध
ही नहीं, बिल्क दूध की तरह मधुर और पौिष्टक, सम्पूणर् आहार भी है।
शहद में िस्थत लौह तत्त्व रक्त के लालकणों में वृिद्ध करता है। शहद गमीर् और
शिक्त पर्दान करता है।
शहद श्वास, िहचकी आिद श्वसनतंतर् के रोगों में िहतकर है।
शहद में िवटािमन बी का पर्माण ज्यादा होता है िजससे उसका सेवन करने से दाह,
खुजली, फुँिसयाँ जैसे त्वचा के सामान्य रोगों की िकायत शन हीं रहती। अतः इन रोगों के
िनवारणाथर् 4-5 महीनों तक रोज पर्ातः 20-20 ग ा म शहद ठ ण ड े पानी म े िम ल ाकर पीन ा
चािहए। पतला साफ कपड़ा शहद में डुबाकर जले हुए भाग पर रखने चािहए। पतला साफ
कपड़ा शहद में डुबाकर जले हुए भाग पर रखने से खूब राहत िमलती है। शहद को िजस
औषिध के साथ िमलाया जाता है उस औषिध के गुण को यह बढा देता है।
शहद गरम चीजों के साथ नहीं खाना चािहए एवं उसे शहद खाने के बाद गरम पानी
भी नही िपया जा सकता कयोिक उषणता िमलने पर वह िवकृत हो जाता है।
एक वषर् के बाद शहद पुराना माना जाता है। शहद जैसे-जैसे पुराना होता है वैस-े वैसे गुणकारी
बनता है। शहद की सेवन-मातर्ा 20 से 30 ग ा म ह ै । बालको को 10-15 ग ा म स े और
वयसको को 40-50 ग ा म स े ज य ा द ा शहद एक साथ नही ल े न ा चािह ए। शहद का अजीणर अ त यं त
हािनकारक है। शहद के दुष्पिरणाम कच्ची धिनया और अनार खाने से िमटते है।
1 चम्मच शहद, 1 चम्मच अरडूसी के पत्तों के रस और आधा चम्मच अदरक का रस
िमलाकर पीने से खाँसी िमटती है।
शहद के साथ पानी िमलाकर उसके कुल्ले करने से बढ़े हुए टॉिन्सल्स में बहुत
राहत िमलती है।
शहद की कसौटी कैसे करें?
शहद में िगरी हुई मक्खी यिद उसमें से बाहर िनकल आये और थोड़ी देर में उड़
सके तो जानना चािहए िक शहद शुद्ध है। शुद्ध शहद को कुत्ते नहीं खाते। शुद्ध शहद लगाये
हुए खाद्य पदाथर् को कुत्ते छोड़ देते हैं। शुद्ध शहद की बूँद पानी में डालने से तली पर
बैठ जाती है। शहद में रूई की बाती डुबाकर दीपक जलाने से आवाज िकये िबना जले तो
शहद शुद्ध मानना चािहए। बाजार में शहद की अमुक िचह्न की (कंपनी की) भरी शीशी िमलती है,
उसे कृितर्म शहद माना जा सकता है। कृितर्म शहद बनाने के िलए चीनी की चाशनी के
टेकर को 6 महीने तक जमीन में दबाकर रखा जाता है और उसमें से बनाया हुआ कृितर्म
शहद पर्योगशाला में भी पास हो सकता है। दूसरे पर्कार से भी कृितर्म शहद बनाया जाता
है। आजकल ज्यादा पर्माण में कृितर्म शहद ही िमलता है।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआ-आआआआआ आआआआआ आआआआआ
आआआआआ
तुलसी एक सवर्पिरिचत एवं सवर्सुलभ वस्पित है। भारतीय धमर् एवं संस्कृित में
इसका महत्त्वपूणर् स्थान है। मातर् भारत में ही नहीं वरन् िवश् वके अन्य अनेक देशों
में भी तुलसी को पूजनीय एवं शुभ माना जाता है।
अथवर्वेद में आता हैः 'यिद त्वचा, मांस तथा अिस्थ में महारोग पर्िवष्ट हो गया
हो तो उसे श्यामा तुलसी नष्ट कर देती है। तुलसी दो पर्कार की होती हैः हरे पत्तों वाली
और शयाम(काले) पतो वाली। शयामा तुलसी सौदयरवधरक है। इसके सेवन से तवचा के सभी रोग नष हो जाते है और
त्वचा पुनः मूल स्वरूप धारण कर लेती है। तुलसी त्वचा के िलए अदभुत रूप से लाभकारी है।'
सभी कुष्ठरोग अस्पतालों में तुलसीवन बनाकर तुलसी के कुष्ठरोग िनवारक गुण का
लाभ िलया जा सकता है।
चरक सूतर्ः 27.169 में आता हैः 'तुलसी िहचकी, खाँसी, िवषदोष, श्वास और पाश्वर्शूल
को नष्ट करती है। वह िपत्त को उत्पन्न करती है एवं वात, कफ और मुँह की दुगर्न्ध को नष्ट
करती है।'
स्कंद पुराणः 2,4,8,13 एवं पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में आता हैः 'िजस घर मे तुलसी का
पौधा होता है वह घर तीथर के समान है। वहा वयािधरपी यमदूत पवेश ही नही कर सकते।'
पदूिषत वायु के शुिदकरण मे तुलसी का योगदान सवािधक है। ितरपित के एस.वी. िवशिवदालय मे िकये गये
एक अध्ययन के अनुसार तुलसी का पौधा उच्छवास में स्फूितर्पर्द ओजोन वायु छोड़ता है,
िजसमे ऑकसीजन के दो के सथान पर तीन परमाणु होते है।
पाकृितक िचिकतसा मे तुलसी का पयोग करने से अनेक पाणघातक और दुःसाधय रोगो को भी िनमूरल करने मे
ऐसी सफलता िमल चुकी है जो पिसद डॉकटरो व सजरनो को भी नही िमलती।
तुलसी ब्लड कोलस्टर्ोल को बहुत तेजी के साथ सामान्य बना देती है। तुलसी के
िनयिमत सेवन से अम्लिपत्त दूर होता है तथा पेिचश, कोलाइिटस आिद िमट जाते हैं।
स्नायुददर्, सदीर्, जुकाम, मेदवृिद्ध, िसरददर् आिद में यह लाभदायी है। तुलसी का रस, अदरक
का रस एवं शहद समभाग में िमशि र्त करके बच्चों को चटाने से बच्चों के कुछ रोगों
में, िवशेषकर सदी, दस्त, उलटी और कफ में लाभ होता है। हृदय रोग और उसकी आनुबंिधक
िनबर्लता और बीमारी से तुलसी के उपयोग से आश् चयर्जनकसुधार होता है।
हृदयरोग से पीिड़त कई रोिगयों के उच्च रक्तचाप तुलसी के उपयोग से सामान्य हो
गय े ह ै . हृदय की दुबर्लता कम हो गयी है और रक्त में चबीर् की वृिद्ध रुकी है। िजन्हें
पहाडी सथानो पर जाने की मनाही थी ऐसे अनेक रोगी तुलसी के िनयिमत सेवन के बाद आनंद से ऊँचाई वाले सथानो पर
सैर-सपाटे के िलए जाने में समथर् हुए हैं।
आआआआआआआआ आआआआआ-आआआ आआ, आआआ आआआ । आआआ आआआआ
आआआआ, आआआआ आआआआआ आआआआआ, आआआआआआआ आआआ आआआ।।
आआआआआआ आआआआआ-आआआआ आआ, आआआआआ आआआआआ । आआआ आआआआ
आआ आआआआआआआ आआआआआआ, आआआआ आआआ आआआआआ ।।
वजन बढाना हो या घटाना हो, तुलसी का सेवन करें। इससे शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता
है।
तुलसी गुदोर्ं की कायर्शिक्त में वृिद्ध करती है। इसके सेवन से िवटािमन ए तथा सी
की कमी दूर हो जाती है। खसरा-िनवारण के िलए यह रामबाण इलाज है।
तुलसी की 5-7 पितया रोजाना चबाकर खाने से या पीसकर गोली बनाकर पानी के साथ िनगलने से पेट की
बीमािरयाँ नहीं होती। मंदािग्न, किब्जयत, ग ै स आिद रोग ो क े िल ए तु ल सी आिद स े त ै य ा र
की जाने वाली वनस्पित चाय लाभ पहुँचाती है।
अपने बच्चों को तुलसी पतर् सेवन के साथ-साथ सूयर्नमस्कार करवाने और सूयर् को
अघ्यर् िदलवाने के पर्योग से उनकी बुिद्ध में िवलक्षणता आयेगी। आशर्म के पूज्य
नारायण स्वामी ने भी इस पर्योग से बहुत लाभ उठाया है।
आआआआआआआआआ दूिषत जल में तुलसी की हरी पित्तयाँ (4 िलटर जल में 50-60 पितया)
डालने से जल शुद और पिवत हो जाता है। इसके िलए जल को कपडे से छानते समय तुलसी की पितया कपडे मे
रखकर जल छान लेना चािहए।
आआआआआआ तुलसी की पित्तयों में खाद्य वस्तुओं को िवकृत होने से बचाने का
अदभुत गुण है। सूयर्गर्हण आिद के समय जब खाने का िनषेध रहता है तब खाद्य वस्तुओं
में तुलसी की पित्तयाँ डालकर यह भाग िलया जाता है िक वस्तुएँ िवकृत नहीं हुई हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआआ आआआआ आआआ आआ आआआआआ इसके अनेक रोिगयों को श्यामा तुलसी
के उपचार से अदभुत लाभ हुआ है। उनके दाग कम हो गये हैं और त्वचा सामान्य हो गयी
है।
आआआ-आआआआ तुलसी की पित्तयों को नींबू के रस में पीसकर लगाने से दाद-खाज
िमट जाती है।
आआआआआआआआआआ, आआ आआ आआआआ रोज सुबह खाली पेट पानी के साथ तुलसी की 5-7
पितयो के सेवन से समरणशिकत, बल और तेज बढ़ता है।
आआआआ, आआआआआआआआआ तुलसी के काढ़े में थोड़ी िमशर्ी िमलाकर पीने से
स्फूितर् आती है, थकावट दूर होती है और जठरािग्न पर्दीप्त रहती है।
आआआआआआ, आआआआआ तुलसी की पित्तयों का दही या छाछ के साथ सेवन करने से
वचन कम होता है, शरीर की चरबी घटती है और शरीर सुडौल बनता है। साथ ही थकान िमटती है।
िदनभर स्फूितर् बनी रहती है और रक्तकणों में वृिद्ध होती है।
आआआआआ तुलसी और अदरक का रस शहद के साथ लेने से उलटी में लाभ होता है।
आआआ आआआआआ पेट मे ददर होने पर तुलसी की ताजी पितयो का 10 ग ा म रस िप य े ।
आआआआआआआआ, आआआआआआ तुलसी के रस में नमक िमलाकर कुछ बूँद नाक में
डालने से मूचछा दूर होती है, िहचिकयाँ भी शांत होती हैं।
आआआआआआआआआ तुलसी की सूखी पित्तयों का चूणर् पाउडर की तरह चेहरे पर रगड़ने
से चेहरे की कांित बढ़ती है और चेहरा सुंदर िदखता है।
मुँहासों के िलए भी तुलसी बहुत उपयोगी है।
ताँबे के बतर्न में नींबू के रस को 24 घंटे तक रख दीिजए। िफर उसमें उतनी ही
मातर्ा में श्यामा तुलसी का रस तथा काली कलौंजी का रस िमलाइये। इस िमशर्ण को धूप में
सुखाकर गाढ़ा कीिजये। इस लेप को चेहरे पर लगाइये। धीरे-धीरे चेहरा सवचछ, चमकदार,
सुंदर, तेजस्वी बनेगा व कांित बढ़ेगी।
आआआआआआआआ काली िमचर्, तुलसी और गुड़ का काढ़ा बनाकर उसमें नींबू का रस
िमलाकर, िदन में 2-2 या 3-3 घंटे के अंतर से गमर्-गमर िप य े , िफर कम्बल ओढ़कर सो
जाये।
आआआआआआआआ आआआआ(आआआआआआआआआआआ)- इसके रोगी को तुलसी का 20 ग ा म रस ,
अदरक का 10 ग ा म रस तथा शहद िम ल ाकर द े ।
आआआआआ-आआआआआआ तुलसी की जड़ें कमर में बाँधने से िस्तर्यों को, िवशेषतः
गभर व त ी िसत य ो को लाभ होता ह ै । प स व -वेदना कम होती है और पसूित भी सरलता से हो जाती है।
तुलसी के रस का पान करने से भी पर्सव-वेदना कम होती है और पसूित भी सरलता से हो जाती
है।
आआआआआ आआआआआआ तुलसी की पित्तयों का रस 20 ग ा म , चावल के मॉड के साथ
सेवन करने से तथा दूध-भात या घी-भात का पथय लेने से शेत पदर रोग दूर होता है।
आआआआआआआआ दाँत िनकालने से पहले यिद बच्चों को तुलसी का रस िपलाया जाय तो
उनके दाँत सरलता से िनकलते हैं।
दाँत िनकलते समय बच्चे को दस्त लगे तो तुलसी की पित्तयों का चूणर् अनार के
शरबत के साथ िपलाने से लाभ होता है।
बच्चों की सूखी खाँसी में तुलसी की कोंपलें व अदरक समान मातर्ा में लें।
इन्हें पीसकर शहद के साथ चटायें।
आआआआआआआआआआ तुलसी के मूल के छोटे-छोटे टुकड़े करके पान में सुपारी की
तरह खाने से स्वप्न दोष की िकायत शद ूर होती है।
तुलसी की पित्तयों के साथ थोड़ी इलायची तथा 10 ग ा म सु ध ामू ली (सालम िमशर्ी) का
काढ़ा िनयिमत रूप से लेने से स्वप्नदोष में लाभ होता है। यह एक पौिष्टक दर्व्य के रूप
में भी काम करता है।
1 ग ा म तु ल सी क े बीज िम ट ी क े पात म े रात को पान ी म े िभ ग ोकर सु ब ह स े व न
करने से स्वप्नदोष में लाभ होता है।
आआआआआआआआआ, आआआआआआआआआ तुलसी के बीजों को कूटकर व गुड़ में िमलाकर
मटर के बराबर गोिलयाँ बना लें। पर्ितिदन सुबह-शाम 2-3 गोल ी खाकर ऊपर स े गाय का दू ध
पीने से नपुंसकतव दूर होता है, वीयर मे वृिद होती है, नसों में शिक्त आती है और पाचनशिक्त में सुधार
होता है। हर पर्कार से हताश पुरुष भी सशक्त बन जाता है।
आआआ आआआआआ, आआआआ आआआआ तुलसी का चूणर् व सूखे आँवले का चूणर् रात को पानी
में िभगोकर रख दीिजये। पर्ातः काल उसे छानकर उसी पानी से िसर धोने से बालों का
झडना रक जाता है तथा सफेद बाल भी काले हो सकते है।
आआआआ दमे के रोग में तुलसी का पंचांग (जड, छाल, पती, मंजरी और बीज), आक के
पीले पते, अडूसा के पत्ते, भंग तथा थूहर की डाली 5-5 ग ा म मात ा म े ल े क र उनका बारीक चू णर
बनायें। उसमें थोड़ा नमक डािलये। िफर इस िमशर्ण को िमट्टी के एक बतर्न में भरकर
ऊपर से कपड़-िमट्टी (कपड़े पर गीली िमट्टी लगाकर वह कपड़ा लपेटना) करके बंद कर
दीिजये। केवल जंगली लकड़ी की आग में उसे एक पर्हर (3 घंटे) तक तपाइये। ठंडा
होने पर उसे अच्छी तरह पीसें और छानकर रख दें। दमें की िकायत शह ोने पर पर्ितिदन
5 ग ा म चू णर शहद क े साथ 3 बार लें।
आआआआआआ कैंसर जैसे कष्टपर्द रोग में 10 ग ा म तु ल सी क े रस म े 20-30 ग ा म
ताजा वही अथवा 2-3 चम्मच शहद िमलाकर देने से बहुत लाभ होता है। इस अनुभूत पर्योग
से कई रूग्ण से बीमारी से रोगमुक्त हो गये हैं।
आआआआआआआआआ िकसी भी पर्कार के िवषिवकार में तुलसी का रस पीने से लाभ होता
है।
20 तुलसी पतर् एवं 10 काली िमचर् एक साथ पीसकर आधे से दो घंटे के अंतर से
बार-बार िपलाने से सपर्िवष उतर जाता है। तुलसी का रस लगाने से जहरीले कीड़े,
ततैया, मच्छर का िवष उतर जाता है।
आआ आआआआ आआआ तुलसी के रस व नािरयल के तेल को उबालकर, ठंडा होने पर जले भाग पर
लगायें। इससे जलन शांत होती है तथा फफोले व घाव शीघर् िमट जाते हैं।
आआआआआआआ आआ आआआआआ िवदुत के तार का सपशर हो जाने पर या वषा ऋतु मे िबजली िगरने के कारण
यिद झटका लगा हो दो रोगी के चेहरे और माथे पर तुलसी का रस मलें। इससे रोगी की
मूच्छार् दूर हो जाती है। साथ में 10 ग ा म तु ल सी का रस िप ला न े स े भी बह ु त लाभ होता ह ै ।
आआआआआआआआआआआ शीत ऋतु में तुलसी की 5-7 पितयो मे 3-4 काली िमचर् के दाने तथा
3-4 बादाम िमलाकर, पीस ले। इसका सेवन करने से हृदय को पुिष पापत होती है।
आआआआ आआआआआ आआ आआ आआआआ तुलसी के 25-30 पते लेकर ऐसे खरल मे अथवा िसलबटे पर
पीसे, िजस पर कोई मसाला न पीसा गया हो। इस िपसे हुए तुलसी के गूदे मे 5-10 ग ा म मीठा दही िम ल ाकर
अथवा 5-7 ग ा म शहद िम ल ाकर 30-40 िदन सेवन करने से गिठया का ददर्, सदीर्, जुकाम,
खाँसी (यिद रोग पुराना हो तो भी), गु द े की पथरी , सफेद दाग या कोढ़, शरीर का मोटापा,
वृदावसथा की दुबरलता, पेिचश, अम्लता, मंदािग्न, कब्ज, ग ै स , िदमागी कमजोरी, स्मरण श िक्त का
अभाव, पुराने से पुराना िसरददर, बुखार, रक्तचाप (उच्च या िनम्न), हृदयरोग, श्वास रोग, शरीर की
झुिरर्याँ, कैंसर आिद रोग दूर हो जाते हैं।
इस पर्कार तुलसी बहुत ही महत्त्वपूणर् वनस्पित है। हमें चािहए िक हम लोग तुलसी
का पूणर् लाभ लें। अपने घर के ऐसे स्थान में जहाँ सूयर् का पर्काश िनरंतर उपलब्ध हो,
तुलसी के पौधे अवश् यलगायें। तुलसी के पौधे लगाने अथवा बीजारोपण के िलए
वषाकाल का समय उपयुकत माना गया है। अतः वषाकाल मे अपने घरो मे तुलसी के पौधे लगाकर अपने घर को पदूषण
तथा अनेक पर्कार की बीमािरयों से बचायें तथा पास-पडौस के लोगो को भी इस कायर हेतु पोतसािहत
करें।
आआआआ अपने िनकटवतीर् संत शर्ी आसारामजी आशर्म से पयार्वरण की शुिद्ध हेतु
तुलसी के पौधे के बीज िनःशु ल्कपर्ाप्त िकये जा सकते हैं।
आआआआआआआआ उष्णपर्कृितवाल,ेरक्तसर्ाव व दाहवाले व्यिक्तयों को गर्ीष्म और शरद
ऋतु में तुलसी का सेवन नहीं करना चािहए। तुलसी के सेवन के डेढ़ दो घंटे बाद तक दूध
नहीं लेना चािहए। -अर्
मस्शशश
से के रोिगयों को तुलसी और काली िमचर् का उपयोग एक साथ
नहीं करना चािहए क्योंिक इनकी तासीर गमर् होती है।
सूयोर्दय के पश् चातही तुलसी के क्यारे में जल डालें एवं पत्ते तोड़ें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआ
जो वयिकत मीठे, खट्टे, खारे, तीखे, कड़वे और तूरे, इन छः रसों का मातर्ानुसार योग्य
रीित से सेवन करता है उसका स्वास्थ्य उत्तम रहता है। हम अपने आहार में गुड़,
शक्कर, घी, दूध, दही जैसे मधुर, कफवधर्क पदाथर् एवं खट्टे, खारे पदाथर् तो लेते हैं
िकंतु कड़वे और तूरे पदाथर् िबल्कुल नहीं लेते िजसकी हमें सख्त जरूरत है। इसी कारण
से आजकर अलग-अलग पर्कार के बुखार मलेिरया, टायफाइड, आँत के रोग, मधुमेह, सदीर्,
खाँसी, मेदवृिद्ध, कोलेस्टर्ोल का बढ़ना, रक्तचाप जैसी अनेक बीमािरयाँ बढ़ गयी हैं।
भगवान अित ने चरक संिहता मे िदये अपने उपदेश मे कडवे रस का खूब बखान िकया है जैसे िक
आआआआआआ आआआ आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआ
आआआआआआआआ आआआआआ आआआआआ आआआआआआआआआआआ आआआआ आआआआआआआआआआआआआआ
आआआआआआआआआआआआ।
(आआआ आआआआआआ, आआआआआ आआआआआ, आआआआआआ-26)
अथार्त् कड़वा रस स्वयं अरुिचकर है, िफर भी आहार के पर्ित अरुिच दूर करता है।
कड़वा रस शरीर के िविभन्न जहर, कृिम और बुखार दूर करता है। भोजन के पाचन में सहाय
करता है तथा स्तन्य (दूध) को शुद्ध करता है। स्तनपान करानेवाली माता यिद उिचत रीित से
नीम आिद कड़वी चीजों का उपयोग करे तो बालक स्वस्थ रहता है।
आधुिनक िवज्ञान को यह बात स्वीकार करनी ही पड़ी नीम का रस यकृत की िकर्याओं को
खूब अच्छे से सुधारता है तथा रक्त को शुद्ध करता है। आआआआआ आआ आआआआआ आआ,
आआआआ आआआ आआआआआ आआ आआआआ आआ । आआआ आआआआ आआआ आआआआआआ आआआआआआ आआआ
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआ (आआआ)
दूध में जोरन (थोड़ा दही) डालने से दही के जीवाणु बडी तेजी से बढने लगते है और वह दूध 4-5
घंटों में ही जमकर दही बन जाता है। दही में पानी डालकर मथने पर मक्खन अलग करने
से वह छाछ बनता है। छाछ न ज्यादा पतली होती हो, न ज्यादा गाढ़ी। ऐसी छाछ दही से
जयादा गुणकारी होती है। यह रस मे मधुर, खट्टी-कसैली होती है और गुण में हलकी, गरम तथा ग ा ह ी
होती है।
छाछ अपने गरम गुणों, कसैली, मधुर, और पचने मे हलकी होने के कारण कफनाशक और
वातनाशक होती है। पचने के बाद इसका िवपाक मधुर होने से िपतपकोप नही करती।
आआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआ । आआआआआआआआ आआआ आआआआआआआआआआ
भोजन के उपरानत छाछ पीने पर वैद की कया आवशयकता है?
