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बाल विकास भाग २

उठो भव्य! खिल रही है उषा, तीर्थ वंदना स्तवन करो।


आतथरौद्र दु ध्र्यान छोड़कर, श्री जिनवर का ध्यान करो।।१।।

अष्टापद से ऋषभदे व जिन, वासुपूज्य चम्पापुर से।


ऊिथयन्त से श्री नेमीश्वर, मुखि गये वंदों रुजच से।।२।।

पावापुरी सरोवर से इस, उषा काल में श्री महावीर।


जवधुत क्लेश जनवाथण गये हैं , नमो उन्हें झट हो भवतीर।।३।।

बीस जिनेश्वर मोक्ष गये हैं , श्री सम्मेद जशिर जगरर से।
और असंख्य साधुगण भी, जशव गये उन्हें वंदों रुजच से।।४।।

जिनवर गणधर मुजनगण की, जनवाथण भूजमयााँ सदा नमो।


पंचकल्याणक भूजम तर्ा, अजतशययुत क्षेत्र सभी प्रणमो।।५।।

शाजलजपष्ट भी शकथरयुत, माधुयथ स्वादकारी िैसे।


पुण्य पुरुष के पद रि से ही, धरा पजवत्र हुई वैसे।।६।।

जत्रभुवन के मस्तक पर जसद्ध-जशला पर जसद्ध अनंतानंत।


नमो नमो जत्रभुवन के सभी, तीर्थ को जिससे हो भव अंत।।७।।

तीर्थक्षेत्र वंदन से नंतानंत, िन्म कृत पाप हरो।


सम्यक् ‘‘ज्ञानमती’’ श्रद्धा से, शीघ्र जसद्ध सुि प्राप्त करो।।८।।
पाठ 1 : चत्ताररमंगल

चत्तारर मं गलं - अररहं त मं गलं , जसद्ध मंगलं , साहु मंगलं , केवजल पण्णत्तो धम्मो मं गलं ।

चत्तारर लोगुत्तमा- अररहं त लोगुत्तमा, जसद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगु त्तमा, केवजलपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।

चत्तारर सरणं पव्वज्जाजम- अररहं त सरणं पव्वज्जाजम, जसद्ध सरणं पव्वज्जाजम, साहु सरणं पव्वज्जाजम,
केवजल पण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जाजम।
लोक

में सबसे

मंगल शरण

४ है ये ४ है

अररहं त जसद्ध

साहू : आचायथ, उपाध्याय, साधु केवली द्वारा प्रणीत धमथ


प्रशनािली
पाठ २ : तीर्थंकर जन्मभूवम ऋषभदे व

24 भगिंत ं की 16 जनमभूवमयााँ हैं ।


अजितनार्

अयोध्या अजभनंदननार्

सुमजतनार्

अनंतनार्
श्रावस्ती (बहराइच-उ.प्र.) संभवनार्

कौशाम्बी (उ.प्र.) पद्मप्रभुनार्


४ काकन्दी पुष्पदं तनार्थ

५ चन्दपुरी (वाराणसी ) चन्द्रप्रभुनार्


सुपाश्वथनार्

६ वाराणसी

पाश्वथनार्

भजद्रकापुरी (जबहार)
७ शीतलनार्

८ जसंहपुरी (भागलपुर, जबहार) श्रेयांसनार्


शांजतनार्

९ हखस्तनापुर (मेरठ, उ.प्र.)


कंु र्ुनार्

अरनार्

१० रत्नपुरी (फैिाबाद, उ.प्र.) धमथनार्

११ कखम्पलपुरी (फर्र
थ िाबाद) जवमलनार्
१२ चम्पापुर िासुपूज्य

मल्लिनार्थ

१३ जमजर्लापुरी

नवमनार्थ

१४ रािगृही मुवनसुव्रतनार्थ
१५ शौरीपुर नेजमनार्

१६ कुण्डलपुर महावीर
प्रशनावली
जीि दया

वप्रय बालक !ं जीि दया से बढ़कर


संसार में दू सरा धमम नहीं है और जीि
वहं सा से बढ़कर दू सरा पाप नहीं है ।
ऐसा समझकर सदै ि जीि ं की दया
पालन कर ।
राजत्र भोिन त्याग

दे ख बच् !ं रावि में भ जन करना स्वास्थ्य


के वलए भी अनेक प्रकार से हावनकारक
है ।
रावि भ जन करने से मनुष्य पशु य वन
प्राप्त कर लेते हैं और यह पशु मनुष्य क्या
भगिान बन गया।
इसवलए हम सबक रावि भ जन का त्याग
कर दे ना चावहए।
कषाय : ज आत्मा क कषे अर्थाम त् दु :ख दे या पराधीन करे उसे कषाय कहते हैं ।

कषाय के भेद

क्र ध मान माया लभ


वजनिाणी स्तुवत
हे सरस्वती माता, अज्ञान दू र कर द ।
जग क दे कर साता, विज्ञान पूर भर द ।। टे क.।।

श्रुत का भण्डार भरा, तेरे ज्ञान की गं गा में।


जन मन शंगार करा, गु रुिर मुवन चन्दा ने।।
शंगार सवहत माता, श्रुतज्ञान पूणम कर द ।
जग क दे कर साता, विज्ञान पूर भर द ।।१।।

प्रभु िीर की िाणी सुन, गणधर ने संिारा है ।


मुवनगण उस पर्थ पर चल, वनज ज्ञान सुधारा है ।।
वनज ज्ञान वकरणदाता, आल क ज्ञान भर द ।
जग क दे कर साता, विज्ञान पूर भर द ।।२।।

चंदन चंदा गं गा, तन शीतल कर सकते।


मुक्ता मालाएाँ भी, वनंह मन क हर सकते।।
‘चंदनामती’ सबक , शारद मााँ कर िर द ।
जग क दे कर साता, विज्ञान पूर भर द ।।३।।