छाछ भूख बढ़ाती है और पाचन शिक्त ठीक करती है। यह शरीर और हृदय को बल देने
वाली तथा तृिपतकर है। कफरोग, वायुिवकृित एवं अिगनमाद मे इसका सेवन िहतकर है। वातजनय िवकारो मे छाछ मे
पीपर (िपपली चूणर) व सेधा नमक िमलाकर कफ-िवकृित मे अजवायन, सोंठ, काली िमचर्, पीपर व सेधा नमक
िमलाकर तथा िपत्तज िवकारों में जीरा व िमशर्ी िमलाकर छाछ का सेवन करना लाभदायी
है। संगर्हणी व अर्शम ें सोंठ , काली िमचर् और पीपर समभाग लेकर बनाये गये 1 ग ा म
चूणर् को 200 िम.ली. छाछ के साथ लें।
आआआआआआआआ मूच्छार्, भम, दाह, रक्तिपत्त व उरःक्षत (छाती का घाव या पीड़ा) िवकारो
में छाछ का पर्योग नहीं करना चािहए। गिमर्यों में छाछ नहीं पीनी चािहए। यिद पीनी हो
तो अजवायन, जीरा और िमशी डालकर िपये।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआ आआ आआ
गाय का घी गु ण ो म े मधु र , शीतल, िस्नग्ध, गुर (पचने मे भारी) एवं हृदय के िलए सदा
पथय, शर्ेयस्कर एवं िपर्यकर होता है। यह आँखों का तेज, शरीर की कांित एवं बुिद्ध को
बढ़ाने वाला है। यह आहार में रुिच उत्पन्न करने वाला तथा जठरािग्न का पर्दीप्त करने
वाला, वीयर, ओज, आयु, बल एवं यौवन को बढ़ाने वाला है। घी खाने से साित्त्वकता, सौम्यता,
सुन्दरता एवं मेधाशिक्त बढ़ती है।
गाय का घी िसन ग ध , गुर , शीत गुणों से युक्त होने के कारण वात को शांत करता है,
शीतवीयर् होने से िपत्त को नष्ट करता है और अपने समान गुणवाले कफदोष को कफघ्न
औषिधयो के संसकारो दारा नष करता है। गाय का घी दाह को शात, शरीर का कोमल, स्वर को मधुर करता है
तथा वणर् एवं कांित को बढ़ाता है।
शरद ऋतु में स्वस्थ मनुष्य को घी का सेवन अवश्य करना चािहए क्योंिक इस ऋतु में
स्वाभािवक रूप से िपत्त का पर्कोप होता है। 'आआआआआआआआआ आआआआआ' के अनुसार गाय का
घी िपत्त और िपत्तजन्य िवकारों को दूर करने के िलए शर्ेष्ठ माना गया है। संपूणर् भारत
में 16 िसतम्बर से 14 नवम्बर तक शरद ऋतु मानी जा सकती है।
िपतजनय िवकारो के िलए शरद ऋतु मे घी का सेवन सुबह या दोपहर मे करना चािहए। घी पीने के बाद गरम जल
पीना चािहए। गरम जल के कारण घी सारे सतोतो मे फैलकर अपना कायर करने मे समथर होता है।
अनेक रोगों में गाय का घी अन्य औषधदर्व्यों के साथ िमलाकर िदया जाता है। घी
के द्वारा औषध का गुण शरीर में शीघर् ही पर्सािरत होता है एवं औषध के गुणों का िवशेष
रूप से िवकास होता है। अनेक रोगों में औषधदर्व्यों से िसद्ध घी का उपयोग भी िकया
जाता है जैस,े ितर्फला घृत, अश् वगंधाघृत आिद।
गाय का घी अ न य औषधद व य ो स े सं स क ािर त करान े की िव िध इस प क ा र ह ै ।
औषधदवय का सवरस (कूटकर िनकाला हुआ रस) अथवा कल्क (चूणर्) 50 ग ा म ल े । उसम े
200 ग ा म गाय का घी और 800 ग ा म पानी डालकर धीमी आ ँ च पर उबलन े द े । जब सारा पानी
जल जाय और घी कलक से अलग एवं सवचछ िदखने लगे तब घी को उतारकर छान ले और उसे एक बोतल मे भरकर रख
लें।
औषधीय दृिष से घी िजतना पुराना, उतना ही ज्यादा गुणपर्द होता है। पुराना घी पागलपन,
िमगीर् जैसे मानिसक रोगों एवं मोितया िबंद जैसे रोगों में चमत्कािरक पिरणाम देता
है। घी बल को बढ़ाता है एवं शरीर तथा इिन्दर्यों अथार्त् आँख, नाक, कान, जीभ तथा तवचा को
पुनः नवीन करता है।
आयुवेर्द तो कहता है िक जो लोग आँखों का तेज बढ़ाना चाहते हो, सदा िनरोगी
तथा बलवान रहना चाहते हो, लम्बा मनुष्य चाहते हों, ओज, स्मरण श िक्त , धारणाशिक्त,
मेधाशशशशशिक्त, जठरािगन का बल, बुिद्धबल, शरीर की कांित एवं नाक-कान आिद इिन्दर्यों की शिक्त
बनाये रखना चाहते हो उन्हें घी का सेवन अवश् यकरना चािहए। िजस पर्कार सूखी लकड़ी
तुरंत टूट जाती है वैसे ही घी न खाने वालों का शरीर भी जल्दी टूट जाता है।
आआआआआआ गाय का घी हृद ह ै अथ ा त ् हृ द य क े िल ए सवर थ ा िह तकर ह ै । नय े
वैजािनक शोध के अनुसार गाय का घी पोिजिटव कोलेसटोल उतपन करता है जो हृदय एवं शरीर के िलए उपयोगी है।
इसिलए हृदयरोग के मरीज भी घबराये िबना गाय का घी सकते हैं।
आआआआआआआआ अत्यंत शीत काल में या कफपर्धान पर्कृित के मनुष्य द्वारा घी का
सेवन राितर् में िकया गया तो यह अफरा, अरुिच, उदरशू लऔर पांडुरोग को उत्पन्न करता है।
अतः ऐसी िस्थित में िदन में ही घी का सेवन करना चािहए। िजन लोगों के शरीर में कफ
और मेद बढा हो, जो िनतय मंदािगन से पीिडत हो, अन्न में अरुिच हो, सदीर्, उदररोग, आमदोष से पीिड़त
हों, ऐसे वयिकतयो को उन िदनो मे घी का सेवन नही करना चािहए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआ रोज सुबह-शाम नाक में गाय के घी की 2-3 बूँदें डालने से सात िदन
में आधासीसी िमट जाती है।
आआआआआआ आआआआ, आआआआआआ, आआआआआआआ (आआआआआआ)- इन रोगों में पंचगव्य
घी िपलाने से इन रोगों का शमन होता है।
आआआआआ आआआआ आआआ जले हुए पर धोया हुआ घी (घी को पानी में िमला कर खूब मथें। जब
एकरस हो जाय िफर पानी िनकालकर अलग कर दें, ऐसा घी) लगाने से िकसी भी पर्कार की
िवकृित के िबना ही घाव िमट जाता है।
आआआआआ आआआआ शतधौत घृत माने 100 बार धोया हुआ घी। इस घी से मािलश करने से
हाथ पैर की जलन और िसर की गमीर् चमत्कािरक रूप से शांत होती है।
बनाने की िविधः एक काँसे के बड़े बतर्न में लगभग 250 ग ा म घी ल े । उसम े
लगभग 2 लीटर शुद्ध ठंडा पानी डालें और हाथ से इस तरह िहलायें मानों, घी और पानी का
िमशर्ण कर रहे हों।
पानी जब घी से अलग हो जाय तब सावधानीपूवरक पानी को िनकाल दे। इस तरह से सौ बार ताजा पानी लेकर
घी को धो डालें और िफर पानी को िनकाल दें। अब जो घी बचता है वह अत्यिधक शीतलता
पदान करने वाला होता है। हाथ, पैर और िसर पर उसकी मािलश करने से गमी शात होती है। कई वैद घी को 120 बार
भी धोते है।
आआआआआआआआ यह घी एक पर्कार का धीमा जहर है इसिलए भूल कर भी इसका पर्योग
खाने में न करें।
अनुकर्म
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आआआआआ आआ आआआआ
आआआ आआ आआआआ नहाने से पहले हमेशा 5 िमनट तक मस्तक के मध्य तालुवे पर
िकसी शर्ेष्ठ तेल (नािरयल, सरसों, ितल्ली, बर्ाह्मी, आँवला, भृग ं राज) की मािलश करो। इससे
स्मरणशिक्त और बुिद्ध का िवकास होगा। बाल काले, चमकीले और मुलायम होंगे।
आआआआआआ रात को सोने से पहले कान के पीछे की नािड़यों, गदर न क े पी छ े की
नािड़यों और िसर के िपछले भाग पर हल्के हाथों से तेल की मािलश करने से िचंता,
तनाव और मानिसक परेशानी के कारण िसर के िपछले भाग और गदर्न में होने वाला ददर्
तथा भारीपन िमटता है।
आआआआआआआआआआआआ िनत्य पर्ातः सरसों के तेल से पाँव के तलवों और
उँगिलयों की मािलश करने से आँखों की ज्योित बढ़ती है। सबसे पहले पाँव के अँगूठों
को तेल से तर करके उनकी मािलश करनी चािहए। इससे िकसी पर्कार का नेतर्रोग नहीं
होता और आँखों की रोशनी तेज होती है। साथ ही पैर का खुरदरापन, रूखापन तथा पैर की
सूजन शीघर् दूर होती है। पैर में कोमलता तथा बल आता है।
आआआ आआ आआआआ सप्ताह में 1 बार भोजन से पूवर् कान में सरसों के हलके
सुहाते गरम तेल की 2-4 बूँदें डालकर खाना खायें। इससे कानों में कभी तकलीफ नहीं
होगी। कान में तेल डालने से अंदर का मैल बाहर आ जाता है। सप्ताह या 15 िदन में 1
बार ऐसा करने से ऊँचे से सुनना या बहरेपन का भय नहीं रहता एवं दाँत भी मजबूत बनते
हैं। कान में कोई भी दर्व्य (औषिध) भोजन से पूवर डालना चािहए।
आआआआआआ 25 ग ा म सरसो क े त े ल म े लहसु न की 2 किलयाँ छीलकर डाल दें। िफर
गु न गु न ा गर म करक े छा न ल े । स प ताह म े यिद 1 बार कान में यह तेल डाल िलया जाय तो
शर्वणशिक्त तेज बनती है। कान िनरोग बने रहते हैं। इस लहसुन के तेल को थोड़ा गमर्
करके कान में डालने से खुश् कीभी दूर होती है। छोटा-मोटा घाव भी सूख जाता है।
कान और नाक के िछदर्ों में उँगली या ितनका डालने से उनमें घाव होने या
संकर्मण पहुँचने का भय रहता है। अतः ऐसा न करें।
आआआआ-आआआआआआ रात के समय िनत्य सरसों का तेल या गाय के घी को गुनगुना
करके 1-2 बूँदें सूँघते रहने से नजला जुकाम कभी नहीं होता। मिस्तष्क अच्छा रहता है।
आआआ आआ आआआआ पातः कडवे नीम की 2-4 हरी पित्तयाँ चबाकर उसे थूक देने से
दाँत,जीभ व मुँह एकदम साफ और िनरोग रहते है।
आआआआआआ नीम की दातुन उिचत ढंग से करने वाले के दाँत मजबूत रहते हैं।
उनके दाँतों में तो कीड़े ही लगते हैं और न ददर् होता है। मुँह के रोगों से बचाव
होता है। जो 12 साल तक नीम की दातुन करता है उसके मुँह से चंदन की खुश् बुआती है।
मुख में कुछ देर सरसों का तेल रखकर कुल्ला करने से जबड़ा बिलष्ठ होता है।
आवाज ऊँची और गम्भीर हो जाती है। चेहरा पुष्ट होता है और 6 रसों में से हर एक रस
को अनुभव करने की शिक्त बढ़ जाती है। इस िकर्या से कण्ठ नहीं सूखता और न ही होंठ
फटते है। दात भी नही टू टते कयोिक दातो की जडे मजबूत हो जाती है। दातो मे पीडा नही होती।
आआआआआआआआआ आआआ आआआ आ आआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआ जो वयिकत िनतय पातः
खाली पेट तुलसी की 4-5 पितयो को चबाकर पानी पी लेता है, वह अनेक रोगो से सुरिकत रहता है। उसके सामानय
रोग स्वतः ही दूर हो जाते हैं। सदीर् के कारण होने वाली बीमािरयों में िवशेष रूप से
जुकाम, खाँसी, बर्ॉंकइिटस, िनमोिनया, इन्फ्लूएंजा, गल े , श्वासनली और फेफडों के रोगों
में तुलसी का सेवन उपयोगी है।
आआआआआआआआआ श्वास बदलने की िविध से, दािहने स्वर के अिधकतम अभ्यास से
तथा दािहने स्वर में ही पर्ाणायाम के अभ्यास से श्वासरोग िनयंितर्त िकया जा सकता है।
भिसतका पाणायाम करने से दमा, क्षय आिद रोग नहीं होते तथा पुराने से पुराना नजला
जुकाम भी समापत हो जाता है। इस पाणायाम से नाक व छाती के रोग नही होते।
आआआआ आआआ आआआआआआआआ आआ आआआआआआआआआ- दिक्षण की ओर पैर करके सोने
से हृदय तथा मिस्तष्क की बीमािरयाँ पैदा होती हैं। अतः दिक्षण की तरफ पैर करके न
सोयें।
आआआआआआ िनत्य पर्ातः 4-5 िकलोमीटर तक चहलकदमी (Brisk Walk) करने वालों को
िदल की बीमारी नहीं होती।
आआआ आआ आआआआआआ िनत्य भोजन के आधे एक घंटे के बाद लहसुन की 1-2 कली
छीलकर चबाया करें। ऐसा करने से पेट का कैंसर नहीं होता। कैंसर भी हो गया तो
लगातार 1-2 माह तक िनत्य खाना खाने के बाद आवश् यकतानुसारलहसुन की 1-2 कली पीसकर
पानी मे घोलकर पीने से पेट के कैसर मे लाभ होता है।
तनावमुक्त रहो और कैंसर के बचो। नवीन खोजों के अनुसार कैंसर का पर्मुख कारण
मानिसक तनाव है। शरीर के िकस भाग में कैंसर होगा यह मानिसक तनाव के स्वरूप पर
िनभर्र है।
यिद कैंसर से पीिड़त व्यिक्त अनारदाने का सेवन करता रहे तो उसकी आयु 10 वषर
तक बढ़ सकती है। कैंसर के रोगी को रोटी आिद न खाकर मूँग का ही सेवन करना चािहए
खाना खूब चबा-चबाकर खाओ। एक गर्ास को 32 बार चबाना चािहए। भूख से कुछ कम एवं
िनयत समय पर खाना चािहए। इससे अपच, अफरा आिद उदररोगों से व्यिक्त बचा रहता है।
साथ ही पाचनिकर्या भी ठीक रहती है।
आआआआआ आआआआआ, आआआआआआ आआ आआआ आआ आआआआआआ सप्ताह में एक बार
करेले की सब्जी खाने से सब तरह के बुखार, िपत-िवकार, बच्चों के हरे पीले दस्त,
बवासीर, पेट के कीडे एवं मूत रोगो से बचाव होता है।
आआआआआआ आआ आआआआआआआ भोजन करने के बाद मूततयाग करने से गुदे, कमर और िजगर के
रोग नहीं होते। गिठया आिद अनेक बीमािरयों से बचाव होता है।
आआआआआ आआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ चैतर् मास अथार्त् माचर्-अपर्ैल में
जब नीम की नयी नयी कोपले िखलती है तब 21 िदन तक पर्ितिदन दातुन कुल्ला करने के बाद ताजी 15
कोंपलें (बच्चों के िलए 7) चबाकर खाने या गोली बनाकर पानी के साथ िनगलने या
घोंटकर पीने से साल भर फोड़े-फुंिसयाँ नहीं िनकलतीं।
आआआआआआ खाली पेट इसका सेवन करके कम से कम 2 घंटे तक कुछ न खायें।
इससे खून की बहुत सारी खरािबयाँ, खुजली आिद चमर्रोग, िपत और कफ के रोग जड से नष
होते हैं।
इस पर्योग से मधुमेह की बीमारी से बचाव होता है।
इससे मलेिरया और िवषमज्वर की उत्पित्त की सम्भावना भी कम रहती है।
आआआआआआआआ ध्यानरहेिक नीमकी 21 कोंपलों और 7 पितयो से जयादा एवं लगातार बहुत लमबे समय
तक नहीं खायें वरना यौवन-शिक्त कमजोर होती है व वातिवकार बढ़ते हैं। इन िदनों तेल,
िमचर्, खटाई एवं तली हुई चीजों का परहेज करें।
आआआआआ 1 िग ल ास पान ी म े एक नी बू िन चोड क र उसम े 1 चम्मच िमशर्ी िमलाकर
शरबत (िशकंजीशशशश ) बनायें। इसे पर्ातः पीने से हैजे में अत्यंत लाभ होता है। हैजे
के िलए यह अत्युत्तम पर्योग है। यहाँ तक िक पर्ारिम्भक अवस्था में इसके 1-2 बार
सेवन से ही रोग ठीक हो जाता है।
आआआआआआ कपूर को साथ रखने से हैजे का असर नहीं होता।
नींबू का शरबत (िशकंजीशशशश ) पीने से िपत, वमन, तृषा और दाह में फायदा होता है।
जो वयिकत दूध नही पचा सकते उनहे अपनी पाचनशिकत ठीक करने के िलए कुछ िदन नीबू का शरबत
(िशकंजी
शशशश ) पीना चािहए।
भोजन के साथ नीबू के रस का सेवन करने से खतरनाक और संकामक बीमािरयो से बचाव होता है।
आआआआआआआ आआआआ आआआआआआआआ आआआआ 1 चुटकी अथार्त् आधा या एक गर्ाम
दालचीनी का चूणर् 2 चम्मच शहद में िमलाकर िदन में 2 बार चाटने से मोतीिझरा (टाइफाइड)
जैसे संकामक रोग से बचा जा सकता है।
आआआआआ नीम की 7 कोंपलों और 7 काली िमचर् इन दोनों का 1 माह तक लगातार पर्ातः
खाली पेट सेवन िकया जाय तो चेचक जैसा भयंकर रोग 1 साल तक नहीं होगा। 15 िदन
पयोग करने से 6 मास तक चेचक नहीं िनकलती। चेचक के िदनों में जो लोग िकसी भी पर्कार
नीम के पत्तों का सेवन करते हैं, उन्हें चेचक जैसे भयंकर रोग से पीिड़त नहीं
होना पड़ता।
अनुकर्म
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आआआआआ आआ आआआआआआआ
आआआआआ-आआआआआआ
आँखों को स्वच्छ, शीतल और िनरोगी रखने के िलए पर्ातः िबस्तर से उठकर, भोजन के
बाद, िदन में कई बार और सोते समय मुँह में पानी भरकर आँखों पर स्वच्छ, शीतल जल
के छींटे मारें। इससे आँखों की ज्योित बढ़ती है।
ध्यानरहेिक मुँहका पानीगमर्न होनेपाये।गमर्
होनेपरपानीबदललें।
मुँह में से पानी िनकालते समय भी पूरे जोर से मुँह फुलाते हुए वेग से पानी को
छोड़ें। इससे ज्यादा लाभ होता है। आँखों के आस-पास झुिररया नही पडती।
इसके अलावा अगर पढ़ते समय अथवा आँखों का अन्य कोई बारीक कायर् करते
समय आँखों में जरा भी थकान महसूस हो तो इसी िविध से ठंडे पानी से आँखों को धोयें।
आँखों के िलए यह रामबाण औषध है।
आआआआ आआआ आआआआआ आआआआआ-
स्नान करते समय िकसी चौड़े मुँहवाले बतर्न में साफ, ताजा पानी लेकर, उसमें
आँखों को डुबोकर बार-बार खोलें और बंद करें। यह पर्योग अगर िकसी नदी या सरोवर के
शुद्ध जल में डुबकी लगाकर िकया जाय तो अपेक्षाकृत अिधक फायदेमंद होता है। इस िविध
से नेतर्-स्नान करने से कई पर्कार के नेतर्रोग दूर हो जाते हैं।
आआआआआआआआ हम िदन भर आँखों का पर्योग करते हैं लेिकन उनको आराम देने
की ओर कभी ध्यान नहीं देते। आँखों को आराम देने के िलए थोड़े-थोड़े समय के
अंतराल के बाद आँखों को बंद करके, मन को शांत करके, अपनी दोनों हथेिलयों से
आँखों को इस पर्कार ढँक लो िक तिनक भी पर्काश और हथेिलयों का दबाव आपकी पलकों पर
न पड़े। साथ ही आप अंधकार का ऐसा ध्यान करो, मानों आप अँधेरे कमरे में बैठे हुए
हैं। इससे आँखों को िवशर्ाम िमलता है और मन भी शांत होता है। रोगी-िनरोगी, बच्चे,
युवान, वृद – सभी को यह िविध िदन मे कई बार करना चािहए।
आआआआआ आआ आआआआआआ आआआआ 'गित ही जीवन ह ै ' इस िसद्धान्त के अनुसार हर
अंग को स्वस्थ और िकर्याशील बनाये रखने के िलए उसमें हरकत होते रहना अत्यंत
आवश् यकहै। पलके झपकाना आँखों की सामान्य गित है। बच्चों की आँखों में सहज रूप
से ही िनरंतर यह गित होती रहती है। पलकें झपकाकर देखने से आँखों की िकर्या और
सफाई सहज में ही हो जाती है। आँखे फाड़-फाड़कर देखने की आदत आँखों का गलत
पयोग है। इससे आँखो मे थकान और जडता आ जाती है। इसका दुषपिरणाम यह होता है िक हमे अचछी तरह देखने के
िलए नकली आँखें अथार्त् चश् मालगाने की नौबत आ जाती है। चश् मेसे बचने के िलए
हमें बार-बार पलकों को झपकाने की आदत को अपनाना चािहए। पलकें झपकाते रहना
आँखों की रक्षा का पर्ाकृितक उपाय है।
आआआआआ आआ आआआआआआ आआ आआआआआ
पातः सूयोदय के समय पूवर िदशा की ओर मुख करके सूयोदय के कुछ समय बाद की सफेद िकरणे बंद पलको पर
लेनी चािहए। पर्ितिदन पर्ातः और अगर समय िमले तो शाम को भी सूयर् के सामने आँखें
बंद करके आराम से इस तरह बैठो िक सूयर् की िकरणें बंद पलकों पर सीधी पड़ें। बैठे-
बैठे, धीरे-धीरे गदरन को कमशः दायी तथा बायी ओर कंधो की सीध मे और आगे पीछे तथा दायी ओर से बायी ओर व
बायीं ओर से दायीं ओर चकर्ाकार गोलाई में घुमाओ। दस िमनट तक ऐसा करके आँखों को
बंद कर दोनों हथेिलयों से ढँक दो िजससे ऐसा पर्तीत हो, मानों अंधेरा छा गया है। अंत
में, धीरे-धीरे आँखो को खोलकर उन पर ठंडे पानी के छीटे मारो। यह पयोग आँखो के िलए अतयंत लाभदायक है और
चश् माछुड़ाने का सामथ्यर् रखता है।
आआआआआ आआ आआआआआआआ आआआआआआ-
हर रोज पर्ातः सायं एक-एक िमनट तक पलकों को तेजी से खोलने तथा बंद करने
का अभ्यास करो।
आँखों को जोर से बंद करो और दस सेकेंड बाद तुरंत खोल दो। यह िविध चार-पाच बार
करो।
आँखों को खोलने बंद करने की कसरत जोर देकर कर्मशः करो अथार्त् जब एक आँख
खुली हो, उस समय दूसरी आँख बंद रखो। आधा िमनट तक ऐसा करना उपयुक्त है।
नेतर्ों की पलकों पर हाथ की उँगिलयों को नाक से कान की िदशा में ले जाते हुए
हलकी-हलकी मािलश करो। पलकों से उँगिलयाँ हटाते ही पलकें खोल दो और िफर पलकों
पर उँगिलयो लाते समय पलको को बंद कर दो। यह पिकया आँखो की नस-नािड़यों का तनाव दूर करने में
सक्षम है।
आआआ आआआ आआ आआआआ आआ आआआआआ
िवदािथरयो को इस बात पर िवशेष धयान देना चािहए िक वे आँखो को चौिधया देने वाले अतयिधक तीवर पकाश मे न
देखें। सूयर्गर्हण और चन्दर्गर्हण के समय सूयर् और चन्दर्मा को न देखें। कम पर्काश
में अथवा लेटे-लेटे पढ़ना भी आँखों के िलए बहुत हािनकारक है। आजकल के
िवदाथी आमतौर पर इसी पदित को अपनाते है। बहत ु कम रोशनी मे अथवा अतयिधक रोशनी मे पढने -िलखने अथवा
नेतर्ों के अन्य कायर् करने से नेतर्ों पर जोर पड़ता है। इससे आँखें कमजोर हो
जाती है और कम आयु मे ही चशमा लग जाता है। पढते समय आँखो और िकताब के बीच 12 इंच अथवा थोड़ी
अिधक दूर रखनी चािहए।
आआआआ आआआआ-आआआआआआ
आपकी आँखों का स्वास्थ्य आपके आहार पर भी िनभर्र करता है। कब्ज नेतर्रोगों
के अलावा शरीर के कई पर्कार के रोगों की जड़ है। इसिलए पेट हमेशा साफ रखो और
कब्ज न होने दो। इससे भी आप अपनी आँखों की रक्षा कर सकते हैं। इसके िलए हमेशा
साित्त्वक और सुपाच्य भोजन लेना चािहए। अिधक नमक, िमचर्, मसाले, खटाई और तले हुए
पदाथों से जहा तक हो सके बचने का पयत करना चािहए। आँखो को िनरोगी रखने के िलए सलाद, हरी सिब्जयाँ
अिधक मातर्ा में खानी चािहए।
आआआ आआ आआआ आआआआआआआ योगासन भी नेतर्रोगों को दूर करने में सहायक
िसद्ध होते हैं। सवार्ंगासन नेतर्-िवकारो को दूर करने का और नेत-जयोित बढाने का सवोतम आसन है।
आआआआआ-आआआआआ आआ आआआआआ
ग म ी और धू प म े स े आन े क े बाद गमर शरीर पर एकदम स े ठं ड ा पान ी न डालो।
पहले पसीना सुखाकर शरीर को ठंडा कर लो। िसर पर गमर पानी न डालो और न जयादा गमर पानी से चेहरा धोया करो।
बहुत दूर के और बहुत चमकीले पदाथोर्ं को घूरकर न देखा करो।
नींद का समय हो जाय और आँखें भारी होने लगें, तब जागना उिचत नहीं।
सूयोर्दय के बाद सोये रहने, िदन में सोने और रात में देर तक जागने से
आँखों पर तनाव पड़ता है और धीरे-धीरे आँखे बेनूर, रूखी और तीखी होने लगती हैं।
धूल, धुआँऔरतेजरोशनीसेआँखोंको बचानाचािहए।
अिधक खट्टे, नमकीन और लाल िमचर्वाले पदाथोर्ं का अिधक सेवन नहीं करना
चािहए। मल-मूतर् और अधोवायु के वेग को रोकने, जयादा देर तक रोने और तेज रफतार की सवारी करने
से आँखों पर सीधी हवा लगने के कारण आँखें कमजोर होती हैं। इन सभी कारणों से
बचना चािहए।
मिस्तष्क को चोट से बचाओ। शोक-संताप व िचंता से बचो। ऋतुचयार् के िवपरीत
आचरण न करो और आँखों के पर्ित लापरवाह न रहो। आँखों से देर तक काम लेने पर
िसर में भारीपन का अनुभव हो या ददर् होने लगे तो तुरंत अपनी आँखों की जाँच कराओ।
घर पर तैयार िकया गया काजल सोते समय आँखों में लगाना चािहए। सुबह उठकर
गील े कपड े स े काजल पो छ क र साफ कर दो।
आआआआआआआआआआआआआआआआ आआआआआ आआआआआआआ
आँखों की ज्योित बढ़ाने के साथ ही शरीर को पुष्ट और सुडौल बनाने वाला एक
अनुभूत उत्तम पर्योग पर्स्तुत हैः आधा चम्मच ताजा मक्खन, आधा चम्मच िपसी हुई िमशर्ी
और 5 काली िमचर् िमलाकर चाट लो। इसके बाद कच्चे नािरयल की िगरी के 2-3 टुकडे खूब चबा-
चबाकर खायें ऊपर से थोड़ी सौंफ चबाकर खा लो। बाद में दो घंटे तक कुछ न खायें। यह
पयोग पातः खाली पेट 2-3 माह तक करो।
पातःकाल सूयोदय से पहले उठकर िनतयकमों से िनवृत होकर भमण के िलए िनयिमत रप से जाना आँखो के
िलए बहुत िहतकारी होता है। जब सूयोर्दय हो रहा हो तब कहीं हरी घास हो तो उस पर 15-20
िमनट तक नंगे पैर टहलना चािहए। घास पर रातभर िगरने वाली ओस की नमी रहती है।
नंगे पैर इस पर टहलने से आँखों को तरावट िमलती है और शरीर की अितिरक्त रूप से
बढ़ी हुई उष्णता में कमी आती है। यह उपाय आँखों की ज्योित की रक्षा करने के
अितिरक्त शरीर को भी लाभ पहुँचाता है।
1 िग ल ास ताज े और साफ पान ी म े नी बू का 5-6 बूँद रस टपका दो और इस पानी को साफ
कपड़े से छान लो। दवाई (केिमस्ट) की दुकान से आँख धोने का पातर् (आई वाश िंगग्लास)
ले आओ। इससे िदन में 1 बार आँखों को धोना चािहए। धोने के बाद ठंडे पानी की पट्टी
आँखों पर रखकर 5-10 िमनट लेटना चािहए। पानी अत्यिधक शीतल भी न हो। इस पर्योग से
नेतर्ज्योित बढ़ती है।
अगर आप आँखों को स्वस्थ रखने की इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दो और िनयिमत
रूप से सावधानी पूवर्क इन पर्योगों को करते रहो तो आप लम्बे समय तक अपनी आँखों को
िविभन रोगो से बचाकर उनहे सवसथ, सुन्दर और आकषर्क बनाये रख सकते हैं।
पितिदन पातःकाल जलनेित करो।
नीम पर की हरी गुडुच (िग ल ो य ) लाकर उसे पत्थर से बारीक पीसकर, कपड़े से
छानकर एक तोला रस िनकालें। अगर हरी गुडुच (िग ल ो य ) न िमले तो सूखी िगलोय का चूणर् 12
घंटे तक िभगोकर रखें। उसके बाद कपड़े से छानकर उसका एक तोला रस िनकालें। इस
रस में 6 मुंजाभार शुद्ध शहद एवं उतनी ही मातर्ा में अच्छे स्तर का सेंधा नमक डालकर
खूब घोंटें। अच्छी तरह से एकरस हो जाने पर इसे आँखों में डालें।
आआआआआ आआ आआआआआ राितर् को सोते समय िबना तिकये के सीधे लेट जायें।
िफर आँखों की ऊपरी पलक को पूरी तरह उलट करके ऊपरी सफेद गोलक पर रस की एक बूँद
डाले एवं दूसरी बूँद नाक की ओर के आँख के कोने मे डाले और आँखे बनद कर ले। पाच िमनट तक आँखो को बंद रखते
हुए आँखों के गोलक को धीरे-धीरे गोल-गोल घु म ाय े तािक रस आ ँ ख ो क े चारो तरफ भीतर ी
भाग मे पवेश कर जाय। सुबह गुनगुने पानी से आँखे धोये। ऐसा करने से दोनो आँखो से बहुत-सा मैल बाहर
आयेगा, उससे न घबरायें। यही वह मैल है िजसके भरने से दृिष्ट कमजोर हो जाती है।
पितिदन डालने से धीरे-धीरे वह एकितत हुआ कफ बाहर िनकलता जायेगा और आँखो का तेज बढता जायेगा। िनरंतर चार
महीने तक डालनेपर आश् चयर्जनकलाभ होगा।
आँख के मरीजों को सदैव सुबह-शाम 4 तोला पथ्यािद क्वाथ जरूर पीना चािहए।
आआआआआआआ आआआआआआ हरड़, बहेड़ा, आँवला, िचरायता, हल्दी और नीम की िगलोय
को समान मातर्ा में लेकर राितर् को कलईवाले बतर्न में िभगोकर सुबह उसका काढ़ा
बनायें। उस काढ़े में एक तोला पुराना गुड़ डालकर थोड़ा गरम-गरम िप य े ।
अनुकर्म
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आआआ-आआआआआआआ
80 से 90 पितशत बालक िवशेषकर दात के रोगो से, उसमें भी दंतकृिम के पीिड़त होते हैं।
बालकों के अलावा और लोगों में भी दाँत के रोग वतर्मान में िवशेष रूप से देखने को
िमलते हैं।
खूब ठंडा पानी अथवा ठंडे पदाथर् खाकर गरम पानी अथवा गरम पदाथर् खाया जाय तो
दाँत जल्दी िगरते हैं।
अकेला ठंडा पानी और ठंडे पदाथर् तथा अकेले गरम पदाथर् तथा गरम पानी के
सेवन से भी दाँत के रोग होते हैं। इससे ऐसे सेवन से बचना चािहए।
भोजन करने के बाद दात साफ करके कुलले करने चािहए। अन के कण दात मे फँस तो नही गये इसका धयान
रखना चािहए।
महीने में एकाध बार राितर् को सोने से पूवर् नमक एवं सरसों का तेल िमलाकर,
उससे दाँत िघसकर, कुल्ले करके सो जाना चािहए ऐसा करने से वृद्धावस्था में भी दाँत
मजबूत रहेंगे।
सप्ताह में एक बार ितल का तेल दाँतों पर िघसकर ितल के तेल के कुल्ले करने
से भी दाँत वृद्धावस्था तक मजबूत रहेंगे।
आईसकर्ीम, िबस्कुट, चॉकलेट, ठंडा पानी, िफर्ज के बासी पदाथर्, चाय, कॉफी आिद के
सेवन से बचने से भी दाँतों की सुरक्षा होती है। सुपारी जैसे अत्यंत कठोर पदाथोर्ं से
खास बचना चािहए।
अनुकर्म
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आआआआआआ आआ आआआ आआआ आआआआआआआआ
हम गुदेर् या वृक्क (Kidney) के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। िजस पर्कार
नगरपािलका शहर को स्वच्छ रखती है वैसे ही गुदेर् शरीर को स्वच्छ रखते हैं। रक्त में
से मूतर् बनाने का महत्त्वपूणर् कायर् गुदेर् करते हैं। शरीर में रक्त में उपिस्थत
िवजातीय व अनावशयक बचचो एवं कचरे को मूतमागर दारा शरीर से बाहर िनकालने का कायर गुदों का ही है।
गु द ा वा स त व म े रक त का शुिद क र ण करन े वाली एक प क ा र की 11 सैं.मी. लम्बी
काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर िस्थत होती
हैं। पर्ाकृितक रूप से स्वस्थ गुदेर् में रोज 60 लीटर िजतना पानी छानने की क्षमता होती
है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर िजतना मूतर् बनाकर शरीर को िनरोग
रखती है। िकसी कारणवशात् यिद एक गुदार् कायर् करना बंद कर दे अथवा दुघर्टना में खो
देना पड़े तो उस व्यिक्त का दूसरा गुदार् पूरा कायर् सँभालता है एवं शरीर को िवषाक्त होने
से बचाकर स्वस्थ रखता है। जैसे नगरपािलका की लापरवाही अथवा आलस्य से शहर में
गं द ग ी फ ै ल जाती ह ै एवं धीर े -धीरे महामािरया फैलने लगती है, वैसे ही गुदों के खराब होने पर शरीर असवसथ
हो जाता है।
अपने शरीर में गुदेर् चतुर यंतर्िवदों (Technicians) की भाँित कायर् करते हैं।
गु द ा शरीर का अिन व ायर एवं िक य ा श ी ल भाग ह ै , जो अपने तन एवं मन के सवासथय पर िनयंतण रखता है।
उसके िबगड़ने का असर रक्त, हृदय, त्वचा एवं यकृत पर पड़ता है। वह रक्त में िस्थत
शकर्रा (Sugar), रक्तकण एवं उपयोगी आहार-दर्व्यों को छोड़कर केवल अनावश् यकपानी
एवं दर्व्यों को मूतर् के रूप में बाहर फेंकता है। यिद रक्त में शकर्रा का पर्माण बढ़
गया हो तो गु द ा मात बढ ी हु ई शकर र ा क े त त त व को छानकर मू त म े भ े ज द े त ा ह ै ।
गु द ों का िव श े ष स म ब न ध हृ द य , फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (ितल्ली) के साथ होता
है। ज्यादातर हृदय एवं गुदेर् परस्पर सहयोग के साथ कायर् करते हैं। इसिलए जब िकसी
को हृदयरोग होता है तो उसके गुदेर् भी िबगड़ते हैं और जब गुदेर् िबगड़ते हैं तब उस
वयिकत का रकतचाप उचच हो जाता है और धीरे-धीरे दुबरल भी हो जाता है।
आयुवेर्द के िनष्णात वैद्य कहते हैं िक गुदेर् के रोिगयों की संख्या िदन
पितिदन बढती ही जा रही है। इसका मुखय कारण आजकल के समाज मे हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग,
मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में िकया जा रहा अंगर्ेजी दवाओं का दीघर्काल तक
अथवा आजीवन सेवन है।
इन अंगर्ेजी दवाओं के जहरी पर्भाव के कारण ही गुदेर् एवं मूतर् सम्बन्धी रोग
उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी िकसी आधुिनक दवा के अल्पकालीन सेवन की िवनाशकारी
पितिकया (Reaction) के रूप में भी िकडनी फेल्युअर (Kidney Failure) जैसे गमभीर रोग होते हुए िदखाई
देते हैं। अतः मरीजों को हमारी सलाह है िक उनकी िकसी भी बीमारी में, जहा तक हो सके, वे
िनदोर्ष वनस्पितयों से िनिमर्त एवं िवपरीत तथा परवतीर् असर (Side Effect and After Effect)
से रिहत आयुवेर्िदक दवाओं के सेवन का ही आगर्ह रखें। एलोपैथी के डॉक्टर स्वयं भी
अपने अथवा अपने सम्बिन्धयों के इलाज के िलए आयुवेर्िदक दवाओं का ही आगर्ह
रखते हैं।
आधुिनक िवज्ञान कहता है िक गुदेर् अिस्थ मज्जा () बनाने का कायर् भी करते हैं।
इससे भी यह िसद्ध होता है िक आज रक्त कैंसर की व्यापकता का कारण भी आधुिनक दवाओं
का िवपरीत एवं परवतीर् पर्भाव ही हैं।
आआआआआ आआआआआआ आआ आआआआआ
आधुिनक समय में मटर, सेम आिद िद्वदलो जैसे पर्ोटीनयुक्त आहार का अिधक
सेवन, मैदा, शक्कर एवं बेकरी की चीजों का अिधक पर्योग चाय कॉफी जैसे उत्तेजक
पेय, शराब एवं ठंडे पेय, जहरीली आधुिनक दवाइया जैसे – बुफेन, मेगाडाल, आइबुजेसीक, वोवीरॉन
जैसी एनालजेिसक दवाएँ , एन्टीबायोिटक्स, सल्फा डर्ग्स, एस्पर्ीन, फेनासेटीन, केफीन, ए.पी.सी.,
एनासीन आिद का ज्यादा उपयोग, अशु द्धआहार अथवा मादक पदाथोर्ं का ज्यादा सेवन, सूजाक
(गोन ोिर य ा ), उपदंश (िसफिलस) जैसे लैिगक रोग, त्वचा की अस्वच्छता या उसके रोग, जीवनशिकत एवं
रोगपर्ितकारक शिक्त का अभाव, आँतों में संिचत मल, शारीिरक पिरशर्म को अभाव,
अत्यिधक शारीिरक या मानिसक शर्म, अशु द्धदवा एवं अयोग्य जीवन, उच्च रक्तचाप तथा
हृदयरोगों में लम्बे समय तक िकया जाने वाला दवाओँ का सेवन, आयुवेर्िदक परंतु
अशु द्धपारे से बनी दवाओं का सेवन, आधुिनक मूतर्ल (Diuretic) औषिधयो का सेवन, तम्बाकू या
डगस के सेवन की आदत, दही, ितल, नया गुड़, िमठाई, वनसपित घी, शर्ीखंड, मांसाहार, फर्ूट जूस,
इमली, टोमेटो केचअप, अचार, केरी, खटाई आिद सब गुदार्-िवकृित के कारण है।
आआआआआआआ आआआआआआ
गु द े खराब होन े पर िन म ा िक त लक ण िदखाई द े त े ह ै -
आआआआआआ आआआआआआआ आआ आआआआआआआ
आँख के नीचे की पलकें फूली हुई, पानी से भरी एवं भारी िदखती है। जीवन मे चेतनता, स्फूितर्
तथा उत्साह कम हो जाता है। सुबह िबस्तर से उठते वक्त स्फूितर् के बदले उबान, आलस्य
एवं बेचैनी रहती है। थोड़े शर्म से ही थकान लगने लगती है। श्वास लेने में कभी-
कभी तकलीफ होने लगती है। कमजोरी महसूस होती है। भूख कम होती जाती है। िसर दुखने
लगता है अथवा चक्कर आने लगते हैं। कइयों का वजन घट जाता है। कइयों को पैरों
अथवा शरीर के दूसरे भागों पर सूजन आ जाती है, कभी जलोदर हो जाता है तो कभी उलटी-
उबकाई जैसा लगता है। रक्तचाप उच्च हो जाता है। पेशाब में एल्ब्यिमन पाया जाता है।
आआआआआआआआ आआ आआआआआआआ
सामान्य रूप से शरीर के िकसी अंग में अचानक सूजन होना, सवार्ंग वेदना, बुखार,
िसरददर्, वमन, रक्ताल्पता, पाणडुता, मंदािग्न, पसीने का अभाव, त्वचा का रूखापन, नाड़ी का तीवर्
गित स े चलना , रक्त का उच्च दबाव, पेट मे िकडनी के सथान का दबाने पर पीडा होना, पायः बूँद-बूँद करके
अल्प मातर्ा में जलन व पीड़ा के साथ गमर् पेशाब आना, हाथ पैर ठंडे रहना, अिनदर्ा,
यकृत-पलीहा के ददर, कणर्नाद, आँखों में िवकृित आना, कभी मूच्छार् और कभी उलटी होना,
अम्लिपत्त, ध्वजभंग(नपुंसकता), िसर तथा गदर्न में पीड़ा, भूख नष होना, खूब प्यास लगना,
किब्जयत होना – जैसे लक्षण होते हैं। ये सभी लक्षण सभी मरीजों में िवद्यमान हों
यह जरूरी नहीं।
आआआआआआ आआआ आआ आआआआ आआआआ आआआआ आआआआआआआ
गु द े की िव कृित का ददर ज य ा द ा समय तक रह े तो उसक े कारण मरीज को श ा स (दमा),
हृदयकंप, न्यूमोिनया, पलुरसी, जलोदर, खाँसी, हृदयरोग, यकृत एवं प्लीहा के रोग, मूच्छार् एवं
अंत में मृत्यु तक हो सकती है। ऐसे मरीजों में ये उपदर्व िवशेषकर राितर् के समय बढ़
जाते है।
आज की एलोपैथी में गुदोर् रोग का सरल व सुलभ उपचार उपलब्ध नहीं है, जबिक
आयुवेर्द के पास इसका सचोट, सरल व सुलभ इलाज है।
आआआआआ पारंभ मे रोगी को 3-4 िदन का उपवास करायें अथवा मूँग या जौ के पानी पर
रखकर लघु आहार करायें। आहार में नमक िबल्कुल न दें या कम दें। नींबू के शबर्त में
शहद या ग्लूकोज डालकर 15 िदन तक िदया जा सकता है। चावल की पतली घेंस या राब दी जा
सकती है। िफर जैसे-जैसे यूिरया की माता कमशः घटती जाय वैस-े वैस,े रोटी, सब्जी, दिलया आिद िदया
जा सकता है। मरीज को मूँग का पानी, सहजने का सूप, धमासायागोक्षुरका पानीचाहेिजतनादेसकतेहैं।िकंतु
जब फेफडो मे पानी का संचय होने लगे तो उसे जयादा पानी न दे, पानी की माता घटा दे।
आआआआआआ गु द े क े मरीज को आरा म जरर कराय े । सू ज न ज य ाद ा हो अथवा यू र े िम य ा
या मूतर्िवष के लक्षण िदखें तो मरीज को पूणर् शय्या आराम (Complete Bed Rest) करायें।
मरीज को थोड़े परम एवं सूखे वातावरण में रखें। हो सके तो पंखे की हवा न िखलायें।
तीवर् ददर् में गरम कपड़े पहनायें। गमर् पानी से ही स्नान करायें। थोड़ा गुनगुना पानी
िपलाये।
आआआ-आआआआआआ गु द े क े रोग ी क े िल ए कफ एवं वायु का नाश करन े वाल ी िच िक त स ा
लाभपर्द है। जैसे िक स्वेदन, वाषपसनान (Steam Bath), गमर पान ी स े किट स ना न (Tub Bath)।
रोगी को आधुिनक तीवर् मूतर्ल औषिध न दें क्योंिक लम्बे समय के बाद उससे
गु द े खराब होत े ह ै । उसकी अप े क ा यिद प े श ा ब म े शक र हो या प े श ा ब कम होता हो तो
नींबू का रस, सोडा बायकाबर्, श्वेत पपर्टी, चन्दर्पर्भा, िशलाजीत आ िद िनदोर्ष औषिधयों या
उपयोग करना चािहए। गंभीर िसथित मे रकत मोकण (िशराम ोक्षण ) खूब लाभदायी है िकंतु यह िचिकत्सा
मरीज को अस्पताल में रखकर ही दी जानी चािहए।
सरलता से सवर्तर् उपलब्ध पुननर्वा नामक वनस्पित का रस, काली िमचर् अथवा
ितर्कटु चूणर् डालकर पीना चािहए। कुलथी का काढ़ा या सूप िपयें। रोज 100 से 200 ग ा म की
मातर्ा में गोमूतर् िपयें। पुननर्वािद मंडूर, दशमूल, क्वाथ, पुननरवािरष, दशमूलािरष्ट,
गोक ु र ा िद क वाथ , गोक ु र ा िद गू गल , जीिवत पदावटी आिद का उपयोग दोषो एवं मरीज की िसथित को देखकर
बनना चािहए।
रोज 1-2 िग ल ास िज तन ा लौहचुं ब क ी य जल (Magnetic Water) पीने से भी गुदे के रोग मे लाभ होता
है।
आआआआआआआआआआ आआ आआआआ
जामुन की गुठली को पीसकर चूणर बना लो। इस चूणर की एक चममच माता पानी के साथ देने से लाभ होता है।
रात को सोते समय पर्ितिदन छुहारे िखलाओ।
200 ग ा म गु ड म े 100 ग ा म काल े ित ल एवं 50 ग ा म अजवाय न िम ल ाकर 10-10 ग ा म
की मातर्ा में िदन में दो बार चबाकर खाने से लाभ होता है।
राितर् को सोते समय दो अखरोट की िगरी एवं 20 िकशशश िमश 15-20 िदन तक िनरन्तर
देने से लाभ होता है।
सोने से पूवर् शहद का सेवन करने से लाभ होता है। रात को भोजन के बाद दो
चम्मच शहद आधे कप पानी में िमलाकर िपलाना चािहए। यिद बच्चे की आयु छः वषर् हो तो
शहद एक चम्मच देना चािहए। इस पर्योग से मूतर्ाशय की मूतर् रोकने की शिक्त बढ़ती है।
पेट मे कृिम होने पर भी बालक शयया पर मूत कर सकता है। इसिलए पेट के कृिम का इलाज कराये।
अनुकर्म
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आआआआ आआआआआआआआ
यकृत िचिकत्सा के िलए अन्य सभी िचिकत्सा-पदितयो की अपेका आयुवेद शेष पदित है। आयुवेद
में इसके सचोट इलाज हैं। यकृत सम्बन्धी िकसी भी रोग की िचिकत्सा िनष्णात वैद्य की
देख-रेख में ही करवानी चािहए।
कई रोगों में यकृत की कायर्क्षमता कम हो जाती है, िजसे बढाने के िलए आयुवेिदक औषिधया
अत्यंत उपयोगी हैं। अतः यकृत को पर्भािवत करने वाले िकसी भी रोग की यथा योग्य
िचिकत्सा के साथ-साथ िनम्न आयुवेर्िदक औषिधयों का सेवन िहतकारी है।
सुबह खाली पेट एक चुटकी (लगभग 0.25 ग ा म ) साबुत चावल पानी के साथ िनगल
जाये।
हल्दी, धिनयाएवंज्वारेका रस20 से 50 िम.ली. की मातर्ा में सुबह-शाम पी सकते हैं।
2 ग ा म रोिह तक का चू णर एवं 2 ग ा म बड ी हरड का चू णर सु ब ह खाली प े ट गोमू त क े
साथ लेना चािहए।
पुननरवामंडूर की 2-2 गोिल य ा (करीब 0.5 ग ा म ) सुबह-शाम गोमूतर् के साथ लेनी चािहए।
संशमनी वटी की दो-दो गोिलयाँ सुबह-दोपहर-शाम पानी के साथ लेनी चािहए।
आरोग्यविधर्नी वटी की 1-1 गोल ी सु ब ह -शाम पानी के साथ लेना चािहए। ये दवाइयाँ
साँई शर्ी लीलाशाहजी उपचार केन्दर् (सूरत आशर्म) में भी िमल सकेंगी।
हरीत की 3 गोिल य ा राित म े गोमू त क े साथ ल े ।
आआआआआआ वजासन, पादपिशमोतानासन, पदासन, भुजगं ासन जैसे आसन तथा पाणायाम भी लाभपद है।
आआआआआआ यकृत के रोगी भारी पदाथर् एवं दही, उडद की दाल, आलू, िभंडी, मूली, केला,
नािरयल, बफर् और उससे िनिमर्त पदाथर्, तली हुई चीजें, मूँगफली, िमठाई, अचार, खटाई
इत्यािद न खायें।
आआआआआ साठी के चावल, मूँग, परमल (मुरमुरे), जौ, ग े हू ँ , अंगूर, अनार, परवल, लौकी,
तुरई, गाय का दूध , गोमू त , धिनया, गन ा आिद जठरािगन को ध य ा न म े रखकर नपा तु ल ा ही खाना
चािहए।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआ आआआआआआआआ
आज िवश् वमें सबसे घातक कोई रोग तेजी से बढ़ता नज़र आ रहा है तो वह है
हृदयरोग। िवश् वस्वास्थ्य संगठन के अनुसार वषर् 2020 तक भारत में पूरे िवश् वकी तुलना
में सवार्िधक हृदय के रोगी होंगे। हमारे देश में पर्त्येक वषर् लगभग एक करोड़
लोगों को िदल का दौरा पड़ता है।
मनुष्य का हृदय एक िमनट में तकरीबन 70 बार धडकता है। चौबीस घंटों में 1,00,800
बार। इस तरह हमारा हृदय एक िदन में तकरीबन 2000 ग ै ल न रक त का पिमपं ग करता ह ै ।
स्थूल दृिष्ट से देखा जाय तो यह मांसपेश ियोंका बना एक पम्प है। ये
मांसपेश ियाँसंकुिचत होकर रक्त को पिम्पंग करके शरीर के सभी भागों तक पहुँचती है।
हृदय की धमिनयों में चबीर् जमा होने से रक्तपर्वाह में अवरोध उत्पन्न होता है िजससे
हृदय को रक्त कम पहुँचता है। हृदय को कायर् करने के िलए आक्सीजन की माँग व पूितर् के
बीच असंतुलन होने से हृदय की पीड़ा होना शुरु हो जाता है। इस पर्कार के हृदय रोग का दौरा
पडना ही अचानक मृतयु का मुखय कारण है।
आआआआआआआ आआ आआआआआ
युवावस्था में हृदयरोग होने का मुख्य कारण अजीणर् व धूमर्पान है। धूमर्पान न
करने से हृदयरोग की सम्भावना बहुत कम हो जाती है। िफर भी उच्च रक्तचाप, जयादा चरबी,
कोलेस्टर्ोल अिधक होना, अित िचंता करना और मधुमेह भी इसके कारण हैं।
मोटापा, मधुमेह, गु द ों की अकायर क म त ा , रक्तचाप, मानिसक तनाव, अित पिरशर्म,
मल-मूतर् की हाजत को रोकने तथा आहार-िवहार मे पाकृितक िनयमो की अवहेलना से ही रकत मे वसा का
पमाण बढ जाता है। अतः धमिनयो मे कोलसटोल के थके जम जाते है, िजससे रकत पवाह का मागर तंग हो जाता है।
धमिनयाँकड़ीऔरसंकीणर् होजातीहैं।
आआआआ आआआ आआ आआआआआआ
छाती में बायीं ओर या छाती के मध्य में तीवर् पीड़ा होना या दबाव सा लगना, िजसमे
कभी पसीना भी आ सकता है और श्वास तेजी से चल सकता है।
कभी ऐसा लगे िक छाती को िकसी ने चारों ओर से बाँध िदया हो अथवा छाती पर
पतथर रखा हो।
कभी छाती के बायें या मध्य भाग में ददर् न होकर शरीर के अन्य भागों में ददर्
होता है, जैसे की कंधे मे, बायें हाथ में, बायीं ओर गरदन में, नीचे के जबड़े में, कोहनी
में या कान के नीचे वाले िहस्से में।
कभी पेट में जलन, भारीपन लगना, उलटी होना, कमजोरी सी लगना, ये तमाम लक्षण
हृदयरोिगयों में देखे जाते हैं।
कभी कभार इस पर्कार का ददर् काम करते समय, चलते समय या भोजनोपरांत भी शुरु
हो जाता है, पर शयन करते ही सवसथता आ जाती है। िकंतु हृदयरोग के आकमण पर आराम करने से भी लाभ नही
होता।
मधुमेह के रोिगयों को िबना ददर् हुए भी हृदयरोग का आकर्मण हो सकता है।
हृदयरोग या हृदयरोग के आकर्मण के समय उपरोक्त लक्षणों से सावधान होकर,
ईश् वरिचंतनया जप का अभ्यास शुरु करना चािहए।
आआआआआआआ आआ आआआआआ
नीचे दी गयी पद्धित के द्वारा हृदय की धमिनयों के बीच के अवरोधों को दूर िकया
जा सकता है।
अमेिरकन डॉ. ओरिनस के अनुसार हररोज ध्यान में एक घंटा बैठना, श्वासोछ्वास
की कसरतें अथार्त् पर्ाणायाम, आसन करना, हर रोज आधा घंटा घूमने जाना तथा चरबी न
बढ़ाने वाला साित्त्वक आहार लेना अत्यंत लाभकारी है।
आज के डॉक्टरों की बात मानने से पूवर् यिद हम भगवान शंकर की, भगवान कृषण की बात
मान लें और उनके अनुसार जीवन िबतायें तो हृदयरोग हो ही नहीं सकता।
भगवान शंकर कहते है
आआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआ । आआआआआआ आआआआआआआआ आआआआआआ
आआआआआआ आआआआआआआआ आआआआआ ।।आआआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआआआआ
ध्यानकेसमानकोई तीथर् , यज्ञ और दान नहीं है अतः ध्यान का अभ्यास करना चािहए।
भगवान शीकृषण ने भी भोजन कैसा लेना चािहए इस बात का वणरन करते हुए गीता मे कहा हैः
आआआआआआआआआआआआआआआआआ आआआआआआआआआआआआआ आआआआआआ।
आआआआआआआआआआआआआआआआआआआ ।। आआआआ आआआआ आआआआआआआआ
दुःखों को नाश करने वाला योग तो यथा योग्य आहार और िवहार करने वाले का तथा
कमोर्ं में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथा योग्य शयन करने तथा जागने वाले
का ही िसद्ध होता है। (गीताः 6-17)

आआआ आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ
आआआआआ आआआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआआ आआआआआआ
आआआआआआआआआआआआआआआआ।।
आयु, बुिद्ध, बल, आरोग्य, सुख और पर्ीित को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, िचकने और
िस्थर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को िपर्य आहार अथार्त् भोजन करने के पदाथर्
साित्त्वक पुरुष को िपर्य होते हैं। (गीताः 17-8)
मंतर्जाप, ध्यान, पाणायाम, आसन का िनयिमत रूप से अभ्यास करने तथा ताँबे की तार
में रूदर्ाक्ष डालकर पहनने से अनेक घातक रोगों से बचाव होता है। उपवास और गोझरण
(गोमू त ) शर्ेष्ठ औषध है।
हृदय रोग से बचने हेतु रोज भोजन से पूवर् अदरक का रस पीना िहतकर है। भोजन
के साथ लहसुन-धिनयाकी चटनीभीिहतकरहै।
हृदयरोगी को अपना उच्च रक्तचाप व कोलेस्टर्ोल िनयंतर्ण में रखना चािहए।
िनयंतर्ण के िलए िकशिमश (काली दर्ाक्ष) व दालचीनी का पयोग िनम तरीके से करना चािहए।
आआआआआआआ पहले िदन 1 िकशिमश रात को गुलाबजल में िभगोकर सुबह खाली पेट
चबाकर खा लें, दूसरे िदन दो िकशिमश खायें। इस तरह पर्ितिदन 1 िकशिमश बढ़ाते हुए 21 वे
िदन 21 िकशिमश लें िफर 1-1 िकशिमश पर्ितिदन कम करते हुए 20, 19, 18 इस तरह 1 िकशशश िमश
तक आयें। यह पर्योग करके थोड़े िदन छोड़ दें। 3 बार यह पर्योग करने से उच्च
रक्तचाप िनयंतर्ण में रहता है।
आआआआआआआआ 100 िम.ली. पानी मे 2 ग ा म दालची न ी का चू णर उबाल े । 50 िम.ली. रहने
पर ठंडा कर ले। उसमे आधा चममच (छोटा) शहद िमलाकर सुबह खाली पेट लें। यिद मधुमेह भी होत
शहद नहीं लें। यह पर्योग 3 माह तक करने से रक्त में कोलेस्टर्ोल का पर्माण िनयंतर्ण
में रहता है।
आआआआआआ
आआआआआआ 2 कली लहसुन रोजाना िदन में 2 बार सेवन करें। लहसुन की चटनी भी ले
सकते हैं। लहसुन हािनकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है। इसमें िनिहत गंधक तत्त्व रक्त
के कोलस्टर्ोल को िनयंितर्त करता है और उसके जमाव को रोकने में सहायक है।
आआआआआआआआआ इसके सेवन से हृदयरोगी को फायदा होता है।
आआआआ 10 ग ा म उड द की िछ लक े व ा ल ी दाल रात को िभ ग ो य े । प ा त ः पीसकर उसम े
गाय का ताजा म क खन 10 ग ा म , एरंड का तेल 10 ग ा म , कूटी हुई गूगल धूप 10 ग ा म िम ल ाकर
लुगदी बना लें। सुबह बायीं ओर हृदयवाले िहस्से पर लेप करके 3 घंटे तक आराम करें।
उसके बाद लेप हटाकर दैिनक कायर् कर सकते हैं। यह पर्योग 1 माह तक करने से हृदय
का ददर् ठीक होता है।
आआआआआ आआआआआ हृदय की धमिनयों में अवरोधवाले रोिगयों को गोझरण अकर् के
सेवन से हृदय के ददर् में राहत िमलती है। अकर् 2 से 6 ढकन तक समान माता मे पानी िमलाकर ले
सकते हैं। सुबह खाली पेट व शाम को भोजन से पहले लें। हृदय ददर् बंद होकर चुस्ती
फुतीर् बढ़ती है तथा बेहद खचीर्ली बाईपास सजर्री से मुिक्त िमलती है।
आआआआआआ आआआ आआ आआआआआआ अजुर्न की ताजी छाल को छाया में सुखाकर चूणर्
बनाकर रख लें। 200 ग ा म दू ध म े 200 ग ा म पान ी िम ल ाकर हलकी आग पर रख े , िफर 3
ग ा म अज ुर न छा ल का चू णर िम ल ाकर उबाल े । उबलत े उबलत े द व य आधा रह जाय तब उतार
लें। थोड़ा ठंडा होने पर छानकर रोगी को िपलायें।
आआआआ आआआआआ रोज 1 बार पर्ातः खाली पेट लें उसके बाद डेढ़ दो घंटे तक कुछ
न लें। 1 माह तक िनत्य सेवन से िदल का दौरा पड़ने की सम्भावना नहीं रहती है।
आआआआआ हृदयरोगों में अंगूर व नींबू का रस, गाय का दूध , जौ का पानी, कच्चा प्याज,
आँवला, सेब आिद। िछलकेवाले साबुत उबले हुए मूँग की दाल, ग े हू ँ की रोटी , जौ का दिलया,
परवल, करेला, गाजर , लहसुन, अदरक, सोंठ, हींग, जीरा, काली िमचर्, सेंधा नमक, अजवायन,
अनार, मीठे अंगूर, काले अंगूर आिद।
आआआआआआ चाय, काफी, घी, तेल, िमचर्-मसाले, दही, पनीर, मावे (खोया) से बनी
िमठाइयाँ, टमाटर, आलू, गोभी , बैंगन, मछली, अंडा, फास्टफूड, ठंडा बासी भोजन, भैस का दूध व घी,
फल, िभंडी। गिरष पदाथों के सेवन से बचे। धूमपान न करे। मोटापा, मधुमेह व उच्च रक्तचाप आिद को
िनयंितर्त रखें। हृदय की धड़कनें अिधक व नाड़ी का बल बहुत कम हो जाने पर अजुर्न की
छाल जीभ पर रखने मातर् से तुरंत शिक्त पर्ाप्त होने लगती है।
आआआआआआआआ अनुभव से ऐसा पाया गया है िक अिधकतर रोगी, िजनहे िदल का मरीज घोिषत
कर िदया जाता है, वे िदल के मरीज नही, अिपतु वात पर्कोपजन्य सीने के ददर् के िकार श ह ोते
हैं। आई.सी.सी.यू. में दािखल कई मरीजों को अंगर्ेजी दवाइयों से नहीं, केवल संतकृपा
चूणर्, िहंगािदहरड़, शंखवटी, लवणभास्कर चूणर् आिद वायु-पकोप को शात करने वाली औषिधयो से लाभ
हो जाता है तथा वे हृदयरोग होने के भर्म से बाहर आ जाते हैं और स्वस्थ हो जाते
हैं।
अनुकर्म
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आआआआआ आआ आआआआआआ आआआ...........
आज के अशांित एवं कोलाहल भरे वातावरण में िदन पर्ितिदन मनुष्य का जीवन
तनाव, िचंता एवं परेशािनयों से गर्स्त होता जा रहा है। इसी वजह से वह थोड़ी-थोड़ी बात
पर िचढने कुढने लगता है एवं कोिधत हो जाता है। यहा कोध पर िनयंतण पाने के िलए कुछ उपचार िदये जा रहे है।
एक नग आँवले का मुरब्बा पर्ितिदन पर्ातः काल खायें और शाम को एक चम्मच
गु ल क न द खाकर दू ध पी ल े । इसस े क ो ध पर िन यं त ण पान े म े सहायत ा िम ल े ग ी।
आआआआआ आआआआआआ
कर्ोध आये उस वक्त अपना िवकृत चेहरा आइने में देखने से भी लज्जावश कर्ोध
भाग जायेगा।
ॐ शांित... शांित..... शांित..... ॐ... एक कटोरी में जल लेकर उस जल में देखते
हुए इस मंतर् का 21 बार जप करके बाद में वही जल पी लें। पर्ितिदन ऐसा करने से कर्ोधी
स्वभाव में बदलाहट आयेगी। ऐसा हररोज करें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआ आआआआआआ आआआआआआआ आआआआआआआआआआ
आआआआआआआ
आआआआआ आआआआ
धमर्शास्तर्ोम
ं ेग ं ोझरणको अितपिवतर्मानागयाहै।गोझरणकािछड़काववातावरणको शुद्धएवंपिवतर्बनाता
है। आज का िवज्ञान भी गोझरण को कीटाणुनाशक बताता है। संत शर्ी आसाराम जी गौशाला
िनवाई के पिवतर् वातावरण में आशर्म के साधको द्वारा गोझरण अकर् तैयार िकया जाता
है। यह अकर् िनम्न रोगों में उपयोगी िसद्ध होता है।
आआआआ कफ के रोग (जैसे सदी, खाँसी, दमा आिद), वायु के रोग, पेट के रोग, ग ै स ,
अिग्नमांद्य, आमवात, अजीणर्, अफरा, संगर्हणी, लीवर के रोग, पीिलया (कामला), पलीहा के रोग,
मूतर्िपंड (िकडनी) के रोग (पथरी आिद), पोसटेट व मूताशय के रोग (पेशाब का रक जाना आिद), बहूमूतर्ता,
मोटापा, मधुपर्मेह, स्तर्ीरोग, सूजाक (गोन ोिर य ा ), चमड़ी के रोग, सफेद दाग, शोथ, कैंसर,
क्षयरोग, गल े की गा ठ े , जोडो का ददर, गिठ य ा , बदनददर्, कृिम, बच्चों के रोग, कान के रोग,
िसर में रूसी, िसरददर् आिद में फायदा करता है। यह नाड़ीशोधक है।
मातर्ाः 30 िम.ली. पानी मे 2 चम्मच अकर्।
बच्चों के पेट में कृिम हों तो 1 चम्मच अकर् में 2 चम्मच पानी िमलाकर।
अनुकर्म
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आआआआआआआआ आआआआआ
अश् वगंधाएक बलवधर्क व पुिष्टदायक शर्ेष्ठ रसायन है। यह मधुर व िस्नग्ध होने
के कारण वात का शमन करने वाला एवं रस-रक्तािद सप्त धातुओं का पोषण करने वाला है।
इससे िवशेषतः मांस व शुकर्धातु की वृिद्ध होती है। यह चूणर् शिक्तवधर्क, वीयरवधरक एवं सनायु व
मांसपेश ियोंको ताकत देने वाला, कद बढ़ाने वाला एक पौिष्टक रसायन है। धातु की
कमजोरी, शारीिरक मानिसक कमजोरी, मांसपेश ियोंव बुढ़ापे की कमजोरी, थकान, रोगों के
बाद आने वाली कृशता आिद के िलए यह रामबाण औषिध है। इसका 1 से 3 ग ा म चू णर एक माह
तक दूध, घी या पानी के साथ लेने से बालक का शरीर उसी पर्कार पुष्ट हो जाता है जैसे
वषा होने पर फसल लहलहा उठती है।
इसमें कैश िल् वयम लौह तत्त्व भी पर्चुर मातर्ा में होते हैं। अश् वगंधाके
िनरंतर सेवन से शरीर का समगर् रूप से शोधन होता है एवं जीवनशिक्त बढ़ती है।
कुपोषण के कारण बालकों मे होने वाले सूखा रोग में यह अत्यंत लाभदायी औषिध
है।
क्षयरोग व पक्षाघात में बल बढ़ाने के िलए इसे अन्य औषिधयों के साथ गोघृत
और िमशी िमलाकर िलया जा सकता है। अशगंधा अतयंत वाजीकारक अथात् शुकधातु की तविरत वृिद करने वाला
रसायन है।
इसके 2 ग ा म चू णर को घी व िम श ी क े साथ ल े न े स े शुक ा णु ओं की वृिद होती ह ै
एवं वीयर्दोष दूर होते हैं।
एक गर्ाम चूणर् दूध व िमशर्ी के साथ लेने पर नींद अच्छी आती है। मानिसक या
शारीिरक थकान के कारण नींद न आने पर इसका उपयोग िकया जा सकता है।
अश् वगंधा, बर्ाह्मी तथा जटामांसी समान मातर्ा में िमलाकर इसका 1 से 3 ग ा म
चूणर् शहद के साथ लेने से बालक का पोषण अच्छी तरह से होता है। पर्सूित के बाद भी
यह पर्योग चालू रखें। इससे बालक के पोषणाथर् आवश् यककैश िल् एवं यम लौह तत्त्व की
वृित होती है। 1 से 3 ग ा म चू णर दू ध म े उबालकर प ित िद न स े व न करन े स े शरीर म े लाल
रक्त कणों की वृिद्ध होती है।
दूध के साथ सेवन करने से िवस्मृित, यादशिक्त की कमी, नपुंसकता, स्वप्नदोष
िमटाकर शरीर की कांित बढ़ाता है।
1 से 3 ग ा म चू णर और 10-40 िम.ली. आँवले का रस िमलाकर लेने से शरीर में
िदव्य शिक्त आती है।
सभी लोग इस पौिष्टक वनस्पित का फायदा ले सकते हैं। हजारों लाखों रूपयों की
िवदेशी औषिधया शरीर को उतना िनदोष फायदा नही पहुँचाती, उतना पोषण नहीं देतीं, िजतना पोषण अशगंधा देती
है।
सिदर्यों के िलए पौिष्टक िकसी भी 1 िक.ग ा . पाक मे 50 से 100 ग ा म अश गं ध ा डाल
सकते हैं। इससे उस पाक की पौिष्टकता में कई गुना वृिद्ध हो जायेगी।
मातर् एक चम्मच अश् वगंधापाक सुबह शाम िमशर्ी िमले हुए गुनगुने दूध के साथ खाली
पेट ले।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआ आआआआआ
लगातार सात िदनों तक गोमूतर् में हरड़ को िभगोने के बाद से सुखाकर िफर उसका
चूणर् करके उसमें हींग, अजवायन, सेंधा नमक, इलायची आिद िमलाकर बनाये गये चूणर्
को हींगािद हरड़ चूणर् कहते हैं।
आआआआ ग ै स , अम्लिपत्त, किब्जयत, अफरा, डकार, िसरददर्, अपच, मंदािग्न, अजीणर्
एवं पेट के अन्य छोटे-मोटे असंख्य रोगों के अलावा चमर्रोग, लीवर के रोग खाँसी,
सफेद दाग, कील मुँहासों वायुरोग, संिधवात, हृदयरोग, बवासीर, सदीर्, कफ, िकडनी, के रोग
एवं िस्तर्यों के मािसक धमर् सम्बन्धी रोगों में लाभ होता है।
आआआआ आआआआआ इस चूणर् की 1 से 2 छोटी चम्मच सुबह में और दोपहर को भोजन के
बाद पानी के साथ ले सकते हैं। आवश् यकलगने पर राितर् में भी भोजन के बाद इस चूणर्
का सेवन कर सकते हैं िकंतु उस रात दूध िबल्कुल न लें।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआआआ
(आआआ आआआ आआआआआ)

आआआआआआ आआ आआआ आआआआआआआआ आआआआआआआआआ आआआआआआआआआ
जो दवय यो औषिध वृदावसथा एवं समसत रोगो का नाश करती है, वह है रसायन। शरीर मे रस आिद सपतधातुओं
का अयन अथार्त् उत्पित्त करने में जो सहायक होती है उस औषिध को रसायन कहा जाता
है।
इस चूणर् में गुडुच (िग ल ो य ), गोखर एवं आ ँ व ल े होत े ह ै , िजनके गुणधमर िनमानुसार है-
आआआआआ (आआआआआ)- अमृत जैसे गुण रखने के कारण यह औषिध अमृता कहलाती
है। ितर्दोषशामक होने से पर्त्येक रोग में, तीनों पर्कार की पर्कृित में, पतयेक ऋतु मे ली
जा सकती है। गुणो मे उषण होने पर भी िवपाक मे मधुर होने से समशीतोषण गुणवाली है। इसमे िसनगधता होने से बलपद
एवं शुद्धवधर्क है।
आआआआआआ यह औषिध ठंडी होने से गुडुच की उष्णता का िनवारण करने वाली है एवं
पेशाब साफ लाकर मूतवहन तंत के समसत रोगो को िमटाती है। यह शुकवधरक एवं बलपद है।
आआआआआआ यह औषिध ठंडी, ितर्दोषनाशश क, रसायन, वयःसथापक (यौवन िस्थर रखने
वाली या यौवनरकक), हृदय एवं नेतर्ों के िलए िहतकर, रक्तवधर्क, मलशु िद्धकरने वाली,
धातुवधर्कएवंज्ञानेिन्दयकी
ोर्
ं शिक्तको बढ़ाने वालीहै।
आयुवेर्द के अनुसार 40 वषर की उम से पतयेक वयिकत को नीरोग रहने हेतु हररोज रसायन चूणर का सेवन
करना चािहए क्योंिक यह चूणर् बड़ी उमर् में होने वाली व्यािधओं का नाश करता है और
शरीर में शिक्त स्फूितर् एवं ताजगी तथा दीघर्जीवन देने वाला है।
पितिदन इस चूणर का सेवन करने से वयिकत सवसथ एवं दीघायु होता है, उसकी आँखों का तेज बढ़ता
है तथा पाचन ठीक होता है। िजस कारण भूख अच्छी लगती है।
यह चूणर् तीनों दोषों को सम करने वाला है। अश् वगंधाचूणर् के साथ लेने पर
अत्यंत वीयर्वधर्क है। उदररोग, आँतों के दोष, स्वप्नदोष तथा पेशाब में वीयर् जाने
के दोष को दूर करने वाला है। इस चूणर् के सेवन से शरीर में शिक्त, स्फूितर् एवं ताजगी
का अनुभव होता है। पाचनतंतर्, नाड़ीतंतर् तथा ओज-वीयर की रका करता है तथा बुढापे की कमजोरी एवं
बीमारी से बचाता है। छोटे-बड़े, रोगी िनरोगी सभी इसका सेवन कर सकते हैं। सुबह
दातुन करके चूसते चूसते यह चूणर् लें तो िवशेष लाभ होगा। इसे पानी से लें अथवा दूध
से भी ले सकते हैं।
पानी के साथ तो पतयेक वयिकत यह चूणर ले सकता है परंतु िवशेष रोग मे िवशेष लाभ के िलए िनमानुसार सेवन
करें।
कफ के रोगों में शहद के साथ, वायु के रोगो मे घी के साथ तथा िपत के रोगो मे िमशी के साथ।
पीिलया के रोग मे 1 ग ा म ल े ड ी प ी प र क े साथ।
मधुमेह में बड़ी मातर्ा 6 से 10 ग ा म चू णर िद न म े दो स े तीन बार पान ी क े साथ।
मूतर् की जलन में घी-िमशर्ी के साथ यह चूणर् लें।
मूतर्ावरोध में ककड़ी के साथ लें।
यौन दौबर्ल्य में एवं सामान्य कमजोरी में दूध अथवा घी-िमशर्ी के साथ लें।
पदररोग मे चावल के माड के साथ ले।
चेहरे पर आँखों के नीचे काले दाग हो गये हों तो 2 ग ा म मु ल हठी क े चू णर म े
िमलाकर सुबह-शाम दूध के साथ लें।
बाल काले करने के िलए 20 से 40 िम.ली. भागरे के रस मे ले।
आआआआआआआ इस चूणर् की 2 से 10 ग ा म तक की मात ा उम एवं शरीर क े अनु स ार ली
जा सकती है।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआआ
आआआआआ, आआआआआआआआ आ आआआआआ आआआआआआआआआ आआ आआआ आआआ आआआआआआआ
आआ आआआआआआआ आआआआआआ
एक छोटे िगलास पानी में एक चम्मच चूणर् डालें और िहलाकर भोजन के आधा घंटा
पहले या बाद मे (सुबह-शाम) पी जाये। इसमे थोडा नीबू का रस और िमशी भी िमला सकते है। पातःकाल इस चूणर के
साथ नींबू, शहद, अथवा िमशर्ी िमलाकर बनाया हुआ शबर्त पीकर टहलने से लाभ होता है।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआआ गमर पान ी क े साथ िम ल ाकर ल े ।
आआआ आआआ आआआआआ टमाटर या पपीते पर डालकर खाये।
आआआ आआआ आआआ, आआआआआ आआआआआआ, आआआआआआआआ ठंडे या गमर पानी मे डालकर ले।
आआआआआ-आआआआआआ गरम पान ी म े नी बू का रस व चू णर िम ल ाकर िप य े ।
आआआआआआ शहद में िमलाकर चाटें।
आआआआआआआआ पूरा चममच भरकर पानी के साथ िमलाकर ले।
आआ आआ आआआआआआआआ शहद के साथ शबर्त बनाकर िपयें।
आआआआआ आआआआआ आआआ आआआआआआआआ आआ आआआआ नािरयल के पानी में िमलाकर
लें।
आआआआआआआआ आआआआआआआ आआ।आआ आआ आआआआआ आआ आआआ आआआआ आआआ इसके
सेवन से नािड़यों का शोधन होकर ध्यान-भजन मे मन लगता है।
दही, लस्सी, शहद, शबर्त, नींबू, फल, पुलाव, सलाद, चटनी आिद साथ सब लोग इसका
सेवन कर सकते हैं। आआ आआआआआ आआआ आआ आआआ आ आआआ। अिधक औषिधयों के व्यथर्
के सेवन से बचें। एक बार इस चूणर् का लाभ अवश् यलें और अपन उदासीनता व िनराशा को
भगाकर जीवन मे ताजगी, स्फूितर् और पर्सन्नता का अनुभव करें।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआआ
आँवला, बहेड़ा व हरड़ का चूणर् समान मातर्ा में िमलाकर ितर्फला तैयार कीिजए।
यह चूणर् आवश् यकतानुसार1 से 8 ग ा म तक खाया जा सकता ह ै ।
आआआआआआआआ रास्ता चलकर थके हुए, बलहीन, कृश , उपवास से दुबरल बने हुए को तथा
गभर व त ी स त ी एवं नय े बुख ारव ा ल े को ित फ ल ा नही ल े न ा चािह ए।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआ-आआआआ आँखों के सभी रोगों के िलए ितर्फला एक अकसीर औषध है। इस
ितर्फला चूणर् को घी तथा िमशर्ी के साथ िमलाकर कुछ माह तक खाने से नेतर्रोग दूर होते
हैं। नेतर्ों की सूजन, ददर्, लािलमा, जलन, कील, जयोित माद आिद रोगो मे सुबह-शाम िनयिमत रूप से
ितर्फला चूणर् अथवा ितर्फला घृत लेने से और ितर्फला जल से नेतर् पर्क्षालन करने
से नेतर्-सम्बन्धी समस्त िवकार िमटते हैं व नेतर्ों की ज्योित तथा नेतर्ों का तेज
बढ़ता है।
आआआआआआआ आआ आआआआआ आआ आआआआआ िमट्टी के कोरे बतर्न या काँच के बतर्न
में 2 ग ा म ित फ ल ा चू णर 200 ग ा म जल म े िभ ग ोकर रख े । 4-6 घंटे बाद उस जल को ऊपर
से िनथारकर बारीक स्वच्छ कपड़े से छान लें। िफर उस जल से नेतर्ों को िनत्य धोयें
या उसमें 2-3 िमनट तक पलकें झपकायें।
आआआआआआआआआआआआआ ितर्फला आयुवेर्द का गंदगी हटाने वाला शर्ेष्ठ दर्व्य है
इसके पानी से घाव धोने से एलोपैिथक एण्टीसेिप्टक दवाई की कोई आवश् यकतानहीं
रहती।
आआआआआआ आआआ आआआआआआआ ितर्फला चूणर् पानी में उबालकर, शहद िमलाकर पीने
से चरबी कम होती है। इसी में यिद पीसी हुई हल्दी भी िमला ली जाय तो पीने से पर्मेह
िमटता है।
आआआआआआआआ दाद, खाज, खुजली, फोड े -फुंसी आिद चमर्रोगों में सुबह-शाम 6 से 8
ग ा म ित फ ल ा चू णर ल े न ा िह तकारी मान ा गया ह ै ।
आआआआआआआ िजन लोगो को बार-बार मुँह आने की बीमारी हो अथार्त् मुखपाक हो जाता हो
वे िनतय रात मे 6 ग ा म ित फ ल ा चू णर पान ी क े साथ खाकर ित फ ल ा क े ठं ड े पान ी स े कु ल ल े
करे।
आआआआआआआआआआ आआ आआआआ मूतर्मागर्गत रोग अथार्त् पर्मेह आिद में शहद के
साथ ितर्फला लेने से अत्यंत लाभ होता है।
आआआआआआआआआ आआ आआआआ 2 से 3 ग ा म ित फ ल ा पान ी क े साथ ल े न ा चािह ए।
आआआआआ आआआआ में गोमूतर् या शहद के साथ 2 से 4 ग ा म ित फ ल ा चू णर ल े न े स े
एक माह में यह रोग िमट जाता है।
आआआआआ आआ आआआआ, आआआआ आआ आआआआआ गरम ी स े त व च ा पर चकतो पर ित फ ल ा
की राख शहद में िमलाकर लगाने से राहत िमलती है। मुँह के छालों में भी इसी पर्कार
लगाकर थूक से मुँह भर जाने पर उससे ही कुल्ला करने से छालों में राहत िमलती है।
आआआआआआ ितर्फला चूणर् में खैर की छाल का क्वाथ, भैस का घी तथा वायिवडंग का चूणर
िमलाकर िनयिमत सेवन करने से भगंदर रोग िमटाता है।
आआआआआआआ, आआआआआ भोजन के बाद ितफला चूणर लेने से अन के दोष तथा वात-िपत-कफ से
उत्पन्न रोग िमटाते हैं और किब्जयत भी नहीं रहती।
ितर्फला में यिद िपप्पली (पीपर) चूणर् का योग हो जाय तो उसकी गुणवत्ता बहुत बढ़
जाती है। ितफला चूणर का तीन भाग व िपपपली चूणर का एक भाग िमलाकर शहद के साथ सेवन करने से खासी, श्वास,
जवर आिद मे लाभ होता है, दस्त साफ व जठरािग्न पर्दीप्त होती है।
इसके अितिरक्त भी अनेक छोटे मोटे रोगों में ितर्फला औषधरूप में सहायक
होता है।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआआआ
जैसे गने मे रस, वैसे हमारी नसो मे वीयर। वीयर िजतना पुष और गाढा होगा, वयिकत उतना ही जीवन के हर केत मे
चमकेगा। आँवले का यह िमशर्ण राितर् को भोजन के बाद पानी के साथ 5-6 ग ा म ल े न े स े
स्वप्नदोष और मिहलाओं का पानी िगरने का दोष दूर होता है, ऊजार् बढ़ती है तथा शरीर
में जो सार तत्त्व है, उसकी रक्षा होती है।
वीयर पुष होने से बहुत सारे लाभ होते है और तमाम पकार के रोग दूर होते है। करीब 40 िदन तक इसका
सेवन करें। इन िदनों राितर् भोजन में दूध न लें।
आआआआ िमशर्ण लेने के दो घंटा पहले से दो घंटा बाद तक दूध न लें।
अनुकर्म
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आआआआआआआआ
आआआआ यह चूणर् पेट के तमाम रोगों एवं अजीणर् को िमटाकर भूख बढ़ाता है,
बलवधर्क है। यह क्षयरोग, दमा, सदीर्, खाँसी, बुखार के बाद की कमजोरी, अरूिच, िसरददर्,
अम्लिपत्त, हृदयरोग, रक्तचाप, मधुमेह, यकृत के रोग, मूतर्िपंड के रोग, िहचकी, आमवात,
मंदािग्न, किब्जयत आिद रोगों के िलए िहतकारी है। यह शरीर का शोधन करके शुिद्ध करता
है, दुष्पर्भाव (साईड इफेक्ट) नहीं करता। कफ, िपत, तथा वात सम्बन्धी रोगों को िमटाता है।
इसे लेने के बाद पहले ही िदन से दोष िनकलेंगे और पेट साफ होने की पर्िकर्या शुरू
हो जायेगी।
आआआआ आआआआआ 4 से 8 ग ा म चू णर को 20 ग ा म शहद , गु न गु न े पान ी तथा सं त कृप ा
चूणर् में िमलाकर सुबह खाली पेट सेवन करें। इन िदनों आँतों की मजबूती के िलए भोजन
में गाय के घी का सेवन करना उिचत है। भोजन हल्का व सुपाच्य हो। मधुमेह वाले यह
चूणर् िबना शहद के लें।
अनुकर्म
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आआआआ आआआआआ
पीपल के पेड की लकडी का मेधाशिकतवधरक पमाण शासतो मे विणरत है। पीपल की पुरानी, सूखी लकड़ी से
बने िगलास में रखे पानी को पीने से अथवा पीपल की लकड़ी का चूणर् पानी िभगोकर छना
हुआ पानी पीने से व्यिक्त मेधावी होता है। िपत्तसम्बन्धी, शारीिरक गमीर् सम्बन्धी तमाम
रोगों पर इसका अच्छा पर्भाव पड़ता है। शबर्त, ठंडाई आिद बनाते समय इस चूणर को कुछ समय के िलए
पानी मे िभगो दे या चूणर को पानी मे उबालकर छान ले तथा ठंडा कर शबरत, ठंडाई आिद मे िमलाकर िपये।
आआआआ आआ आआआ आआआआ आआआआआ आआआआ आ आआआआआआआआ आआ।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआआ आआआ
यह चाय स्वास्थ्यवधर्क, रूिचकर एवं शरीर के िलए लाभपर्द है। इसे पीने से
मिस्तष्क में शिक्त व शरीर में स्फूितर् आती है, भूख बढती है तथा पाचनिकया वेगवती बनती है। यह
सदीर्, खाँसी, दमा, श्वास, कफजन्य ज्वर जैसे रोगों में लाभकारी है। यह चाय हर मौसम
में उपयोगी है।
आआआआआआआ दो कप पानी में एक चम्मच चाय।
आआआआआ यह चाय पानी में डालकर उबाल लें। जब पानी में आधा शेष बचे तब
नीचे उतारकर छान लें। अब उसमें दूध, िमशर्ी या चीनी िमलाकर िपयें।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआआआ
मुलतानी िमट्टी से स्नान करने पर रोमकूप खुल जाते हैं। मुलतानी िमट्टी से
रगड़कर स्नान करने से जो लाभ होते हैं उनका एक पर्ितशत लाभ भी साबुन से स्नान
करने से नहीं होता। बाजार में उपलब्ध साबुन में चबीर्, सोडा-क्षार और कई जहरीले
रसायनों का िमशर्ण होता है जो त्वचा व रोमकूपों पर हािनकारक पर्भाव छोड़ते हैं।
स्फूितर् और आरोग्यता चाहने वालों को साबुन के पर्योग से बचकर मुलतानी िमट्टी से
नहाना चािहए।
मुलतानी िमट्टी या उसमें नींबू, बेसन, दही अथवा छाछ आिद िमलाकर शरीर पर थोड़ी
देर लगाये रखें तो गमीर् व िपत्तदोष से होने वाली तमाम बीमािरयों को यह सोख लेता
है। यह घोल लगाने से थोड़ा समय पहले बनाकर रखा जाय।
अपने वेद और पुराणों से लाभ उठाकर जापानी लोग मुलतानी िमट्टी िमशि र्त घोल
में आधा घंटा टब बाथ करते हैं, िजससे उनके तवचा व िपत समबनधी काफी रोग ठीक हएु है। आप भी यह
पयोग करके सफूितर और सवासथय का लाभ ले सकते है।
यिद मुलतानी िमट्टी का घोल बनाकर शरीर पर लेप कर िदया जाय तथा 5-10 िमनट बाद
रगड़कर नहाया जाय तो आशातीत लाभ होते हैं।
आप सभी साबुन का पर्योग छोड़कर मुलतानी िमट्टी से स्नान करें और पर्त्यक्ष
लाभ का अनुभव करें।
अनुकर्म
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आआआआआआ आआआआआ
यह गोली स्वणर् भस्म, मोती भस्म, यशदभस्म, िहंगुल, सफेद िमचर् और मक्खन को
नींबू के रस से भािवत करके बनायी जाती है।
आआआआ यह औषिध, वृद, युवक, सगभार् स्तर्ी आिद सबके िलए िहतकर है। इस रसायन
में बल्य, क्षयघ्न, कीटाणुनाशक तथा रक्तपर्सादन गुण िवशेष रूप से हैं। वातवह मण्डल,
सहसर्ार चकर् नाड़ी चकर् से लेकर सूक्ष्माितसूक्ष्म अवयव तक सबको बल देने का
महत्त्वपूणर् गुण इस रसायन में है।
यह खासतौर पर उदरकला पर अपना पर्भाव िदखाती है। यह वायु का नाश करके आँतों
की ििथलता
शक ो दूर करती है। पाचक रसों को बढ़ाती है और अजीणर् से होने वाले ज्व, र
जीणरजवर, िवषमजवर, कफज्वर, धातुगत, जवर आिद रोगो का नाश करती है।
यह रसायन क्षयरोग, यकृत की वृिद्ध, पलीहा के दोष, मंदािग्न, िस्तर्यों का पर्दररोग,
मानिसक िनबर्लता, पुरानी खासी, धातुक्षीणता, हृदयरोग, मस्तकशू लआिद में िहतकर है।
िकसी भी पुराने रोग में धैयर् और शांत िचत्त से इस औषिध का सेवन करने से
लाभ होता ही है। िकसी भी रोग से या अित व्यायाम, अित वीयर्नाश, अित पिरशर्म या
वृदावसथा आिद िकसी भी हेतु से आयी हईु कमजोरी को यह रसायन दूर करता ही है।
आआआआआआ आआ आआआआआआआ 1 से 2 गोल ी िद न म े 2 बार शहद या च्यवनपर्ाशावलेह
या िसतोपलािद चूणर् और शहद के साथ लें।
अनुकर्म
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आआआ आआआआआ
आआआआ रक्त को बढ़ाकर मांसपेश ियोंको शिक्त देती है। आयुष्य, वीयर, बुिद्ध और
कांित को बढ़ाती है। कर्ोध, शर्म, पढाई, राितर्-जागरण, मनन, सूयर्ताप, शोक, भय आिद के कारण
होने वाली वात-वृिद मे खास फायदा करती है। मूतिपंड, िदमाग, वातवहनाडी और वात-िपत दोष पर शामक पभाव
िदखाती है, िजससे पकाघात (लकवा), खंज, पंगु, शुकर्क्षयज व्यािध, नेतर्रोग, पाणडुरोग, यकृत शोथ,
िहस्टीिरया, ऐंठन, वृदावसथा की वयािध आिद मे िवशेष फायदा देती है। गुपतरोग और सतोतस संकोचन के कारण जो
नपुंसकता आती है उसको भी यह िमटाती है।
आआआआआआआ शहद, मलाई, िमशर्ी, दूध, मक्खन, आँवले का मुरब्बा या गुलकंद के साथ
सेवन करें।
मधुमेह में अदरक के रस के साथ।
आआआआआआआ बच्चों के िलए आधी गोली एक बार। बड़ों के िलए 1 या 2 गोल ी 2 बार।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआआआआआ आआआ
आआआआआआ यह बूटी बल-वीयरवधरक, टू टी हडडी को शीघ ही जोडने मे सहायक और सनायु संसथान को
सक्षम बनाये रखने वाली है। यह धातुसर्ाव, अशिक्त एवं कृशता में उपयोगी है तथा शरीर
की सप्तधातुओं का संतुलन बनाये रखने में सहायभूत है।
आआआआ आआआआआ एक िगलास पानी में रात को 2-3 ग ा म बू ट ी िभ ग ो द े । सु ब ह
उबालकर पानी आधा कर लें। इस ढंग से उबाली हुई बूटी एक बतर्न से दूसरे बतर्न में
लें तािक कदािचत िमट्टी के कण हों तो नीचे रह जायें। भीगी हुई बूटी को दूध के साथ भी
उबालकर ले सकते हैं अथवा इसके पानी से हलवा बनाकर खा सकते हैं या सब्जी आिद
में भी उपयोग कर सकते हैं। िजनकी हिड्डयाँ कमजोर हैं या फर्ैक्चर हो गया है उसको
ग े हू ँ क े आट े का हलवा बनाकर उसम े यह बू ट ी िम ल ाकर ल े न ा अ त यं त लाभकारी ह ै ।
सप्तधातुवधर्क इस औषिध में कोई दोष नहीं, कोई दुषप ् िरणाम (साइड इफेक्ट) नहीं। शरीर को
सुदुढ़ बनाने की इच्छा वाले रोगी िनरोगी, सभी इसका उपयोग कर सकते हैं।
अनुकर्म
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आआआ आआआआआआआआआआ
च्यवनपर्ाश एक उत्तम आयुवेर्िदक औषध एवं पौिष्टक खाद्य है, िजसका पमुख घटक
आँवला है। यह जठरािग्नवधर्क और बलवधर्क है। इसका सेवन अवश् यकरना चािहए।
िकसी िकसी की धारणा है िक च्यवनपर्ाश का सेवन शीत ऋतु में ही करना चािहए, परंतु
यह सवर्था भर्ांत मान्यता है। इसका सेवन सब ऋतुओं में िकया जा सकता है। गर्ीष्म ऋतु
में भी यह गरमी नहीं करता, क्योंिक इसका पर्धान दर्व्य आँवला है, जो शीतवीयर होने से
िपतशामक है। आँवले को उबालकर उसमे 56 पकार की वसतुओं के अितिरकत िहमालय से लायी गयी वजबला
(सप्तधातुवधर्नी वनस्पित) भी डालकर यह चयवनपाश बनाया जाता है।
आआआआ बालक, वृद, क्षत-क्षीण, स्तर्ी-संभोग से क्षीण, शोषरोगी, हृदय के रोगी और
क्षीण स्वरवाले को इसके सेवन से काफी लाभ होता है। इसके सेवन से खाँसी, श्वास,
वातरकत, छाती की जकड़न, वातरोग, िपतरोग, शुकर्दोष, मूतर्रोग आिद नष्ट हो जाते हैं। यह
स्मरणशिक्त और बुिद्धवधर्क तथा कांित, वणर और पसनता देनेवाला है एवं इसके सेवन से वृदतव की कमजोरी
नहीं रहती। यह फेफड़ों को मजबूत करता है, िदल को ताकत देता है, पुरानी खासी और दमे मे
बहुत फायदा करता है तथा दस्त साफ आता है। अम्लिपत्त में यह बड़ा फायदेमंद है।
वीयरिवकार और सवपदोष नष करता है। इसके अितरकत यह कयरोग और हृदयरोगनाशक तथा भूख बढाने वाला है।
संिक्षप्त में कहा जाय तो पूरे शरीर की कायर्िविध को सुधार देने वाला है।
आआआआआआआ नाश् ते क े साथ 15 से 20 ग ा म सु ब ह शाम। ब च चो क े िल ए 5 से 10
ग ा म। च य व न प ा श स े व न करन े स े 2 घंटे पूवर् तथा 2 घंटे बाद तक दूध का सेवन न करें।
च्यवनपर्ाश केवल बीमारो की ही दवा नहीं है, बिल्क स्वस्थ मनुष्यों के िलए भी
उत्तम खाद्य है। आँवले में वीयर् की पिरपक्वता काितर्क पूिणर्मा के बाद आती है।
लेिकन जानने में आता है िक कुछ बाजारू औषध िनमार्णशालाएँ (फामेर्िसयाँ) धनकमानेव
च्यवनपर्ाश की माँग पूरी करने के िलए हरे आँवले की अनुपलब्धता में आँवला चूणर् से
ही च्यवनपर्ाश बनाती हैं और कहीं-कहीं तो स्वाद के िलए इसमें शकरकंद का भी पर्योग
िकया जाता है। कैसी िवडंबना है िक धन कमाने के िलए स्वाथीर् लोगों द्वारा कैसे-
कैसे तरीके अपनाये जाते हैं!
करोड़ों रूपये कमाने की धुन में लाखों-लाखों रूपये पर्चार में लगाने वाले
लोगों को यह पता ही नहीं चलता िक लोहे की कड़ाही में च्यवनपर्ाश नहीं बनाया जाता।
उन्हें यह भी नहीं पता िक ताजे आँवलों से और काितर्क पूनम के बाद ही वीयर्वान
च्यवनपर्ाश बनता है।
जो काितरक पूनम से पहले ही चयवनपाश बनाकर बेचते है और लाखो रपये िवजापन मे खचर करते है, वे करोडो
रूपये कमाने के सपने साकार करने में ही लगे रहते हैं। ऐसे लोगों का लक्ष्य केवल
पैसा कमाना होता है, मानव के स्वास्थ्य के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं होता।
इसके िवपरीत सूरत, िदल्ली व अमदावाद सिमितयों द्वारा न नफा न नुकसान इस
सेवाभाव से वीयर्वान आँवलों के द्वारा शुद्ध व पौिष्टक च्यवनपर्ाश बनाया जाता है।
िजसमे आँवलो को 24 वनसपितयो मे उबाला जाता है और 32 पौिषक चीजे (शहद, घी, इलायची आिद) डालकर
कुल 56 पकार की वसतुओं के अितिरकत िहमालय से लायी गयी वजबला (सप्तधातुवधर्नी वनस्पित) भी डालकर
च्यवनपर्ाश बनाया गया है।
िविधवत 56 पकार की वसतुओं से युकत शुद एवं पौिषक यह चयवनपाश जरर खाना चािहए।
56 वसतुओं से एवं वीयरवान आँवलो से बने इसे चयवनपाश का नाम रखा गया है आआआ
आआआआआआआआआआ।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआ
जोडो (वायु के) ददर् के िलए यह एक उत्तम तेल है। मूढ़मार, पैर मे मोच आना आिद मे हलके
हाथ से मािलश करके गरम कपड़े से सेंक करने पर शीघर् लाभ होता है। चोट, घाव,
खुजली और फटी एिड़यों के िलए यह लाभदायक है।
एक सज्जन के पैर की एड़ी िकसी दुघर्टना में कट गयी दी। उन्हें नरेन्दर्नगर के
सरकारी अस्पताल में दािखल िकया गया। डेटॉल और सोफर्ामाइिसन की कई टयूब्स खाली हो
गयी ल े िक न घाव ठीक नही हु आ। ऐन टीब ा य ोिट क गोिल य ो और इं ज ै क श न ो म े खू ब प ै स ा
लुटाया, पर ठीक न हुआ। आिखर आशम दारा िनिमरत संत कृपा मािलश तेल (सवर्गुण तेल) िदन में दो बार
गु न गु न ा कर लगाय ा गया। इसस े जादु ई फायदा द े ख ा गया।
इस तेल का उपयोग परम पूज्य संत शर्ी आसारामजी बापू ने भी स्वयं पर िकया। फोड़ा
हो रहा था तब दो िदन उस पर यह तेल लगाया िजससे फोड़ा गायब हो गया। कहीं थोड़ी चोट
लगी, खून िनकला तब एक दो बार यह तेल लगाया तो वह ठीक हो गयी। आप भी पर्ाकृितक पद्धित
से बनाये गये इस तेल का लाभ लें।
बहुत फायदा करने वाला, बहुत सस्ता संत कृपा मािलश तेल अपने सभी आशर्मों एवं
आशर्म की सेवा सिमितयों के पास उपलब्ध है।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआ
बालों के िलए उत्तम यह तेल बाल झड़ना, सफेद होना, िसर की गमीर् आिद में
फायदा पहुँचाता है।
अनुकर्म
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आआआ आआआ
यह तेल दाद, खाज, खुजली तथा चमड़ी के अनेक रोगों में लाभ करता है। इसके
अलावा बालों में जुएँ पड़ने पर भी इसका उपयोग िकया जा सकता है।
अनुकर्म
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आआआआआआआ आआआआआआआआआआआ
गु ल ाब जल और अ न य आयु व े िद क औषिध य ो स े बना यह न े त िब न द ु आ ँ ख ो की
समस्त बीमािरयों में लाभकारी औषिध िसद्ध हुई है। इसके पर्योग से आँख आना, आँखों
में खुजली, लाली, रोहे आिद रोग ठीक हो जाते हैं। इसका लगातार इस्तेमाल करने से
सफेद व काला नाखूना साफ हो जाता है। आँखों की ज्योित बढ़ती है एवं कमजोरी दूर होती
है। अिधक समय तक इसका उपयोग करने से धीरे-धीरे नंबर घटकर चशमा भी छू ट जाता है। इसे छोटे
बच्चे भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
आआआआआआ-आआआआआ नेतर्िबन्दु डालने से पहले आँखों को ठंडे पानी से धोकर
साफ करें िफर तौिलये से पोंछकर नेतर्िबन्दु डालें, तो जल्द लाभ होगा। आँखों में
इसकी 1 से 2 बूँद डालकर ढक्कन लगाकर शीशी तुरंत बंद कर दें और इसे ठंडे स्थान पर
रखें। नेतर्िबन्दु को प्लािस्टक की अपेक्षा काँच की शीशी में रख सकें को उत्तम है। 1-2
बूँद पर्ातः व सायं आँखों में डालें।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआआ
कान का ददर्, कान से बहता हुआ मवाद, बहरापन, िसरददर्, दाँत एवं दाढ़ का ददर्,
आँख की लािलमा आिद रोगों में यह िबन्दु िसफर् कान डालनेमातर् से फायदे करता है।
अनुकर्म
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आआआआ आआआआ
कपूर, मेंथाल, अजवायन सत्त्व आिद आयुवेर्िदक वस्तुएँ िमलाकर यह दर्व तैयार
िकया जाता है। िसरददर्, जुकाम, खाँसी, गल े क े रोग म े एक कटोरी म े पानी ह ल का सा गमर
करके उसमें अमृत दर्व की 2 से 10 बूँदें िमलाकर पीने से फायदा होता है। िसरददर्
होने पर इसे बाम की तरह भी लगाया जा सकता है।
अनुकर्म
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आआआआआआआ
ितल के तेल को खैर, जामुन, आम की छाल, मुलहठी, घमासो, काला कमल आिद दर्व्यों
से िसद्ध िकया जाता है। उसके बाद नीम तेल, अमृत दर्व, लौंग तेल आिद िमलाकर यह
दंतामृत तैयार िकया जाता है। पायिरया, मसूड़ों में ददर् तथा दाँतों की सभी तकलीफों
में इससे मसाज करें। मुँह में से दुगर्न्ध आने पर कटोरी में पानी लेकर उसमें
दंतामृत की 5 से 7 बूँदे डालकर कुल्ले करने हैं। यह खूब फायदा करता है।
अनुकर्म
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आआआ आआआ
चेहरे की कील मुँहासे, चेहरे का कालापन, आँखों के नीचे कालापन आिद में
फेस पैक शीघर् ही लाभदायी है।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआआआ
असली मामरा बादाम 100 ग ा म , गाय का घी 100 ग ा म और अ न य िम श ण क े साथ कुल
350 ग ा म। इस िम श ण को चा द ी या सं ग म र म र क े बतर न म े रखकर अनाज म े सात िद न तक
दबाकर रखें। बाद में यह िमशर्ण हररोज सुबह खाली पेट 1 चम्मच (8 से 10 ग ा म ) चबा-
चबाकर खायें। इन िदनों में हलका खुराक होना अच्छा रहेगा।
इससे सेवन से नेतर्ज्योित बढ़ती है, मिस्तष्क व नाड़ीतंतर् पुष्ट होता है, आयु
बढ़ती हैष पूज्य बापू जी और 84 वषर उम के महंत बदीरामजी इसके लाभ का पतयक अनुभव िकया है।
जानतंतुओं को पोषण देने वाला यह बेजोड िमशण है।
अनुकर्म
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आआआआआआआआआआ आआआआआआआआआआआ
आयुवेर्द के शर्ेष्ठ गर्ंथ अष्टांगहृदय तथा कश् यपसंिहता में बालकों के िलए
जाने वाले 16 संस्कारों के अंतगर्त सुवणर्पर्ाश का उल्लेख आता है। नवजात िश ु शको जन्म
से एक माह तक रोज िनयिमत रूप से सुवणर्पर्ाश देने से वह अितशय बुिद्धमान बनता है
और सभी पकार के रोगो से उसकी रका होती है। सुवणरपाश मेधा, बुिद्ध, बल, अिग्न तथा आयुष्य
बढ़ानेवाला, कल्याणकारक व पुण्यदायी है।यह गर्हबाधा व गर्हपीड़ा को भी दूर करता है।
6 मास तक इसका सेवन करने से बालक शर्ुितधर होता है अथार्त् सुनी हुई हर बात
धारणकर लेताहै।उसकी स्मरणशिक्तबढ़तीहैतथा शरीरका समुिचतिवकास होताहै।वहपुष्टव चप्पलबनताहै।
सुवणर्पर्ाश शरीर की कांित उज्जवल बनाता है। यह भूख बढ़ाता है, िजससे बालक का शरीर पुष
होता है। बालकों की रोगपर्ितकारक शिक्त बढ़ती है, िजसमे बालयावसथा मे बार-बार उत्पन्न
होनेवाले सदीर्, खाँसी, जुकाम, दस्त, उलटी, न्यूमोिनया आिद कफजन्य िवकारों से छुटकारा
िमलता है।
यह एक पर्कार का आयुवेर्िदक रोगपर्ितकारक टीका भी है जो बालकों की पोिलयो,
क्षयरोग (टी.बी.), िवसूिचका (कॉलरा) आिद से रक्षा करता है।
िवदाथी भी समरणशिकत व शारीिरक शिकत बढाने के िलए इसका उपयोग कर सकते है। माताएँ गभावसथा मे
पाणीजनय कैिलशयम, लौह, जीवनसततवो (िवटािमनस) की गोिलयों के स्थान पर अगर सुवणर्पर्ाश का
पयोग करे तो वे सवसथ, तेजस्वी-ओजसवी व मेधावी संतान को जनम दे सकती है। इसके साथ-साथ ताजा,
िस्नग्ध, सुपाच्य और साित्त्वक आहार लेने से गभर्स्थ िश ु शको िवशेष लाभ होता है। यह
एक उत्तम गभर्पोषक है। इसमें उपिस्थत शुद्ध केसर बालक के वणर् में िनखार लाता है।
वृदावसथा मे, स्मृितिवभर्म, मानिसक अवसाद आिद लक्षणों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप,
हृदयरोग, स्तर्ीरोग आिद में तन मन को सक्षम बनाने के िलए यह कल्याणकारक सुवणर्पर्ाश
िवशेष लाभदायी है।
आआआआ आआआआ आआआआआआआ पहले िदन बूिट को सवचछ पतथर पर शुद जल अथवा मातृसतनय मे एक
बार िघसकर घी तथा शुद्ध शहद के िविमशर्ण (िवषम अनुपात) में िमलाकर नवजात िश ु शको दें।
दूसरे िदन 2 बार दें। इस पर्कार 10 िदन तक पर्ितिदन 1-1 पसारा बढाते जाये। अथात् 1 माह के
बालक के िलए लगभग 27 से 30 बार गुटी िघसकर दे दें। 2 माह – 40, 3 माह – 50, 4 माह – 60,
1 माह – 70 और 6 माह के बालक के िलए लगभग 80 बार िघसकर गुटी दे दें। 6 महीने बाद
सुवणर् पर्ाश गोली का उपयोग करें।
आआआआ आआ आआआआ आआआ
6 माह से 2 साल तक ¼ गोल ी 1 बार घी+शहद से
2 से 3 साल तक ½ गोल ी 1 बार घी+शहद से
3 से 7 साल तक ½ गोल ी 2 बार घी+शहद से
7 से 10 साल तक 1 गोल ी 2 बार घी+शहद से
आआआआआआआआ, आआआआआआआआआआ आआआ आआआआआआआ आआ आआआ 2
आआआआआआआ 2 आआआ आआ+आआआ। आआआ
आआआआ घी और शहद असमान मातर्ा में िमलाकर लें। अथार्त् घी अिधक और शहद
कम अथवा शहद अिधक और घी कम।
अनुकर्म
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आआआ आआ आआआ आआआआआआआआआ आआ आआआ
आआआआआआआआ
आजकल बड़ी-बड़ी िमलों से बनकर आने वाले आटे का उपयोग अिधक होता है
िकंतु यह आटा खाने वाले के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। िमलों के आटे की
अपेक्षा घरेलू मशीनों का आटा अच्छा रहता है लेिकन हाथ की चक्की द्वारा बनाया गया
आटा सवोर्त्तम होता है। आटे की िमलों में पर्ितिदन टनों की मातर्ा में गेहूँ पीसा जाता
है। अतः इतने सारे गेहूँ की ठीक से सफाई नहीं हो पाती। फलतः गेहूँ के साथ उसमें
चूहों द्वारा पैदा की गयी गंदगी तथा गेहूँ में लगे कीड़े आिद भी िघस जाते हैं।
साधकों के िलए इसे शुद्ध एवं साित्त्वक अन्न नहीं कहा जा सकता। इसिलए जहाँ तक हो
सके गेहूँ को साफ करके स्वयं चक्की में पीसना चािहए और उस आटे को सात िदन से
अिधक समय तक नहीं रखना चािहए क्योंिक आटा सात िदन तक ही पौिष्टक रहता है। सात
िदनों के बाद उसके पौिष्टक तत्त्व मरने लगते हैं। इस पर्कार का पोषकतत्त्विवहीन
आटा खाने से मोटापा, पथरी तथा कमजोरी होने की समभावना रहती है।
आटे को छानकर उसका चापड़ा (चोकर) फेंके नहीं, वरन् चोकरयुकत आटे का सेवन करे।
अनुकर्म
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आआआआ आआ आआआआआ आआआ आआआआआआआआआ आआ
आआआआआआ आआ?
आमतौर पर साबूदाना शाकाहार कहा जाता है और वर्त, उपवास मे इसका काफी पयोग होता है।
लेिकन शाकाहार होने के बावजूद भी साबूदाना पिवतर् नहीं है। क्या आप इस सच्चाई को
जानते है ?
यह सच है िक साबूदाना (Tapioca) कसावा के गूदे से बनाया जाता है परंतु इसकी
िनमार्ण िविध इतनी अपिवतर् है िक इसे शाकाहार एवं स्वास्थ्यपर्द नहीं कहा जा सकता।
साबूदाना बनाने के िलए सबसे पहले कसावा को खुले मैदान में बनी कुिण्डयों
में डाला जाता है तथा रसायनों की सहायता से उन्हें लम्बे समय तक सड़ाया जाता है।
इस पर्कार सड़ने से तैयार हुआ गूदा महीनों तक खुले आसमान के नीचे पड़ा रहता है।
रात में कुिण्डयों को गमीर् देने के िलए उनके आस-पास बडे-बड़े बल्ब जलाये जाते
हैं। इससे बल्ब के आस-पास उडने वाले कई छोटे मोटे जहरीले जीव भी इन कुिणडयो मे िगर कर मर जाते है।
दूसरी ओर इस गूदे में पानी डाला जाता है िजससे उसमें सफेद रंग के करोड़ों
लम्बे कृिम पैदा हो जाते हैं। इसके बाद इस गूदे को मजदूरों के पैरों तले रौंदा जाता
है। इस पर्िकर्या में गूदे में िगरे हुए कीट पतंग तथा सफेद कृिम भी उसी में समा जाते
हैं। यह पर्िकर्या कई बार दोहरायी जाती है।
इसके बाद इसे मशीनों में डाला जाता है और मोती जैसे चमकीले दाने बनाकर
साबूदाने का नाम रूप िदया जाता है परंतु इस चमक के पीछे िकतनी अपिवतर्ता िछपी है वह
सभी को िदखायी नहीं देती।
अनुकर्म
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आआ.आआ. आआआआ आआआआआ आआ आआआआआआ आआ
आआआआआआ................
अमृतसर मेिडकल कालेज के स्नायुतंतर् िवभाग के अध्यक्ष डॉ. अशोक उप्पल ने
अमृतसर में हुए अिखल भारतीय सम्मेलन में कहा िक पशि ्चमी देशों में टेिलिवजन
अिधक देखने के कारण बच्चों में िमगीर् का रोग बहुत बढ़ चुका है और अब भारत में भी
ऐसे कई समाचार सुनने मे आ रहे है। देश मे अनेक चैनलो के पसारण के कारण बचचे पहले की अपेका अिधक समय तक
टी.वी. देखते हैं। इसके दुषप ् िरणामस्वरूप उनमें िमगीर् रोग से गर्स्त होने की संभावना
बढ़ रही है।
सम्मेलन में यह मुदद ् ा िवशेष रूप से चिचर्त रहा।
सम्मेलन में भाग लेने वाले िविभन्न डॉक्टरों ने इस तथ्य की पुिष्ट करते हुए
कहाः टेिलिवजन में पर्सािरत कायर्कर्मों को बड़ों की अपेक्षा बच्चे अिधक ध्यानपूवर्क
देखते हैं। टेिलिवजन पर तेजी से बदल रहे दृश् योंका उनके मिस्तष्क में िस्थत
हारमोन्स पर बुरा पर्भाव पड़ता है, िजससे उनका िदमागी संतुलन िबगड जाता है। फलतः िमगी, अशांित,
तनाव जैसे रोगों का होना तथा कर्ोधी व िचड़िचड़ा स्वभाव बनना साधारण बात हो जाती है।
बच्चों के अितिरक्त टी.वी. के अिधक शौकीन वयस्कों में भी इस पर्कार की समस्या
पैदा हो सकती है। िवशेषकर देर रात तक टी.वी. देखने वालों को यह रोग होने की अिधक संभावना
रहती है।
अनुकर्म
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आआआआआआ आआ आआआआ आआआआआ आआआआआआआ आआ
आआआआआआआ
क्या आप जानते हैं िक चॉकलेट में कई ऐसी चीजें भी हैं जो शरीर को धीरे-धीरे
रोगी बना सकती है ? पापत जानकारी के अनुसार चॉकलेट का सेवन मधुमेह एवं हृदयरोग को उतपन होने मे सहाय
करता है तथा शारीिरक चुस्ती को भी कम कर देता है। यिद यह कह िदया जाये िक चॉकलेट
एक मीठा जहर है तो इसमें कोई अितशयोिक्त नहीं होगी।
कुछ चॉकलेटों में इथाइल एमीन नामक काबर्िनक यौिगक होता है जो शरीर में
पहुँचकर रकतवािहिनयो की आंतिरक सतह पर िसथत तंितकाओं को उदीपत करता है। इससे हृदयरोग पैदा होते है।
हृदयरोग िवशेषज्ञों का मानना है िक चॉकलेट के सेवन से तंितर्काएँ उदीप्त
होने से डी.एन.ए. जीनस सिकय होते है िजससे हृदय की धडकने बढ जाती है। चॉकलेट के माधयम से शरीर मे
पवेश करने वाले रसायन पूरी तरह पच जाने तक अपना दुषपभाव छोडते रहते है। अिधकाश चॉकलेटो के िनमाण मे पयुकत
होने वाली िनकेल धातु हृदयरोगों को बढ़ाती है।
इसके अलावा चॉकलेट के अिधक पर्योग से दाँतों में कीड़ा लगना, पायिरया, दाँतों
का टेढ़ा होना, मुख में छाले होना, स्वरभंग, गल े म े सू ज न व जलन , पेट मे कीडे होना, मूतर्
में जलन आिद अनेक रोग पैदा हो जाते हैं।
वैसे भी शरीर सवासथय एवं आहार के िनयमो के आधार पर िकसी वयिकत को चॉकलेट की कोई आवशयकता नही
है।
अनुकर्म
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'आआआआआ आआ आआआआआ आआआआआआआ आआआआआ आआ आआ'
आचायर् सुशन र्त
ु े कहा हैः 'भैस का दूध पचने मे अित भारी, अितशय अिभष्यंदी होने से
रसवाही सर्ोतों को कफ से अवरूद्ध करने वाला एवं जठरािग्न का नाश करने वाला है !' यिद
भैस का दूध इतना नुकसान कर सकता है तो उसका मावा जठरािगन का िकतना भयंकर नाश करता होगा? मावे के
िलए शास्तर् में िकलाटक शब्द का उपयोग िकया गया है, जो भारी होने के कारण भूख िमटा देता है।
आआआआआ आआआआआआआआ आआआआआआ आआआआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ आआआआ
आआआआआआआ आआआआआआ आआआ। आआआआ आआआ आआआआआआआआआआआआ
नयी ब्याही हुई गाय-भैस के शुरआत के दूध को पीयूष भी कहते है। यही कचचा दूध िबगडकर गाढा हो
जाता है, िजसे कीरशाक कहते है। दूध मे दही अथवा छाछ डालकर उसे फाड िलया जाता है िफर उसे सवचछ वसत मे
बाँधकर उसका पानी िनकाल िलया जाता है िजसे तकर्िपंड (छेना या पनीर) कहते हैं।
भावपकाश िनघंटु मे िलखा गया है िक ये सब चीजे पचने मे अतयंत भारी एवं कफकारक होने से अतयंत तीवर
जठरागनवालो को ही पुिष देती है, अन्य के िलए तो रोगकारक ही सािबत होती है।
शर्ीखंड और पनीर भी पचने में अित भारी, किब्जयत करने वाले एवं अिभष्यंदी
है। ये चबीर्, कफ, िपत एवं सूजन उतपन करने वाले है। ये यिद नही पचते है तो चकर, जवर, रक्तिपत्त (रक्त
का बहना), रक्तवात, त्वचारोग, पाडुरोग(रक्त न बनना) तथा रक्त को कैंसर आिद रोगों को जन्म
देते हैं।
जब मावा, पीयूष, छेना (तकर्िपंड), क्षीरशाक, दही आिद से िमठाई बनाने के िलए
उनमें शक्कर िमलायी जाती है, तब तो वे और भी ज्यादा कफ करने वाले, पचने मे भारी एवं
अिभष्यंदी बन जाते हैं। पाचन में अत्यंत भारी ऐसी िमठाइयाँ खाने से किब्जयत एवं
मंदािग्न होती हैं जो सब रोगों का मूल है। इसका योग्य उपचार न िकया जाय तो ज्वर आता
है एवं ज्वर को दबाया जाय अथवा गलत िचिकत्सा हो जाय तो रक्तिपत्त, रक्तवात, त्वचा के
रोग, पाडुरोग, रक्त का कैंसर, मधुमेह, कोलेस्टर्ोल बढ़ने से हृदयरोग आिद रोग होते हैं।
कफ बढ़ने से खाँसी, दमा, क्षयरोग जैसे रोग होते हैं। मंदािग्न होने से सातवीं धातु
(वीयर) कैसे बन सकती है? अतः अंत में नपुंसकता आ जाती है!
आज का िवज्ञान भी कहता है िक 'बौिद्धक कायर् करने वाले व्यिक्त के िलए िदन के
दौरान भोजन में केवल 40 से 50 ग ा म वसा (चरबी) पयापत है और किठन शम करने वाले के िलए 90
ग ा म। इतनी वसा तो सामा न य भोजन म े िल य े जान े वाल े घी , तेल, मक्खन, ग े हू ँ , चावल,
दूध आिद में ही िमल जाती है। इसके अलावा िमठाई खाने से कोलेस्टर्ोल बढ़ता है।
धमिनयोंकी जकड़नबढ़तीहै , नािड़याँ मोटी होती जाती हैं। दूसरी ओर रक्त में चरबी की मातर्ा
बढ़ती है और वह इन नािड़यों में जाती है। जब तक नािड़यों में कोमलता होती है तब
तक वे फैलकर इस चरबी को जाने के िलए रास्ता देती है। परंतु जब वे कड़क हो जाती
हैं, उनकी फैलने की सीमा पूरी हो जाती है तब वह चरबी वहीं रुक जाती है और हृदयरोग को
जनम देती है।'
िमठाई में अनेक पर्कार की दूसरी ऐसी चीजें भी िमलायी जाती हैं, जो घृणा उतपन करे।
शक्कर अथवा बूरे में कॉिस्टक सोडा अथवा चोंक का चूरा भी िमलाया जाता है िजसके
सेवन से आँतों में छाले पड़ जाते हैं। पर्त्येक िमठाई में पर्ायः कृितर्म (एनेिलन)
रंग िमलाये जाते हैं िजसके कारण कैंसर जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
जलेबी मे कृितम पीला रंग (मेटालीन यलो) िमलाया जाता है, जो हािनकारक है। लोग उसमे टॉफी,
खराब मैदा अथवा घिटया िकस्म का गुड़ भी िमलाते हैं। उसे िजन आयस्टोन एवं पेराफील
से ढका जाता है, वे भी हािनकारक है। उसी पकार िमठाईयो को मोहक िदखाने वाले चादी के वकर एलयूमीिनयम
फॉइल मे से बने होते है एवं उनमे जो केसर डाला जाता है, वह तो केसर के बदले भुटे के रेशे मे मुगी का खून भी हो सकता
है !!
आधुिनक िवदेशी िमठाईयों में पीपरमेंट, गोल े , चॉकलेट, िबस्कुट, लालीपॉप, केक,
टॉफी, जेमस, जेलीज, बर्ेड आिद में घिटया िकस्म का मैदा, सफेद खड़ी, पलासटर ऑफ पेिरस,
बाजरी अथवा अन्य अनाज का िबगड़ा हुआ आटा िमलाया जाता है। अच्छे केक में भी
अण्डे का पाउडर िमलाकर बनावटी मक्खन, घिटया िकस्म के शक्कर एवं जहरीले सुगंिधत
पदाथर िमलाये जाते है। नानखटाई मे इमली के बीज के आटे का उपयोग होता है। कनफेकशनरी मे फेच चॉक, ग लकोज
का िबगड़ा हुआ सीरप एवं सामान्य रंग अथवा एसेन्स िमलाये जाते हैं। िबस्कुट बनाने
के उपयोग में आने वाले आकषर्क जहरी रंग हािनकारक होते हैं।
इस पर्कार, ऐसी िमठाइया वसतुतः िमठाई न होते हुए बल, बुिद्ध और स्वास्थ्यनाशक, रोगकारक
एवं तमस बढ़ानेवाली सािबत होती है।
िमठाइयों का शौक कुपर्वृित्तयों का कारण एवं पिरणाम है। डॉ. ब्लोच िलखते हैं िक
िमठाई का शौक जल्दी कुपर्वृित्तयों की ओर पर्ेिरत करता है। जो बालक िमठाई के ज्यादा
शौकीन होते हैं उनके पतन की ज्यादा संभावना रहती है और वे दूसरे बालकों की
अपेक्षा हस्तमैथुन जैसे कुकमोर्ं की ओर जल्दी िखंच जाते हैं।
स्वामी िववेकानंद ने भी कहा हैः
''िमठाई (कंदोई) की दुकान साक्षात यमदूत का घर है।''
जैस,े खमीर लाकर बनाये गये इडली-डोसे आिद खाने मे तो सवािदष लगते है परंतु सवासथय के िलए
अत्यंत हािनकारक होते हैं, इसी पर्कार मावे एवं दूध को फाड़कर बने पनीर से बनायी
गयी िम ठाइ य ा लगती तो मीठी ह ै पर होती ह ै जहर क े समान। िम ठाई खान े स े लीव र और
आँतों की भयंकर असाध्य बीमािरयाँ होती हैं। अतः ऐसी िमठाइयों से आप भी बचें, औरो को
भी बचाये।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआआआआआआ
रसायन िचिकत्सा आयुवेर्द के अष्टांगों में से एक महत्त्वपूणर् िचिकत्सा है।
रसायन का सीधा सम्बन्ध धातु के पोषण से है। यह केवल औषध-वयवसथा न होकर औषिध, आहार-
िवहार एवं आचार का एक िविशष पयोग है िजसका उदेशय शरीर मे उतम धातुपोषण के माधयम से दीघर आयुषय,
रोगपर्ितकारक शिक्त एवं उत्तम बुिद्धशिक्त को उत्पन्न करना है। स्थूल रूप से यह शारीिरक
स्वास्थ्य का संवधर्न करता है परंतु सूक्ष्म रूप से इसका सम्बन्ध मनःस्वास्थ्य से अिधक
है। िवशेषतः मेध्य रसायन इसके िलए ज्यादा उपयुक्त है। बुिद्धवधर्क पर्भावों के
अितिरक्त इसके िनदर्ाकारी, मनोशांितदायी एवं िचंताहारी पर्भाव भी होते हैं। अतः इसका
उपयोग िवशेषकर मानिसक िवकारजनय शारीिरक वयािधयो मे िकया जा सकता है।
रसायन सेवन में वय, पकृित, सात्म्य, जठरािगन तथा धातुओं का िवचार आवशयक है। िभन-िभन वय
तथा पर्कृित के लोगों की आवश् यकताएँिभन्न-िभन होने के कारण तदनुसार िकये गये पयोगो से ही वािछत
फल की पर्ािप्त होती है।
1 से 10 साल तक के बच्चों को 1 से 2 चुटकी वचाचूणर् शहद में िमलाकर चटाने से
बाल्यावस्था में स्वभावतः बढ़ने वाले कफ का शमन होता है, वाणी सपष व बुिद कुशाग होती है।
11 से 20 साल तक के िकशोंरों एवं युवाओं को 2-3 ग ा म बलाचू णर 1-1 कप पानी व दूध
में उबालकर देने से रस, मांस तथा शुकर्धातुएँ पुष्ट होती हैं एवं शारीिरक बल की वृिद्ध
होती है।
21 से 30 साल तक के लोगों को 1 चावल के दाने के बराबर शतपुटी लौह भस्म गोघृत
में िमलाकर देने से रक्तधातु की वृिद्ध होती है। इसके साथ सोने से पहले 1 चम्मच
आँवला चूणर् पानी के साथ लेने से नािड़यों की शुिद्ध होकर शरीर में स्फूितर् व ताजगी
का संचार होता है।
31 से 40 साल तक के लोगों को शंखपुष्पी का 10 से 15 िम.ली. रस अथवा उसका 1
चम्मच चूणर् शहद में िमलाकर देने से तनावजन्य मानिसक िवकारों में राहत िमलती है
व नीद अचछी जाती है। उचच रकतचाप कम करने एवं हृदय को शिकत पदान करने मे भी वह पयोग बहुत िहतकर है।
41 से 50 वषर की उम के लोगो को 1 ग ा म ज य ोित िषम त ी चू णर 2 चुटकी सोंठ के साथ गरम
पानी मे िमलाकर देने तथा जयोितषमती के तेल से अभयंग करने से इस उम मे सवभावतः बढने वाले वातदोष का शमन होता
है एवं संिधवात, पकाघात (लकवा) आिद वातजन्य िवकारों से रक्षा होती है।
51 से 60 वषर की आयु मे दृिषशिकत सवभावतः घटने लगती है जो 1 ग ा म ित फ ल ा चू णर तथा आधा
ग ा म स प त ा मृ त लौह गौघृ त क े साथ िद न म े 2 बार लेने से बढ़ती है। सोने से पूवर् 2-3
ग ा म ित फ ल ा चू णर गरम पानी क े साथ ल े न ा भी िह तकर ह ै । िग ल ो य , गोक ु र एवं आ ँ व ल े
से बना रसायन चूणर् 3 से 10 ग ा म तक स े व न करना अित उत म ह ै ।
आआआआआ आआआआआआ शंखपुष्पी, जटामासी और बाहीचूणर समभाग िमलाकर 1 ग ा म चू णर शहद
के साथ लेने से गर्हणशिक्त व स्मरणशिक्त में वृिद्ध होती है। इससे मिस्तष्क को बल
िमलता है, नींद अच्छी आती है एवं मानिसक शांित की पर्ािप्त होती है।
आआआआ आआआआआआ केवल सदाचार के पालन से भी शरीर व मन पर रसायनवत् पर्भाव
पडता है और रसायन के सभी फल पापत होते है।
अनुकर्म
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आआआआआ-आआआआआ आआ आआआआआआ
सूयर् शिक्तवधर्क और बुिद्ध-िवकासक है।
हररोज पर्ातःकाल में सूयोर्दय से पहले स्नानािद से िनवृत्त होकर खुले मैदान
में अथवा घर की छत पर जहाँ सूयर् का पर्काश ठीक पर्कार से आता हो वहाँ नािभ का भाग
खुला करके सूयोर्दय के सामने खड़े रहो। तदनंतर सूयर्देव को पर्णाम करके, आँखें
बंद करके िचंतन करो िकः
'जो सूयर की आतमा है वही मेरी आतमा है। ततवतः दोनो की शिकत समान है।'
िफर आँखें खोलकर नािभ पर सूयर् के नीलवणर् का आवाहन करो और इस पर्कार
मंतर् बोलोः
आ आआआआआआआ आआआ। आ आआआआआआआ आआआआआ आआआआ आआआ। आ आआआआआ।
आआआ। आ आआआआ आआआआआ आआआआआआ आआआ। आ आआआआआआआआआआआआ । । आआआआआ
आआआआआआ आआआआआ आआआआआआआआ आआआ। आ आआआआआआआ । आआआआआ आआआआआआ आआआ। ।
आ आआआआआआआआ आआआ। आ आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ । आआआआ
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआ (आआआआआआआआआआआआ आआआआआ)
हमारे ऋिषयों ने बर्ह्माण्ड के तत्वों का सूक्ष्म अध्ययन करके उनसे लाभ लेने
के िलए अनेक पर्योग िकये। सनातन धमर् के मंिदरों की छत पर बनी ितर्कोणीय आकृित
उन्हीं पर्योगों में से एक है। िजसे वास्तश ु ास्तर् एवं वैज्ञािनक भाषा में िपरािमड
कहते हैं। यह आकृित अपने-आप में अदभुत है।
िपरािमड चार ितकोणो से बना होता है। जयािमितशासत के अनुसार ितकोण एक िसथर आकार है। अतः
िपरािमड िसथरता का पदाता है। िपरािमड के अंदर बैठकर िकया गया शुभ संकलप दृढ होता है। कई पयोगो से यह देखा
गया िक िकसी बु र ी आदत का िशकार व यिकत यिद िप रािम ड म े ब ै ठ क र उस े छोड न े का
संकल्प करे तो वह अपने संकल्प में सामान्य अवस्था की अपेक्षा कई गुना अिधक दृढ़
रहता है और उसकी बुरी आदत छूट जाती है।
िवशेषजो का कहना है िक िपरािमड मे कोई भी दूिषत, खराब या बाधक तत्त्व नहीं िटकते हैं।
अपनी िवशेष आकृित के कारण यह केवल साित्त्वक ऊजार् का ही संचय करता है। इसीिलए
थोड़े िदनों तक िपरािमड में रहने वाले व्यिक्त के दुगुर्ण भी दूर भाग जाते हैं।
िपरािमड मे िकसी भी पदाथर के मूल कण नष नही होते इसिलए इसमे रखे हुए पदाथर सडते-गलत े नही
हैं। इसका पर्त्यक्ष पर्माण है िमसर् के िपरािमडों में हजारों वषर् पहले रखे गये शव,
जो आज भी सुरिकत है।
िमसर् के िपरािमड मृत शरीर को नष्ट होने से बचाने के िलए बनाये गये हैं।
इनकी वगार्कार आकृित पृथ्वी तत्त्व का ही गुण संगर्ह करती है जबिक मंिदरों के िखर शप र
बने िपरािमड वगार्कार के साथ-साथ ितकोने व गोलाकार आकृित के होने से पंच महाभूतों
को सिकर्य करने के िलए बनाये गये हैं। इस पर्कार के सिकर्य (ऊजार्मय) वातावरण मे
भकतो की भिकत, िकर्या तथा ऊजार्शिक्त का िवकास होता है।
िपरािमड बहाणडीय ऊजा िजसे िवजान कॉिसमक एनजी कहता है, उसे अवशोिषत करता है।
बर्ह्माण्ड स्वयं बर्ह्माण्डीय ऊजार् का सर्ोत है तथा िपरािमड अपनी अदभुत आकृित के
द्वारा इस ऊजार् को आकिषर्त कर अपने अंदर के क्षेतर् में घनीभूत करता है। यह
बर्ह्माण्डीय ऊजार् िपरािमड के िखरवाले शन ुकीले भाग पर आकिषर्त होकर िफर धीरे -धीरे
इसकी चारों भुजाओं से पृथ्वी पर उतरती है। यह िकर्या सतत चलती रहती है तथा इसका
अिद्वतीय लाभ इसके भीतर बैठे व्यिक्त या रखे हुए पदाथर् को िमलता है।
दिक्षण भारते के मंिदरों के सामने अथवा चारों कोनों में िपरािमड आकृित के
गोपु र इसी उद े श य स े बनाय े गय े ह ै । य े गोपु र एवं िशखर इस प क ा र स े बनाय े गय े
हैं तािक मंिदर में आने-जाने वाले भकतो के चारो ओर बहाणडीय ऊजा का िवशाल एवं पाकृितक आवरण
तैयार हो जाय।
अपनी िवशेष आकृित से पाँचों तत्त्वों को सिकर्य करने के कारण िपरािमड शरीर
को पृथ्वी तत्त्व के साथ, मन को वायु तथा बुिद्ध को आकाश-तत्त्व के साथ एकरूप होने के
िलए आवश् यकवातावरण तैयार रहता है।
िपरािमड िकसी भी पदाथर की सुषुपत शिकत को पुनः सिकय करने की कमता रखता है। फलतः यह शारीिरक,
मानिसक एवं बौिद्धक क्षमताओं को िवकिसत करने में महत्त्वपूणर् भूिमका िनभाता है।
परम पूजय संत शी आसारामजी बापू के िदशा-िनदेर्शन में उनके कई आशर्मों में साधना के
िलए िपरािमड बनाये गये हैं। मंतर्जप, पाणायाम एवं धयान के दारा साधक के शरीर मे एक पकार की
िवशेष सािततवक ऊजा उतपन होती है। यह ऊजा उसके शरीर के िविभन भागो से वायुमणडल मे चली जाती है परंतु
िपरािमड ऊजा का संचय करता है। अपने भीतर की ऊजा को बाहर नही जाने देता तथा बहाणड की सािततवक ऊजा को
आकिषर्त करता है। फलतः साधक पूरे समय साित्त्वक ऊजार् के बीच रहता है।
आशर्म में बने िपरािमडों में साधक एक सप्ताह के िलए अंदर ही रहता है। उसका
खाना पीना अंदर ही पहुँचाने की व्यवस्था है। इस एक सप्ताह में िपरािमड के अंदर बैठे
साधक को अनेक िदव्य अनुभूितयाँ होती हैं। यिद उस साधक की िपरािमड में बैठने से
पहले तथा िपरािमड से बाहर िनकलने के बाद की शारीिरक, मानिसक, बौिद्धक एवं आध्याित्मक िस्थित का
तुलनात्मक अध्ययन िकया जाय तो िपरािमड के पर्भाव को पर्त्यक्ष देखा जा सकता है।
िपरािमड दारा उतपन ऊजा शरीर की नकारातमक ऊजा को सकारातमक ऊजा मे बदल देती है िजसके कारण
कई रोग भी ठीक हो जाते हैं। व्यिक्त के व्यवहार को पिरवितर्त करने में भी यह पर्िकर्या
चमत्कािरक सािबत हुई है। िवशेषज्ञों ने तो परीक्षण के द्वारा यहाँ तक कह िदया िक
िपरािमड के अंदर कुछ िदन तक रहने पर मासाहारी पशु भी शाकाहारी बन सकता है।
इस पर्कार िपरािमड की साित्त्वक ऊजार् का यिद साधना व आदर्शज ीवन के िनमार्ण
हेतु पर्योग िकया जाय तो आशातीत लाभ हो सकते हैं। हमारे ऋिषयों का मंिदरों की छतों
पर िपरािमड िशखर बनाने का यही हेतु रहा है। हमे उनकी इस अनमोल देन का यथावत् लाभ उठाना चािहए।
अिधकांश लोग यही समझते हैं िकं िपरािमड िमसर् की देन है परंतु यह सरासर
गलत ह ै । िप रािम ड क े बार े म े हमार े ऋिष यो न े िम स क े लोग ो स े भी सू क म एवं
गहन खोज े की ह ै । िम स क े लोग ो न े िप रािम ड को मात मृ त शरीरो को सु र िक त रखन े
के िलए बनाया जबिक हमारे ऋिषयों ने इसे जीिवत मानव की शारीिरक, मानिसक, बौिद्धक
एवं आध्याित्मक उन्नित के िलए बनाया है।
भारतीय संसकृित िवश की सबसे पाचीन संसकृित है तथा भारत के अित पाचीन िशलपगंधो एवं िशवसवरोदय जैसे
धािमर्कगर्ंथोम
ं ेभ
ं ीिपरािमडकी जानकारीिमलतीहै।अतःयहिसद्धहोताहैिकिपरािमडमृत चमड़े की सुरक्षाकरनेवाले
िमसर्वािसयों की नहीं अिपतु जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का िवज्ञान जानने वाले
भारतीय ऋिषयो की देन है।
अनुकर्म
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आआआ
शंख दो पर्कार के होते हैं – दिक्षणावतर् एवं वामावतर्। दिक्षणावतर् शंख पुण्य
योग से िमलता है। यह िजसके यहाँ होता है उसके यहाँ लक्ष्मी जी िनवास करती हैं। यह
ितर्दोषशश ामक,
शश शुद्ध एवं नविनिधयों में से एक िनिध है तथा गर्ह एवं गरीबी की पीड़ा,
क्षय, िवष, कृशता एवं नेतर्रोग का नाश करता है। जो शंख सफेद चन्दर्कान्तमिण जैसा होता
है वह उत्तम माना जाता है। अशु द्धशंख गुणकारी नहीं होते, उन्हें शुद्ध करके ही दवा के
रूप में पर्योग में लाया जाता है।
भारत के महान वैजािनक शी जगदीशचनद बसु ने िसद करके बताया है िक शंख को बजाने पर जहा तक उसकी
ध्विनपहुँचतीवहाँतक रोगउत्पन्नकरनेवालेकई पर्कारकेहािनकारकजीवाणुनष्टहोजातेहैं।इसीिलएअनािदकालसे
पातःकाल एवं संधया के समय मंिदरो मे शंख बजाने का िरवाज चला आ रहा है।
संध्या के समय हािनकारक जंतु पर्कट होकर रोग उत्पन्न करते हैं, अतः उस समय
शंख बजाना आरोग्य के िलए लाभदायक हैं और इससे भूत-पेत, राक्षस आिद भाग जाते हैं।
आआआआ-आआआआआआआ
आआआआआआआ अधोिलिखत पर्त्येक रोग में 50 से 250 िम.ग ा . शंखभस्म ले सकते
हैं।
आआआआआआआआ गू ँ ग े व यिकत क े द ा र ा प ित िद न 2-3 घंटे तक शंख बजवायें। एक
बड़े शंख में 24 घंटे तक रखा हुआ पानी उसे पर्ितिदन िपलायें, छोटे शंखों की माला
बनाकर उसके गले में पहनायें तथा 50 से 250 िम.ग ा . शंखभस्म सुबह शाम शहद साथ
चटायें। इससे गूँगापन में आराम होता है।
आआआआआआआआ 1 से 2 ग ा म आ ँ व ल े क े चू णर म े 50 से 250 िम.ग ा . शंखभस्म
िमलाकर सुबह शाम गाय के घी के साथ देने से तुतलेपन में लाभ होता है।
तेजपात (तमालपतर्) को जीभ के नीचे रखने से रूक रूककर बोलने अथार्त्
तुतलेपन में लाभ होता है।
सोते समय दाल के दाने के बराबर िफटकरी का टुकड़ा मुँह में रखकर सोयें। ऐसा
िनत्य करने से तुतलापन ठीक हो जाता है।
दालचीनी चबाने व चूसने से भी तुतलापन में लाभ होता है।
दो बार बादाम पर्ितिदन रात को िभगोकर सुबह छील लो। उसमें 2 काली िमचर्, 1
इलायची िमलाकर, पीसकर 10 ग ा म म क खन म े िम ल ाकर ल े । यह उपाय कु छ माह तक िन रं त र
करने से काफी लाभ होता है।
आआआ आआ आआआआआ आआ आआआआ शंख को पानी में िघसकर उस लेप को मुख पर
लगाने से मुख कांितवान बनता है।
आआ-आआआआआआ-आआआआआआआआआआआ शंखभस्म को मलाई अथवा गाय के दूध के साथ
लेने से बल-वीयर मे वृिद होती है।
आआआआ, आआआ आआआआआआ आआआआआ लेंडीपीपर का 1 ग ा म चू णर एवं शं खभ स म सु ब ह
शाम शहद के साथ भोजन के पूवर् लेने से पाचनशिक्त बढ़ती है एवं भूख खुलकर लगती
है।
आआआआआ-आआआ-आआआआआआआआआआ 10 िम.ली. अदरक के रस के साथ शंखभस्म सुबह
शाम लेने से उक्त रोगों में लाभ होता है।
आआआआआआआ 5 ग ा म गाय क े घी म े 1.5 ग ा म भु न ी हु ई ही ग एवं शं खभ स म ल े न े स े
उदरशू लिमटता है।
आआआआआआआ नींबू के रस में िमशर्ी एवं शंखभस्म डालकर लेने से अजीणर् दूर
होता है।
आआआआआआ नागरबेल के पत्तों (पान) के साथ शंखभस्म लेने से खाँसी ठीक होती
है।
आआआआआआआआआ (Diarhoea) 1.5 ग ा म जायफल का चू णर , 1 ग ा म घी एवं शं खभ स म एक
एक घण्टे के अंतर पर देने से मरीज को आराम होता है।
आआआ आआ आआआआआ शहद में शंखभस्म को िमलाकर आँखों में आँजने से लाभ
होता है।
आआआआआआआआआ (आआआआ आआ आआआ आआ आआआ आआआआ)- गरम पानी क े साथ शं खभ स म
देने से भोजन के बाद का पेटददर् दूर होता है।
आआआआआआ आआआ आआआआआआआ (Enlarged Spleen) अच्छे पके हुए नींबू के 10 िम.ली.
रस में शंखभस्म डालकर पीने से कछुए जैसी बढ़ी हुई प्लीहा भी पूवर्वत् होने लगती है।
आआआआआआआआ-आआआआआआआआआ (Sprue) शंखभस्म को 3 ग ा म स ै ध व नमक क े साथ
िदन में तीन बार (भोजन के बाद) देने से किठन संगर्हणी में भी आराम होता है।
आआआआआ ()- मोरपंख के 50 िम.ग ा . भसम मे शंखभसम िमलाकर शहद के साथ डेढ-डेढ घंटे के अंतर
पर चाटने से लाभ होता है।
अनुकर्म
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आआआ आआ आआआआआ आआ आआआआ-आआआआआआ
आआआआआआआआ अफर्ीका िनवासी घंटा बजाकर जहरीले सपर्दंश की िचिकत्सा करते
हैं।
आआआआआआआआ मास्को सैनीटोिरयम (क्षयरोग िचिकत्सालय) में घंटे की ध्विन से
क्षयरोग ठीक करने का सफल पर्योग चल रहा है। घंट ध्विन से क्षयरोग ठीक होता है तथा
अन्य कई शारीिरक कष्ट भी दूर होते हैं।
आआआआआ-आआआआआ अभी बजा हुआ पंचधातु का घंटा आप पानी से धो डािलये और वह
पानी उस सती को िपला दीिजए िजस सती को अतयंत पसव वेदना हो रही हो और पसव न होता हो। िफर देिखये, एक
घंटे के अंदर ही सारी िवघ्न बाधाओं को हटाकर सफलतापूवर्क पर्सव हो जायेगा।
अनुकर्म
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आआआआआआआआ आआ आआआआआआआआ आआआआ
एक ओर तो तथा किथत मनोिचिकत्सक हमारे देश के युवावगर् को गुमराह कर उसे
संयम सदाचार और बर्ह्मचयर् से भर्ष्ट करके असाध्य िवकारों के िकार श ब ना रहे हैं तो
दूसरी ओर कुछ तथा किथत िवद्वान वाममागर् का सही अथर् न समझ सकने के कारण स्वयं तो
िदग्भर्िमत हैं ही, साथ ही उसके आधार पर 'संभोग से समािध' की ओर ले जाने के नाम
पर युवानो को पागलपन और महािवनाश की ओर ले जा रहे है। इन सबसे समाज व राषट को भारी नुकसान पहुँच रहा है।
कोई भी िदग्भर्िमत व्यिक्त, समाज अथवा राष्टर् कभी उन्नित नहीं कर सकता, उसका पतन
िनशि ्चत है। अतः समाज को सही मागर्दर्शन की िनतांत आवश् यकताहै।
आजकल तंतर्तत्त्व से अनिभज्ञ जनता में वाममागर् को लेकर एक भर्म उत्पन्न
हो गया है। वास्तव में पर्ज्ञावान पर्शंसनीय योगी का नाम 'वाम' है और उस योगी के मागर्
का नाम ही 'वाममागर' है। अतः वाममागर् अत्यंत किठन है और योिगयों के िलए भी अगम्य है
तो िफर इिन्दर्यलोलुप व्यिक्तयों के िलए यह कैसे गम्य हो सकता है? वाममागर िजतेिनदय के िलए
है और िजतेिन्दर्य योगी ही होते हैं।
वाममागर उपासना मे मद, मांस, मीन, मुदर्ा और मैथुन – ये पाँच आध्याित्मक मकार
िजतेिनदय, पजावान योिगयो के िलए ही पशसय है कयोिक इनकी भाषा साकेितक है िजसे संयमी एवं िववेकी वयिकत ही ठीक-
ठीक समझ सकता है।
आआआआआ िशवि शक्त के संयोंग से जो महान अमृतत्व उत्पनन्न होता है उसे ही
मद्य कहा गया है अथार्त् योगसाधना द्वारा िनरंजन, िनिवर्कार, सिच्चदानंद परबर्ह्म में
िवलय होने पर जो जान उतपन होता है उसे मद कहते है और बहरनध मे िसथत सहसपददल से जो अमृततव सािवत होता
है उसका पान करना ही मद्यपान है। यिद इस सुरा का पान नहीं िकया जाता अथार्त् अहंकार
का नाश नहीं िकया जाता तो सौ कल्पों में ईश् वरदर्शन करना असंभव है। तंतर्तत्त्वपर्काश
में आया है िक जो सुरा सहसर्ार कमलरूपी पातर् में भरी है और चन्दर्मा कला सुधा से
सर्ािवत है वही पीने योग्य सुरा है। इसका पर्भाव ऐसा है िक यह सब पर्कार के अशु भ
कमोर्ं को नष्ट कर देती है। इसी के पर्भाव से परमाथर्कश ु ल ज्ञािनयों-मुिनयों ने
मुिक्तरूपी फल पर्ाप्त िकया है।
आआआआआ िववेकरपी तलवार से काम, कर्ोध, लोभ, मोह आिद पाशवी वृित्तयों का संहार कर
उनका भक्षण करने की ही मांस कहा गया है। जो उनक भक्षण करे एवं दूसरों को सुख
पहुँचाये, वही सचचा बुिदमान है। ऐसे जानी और पुणयशील पुरष ही पृथवी पर के देवता कहे जाते है। ऐसे सजजन कभी
पशुमास का भकण करके पापी नही बनते बिलक दूसरे पािणयो को सुख देने वाले िनिवरषय तततव का सेवन करते है।
आलंकािरक रूप से यह आत्मशु िद्धका उपदेश है अथार्त् कुिवचारों, पाप-तापों, कषाय-
कल्मषों से बचने का उपदेश है। िकंतु मांसलोलुपों ने अथर् का अनथर् कर उपासना के
अितिरक्त हवन यज्ञों में भी पशु वधपर्ारंभ कर िदया।
आआआ (आआआआआआ)- अहंकार, दम्भ, मद, मत्सर, द्वेष, चुगलखोरी – इन छः मछिलयों
का िवषय-िवरागरपी जाल मे फँसाकर सदिवदारपी अिगन मे पकाकर इनका सदुपयोग करने को ही मीन या मतसय कहा
गया ह ै अथ ा त ् इिनद य ो का वशीकरण , दोषों तथा दुगुर्णों का त्याग, साम्यभाव की िसिद्ध
और योगसाधन मे रत रहना ही मीन या मतसय गहण करना है। इनका साकेितक अथर न समझकर पतयक मतसय के दारा
पूजन करना तो अथर का अनथर होगा और साधना केत मे एक कुपवृित को बढावा देना होगा।
जल मे रहने वाली मछिलयो को खाना तो सवरथा धमरिवरद है, पापकमर है। दो मतसय गंगा-यमुना के भीतर
सदा िवचरण करते रहते हैं। गंगा यमुना से आशय है मानव शरीरस्थ इड़ा-िपंगला नािडयो से।
उनमें िनरंतर बहने वाले शव ् ास-पशास ही दो मतसय है। जो साधक पाणायाम दारा इन शास-पशासो को
रोककर कुंभक करते हैं वे ही यथाथर् में मत्स्य साधक हैं।
आआआआआआआ आशश ा , तृष्णा, िनंदा, भय, घृणा, घमंड, लज्जा, कर्ोध – इन आठ कष्टदायक
मुदर्ाओं को त्यागकर ज्ञान की ज्योित से अपने अंतर को जगमगाने वाला ही मुदर्ा साधक
कहा जाता है। सत्कमर् में िनरत पुरुषों को इन मुदर्ाओं को बर्ह्मरूप अिग्न में पका डालना
चािहए। िदव्य भावानुरागी सज्जनों को सदैव इनका सेवन करना चािहए और इनका सार गर्हण
करना चािहए। पशु हत्यासे िवरत ऐसे साधक ही पृथव ् ी पर िवश क े तुल्य उच्च आसन पर्ाप्त
करते हैं।
आआआआआआ मैथुन का सांकेितक अथर् है मूलाधार चकर् में िस्थत सुषप ु ्त कुण्डिलनी
शिक्त का जागृत होकर सहसर्ार चकर् में िस्थत िशशशशशशश शवतत्त्व (परबह) के साथ
संयोग अथार्त् पराशिक्त के साथ आत्मा के िवलास रस में िनमग्न रहना ही मुक्त आत्माओं
का मैथुन है, िकसी स्तर्ी आिद के साथ संसार व्यवहार करना मैथुन नहीं है। िवश् ववंद्य
योगीजन सुखमय वनस्थली आिद में ऐसे ही संयोग का परमानंद पर्ाप्त िकया करते हैं।
इस पर्कार तंतर्शास्तर् में पंचमकारों का वणर्न सांकेितक भाषा में िकया गया है
िकंतु भोगिलप्सुओं ने अपने मानिसक स्तर के अनुरूप उनके अथर्घटन कर उन्हें अपने
जीवन मे चिरताथर िकया और इस पकार अपना एवं अपने लाखो अनुयािययो का सतयानाश िकया। िजस पकार सुनदर
बगीचे में असावधानी बरतने से कुछ जहरीले पौधे उत्पन्न हो जाया करते हैं और
फलने फूलने भी लगते हैं, इसी पर्कार तंतर् िवज्ञान में भी बहुत सी अवांछनीय
ग न दिग य ा आ गयी ह ै । यह िव षय ी कामा न ध मनु ष य ो और मा स ा ह ा र ी एवं मद ल ो ल ु प
दुराचािरयों की ही काली करतूत मालूम होती है, नहीं तो शर्ीश िवऔर ऋिष पर्णीत
मोक्षपर्दायक पिवतर् तंतर्शास्तर् में ऐसी बातें कहाँ से और क्यों नहीं आतीं?
िजस शासत मे अमुक अमुक जाित की िसतयो का नाम से लेकर वयिभचार की आजा दी गयी हो और उसे धमर
तथा साधना बताया गया हो, िजस शासत मे पूजा की पदित मे बहुत ही गंदी वसतुएँ पूजा-सामगर्ी के रूप में
आवश् यकबतायी गयी हों, िजस शासत को मानने वाले साधक हजारो िसतयो के साथ वयिभचार को और नरबालको
की बिल अनुष्ठान की िसिद्ध में कारण मानते हों, वह शासत तो सवरथा अशासत और शासत के नाम को
कलंिकत करने वाला ही है। ऐसे िवकट तामिसक कायोर्ं को शास्तर्सम्मत मानकर भलाई की
इच्छा से इन्हें अपने जीवन में अपनाना सवर्था भर्म है, भारी भूल है। ऐसी भूल मे कोई पडे हुए
हों तो उन्हें तुरंत ही इससे िनकल जाना चािहए।
आजकल ऐसे सािहत्य और ऐसे पर्वचनों की कैसेटें बाजार में सरेआम िबक रही
हैं। अतः ऐसे कुमागर्गामी सािहत्य और पर्वचनों की कड़ी आलोचना करके जनता को उनके
पित सावधान करना भी राषट के युवाधन को सुरका करने मे बडा सहयोगी िसद होगा।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआआआआआ आआआआ आआआआआआआ?
अच्छी और तीवर् स्मरण शिक्त के िलए हमें मानिसक और शारीिरक रूप से स्वस्थ,
सबल और िनरोग रहना होगा। मानिसक और शारीिरक रूप से स्वस्थ और सशक्त हुए िबना हम
अपनी स्मृित को भी अच्छी और तीवर् नहीं बनाये रख सकते।
आप यह बात ठीक से याद रखें िक हमारी यादशिक्त हमारे ध्यान पर और मन की
एकागर्ता पर िनभर्र करती है। हम िजस तरफ िजतना ज्यादा एकागर्तापूवर्क ध्यान देंगे,
उस तरफ हमारी िवचारशिक्त उतनी ज्यादा केिन्दर्त हो जायेगी। िजस कायर् में भी िजतनी
अिधक तीवर्ता, िस्थरता और शिक्त लगायी जायेगी, उतनी गहराई और मजबूती से वह कायर्
हमारे स्मृित पटल पर अंिकत हो जायेगा।
स्मृित को बनाये रखना ही स्मरणशिक्त है और इसके िलए जरूरी है सुने हुए व पढ़े
हुए िवषयों का बार-बार मानना करना, अभ्यास करना। जो बातें हमारे ध्यान में बराबर
आती रहती हैं, उनकी याद बनी रहती है और जो बातें लम्बे समय तक हमारे ध्यान में
नहीं आतीं, उन्हें हम भूल जाते हैं। िवद्यािथर्यों को चािहए िक वे अपने अभ्यासकर्म
(कोसर्) की िकताबों को पूरे मनोयोग से एकागर्िचत्त होकर पढ़ा करें और बारंबार िनयिमत
रूप से दोहराते भी रहें। फालतू सोच िवचार करने से, िचंता करने से, जयादा बोलने से,
फालतू बातें करने से, झूठ बोलने से या बहाने बाजी करने से तथा कायर के कायों मे उलझे रहने से समरणशिकत
नष्ट होती है।
बुिद्ध कहीं बाजार में िमलने वाली चीज नही है, बिल्क अभ्यास से पर्ाप्त करने
की और बढ़ायी जाने वाली चीज है। इसिलए आपको भरपूर अभ्यास करके बुिद्ध और ज्ञान
बढ़ाने में जुटे रहना होगा।
िवदा, बुिद्ध और ज्ञान को िजतना खचर् िकया जाय उतना ही ये बढ़ते जाते हैं जबिक
धनयाअन्यपदाथर् खचर्करनेपरघटतेहैं।िवद्याकी पर्ािप्औ
त रबुिद्ध
केिवकास केिलएआपिजतना पर्यत्नकरेंग ,े
अभ्यास करेंगे, उतना ही आपका ज्ञान और बौिद्धक बल बढ़ता जायगा।
सतत अभ्यास और पिरशर्म करने के िलए यह भी जरूरी है िक आपका िदमाग और
शरीर स्वस्थ व ताकतवर बना रहे। यिद अल्प शर्म में ही आप थक जायेंगे तो पढ़ाई-
िलखाई में ज्यादा समय तक मन नहीं लगेगा। इसिलए िनम्न पर्योग करें।
आआआआआआ आआआआआआआआ शंखावली (शंखपुष्पी) का पंचांग कूट-पीसकर, छानकर,
महीन, चूणर् करके शीशी में भर लें। बादाम की 2 िग री और तरबू ज , खरबूजा, पतली ककडी और
मोटी खीरा ककड़ी इन चारों के बीज 5-5 ग ा म , 2 िपसता, 1 छुहारा, 4 इलायची (छोटी), 5 ग ा म
सौंफ, 1 चम्मच मक्खन और एक िगलास दूध लें।
आआआआआ रात में बादाम, िपसता, छुहारा और चारों मगज 1 कप पानी में डालकर रख
दें। पर्ातःकाल बादाम का िछलका हटाकर उन्हें दो बार बूँद पानी के साथ पत्थर पर िघस
लें और उस लेप को कटोरी में ले लें। िफर िपस्ता, इलायची के दाने व छुहारे को
बारीक काट-पीसकर उसमे िमला ले। चारो मगज भी उसमे ऐसे ही डाल ले। अब इन सबको अचछी तरह िमलाकर खूब
चबा-चबाकर खा जायें। उसके बाद 3 ग ा म शं खा व ल ी का महीन चू णर म क खन म े िम ल ाकर
चाट लें और एक िगलास गुनगुना मीठा दूध 1-1 घूँट करके पी लें। अंत में, थोड़े सौंफ
मुँह में डालकर धीरे-धीरे 15-20 िमनट तक चबाते रहें और उनका रस चूसते रहें। चूसने
के बाद उन्हें िनगल जायें।
आआआआ यह पर्योग िदमागी ताकत, तरावट और स्मरणशिक्त बढ़ाने के िलए बेजोड़
है। साथ ही साथ यह शरीर में शिक्त व स्फूितर् पैदा करता है। लगातार 40 िदन तक पर्ितिदन
सुबह िनत्य कमोर्ं से िनवृत्त होकर खाली पेट इसका सेवन करके आप चमत्कािरक लाभ
देख सकते हैं।
यह पर्योग करने के दो घंटे बाद भोजन करें। उपरोक्त सभी दर्व्य पंसारी या
कच्ची दवा बेचने वाले की दुकान से इकट्ठे ले आयें और 15-20 िमनट का समय देकर
पितिदन तैयार करे। इस पयोग को आप 40 िदन से भी ज्यादा, जब तक चाहे कर सकते है।
आआ आआआआ आआआआआआआ एक गाजर और लगभग 50-60 ग ा म पत ा गोभी अथ ा त ् 10-12
पते काटकर पलेट मे रख ले। इस पर हरा धिनया काटकर डाल दे। िफर उसमे सेधा नमक, काली िमचर् का चूणर्
और नीबू का रस िमलाकर खूब चबा चबाकर नाशते के रप मे खाया करे।
भोजन के साथ एक िगलास छाछ भी िपया करे।
आआआआआआआआआआ
रात को 9 बजे के बाद पढ़ने के िलए जागरण करें तो आधे-आधे घंटे के अंतर
पर आधा िगलास ठंडा पानी पीते रहे। इससे जागरण के कारण होने वाला वातपकोप नही होगा। वैसे 11 बजे से
पहले सो जाना ही उिचत है।
लेटकर या झुके हुए बैठकर न पढ़ा करें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठें। इससे
आलस्य या िनदर्ा का असन नहीं होगा और स्फूितर् बनी रहेगी। सुस्ती महसूस हो तो थोड़ी
चहलकदमी करें। नींद भगाने के िलए चाय या िसगरेट का सेवन कदािप न करें।
अनुकर्म
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आआआआआआ आआआआ आआ आआआआआआआआआआ
पकृित की सवोतकृष रचना है मानव। सबको िनरोग व सवसथ रखना पकृित का नैसिगरक गुण है। सवसथ रहना
िकतना सहज, सरल व स्वाभािवक है, यह आज के माहौल में हम भूल गये हैं। सदवृित्त तथा
सदाचार के छोटे-छोटे िनयमों के पालन से तथा स्वास्थ्य की इस चतुःसूतर्ी को अपनाने
से हम सदैव स्वस्थ व दीघार्युषी जीवन सहज में ही पर्ाप्त कर सकते हैं और यिद शरीर
कभी िकसी व्यािध से पीिड़त हो भी जाय तो उससे सहजता से छुटकारा पा सकते हैं।
पाणायाम, सूयोर्पासना, भगवनाम-जप तथा बहचयर का पालन – यह िनरामय (स्वस्थ) जीवन की गुरवाची है।
आआआआआआआआआआ पाण अथात् जीवनशिकत और आयाम अथात् िनयमन। पाणायाम शबद का अथर है।
श्वासोच्छवास की पर्िकर्या का िनयमन करना। िजस पर्कार एलोपैथी में बीमािरयों का मूल
कारण जीवाणु माना गया है, उसी पर्कार पर्ाण िचिकत्सा में िनबर्ल पर्ाण को माना गया है।
शरीर में रक्त का संचारण पर्ाणों के द्वारा ही होता है। पर्ाण िनबर्ल हो जाने पर शरीर
के अंग पर्त्यंग ढीले पड़ जाने के कारण ठीक से कायर् नहीं कर पाते और रक्त संचार
मंद पड़ जाता है।
पाणायाम से पाणबल बढता है। रकतसंचार सुवयविसथत होने लगता है। कोिशकाओं को पयापत ऊजा िमलने से
शरीर के सभी पर्मुख अंग-हृदय, मिस्तष्क, गु द े , फेफड़े आिद बलवान व कायर्शील हो
जाते है। रोग-पितकारक शिकत बढ जाता है। रकत, नािड़याँ तथा मन भी शुद्ध हो जाता है।
आआआआआआआ पदासन, िसद्धासन या सुखासन में बैठ जायें। दोनों नथुनों से पूरा
श्वास बाहर िनकाल दें। दािहने हाथ के अँगूठे से दािहने नथुने को बंद करके नथुने से
सुखपूवर्क दीघर् श्वास लें। अब यथाशिक्त श्वास को रोके रखें। िफर बायें नथुने को
अनािमका उँगली से बंद करके श्वास को दािहने नथुने से धीरे-धीरे छोडे। इस पकार शास को
पूरा बाहर िनकाल दे और िफर दोनो नथुनो को बंद करके शास को बाहर ही सुखपूवरक कुछ देर तक रोके रखे। अब
दािहने नथुने से पुनः श्वास लें और थोड़े समय तक रोककर बायें नथुने से धीरे-धीरे
छोड़े। पूरा श्वास बाहर िनकल जाने के बाद कुछ समय तक शव ् ास को बाहर ही रोके रखें।
यह एक पर्ाणायाम पूरा हुआ।
पाणायाम मे शास को लेने , अंदर रोकने, छोड़ने और बाहर रोकने के समय का पर्माण
कर्मशः इस पर्कार हैं 1.4-2.2 अथार्त् यिद 5 सेकेंड श्वास लेने में लगायें तो 20
सेकेंड रोकें, 10 सेकेंड उसे छोड़ने में लगायें तथा 10 सेकेंड बाहर रोकें। यह
आदर्शअ नुपात है। धीरे -धीरे िनयिमत अभयास दारा इस िसथित को पापत िकया जा सकता है।
पाणायाम की संखया धीरे-धीरे बढाये। एक बार संखया बढाने के बाद िफर घटानी चािहए। 10 पाणायाम करने के
बाद िफर 9 करें। ितर्काल संध्या में (सूयोर्दय, सूयार्स्त तथा मध्याह्न के समय) पाणायाम
करने से िवशेष लाभ होता है। सुषुप्त शिक्तयों को जगाकर जीवनशिक्त के िवकास में
पाणायाम का बडा महतव है।
आआआआआआआआआआआआ
हमारी शारीिरक शिक्त की उत्पित्त, िस्थित तथा वृिद्ध सूयर् पर आधािरत है। सूयर् की
िकरणों का रक्त, श्वास व पाचन-संस्थान पर असरकारक पर्भाव पड़ता है। पशु सूयर्िकरणों
में बैठकर अपनी बीमारी जल्दी िमटा लेते हैं, जबिक मनुषय कृितम दवाओं की गुलामी करके अपना
स्वास्थ्य और अिधक िबगाड़ लेता है। यिद वह चाहे तो सूयर् िकरण जैसी पर्ाकृितक
िचिकत्सा के माध्यम से शीघर् ही आरोग्यलाभ कर सकता है।
आआआआआआआआआआ सूयर्िकरणों में सात रंग होते हैं जो िविभन्न रोगों के उपचार
में सहायक हैं। सूयर् को अघ्यर् देते समय जलधारा को पार करती हुई सूयर्िकरणें हमारे
िसर से पैरों तक पूरे शरीर पर पड़ती हैं। इससे हमे स्वतः ही सूयर्िकरणयुक्त जल
िचिकत्सा का लाभ िमल जाता है।
आआआआआआआआआआआ सूयोर्दय क समय कम से कम वस्तर् पहन कर, सूयर् की िकरणें
नािभ पर पड़ें इस तरह बैठ जायें। िफर आँखें मूँदकर ऐसा संकल्प करें। सूयर् देवता
का नीलवणर् मेरी नािभ में पर्वेश कर रहा है। मेरे शरीर में सूयर् भगवान की तेजोमय
शिक्त का संचार हो रहा है। आरोग्यदाता सूयर्नारायण की जीवनपोषक रशि ्मयों से मेरे
रोम-रोम में रोग-पितकारक शिकत का अतुिलत संचार हो रहा है। इससे सवर रोगो का जो मूल कारण,
अिग्नमाद्य है, वह दूर होकर रोग समूल नष हो जायेगे। मौन, उपवास, पाणायाम, पातःकाल 10 िमनट तक
सूयर् की िकरणों में बैठना और भगवन्नाम जप रोग िमटाने के बेजौड़ साधन हैं।
आआआआआआआआआआआआआ हमारे ऋिषयों ने मंतर् एवं व्यायामसिहत सूयर्नमस्कार
की एक पर्णाली िवकिसत की है, िजसमे सूयोपासना के साथ-साथ आसन की िकर्याएँ भी हो जाती
हैं। इसमें कुल 10 आसनों का समावेश है। (इसका िवस्तृत वणर्न आशर्म से पर्काश ित
पुसतक बाल संसकार मे उपलबध है।)
िनयिमत सूयर्नमस्कार करने से शरीर हृष्ट पुष्ट व बलवान बनता है। व्यिक्तत्व
तेजस्वी, ओजसवी व पभावी होता है। पितिदन सूयोपासना करने वाले का जीवन भी भगवान भासकर के समान
उजजवल तथा तमोनाशक बनता है।
आआआआआआआआ आआआ
भगवान जप मे सवर वयािधिवनािशनी शिकत है। हिरनाम, रामनाम, ओंकार के उचचारण से बहुत सारी बीमािरया
स्वतः ही िमटती हैं। रोगपर्ितकारक शिक्त बढ़ती है। मंतर्जाप िजतना शर्द्धा-िवशासपूवरक
िकया जाता है, लाभ उतना ही अिधक होता है। िचन्ता, अिनदर्ा, मानिसक अवसाद (िडपेशन),
उच्च व िनम्न रक्तचाप आिद मानिसक िवकारजन्य लक्षणों में मंतर्जाप से शीघर् ही लाभ
िदखायी देता है। मंतर्जाप से मन में सत्त्वगुण की वृिद्ध होती है िजससे आहार-िवहार,
आचार व िवचार साित्त्वक होने लगते हैं। रोगों का मूल हेतु पर्ज्ञापराध व असात्म्य
इिन्दर्याथर् संयोग (इिन्दर्यों का िवषयों के साथ अितिमथ्या अथवा हीन योग) दूर होकर
मानव-जीवन संयमी, सदाचारी व स्वस्थ होने लगता है। िनयिमत मंतर्जाप करने वाले हजारों-
हजारों साधकों का यह पर्त्यक्ष अनुभव है।
आआआआआआआआआआआ वैदक शासत मे बहचयर को परम बल कहा गया है। आआआआआआआआआआआ
आआआ ।आआआआआ वीयर शरीर की बहुत मूलयवान धातु है। इसके रकण से शरीर मे एक अदभुत आकषरण शिकत उतपन
होती है, िजसे ओज कहते है। बहचयर के पालन से चेहरे पर तेज, वाणी मे बल, कायर् में उत्साह व स्फूितर्
आती है। शरीर से वीयर् व्यय यह कोई क्षिणक सुख के िलए पर्कृित की व्यवस्था नहीं है।
केवल संतानोत्पित्त के िलए इसका वास्तिवक उपयोग है। काम एक िवकार है जो बल बुिद्ध
तथा आरोग्यता का नाश कर देता है। अत्यिधक वीयर्नाश से शरीर अत्यंत कमजोर हो जाता
है, िजससे कई जानलेवा बीमािरया शरीर पर बडी आसानी से आकमण कर देती है। इसीिलए कहा गया हैः
आआआआ आआआआआआआआआआआ ।आआआआआ आआआआआआआआआआआआआआ
िबन्दुनाश (वीयरनाश) ही मृत्यु है और वीयर्रक्षण ही जीवन है।
बर्ह्मचयर् की रक्षा के िलए आशर्म से पर्काश ितपुस्तक यौवन सुरक्षा (अब िदव्य
पेरणा पकाश) अथवा युवाधन सुरक्षा पाँच बार पढ़ें। आशर्म में उपलब्ध हल्दी बूटी का पर्योग
करें। आ आआआआआआआआ आआआ इस बर्ह्मचयर् रक्षक मंतर् का जप करें। सत्संग का शर्वण
वयािध से पीिडत वयिकतयो के रोगो का िवनाश तथा सवसथ वयिकतयो के सवासथय की सुरका होती है।
अनुकर्म
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आआआआआआ आआ आआआआआआ आआआ आआ आआआ
आआआआआआआआआ
तन मन की अस्वस्थ्ता के समय भी आप िदव्य िवचार करके लाभािन्वत हो सकते हैं।
आपके शरीर को रोग ने घेर िलया हो, आप िबस्तर पर पड़े हों अथवा आपको कोई शारीिरक
पीडा सताती हो तो इन िवचारो को अवशय दुहराना। इन िवचारो को अपने िवचार बनाना। अवशय लाभ होगा।
ऐसे समय मे अपने -आप से पूछो, रोग या पीड़ा िकसे हुई है?
शरीर को हुई है। शरीर पंचभूतों का है। इसमें तो पिरवतर्न होता ही रहता है। रोग
के कारण, दबी हुई अशु िद्धबाहर िनकल रही है अथवा इस देह में जो मेरी ममता है उसको
दूर करने का सुअवसर आया है। पीड़ा इस पंचभौितक शरीर को हो रही है, दुबर्ल तन मन हुए
हैं। इनकी दुबर्लता को, इनकी पीड़ा को जानने वाला मैं इनसे पृथक हूँ। पर्कृित के इस
शरीर की रक्षा अथवा इसमें पिरवतर्न पर्कृित ही करती है। मैं पिरवतर्न से िनलेर्प हूँ।
मैं पर्भु का, पभु मेरे। मै चैतनय आतमा हँ,ू पिरवतरन पकृित मे है। मै पकृित का भी साकी हँू। शरीर की आरोगयता,
रूग्णता या मायावस्था – सबको देखने वाला हूँ।
ॐ....ॐ....ॐ.... का पावन रटन करके अपनी मिहमा में, अपनी आत्मबुिद्ध में जाग
जाओ।
अरे भैया ! िचन्ता िकस बात की ? क्या तुम्हारा कोई िनयंता नहीं है? हजारों तन
बदलने पर, हजारों मन के भाव बदलने पर भी सिदयों से तुम्हारे साथ रहने वाला
परमातमा, दर्ष्टा, साक्षी, वह अबदल आतमा कया तुमहारा रकक नही है?
क्या पता, इस रुग्णावस्था से भी कुछ नया अनुभव िमलने वाला हो, शरीर की अहंता और
सम्बन्धों की ममता तोड़ने के िलए तुम्हारे प्यारे पर्भु ने ही यह िस्थित पैदा की हो तो?
तू घबड़ा मत, िचन्ता मत कर बिल्क तेरी मजीर् पूणर् हो..... का भाव रख। यह शरीर पर्कृित का
है, पंचभूतो का है। मन और मन के िवचार एवं तन के समबनध सवपमात है। उनहे बीतने दो, भैया ! ॐ शांित....ॐ
शांित....ॐ....ॐ....
इस पर्कार के िवचार करके रुग्नावस्था का पूरा सदुपयोग करें, आपको खूब लाभ होगा।
खान पान में सावधानी बरतें, पथय अपथय का धयान रखे, िनदर्ा-जागरण-िवहार का खयाल रखे और
उपरोकत पयोग करे तो आप शीघ सवसथ हो जायेगे।
आआआ आआआआआ आआआ आआआआ आआआआआआ आआ आआआआ
आआआआ आआ आआआआआआ आआआ आआआआआआआआ फल मरीजों के िलए िहतकारी नहीं
हैं। केला और अमरूद तो मरीजों के िहत के बदले अिहत ज्यादा करते हैं। खूब कफ
बढ़ाते हैं। अनार व अंगूर के िसवाय दूसरे फल मरीजों को वैद्य से पूछकर ही खाने
चािहए।
अनुकर्म
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आआआआआ आआआआआआ आआआआआआआआ आआआआआआआआ
आआआआ आआआआआआ 9 आआ आआआआ 4 आआआ आआआ
आआआआआ साँई शर्ी लीलाशाह जी उपचार केन्दर्, संत शर्ी आसाराम जी आशर्म,
आशर्म रोड, जहागीर पुरा। फोनः 0261-2772202, 2772203
आआआआआआआआ धन्वन्तरीआरोग्यकेन्दर् , संत शर्ी आसाराम जी आशर्म, साबरमती। फोन 079-
27505010, 27505011
आआआआ (आआआआआ), आआआआआआ संत शर्ी आसारामजी आरोग्य केन्दर्। 15, गौत म
शॉिपंग सेन्टर, कोपरी। फोनः 022-21391683, 25426175
आआआआआआआआ (आआआआआ), आआआआआआ संत शर्ी आसारामजी आशर्म, आरे रोड, पेर
बाग, अनुपम िसनेमा के पीछे। फोनः 022-28790582, 25391683
आआआआआआआआआआ साँई शर्ी लीलाशाह जी आरोग्य केन्दर्, संत शर्ी आसारामजी
आशशशर्म
श , श.टी. सेक्शशन , खेमानी (महा.) फोनः 0251-2542696, 2563889
आआआआआआआआ धन्वन्तरीआरोग्यकेन्दर् , संत शर्ी आसारामजी आशर्म, िज. नंदुरबार (महा.)
फोनः 02565-240275, 240441
आआआआआआआ धन्वन्तरीआरोग्यकेन्दर्, संत शर्ी आसारामजी आशर्म, वंदे मातरम् मागर, करोलबाग।
फोनः 011-25729338, 25764161
आआआआआआ (आआआआआआआ)- संत शर्ी आसारामजी आशर्म, डाडोला गाव। फोनः 01742-
2662202, 2660202
आआआआआआआआआ संत शर्ी आसारामजी आशर्म, िकशनगुडा, पो. टोडुपलली, िज. रंगा
रेड्डी। फोनः 08413-222103, 222747
आआआआआआआआ (आआआआआ) संत शर्ी आसाराम आशर्म, साहनेवाल गाँव, नहर के पास।
फोनः 0161- 2845875, 2846875
आआआआ (आ.आआआ.)- संत शर्ी आसारामजी आशर्म, आगरा मथुरा रोड, िसकन्दरा। फोन
0562- 2642016, 2641770
अनुकर्म
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आआआआ कृपया उपरोक्त िचिकत्सा केन्दर्ों पर जाने से पूवर् फोन द्वारा िचिकत्सा
सेवा के िदन जाँच कर लें।
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